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सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

फिर करेंगे यार मेेरे तुझसे, मेरे गम की बातें.

-पंशु-

(Picture used only for referential purpose, no commercial use intended.)

​दरो दीवार से क्या पूछो मेरे दम की बातें,
मेेरे उस यार से पूछो मेरे गम की बातें.

वो मिरा यार सहर में मुझे बहलाता है,
तुम हो कि शाम से पूछो मेरे गम की बातें.

इक ​​तेरे दोस्त से बस की शिकायत थोड़ी सी,
​अब​ ना कहना ना मालूम मेरे गम की बातें.

ये बातें वो बातें बची गुजरी सारी बातें,
जगरातें सोै रातें करतीं मेरे गम की बातें.

लौट आओ ना, बसते तो नहीं लगते हो,
फिर करेंगे यार मेेरे तुझसे, मेरे गम की बातें.

© पंशु। 13102014

रविवार, 30 जून 2013

शाहरुख का ‘बहादुर’ और वॉटरमैन

पंकज शुक्ल

बहादुर के परिवेश के बारे में बताते वक्त 78 साल के आबिद सुरती के चेहरे की चमक देखने लायक थी। फिर जैसे ज़ोर का झोंका आए और लौ फड़फड़ाने लगे, वैसी ही बेचैनी के साथ बताने लगे, “शाहरुख से पहले कबीर सदानंद ने भी बहादुर पर फिल्म बनाने की प्लानिंग की थी। हमने इस किरदार को ट्रेडमार्क रजिस्टर्ड कराना चाहा। पर पता चला कि एक बहुत बड़े मीडिया हाउस ने 'बहादुर बाई आबिद सुरती' नाम का ट्रेडमार्क अपने नाम रजिस्टर्ड करा लिया है।”

गतांक से आगे...

शाहरुख खान के घर उस रोज़ उनसे लंबी बातें हुईं। बचपन की शरारतों के बारे में वो बोले, अपने सपनों के बारे में बातें की और बताया कि खाली वक्त में कैसे वो खुद को किताबों में बिजी रखते हैं। नीचे हाल में खड़े खड़े ऊपर के कमरे की तरफ इशारा किया और बोले, एक पूरी लाइब्रेरी मैंने बना रखी है वहां। आर्यन को तो ज्यादा किताबों का शौक रहा नहीं, हां, सुहाना को पन्नों में खोए रहना अच्छा लगता है।‘ बात घूम फिरकर फिर सिनेमा पर आई और एक बार फिर शाहरुख के दिल से छलक आई वो ख्वाहिश जो वो हिंदी सिनेमा के बादशाह होकर भी पूरी नहीं कर पा रहे हैं। दरअसल, शाहरुख बड़े परदे पर ‘बहादुर’ बनना चाहते हैं। जिनकी उम्र पैंतालिस पचास के आसपास होगी, उनको अपने बचपन के इंद्रजाल कॉमिक्स ज़रूर याद होंगे। एक रूपये की एक किताब मिलती थी और वो एक रुपया भी जुगाड़ना जतन का काम होता था। किराए पर तब 10 पैसे में मिला करते थे कॉमिक्स।

इंद्रजाल कॉमिक्स याद होंगे तो फिर उनका एक किरदार ‘बहादुर’ भी याद होगा। ‘बहादुर’ यानी इसी नाम से बनी कॉमिक सीरीज का हीरो। बाप जिसका डाकू था, लेकिन उसने कानून के पाले में आने का फैसला किया। केसरिया कुर्ता, डेनिम की जींस। कॉमिक्स की दुनिया का पहला हिंदुस्तानी हीरो। दुनिया भर में वो आबिद सुरती के बहादुर के नाम से मशहूर हुआ। शाहरुख खान इस किरदार का चोला पहनकर बड़े परदे पर आना चाहते हैं। बोले, “बचपन में इसके बारे में खूब पढ़ा। पूरा कलेक्शन जमा करके रखा। अब मन किया कि इस पर फिल्म बनाई जाए तो इसके कॉपराइट नहीं मिल रहे।” शाहरुख खान जैसी हस्ती किसी किरदार पर फिल्म बनाना चाहे और उसके सामने ऐसी अड़चनें आ जाए कि वो भी न पार सकें तो मन में उत्सुकता तो जागती ही है।

