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सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

फिर करेंगे यार मेेरे तुझसे, मेरे गम की बातें.

-पंशु-

(Picture used only for referential purpose, no commercial use intended.)

​दरो दीवार से क्या पूछो मेरे दम की बातें,
मेेरे उस यार से पूछो मेरे गम की बातें.

वो मिरा यार सहर में मुझे बहलाता है,
तुम हो कि शाम से पूछो मेरे गम की बातें.

इक ​​तेरे दोस्त से बस की शिकायत थोड़ी सी,
​अब​ ना कहना ना मालूम मेरे गम की बातें.

ये बातें वो बातें बची गुजरी सारी बातें,
जगरातें सोै रातें करतीं मेरे गम की बातें.

लौट आओ ना, बसते तो नहीं लगते हो,
फिर करेंगे यार मेेरे तुझसे, मेरे गम की बातें.

© पंशु। 13102014

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

तेरी खुशबुएं...

पंशु। 25092014





ये जो सूतों के 

धागों में बंधी हैं,

तेरी खुशबुएं 

मेरे ख्वाबों में बसी हैं।

इन लिहाफों में,

इन किताबों में,

इन हवाओं में,

इन फिज़ाओं में,

जागता हूं, सोचता हूं,

फिर सहमकर सिमटता हूं,

तेरी खुशबुएं,

मेरी सांसों में बसी हैं।

तेरी खुशबुएं 

मेरे ख्वाबों में बसी हैं।

ये जो सूतों के 

धागों में बंधी हैं,

तेरी खुशबुएं 

मेरे ख्वाबों में बसी हैं।

जब सिमट कर तू

आए पनाहों में,

गेसू तेरे यूं

बिखरे हैं शानों पे,

सूंघता हूं, ढ़ूंढता हूं,

फिर पलट कर खोजता हूं,

तेरी खुशबुएं 

मेरी रग रग में बसी हैं।

तेरी खुशबुएं 

मेरे ख्वाबों में बसी हैं।

ये जो सूतों के 

धागों में बंधी हैं,

तेरी खुशबुएं 

मेरे ख्वाबों में बसी हैं।


Text © Pankaj Shukla । 2014
(Pic not used for any commercial purpose)

शनिवार, 26 नवंबर 2011

मैं बच्चा बनके फिर से रोना चाहता हूं..


के अपनी बदगुमानियों से उकता गया हूं,
मैं बच्चा बनके फिर से रोना चाहता हूं।

न हमराह न हमराज़ इन गलियों में लेकिन,
मैं इस शहर में अपना एक कोना चाहता हूं।

सुकूं आराम की मोहलत के कैसी ये क़ज़ा* है,
मैं अपनी मां के आंचल सा बिछौना चाहता हूं।

के यूं ख्वाहिश जगी दाग़ औ कीचड़ के फाहों की,
मैं बच्चा बनके राह गलियारों में सोना चाहता हूं।

सिसकना सब्र से ईमां का अब होता नहीं रक़ीब*,
ना बन दस्त ए गिरह रफ़ीक*, मैं खोना चाहता हूं।

मुसल्लम ए ईमां हूं क़ाफिर की सज़ा पाई है,
अब बोसा* ए संग ए असवद* भी धोना चाहता हूं.. (पंशु.)



क़ज़ा- मौत। रक़ीब - दुश्मन। रफ़ीक - दोस्त।
बोसा - चुंबन। संग ए असवद - मक्का का पवित्र पत्थर।

सोमवार, 26 सितंबर 2011

तेरी लाडो मुन्नी मेरी...


दर ओ दीवार कभी बनते हैं घरों से सजते हैं,
रहा करे सुपुर्द ए खाक़ मेरी बसुली, कन्नी मेरी।

दरिया ए दौलत में उसे सूकूं के पानी की तलाश,
तर बतर करती बूंद ए ओस सी चवन्नी मेरी।

तू सही है गलत मैं भी नहीं ना कोई झगड़ा है,
वो आसमां उक़ूबत का ये घर की धन्नी मेरी।

मेरी गुलाटियों औ मसखरी को मजबूरी न समझ,
उछाल रुपये सा न मार ग़म की अठन्नी मेरी।

रगों में इसकी खून मेरा तो हो दूध तेरा भी,
सर ए दुनिया रहे चमके तेरी लाडो मुन्नी मेरी।

© पंकज शुक्ल। 2011।

रविवार, 25 सितंबर 2011

ज़िक्र इक शाम का...


ज़िक्र इक शाम का यूं कर आया,
सरे राह ख्वाबों का सफर उग आया,
वो नहीं ना उनकी बेचैनी सा आलम है,
मेरी आंखों में ये आब है किसका साया।

वो गुमज़ुबां सी बोली, उसने आंखों से सुना,
थिरकते पांव की खुरचन को सिरहाने पे बुना,
खिंची थी मेड़ सी, अब मिलने का मातम है,
तेरी हंसी तेरी मुस्कान से क्यूं फिर शरमाया
मेरी आंखों में ये आब है किसका साया,
ज़िक्र इक शाम का यूं कर आया,
सरे राह ख्वाबों का सफर उग आया।

कभी थी ताप अब छांव रुई के फाहे सी,
कसम दी कोसों की अब दिल में चाहे सी
कहीं ना दूर गया वो, उसी का आदम है,
ख़री बात पे टिक के वो कब का भर पाया,
मेरी आंखों में ये आब है किसका साया,
ज़िक्र इक शाम का यूं कर आया,
सरे राह ख्वाबों का सफर उग आया।

© पंकज शुक्ल। 2011।

Pic Courtesy: Nokia । Vfx: Sound N Clips।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

सलाम ए सितमगर..










