
के अपनी बदगुमानियों से उकता गया हूं,
मैं बच्चा बनके फिर से रोना चाहता हूं।
न हमराह न हमराज़ इन गलियों में लेकिन,
मैं इस शहर में अपना एक कोना चाहता हूं।
सुकूं आराम की मोहलत के कैसी ये क़ज़ा* है,
मैं अपनी मां के आंचल सा बिछौना चाहता हूं।
के यूं ख्वाहिश जगी दाग़ औ कीचड़ के फाहों की,
मैं बच्चा बनके राह गलियारों में सोना चाहता हूं।
सिसकना सब्र से ईमां का अब होता नहीं रक़ीब*,
ना बन दस्त ए गिरह रफ़ीक*, मैं खोना चाहता हूं।
मुसल्लम ए ईमां हूं क़ाफिर की सज़ा पाई है,
अब बोसा* ए संग ए असवद* भी धोना चाहता हूं.. (पंशु.)
क़ज़ा- मौत। रक़ीब - दुश्मन। रफ़ीक - दोस्त।
बोसा - चुंबन। संग ए असवद - मक्का का पवित्र पत्थर।
शानदार ग़ज़ल.
जवाब देंहटाएंकुछ रचनाकार rachanakar.org के लिए भी भेजें.
शुक्रिया रविशंकर जी। आप चाहें तो इसका प्रकाशन यथोचित लेखन श्रेय देते हुए अपने पोर्टल पर सकते हैं।
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर गज़ल्।
जवाब देंहटाएंआभार..वंदना जी। यूं ही स्नेह बनाए रखिए।
जवाब देंहटाएंशुक्रिया संगीता जी..आपकी तारीफ मेरा हौसला बढ़ाती है।
जवाब देंहटाएंbahut hi khubsurat :)
जवाब देंहटाएं:)) धन्यवाद..महुवा।
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