-पंशु-
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दरो दीवार से क्या पूछो मेरे दम की बातें,
किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार, जीना इसी का नाम है..! - शैलेंद्र (1959)
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यह पर्चा मेले में “हिंदू कौन है?” शीर्षक के साथ बांटा जा रहा है। पर्चे में पहले तो हिंदू शब्द की उत्पत्ति और इसके एक धर्म होने के आधार पर सवाल उठाए गए हैं, लेकिन फिर बात पहुंच जाती है वहां, जहां से वंदे मारतम् का विरोध करने वालों के दावों की हवा निकलती दिखाई देती है। इसके मुताबिक इस्लाम के पहले ईशदूत का भारतीय होना इस्लाम का भारतीय मूल का धर्म सिद्ध करता है। इसके अलावा अंतिम ईशदूत हज़रत मुहम्मद को भारत की ओर से जन्नत की सुगंध आना, निश्चित रूप से भारत को विश्व के सभी मुसमलमानों की पुण्य भूमि करार देता है। हिंदुस्तान की तारीफ में आगे लिखा गया है कि हजरत मुहम्मद के जन्म के पूर्व से ही अरब निवासी हमारी सुंदर भूमि को हिंद कहते थे। अरब देशों में सुंदर स्त्रियों का नाम हिंदा रखा जाता था। बहुत हदीसों में हिंद शब्द भारत के लिए प्रयुक्त हुआ है। यह भी कहा गया है कि हिंद नाम अरबी मूल का है।
ऐसा ही एक और हरा पर्चा मेले में “मानवता का दूत” शीर्षक के साथ बांटा जा रहा है। लेकिन उसकी चर्चा से पहले मेले में बिक रही एक किताब “फ्रीडम ऑफ रिलीज़न एंड टॉलरेंस इन इस्लाम” का ज़िक्र ज़रूरी हो जाता है। ये किताब इस्लामिक आतंकवाद की जड़ पर चोट करती है। कुरान शरीफ की आयतों का ज़िक्र करते हुए ये किताब उन लोगों को संदेश देने की कोशिश करती है जो आतंक की राह पर चल चुके हैं। अमेरिका पर अपहृत विमानों के ज़रिए किए गए 9/11 के हमले की मुख़ालिफत करते हुए ये किताब कुरान शरीफ का हवाला देते हुए कहती है कि एक मुसलमान को अच्छा हमसफर और उतना ही अच्छा हमराही होना चाहिए। किसी भी मुसलमान को अपने सहयात्री को नुकसान पहुंचाना ग़लत है, बारूद से विमान को उड़ाना या फिर हवाई जहाज को ले जाकर टकरा देने जैसी बात तो किसी मुसलमान को सोचनी भी नहीं चाहिए। किताब के एक सफे पर यह भी लिखा है कि इस्लाम एक मुसलमान को गैर मुसलमानों के साथ भी शांति, सद्भाव और मित्रवत रहने की सीख देता है। इसमें अनजान पड़ोसी के साथ भी अच्छे व्यहार की बात कहते हुए इस अनजान पड़ोसी के साथ किसी भी तरह से यानी जाति, धर्म या देश के आधार पर भेदभाव को गलत ठहराया गया है।
बात यहीं तक रुकती नहीं है, ये किताब कुरान की उन आयतों का चुन चुन कर ज़िक्र करती है, जिन्हें आज के वक्त में इस्लाम को मानने वाले हर शख्स को पढ़ना और इन पर अलम करना ये किताब ज़रूरी मानती है। जिहाद पर इस किताब में खास तौर से अलग से चर्चा की गई है। कुरान शरीफ की आयतों का हवाला देते हुए इसमें कहा गया है कि जिहाद का पहला मतलब जंग नहीं है। फिर हदीस का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि जिहाद का बेहतरीन उदाहरण है कायदे से किया गया हज़ और जिहाद का मतब है अपने आप से जंग खुद को एक नैतिक और आध्यात्मिक तौर पर एक बेहतर इंसान बनाने के लिए। यही नहीं मुसलमान के मायने को साफ करते हुए ये किताब कहती है –कि मुसलमान वो है जो गुस्से पर काबू करे और लोगों को माफ करे।