यहां से शाहरुख ने शुरू की कहानी मुंबई के वॉटरमैन की। ये वॉटरमैन और कोई नहीं, हमारे आपके अजीज़ आबिद सुरती साब ही हैं। जी हां, वही जिनके कॉमिक किरदार ढब्बू जी ने कभी धर्मवीर भारती तक पर उर्दू को बढ़ावा देने का इल्जाम लगा दिया था, और वो इसलिए कि ढब्बूजी धर्मयुग के पीछे के पन्ने पर छपते थे और लोग धर्मयुग खरीदने के बाद उसे पीछे से ही पढ़ना शुरू करते थे। आबिद सुरती के किरदार दुनिया भर में मशहूर हैं। उनकी लिखी कहानियां परदेस में हिंदी सीखने के इच्छुक लोगों को क्लासरूम में पढ़ाई जाती हैं। नाटककार भी वो रहे। फिल्मों में स्पॉट बॉय से लेकर लेखन तक में हाथ आजमाया। पेंटर ऐसे कि अगर एक ही लीक पकड़े रहते तो आज एम एफ हुसैन से आगे के नहीं तो कम से कम बराबर के कलाकार होते।

आबिद सुरती मुंबई से थोड़ा दूर बसे इलाके मीरा रोड में अकेले रहते हैं। दोनों बेटे सैटल हो चुके हैं। एक का तो शाहरुख ने नाम भी लिया, किसी कंपनी में नौकरी लगवाने के सिलसिले में। आबिद की पत्नी अपने बच्चों के साथ हैं, और वो मीरा रोड में ही ड्रॉप डेड एनजीओ के नाम पर नलों से पानी टपकने के खिलाफ मुहिम चलाते हैं। पढ़ने में अजीब सा लग सकता है लेकिन कोई छह साल पहले अपने एक दोस्त के घर में लेटे आबिद सुरती को घर के बूंद बूंद टपकते नल ने सोने नहीं दिया। और, बस वहीं से ये ख्याल जनमा। हर इतवार आबिद अपना झोला लेकर घर से निकलने लगे। झोले में होती कुछ रिंचे, प्लास और वाशर। वो सोसाइटी के घर घर जाकर टपकते नल ठीक करने लगे। और, यहीं से शुरू हुई ड्रॉप डेड फाउंडेशन की। शाहरुख खान ने आबिद सुरती की इस मुहिम के बारे में किसी अखबार में पढ़ा और उन्हें एक लंबा एसएमएस भेज दिया। शाहरुख ने ये भी लिखा कि कैसे वो बचपन से “बहादुर” के फैन रहे हैं। फैन मैं भी बचपन से ढब्बू जी का रहा हूं। शाहरुख ने बस इस किरदार को बनाने वाले आबिद सुरती से मुलाकात की मेरी इच्छा को फिर से जगा दिया। आबिद सुरती की फ्रेंड लिस्ट में मैं शामिल रहा हूं और उनकी सालगिरह पर मुबारक़बाद भी भेजता रहा हूं। इस बार बात आगे बढ़ी। मैंने संदेश भेजा। उनका जवाब आया। पिछले इतवार हम मिले फन रिपब्लिक के पास एक रेस्तरां में।