लो आ गया वो फिर से उसी शहर उन्हीं गलियों में,
नसीब उसका, रिवायत वही राह ए गुजर बनने की।

ना कर वादे, वादों पे नहीं अब और ऐतबार उसे,
मर चुकी ख्वाहिश भी हमराह ए सफर बनने की।

अपने शागिर्द की उस्तादी का भरम वो तोड़ चला,
हो के रुसवा बढ़ी चाहत यूं रूह ए इतर बनने की।

उसका एहतराम वो संगदिल भी थोड़ा सनकी भी,
हो के बेगैरत पड़ी आदत ज़िक्र ए फिक़र बनने की।

उसने परखा परखने में कोई अपना नहीं निकला,
मुए की आदत थी मुई लख़्त ए जिगर बनने की।

© पंकज शुक्ल। 2011।

picture used for reference only. no commercial use intended.

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

ये वक़्त ए इद्दत है..

सितमगर को मालूम, है खा़क़ ए मंज़िल मकां,
ये मेला कब्र का, यूं साज ओ सामां क्यूं है।

अज़ल का ख़ौफ़, है पैबस्त ए पेशानी शिक़न,
सफर ये सब्र का, यूं ज़ुल्म ओ दामां क्यूं है।



ज़फ़ा की जुस्तजू, शिद्दत से पुर ओ इमां से,
यही तरीक़ अजल से, यूं ग़म ए गिरेबां क्यूं है।

नहीं मैं दूर, ना तुझसे ना इस ज़माने से,
ये वक्त ए इद्दत है, यूं शाम ए परेशां क्यूं है।

ये तेरा दामन, रंगेगा और अभी छीटों से,
तू है शैदाई, यूं सहर ए तमाशा क्यूं है।



अज़ल-मौत। पैबस्त-समाया। पेशानी-माथा। अजल- क़यामत का पहला दिन। इद्दत- तलाक़ के बाद पुनर्विवाह से पहले की न्यूनतम मियाद। सहर- सुबह।


© पंकज शुक्ल। 2011।

चित्र सौजन्य- फिल्म 'प्यासा'

सोमवार, 12 सितंबर 2011

चटख़ चोला, फीक़े रंग..



मौसम के रंग देखकर रंगीं वो यूं हुए,
रंगों ने रातें ओढ़ लीं मौसम बदल दिए।

बदली घिरी बूंदों तले मेघों को हुआ रश्क़,
षडयंत्र सावनों के देख बादल बदल दिए।

भादों के भाव भोर तक गिनता रहा रफ़ीक,
घिरती घटा के छांव यूं घनघोर हो गए।

किलकी किरन बादलों के काले कोह चीर के,
छपकी छपक छलांगकर उस छोर हो गए।

रंगरेज़ बेईमान है, चोला है मुख़्तसर,
नीयत पे दाग़ इस कदर चेहरे बदल दिए

© पंकज शुक्ल। सितंबर 2011।


(image used here is only for referential purpose)

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

तू मेरी फरियाद रहे..


तू मेरी उम्र में चांद सी इठला ना सकीं,
स्याह मेरी रात तो क्या,
चांदनी तू आबाद रहे।

मैं भीगूं ना भीगूं ये मेरी किस्मत है,
तेरी तक़दीर है बरसना,
तू यूं ही शाद रहे।

मैं इक़ रोज़ तेरी आंख से बह जाऊंगा,
तेरे रुखसार से लिपटना,
मुझे भी याद रहे।

तू मेरी सांस से लिपटी है सूरज की तरह,
मैं तेरी शाम बनूं,
सुबह तेरी ही बात रहे।

सबने मांगी हैं रब से सलामती की दुआ,
वो उनके हाथ रहे,
तू मेरी फरियाद रहे।

मिल जो जाए अब मौत अचानक से मुझे,
मैं उसके साथ रहूं,
तू सबके साथ रहे। (पं.शु.)


पेटिंग सौजन्य- संगीता रोशनी बाबानी

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

फरवरी की पांचवीं तारीख...

रचनाशीलता का एक अनोखा संगम 9 फरवरी को मुंबई में हो रहा है। यूनियन पार्क, खार की आउट ऑफ द ब्लू आर्ट गैलरी में मशहूर अभिनेता फारुख शेख कैनवास और कलम के इस संगम का उद्घाटन करेंगे। मशहूर पेंटर संगीता रोशनी बाबानी की पेटिंग्स पर लिखी गईं मेरी कुछ रचनाएं इस दिन पेटिंग्स के साथ सार्वजनिक पठन के लिए प्रदर्शित की जाएंगी। आप भी आमंत्रित हैं। प्रदर्शनी 20 फरवरी तक चलेगी।



वो जो हलचल है तेरे दिल में मेरी हरक़त है,
मेरी जुंबिश ही तेरे हुस्न की ये बरक़त है।

मेरी गुस्ताख़ नज़र ने तुझे फिर से देखा,
तू कुछ औऱ खिली, और रंगीं शफ़क़त है।

गुम हूं पास तेरे तू ही ढूंढती मुझको,
मेरे सीने में छिपी क्या ये तेरी हसरत है।

तेरे करीब हूं, फिर भी जुदा सी तू मुझसे,
मेरी तदबीर से संवरी ये किसकी किस्मत है।

तेरा ये गोरा रंग, फितरत मेरी ये काली सी,
ना तू मंदिर में रहे फिर भी मेरी इबादत है। (पं.शु.)

पेंटिंग सौजन्य- संगीता रोशनी बाबानी