पिछले कई दिनों से इस किताब के खास हिस्सों को अलग से पन्नों पर छाप कर भी मेले में बांटा जा रहा है और दिलचस्प बात ये भी है कि इस बार मेले में इस्लामिक साहित्य के छोटे ही सही पर जगह जगह लगे स्टालों पर दूसरे धर्मों के लोगों की खासी भीड़ भी दिख रही है। कुरान शरीफ़ के देवनागरी में तर्जुमे और अंग्रेजी अनुवाद की अच्छी खासी बिक्री हो रही है। मायने साफ है कि लोग इस्लाम को नज़दीक से जानने की उत्सुकता लिए आते हैं और इसी बहाने कुछ लोग ही सही पर इस्लाम के दामन पर चंद फिरकापरस्तों की तरफ से लगाए जा रहे दाग को धोने की कोशिश कर रहे हैं। ये सफेद हरे पर्चे बताते हैं कि इस्लाम पर बार बार उठती उंगली से एक तबका खासा परेशान है, और ये तबका चाहता है कि आतंक के हर हमले के बाद उंगली आतंकवादियों पर ही उठे, इस्लाम पर नहीं।
इस्लाम की शुरुआती वक्त की तारीफ करते हुए एक दूसरा हरा पर्चा भी मेले में मिला। मक्का शहर में जन्मे एक अनाथ बच्चे की कहानी कहता हुआ ये पर्चा धीरे धीरे हजरत मुहम्मद की शोहरत तक आता है। पर्चा कहता है कि इस्लाम को मानने वालों की तादाद ज्यों ज्यों बढ़ती गई, जुल्म व सितम का खात्मा हो गया। आतंकवाद का नाम व निशान न रहा। लोग दुख व दर्द में एक दूसरे के काम आने लगे। अनाथों और बेवाओं का संरक्षण करना लोग अपना कर्तव्य समझने लगे। गरीबों के लिए अमीरों की आमदनी में से ढाई फीसदी का अनिवार्य दान निर्धारित हुए। ईश्वर के बाद सबसे ज्यादा मान सम्मान की हक़दार मां को बनाया गया। शराब और जुए की लानत जड़ से समाप्त हो गई। लड़की के जन्म को शुभ माना जाने लगा। स्त्रियों के लिए विरासत में हिस्सा नियुक्त हुआ। इंसानों ही नहीं पशुओं के भी अधिकार मुकर्रर हुए, बदला लेने के बजाए माफी की शिक्षा दी गई। इन लाइनों को ध्यान से पढ़ें तो ये सारी बातें वहीं हैं जो एक विकसित समाज के लिए ज़रूरी होती हैं और जिनके लिए भारत समेत कई दूसरे देशों में बाद की सरकारों ने कानून तक बनाए। मतलब ये कि इस्लाम को दकियानूसी और रूढ़वादी मानने वालों तक ये बात पहुंचाने की कोशिश की जा रही है कि इस्लाम भी उतना ही प्रोग्रेसिव है जितना कि दुनिया के दूसरे धर्म। इस्लाम को इस पर्चे में इतिहास का सबसे अद्भुत और शांतिपूर्ण इंकलाब भी बताया गया है। ध्यान देने की बात ये भी है कि ये सारे पर्चे या तो हिंदी या फिर अंग्रेजी में हैं। उर्दू लिपि में कहीं कोई पर्चा बंटना नज़र नहीं आता यानी कि ये बात भी करीब करीब साफ़ है कि ये पर्चे बांटे किनके लिए जा रहे हैं।
इस्लाम को लेकर दूसरे धर्मों के लोगों के बीच हमेशा से भ्रांतियां रही हैं। अंग्रेजी में एक नए शब्द इस्लामोफोबिया का चलन भी शुरु हुआ और गैर मुस्लिम पढ़े लिखे लोगों के बीच इस शब्द का इस्तेमाल आजकल धड़ल्ले से होता है। न्यूयॉर्क और लंदन से निकला ये शब्द हाल ही में हुए प्रवासी भारतीय दिवस में भी खूब सुनाई दिया। मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में तो निर्देशक और लेखक सीना ठोंक कर कहते हैं कि उनकी फिल्म इस्लामोफोबिया पर बनी है। लेकिन, सोचने वाली बात ये है कि लोग इस्लाम से डरते हैं या फिर पाकिस्तान और अफगानिस्तान में छुपे बैठे उन दहशतगर्दों से जो अपने नापाक इरादों को जायज़ ठहराने के लिए इस्लाम का सहारा लेने लगते हैं। ये पर्चे अगर कुछ इशारा करते हैं तो यही कि अब इस्लाम को मानने वालों ने ही अपने बीच के इन चंद फिरकापरस्तों को अलग थलग करने की छोटी सी ही सही पर स्वागत योग्य पहल की है। कुरान शरीफ की आयतों के ज़रिए अगर इस्लाम के असली मकसद को सबके सामने लाया जाता है तो इसका खुले दिल से ख़ैरमकदम किया जा चाहिए। जैसा कि कुरान शरीफ़ भी कहती है – धर्म में ज़बर्दस्ती के लिए कोई जगह नहीं है। आमीन।