बातों बातों में ज़िक्र फिर से बहादुर का निकला। बहादुर के परिवेश के बारे में बताते वक्त 78 साल के आबिद सुरती के चेहरे की चमक देखने लायक थी। फिर जैसे ज़ोर का झोंका आए और लौ फड़फड़ाने लगे, वैसी ही बेचैनी के साथ बताने लगे, “शाहरुख से पहले कबीर सदानंद ने भी बहादुर पर फिल्म बनाने की प्लानिंग की थी। हमने इस किरदार को ट्रेडमार्क रजिस्टर्ड कराना चाहा। पर पता चला कि एक बहुत बड़े मीडिया हाउस ने 'बहादुर बाई आबिद सुरती' नाम का ट्रेडमार्क अपने नाम रजिस्टर्ड करा लिया है।” सुनकर बड़ा दुख हुआ। दूसरों के अधिकारों की दिन रात बात करने वाले मीडिया हाउस क्या ऐसे भी किसी कलाकार का हक मार देते हैं। कॉपीराइट कानून कहता है कि किसी कृति के बनाते ही उसका कॉपीराइट सृजक के नाम हो जाता है। उसका कहीं रजिस्ट्रेशन जरूरी नहीं। माने कि अगर कोई ढंग का वकील आबिद सुरती का मामला अपने हाथ में ले तो उनके बौद्धिक संपदा अधिकार उन्हें मिल सकते हैं। मुझे खुद एक हफ्ता लग गया इस बात को दुनिया के सामने लाने में। चाहता हूं उनकी लड़ाई लड़ूं। जितना बन सकेगा कोशिश करूंगा। क्या आप साथ देंगे?

रविवार, 17 जून 2012

कामयाब होने से ज्यादा मुश्किल बेहतर इंसान बनना- मिथुन चक्रवर्ती



फुटपाथ से उठकर सतरंगी आसमान पर छा जाने वाले मिथुन चक्रवर्ती हिंदी सिनेमा के आखिरी सुपर सितारे हैं। दो वक्त की रोटी कमाने के लिए कभी टैक्सियों पर स्टिकर चिपकाने वाले मिथुन बाद में देश में सबसे ज्यादा व्यक्तिगत आयकर चुनाने वाले रईस भी बने। अपने प्रशंसकों के बीच प्रभुजी के नाम से पूजे जाने वाले मिथुन चक्रवर्ती बता रहे हैं कामयाबी के कुछ अनोखे मंत्र।

© पंकज शुक्ल

दादा, वैसे तो आपके बारे में जितना जानने की कोशिश की जाए कम है, और आप हैं कि अपनी संघर्ष यात्रा के बारे में ज्यादा कुछ लोगों को बताते भी नहीं हैं, ऐसा क्यों?
-शायद मेरी आदत नहीं रही शुरू से अपने बारे में ज्यादा बात करने की। आप ने तो मुझे बरसों से देखा है। मुझे अपनी मार्केटिंग करने का शौक कभी नहीं रहा। मैं कर्म करने में विश्वास करता हूं। ईश्वर में आस्था रखता हूं और कोशिश में रहता हूं कि ये जीवन जिन ऋणों को चुकाने के लिए मिला है, वे सारे समय रहते पूरे कर सकूं। जीवन एक ऐसा चक्र है जिसमें उतार चढ़ाव, यश अपयश, ऊंच नीच सब लगी रहती है। इससे परेशान होने वाला ही जीवन को जी नहीं पाता। मेरा फलसफा रहा है कि दूसरों के बीच खुशियां बांटते रहो, आपके बीच खुशियां खुद चलकर आएंगी। मेरी खुशियां भी हमेशा खुशियां बांटने से ही बढ़ीं हैं।

आपने एक बार कहा था कि आप उस इंसान की आखिरी आशा हो जिसकी कोई आशा पूरी न हुई हो। आज भी आपके यहां निर्माताओं की कतार लगी रहती है, पर अब तो आप उतनी फिल्में नहीं करते?
-ये दिलचस्प है कि लोग मुझे अब भी मुख्य भूमिकाओं के लिए साइन करने आते हैं। क्षेत्रीय भाषाओं के निर्देशक अब भी मुझे बतौर हीरो रिटायर नहीं होने देना चाहते। हिंदी फिल्मों में मेरे बाद दो तीन पीढ़ियां आ चुकी हैं तो वहां मैं अब अपने हिसाब से फिल्में करता हूं। दूसरा मेरा क्या मानना है कि किसी चीज को ज्यादा घिसने से उसकी चमक चली जाती है। मैं जीवन के आखिरी दिन तक काम करना चाहता हूं, इसके लिए जरूरी है कि मैं उतना ही काम करूं जितना मेरे लिए सही है। मैंने हर तरह का समय देख लिया, अब तो बस मैं सिनेमा का होकर उसका लुत्फ लेना चाहता हूं।

फिल्म मृगया में अपनी पहली ही फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार जीतने के बाद पहला इंटरव्यू देने से पहले आपने एक पत्रकार से मांगकर बिरयानी खाई थी, अब आप सैकड़ों लोगों का पेट खुद भरते हैं, इसे समय चक्र मानते हैं या कुछ और?
-मेरा ये स्पष्ट मानना रहा है कि कर्म और भाग्य दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। भाग्य अक्सर आपसे वही कर्म करवाता है जिसकी नियति आपके लिए शायद पहले से तय है। लेकिन, कर्म से भाग्य भी बदले जाते हैं। पक्की लगन और अनुशासन हो तो लक्ष्य पा लेने में दिक्कत कम होती है। दूसरे मेरा ये मानना है कि समय के हिसाब से भी हमें अपने लक्ष्य तय करने चाहिए। हमारे लक्ष्य छोटे छोटे और अनवरत बनते रहने चाहिए। हमें अपनी मंजिल पहले कदम में उतनी ही बनानी चाहिए, जितनी हमारी नजरों के सामने है। पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में मुझे देखकर मृणाल बाबू ने मुझे मृगया दे दी थी, लेकिन जरूरी नहीं कि हर कोयले को ऐसा जौहरी जीवन में मिल ही जाए। समय बदला है, जौहरी भी अब बाजार के हिसाब से हीरे तलाशने लगे हैं तो जाहिर है ऐसे में गुदड़ी के लालों को मौका नहीं मिल पा रहा है। लेकिन, मैं आखिरी इंसान नहीं हूं जो फुटपाथ से उठकर यहां तक आया। लोगों की उम्मीदें बंधती रहेंगी और लोग कामयाबी भी पाते रहेंगे।

और, आपसे लगी ऐसी ही छोटी छोटी उम्मीदों ने ऐश्वर्या राय को अपनी पहली ही फिल्म में आपकी हीरोइन बनने से वंचित कर दिया?
-अरे शुक्लाजी, वो बहुत पुरानी कहानी हो चुकी। लेकिन, आपकी बात सही है। मोहनलाल वाला रोल लेकर मणिरत्नम पहले मेरे पास ही आए थे। पर मैं करता क्या मेरी एक दर्जन से ज्यादा फिल्में फ्लोर पर थीं और अगर मैं इस रोल के हिसाब से बाल कटा लेता तो बाकी सारे निर्माताओं की फिल्में आगे खिसक जातीं। मैं नहीं चाहता था कि मुझे कोई बड़ा मौका मिले तो मेरे सहारे अपना घर बार छोड़े बैठे फिल्म निर्माताओं को नुकसान हो। अपना भला करके दूसरों को भला करना तो बहुत आसान है। मजा तो तब है कि आपको पता है कि दूसरे के इस भले में आपका नुकसान हो रहा है, पर आप को उसमें भी आनंद आता है। जीवन में कामयाब होना ज्यादा मुश्किल नहीं है, मुश्किल है बेहतर इंसान बनना।

और, वो एक ही साल भगवान और शैतान के किरदारों के पुरस्कृत होने का किस्सा?
-अभिनेताओं को भी ये गजब की नियामत हासिल है। वो हर फिल्म में क्या क्या भेस धरकर पर लोगों के सामने आते हैं? लेकिन क्या कभी हम सोचते हैं कि ये कितनी बड़ी चीज हमें ईश्वर ने दी है। स्वामी विवेकानंद की शूटिंग चल रही थी। लंच ब्रेक था और मैं एक पेड़ के नीचे बैठकर सिगरेट पीने लगा। कुछ महिलाएं वहां थोड़ी परे खड़े होकर सहमे सहमे मुझे देख रही थीं। फिर उनमें से दो तीन हिम्मत करके मेरे पास आईं। मैं फिल्म में रामकृष्ण परमहंस का किरदार कर रहा था। महिलाएं आईं और आते ही प्रणाम किया। फिर मेरी सिगरेट की तरफ इशारा किया। बोलीं, आप भगवान हैं। इसे मत पीजिए। मैं तो जैसे बैठे बैठे ही काठ का हो गया। इसके बाद पूरी फिल्म जब भी मैं गेटअप में रहा, मैंने सिगरेट को हाथ नहीं लगाया। इस फिल्म के लिए मुझे 1995 में अभिनय का एक और राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उसी साल फिल्म जल्लाद के लिए मुझे सर्वश्रेष्ठ खलनायक का पुरस्कार मिला। सलाम है ऐसे दर्शकों का जिन्होंने मुझे एक ही साथ भगवान के रूप में भी प्यार दिया और मैं खलनायक बना तो उसे भी सराहा।

हिंदी सिनेमा में हर बड़े सितारे ने अपने बेटे के लिए फिल्में बनाईं, आपने नहीं। ऐसा क्यों?
-मिमोह अपनी जगह बना रहा है हिंदी सिनेमा में। उसे पता होना चाहिए कि जिंदगी में जो कुछ मिलता है, वो बड़ी मेहनत और मुश्किल से मिलता है। मिमोह को मेहनत का मतलब समझ आ रहा है। अब वह जो भी बन रहा है उसमें उसका आत्मविश्वास शामिल है। रिमोह ने निर्देशन का कोर्स किया है विदेश से। वह कैमरे के पीछे अपना हुनर दिखाना चाहता है। उसकी एक डिप्लोमा फिल्म को कनाडा फिल्म फेस्टिवल में अवार्ड भी मिल चुका है। दोनों के सपोर्ट के लिए मैं हमेशा यहां हूं, लेकिन दोनों को हिंदी सिनेमा में जो भी मुकाम पाना है, वो अपनी मेहनत से ही पाना होगा।


संपर्क - pankajshuklaa@gmail.com

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

लाइट, कैमरा, रन..

फूहड़ता के सबसे निचले स्तर तक पहुंचने के बाद हिंदी सिनेमा में सफाई और साफगोई के अंकुर फिर से निकल रहे हैं। दर्शकों की मनोरंजन में भी सच्चाई की ललक बढ़ रही है और इसका सबसे सही जवाब फिल्मकारों ने तलाशा है उन नायकों को रुपहले परदे पर फिर से नई जान देने का, जिनके किस्से कहानियां बस किताबों या अखबारों की कतरनों में ही सिमट कर रह जाते रहे हैं। जिद और जीवट की चंद सार्थक कहानियों को क्रिकेट की पूजा करने वाले देश में क्रिकेट से इतर खेलों के नायकों के बहाने भी रुपहले परदे पर पेश करने की कोशिशें वाकई सुखद संकेत देने वाली हैं।

© पंकज शुक्ल

इरफान की फिल्म पान सिंह तोमर की कामयाबी ने हिंदी सिनेमा में एक तरह की नई क्रांति का बीज रोपा है। पर ध्यान देने वाली बात ये है कि ये क्रांति सिर्फ सामाजिक जिम्मेदारी वाले सिनेमा के फिर से रुपहले परदे पर लौटने भर की बात नहीं है, ना ही इस पर हो रही बहस महज जमीन से जुड़े और वास्तविकता के करीब रहने वाले सिनेमा के मुख्यधारा में फिर से जगह पाने की वापसी तक ही सीमित है। दरअसल ये दिनों दिन समझदार होते और मनोरंजन से आगे जाकर भी कुछ पाने को तैयार हो रही हिंदी सिनेमा के दर्शकों की नई पीढ़ी को फूहड़ सिनेमा के काले बादलों के पार दिखी वो चमकीली लकीर है, जिसकी बुनियाद पर हिंदी सिनेमा में खेल पर आधारित फिल्मों का एक नया चलन शुरू हो सकता है। ऐसी फिल्में जिनमें कथानक किसी खास खेल के आसपास बुना जाता है और इसे खेलने वाले किरदार को फिल्म के नायक के तौर पर पेश किया जाता है। यही नहीं, इसने राकेश ओमप्रकाश मेहरा जैस निर्देशक को मिल्खा सिंह के जीवन पर फिल्म बनाने का हौसला भी दिया है। इसने फरहान अख्तर जैसे गैरपारंपरिक अभिनेता को अपने बाल बढ़ाकर एक सरदार के गेटअप में घुसने का जज्बा भी दिया है। और, इस बदलाव की बयार का ही असर है कि हॉकी के एक असल कोच की जिंदगी की आधारित फिल्म चक दे इंडिया कर चुके शाहरूख खान अब हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की जीवनी पर फिल्म करना चाहते हैं। ऐसी ही कुछ कुछ मंशा इन दिनों इरफान खान भी जता रहे हैं।

जैसाकि हम सब जानते हैं भारत देश में क्रिकेट और सिनेमा के सितारों के बीच लोकप्रियता का ट्वेंटी ट्वेंटी हमेशा चलता रहता है और दोनों का कॉकटेल सेलेब्रिटी क्रिकेट लीग (सीसीएल) भी इसी सोच से जन्मा है, लेकिन सच ये भी है सम सामयिक क्रिकेट को लेकर हिंदी में बनी इकबाल को छोड़कर दूसरी एक भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कामयाब नहीं हो सकी है। निर्देशक आशुतोष गोवारिकर की जिस क्रिकेट आधारित फिल्म लगान ने देश विदेश में कामयाबी का झंडा गाड़ा, उसमें क्रिकेट का वह दौर दिखाया गया जब आम भारतीय गेंद और बल्ले के इस खेल का अक्षर ज्ञान भी नहीं कर पाया था। लेकिन, इस बार बात हम क्रिकेट की फिल्मों की करेंगे ही नहीं। भले लगान को टाइम पत्रिका ने दुनिया की 25 सर्वश्रेष्ठ खेल आधारित फिल्मों की कालजयी सूची में शामिल किया हो, लेकिन फिल्म की कहानी को करीब से समझा जाए तो दिखाई देता है कि लगान की कामयाबी क्रिकेट की कामयाबी कम बल्कि चंद गंवार लोगों की इस खेल को सीखने की जिद और इस खेल में महारात हासिल कर चुके चंद गोरों को हराने के जीवट की कहानी ज्यादा है।

ये जिद और ये जीवट ही पान सिंह तोमर की भी कहानी कहते हैं। इसी जिद और जीवट ने चक दे इंडिया में कबीर के सपनों को राह दिखाई और बरसों पहले ऐसी ही जिद और जीवट रखने वाले चंद बच्चों को लेकर संदीप नाम का एक कोच भिड़ गया था फुटबॉल के उन सूरमाओं से जिन्हें हराने की बात करना भी उस शहर में शायद गुनाह समझा जाता था। लोगों ने तब पूरे उत्साह से आवाज लगाई थी, हिप हिप हुर्रे। इन दिनों सियासत, सत्ता और सामाजिक अपराधों के ताने बाने में खो चुके निर्देशक प्रकाश झा की ये पहली फीचर फिल्म थी और मेरे लिहाज से भारतीय सिनेमा में गैर क्रिकेट खेलों पर बनी स्पोर्ट्स फिल्मों के किसी भी पैमाने पर तीन बेहतरीन फिल्मों में शुमार होती है। हिप हिप हुर्रे शायद समय से पहले की फिल्म थी, कुछ कुछ वैसे ही जैसे राजकपूर की मेरा नाम जोकर, राज कपूर की तीसरी कसम और अमिताभ बच्चन की मैं आजाद हूं को समय से पहले की फिल्में माना जाता है। लेकिन, बलिहारी है यूटीवी मोशन पिक्चर्स की जिसने कोई दो साल तक पान सिंह तोमर को डिब्बाबंद रखा और ऐसा ही समय से पहले की फिल्म का ठप्पा उस पर नहीं लगने दिया। ये फिल्म अगर दो साल पहले रिलीज हुई होती तो शायद चुलबुल पांडे के दौर में कहीं गुम हो गई होती, भला हो इस देरी का कि दर्शकों को फूहड़ फिल्मों की ओवरडोज झेलनी पड़ी और इसके हैंगओवर से निकलने के लिए पान सिंह तोमर हिंदी सिने दर्शकों का नया नींबू पानी बन गई।

जैसा कि हर कारोबार में होता है हिंदी सिनेमा में भी ज्यादातर फैसले मुनाफे को ध्यान में ही रखकर किए जाते हैं। पर, स्पोर्ट्स फिल्मों के मामले में कम से कम क्रिकेट आधारित फिल्में बनानकर हिंदी सिनेमा ने कई बार गच्चे खाए हैं। और, ये गच्चा खाने वालों में फिल्म अव्वल नंबर में सदाबहार अभिनेता और निर्देशक देव आनंद से लेकर फिल्म पटियाला हाउस में निर्देशक निखिल आडवाणी तक शामिल हैं। तो फिर क्रिकेट से इतर हिंदी स्पोर्ट्स फिल्मों पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता है या फिर क्रिकेट की चकाचौंध ने हमको इतना विस्मित कर दिया है कि हम उसके दाएं बाएं देख ही नहीं पाते। अस्सी के दशक में जब नक्सलबाड़ी आंदोलन के चंगुल से छूट भागा एक काला कलूटा सा लड़का हिंदी सिनेमा में अपने कूल्हे मटकाकर अमिताभ बच्चन के सुपरस्टारडम की गिनती पूरे होने का नृत्य कर रहा था, तो निर्देशक राज एन सिप्पी ने इस लड़के की सेहत देखी। इसकी आंखों में कुछ कर गुजरने का जज्बा देखा और देखी वही जिद और जीवट जो दुनिया बदल देने का माद्दा रखती है। राज एन सिप्पी ने इस लड़के को लेकर बनाई फिल्म बॉक्सर। गुरबत में दिन बिताने वाले एक लड़के के रिंग का चैंपियन बनने की ये कहानी 1984 में फरवरी की गुलाबी सर्दियों के उस दौर में परदे पर उतरी, जब साल भर पहले ही एक इतवार को भारतीय क्रिकेट टीम ने इतिहास का सबसे बड़ा उलटफेर करते हुए विश्वविजेता का खिताब जीत लिया था और साल की शुरूआत के पहले ही दिन यानी 1 जनवरी 1984 को रिलीज हुई हिप हिप हुर्रे ने स्कूली क्रिकेट की दीवाने हो चुके देश में भी अपने लिए सिनेमा हॉल मे तालियां बजाने वाले चंद हाथ ढूंढ लिए थे।


बॉक्सर की मिली जुली कामयाबी के बाद मिथुन चक्रवर्ती ने एक स्पोर्ट्स फिल्म और की- कराटे। ये फिल्म हालांकि भारत के पारंपरिक खेलों से इतर खेल पर बनी फिल्म थी, लेकिन ब्रूस ली के दौर में मिथुन चक्रवर्ती ने तमाम भारतीय युवाओं के हाथ में पकड़ा दिया एक ऐसा खिलौना, जिसका सही वार हो तो सामने वाले पल भर में ही धूल चाटने लगता था। ये खिलौना था- नान चाकू और फिल्म की लोकप्रियता का आलम ये था कि देश में गली गली कराटे क्लब खुल गए। लोगों को येलो बेल्ट, ग्रीन बेल्ट, रेड बेल्ट और ब्लैक बेल्ट के मायने समझ आने लगे और दारा सिंह के देश के लोगों को ये भी पता चला कि दांव सिर्फ हाथों से ही नहीं बल्कि अब पैरों से भी चले जाते हैं और वार भी मुक्के का कम बल्कि फ्लाइंग किक का ज्यादा जोर का होता है। किसी भी चलन या किसी भी सितारे की कामयाबी इसी में है कि वह परदे से निकलकर निजी जिंदगी में शामिल हो जाए। तो अगर पान सिंह तोमर देखकर निकलने वाले बुंदेलखंडी में बात करने कोशिश करते नजर आते हैं तो बरसों पहले लोगों ने अगर मिथुन को देख नान चाकू घरों में टांग लिए थे, तो बात ही क्या? क्रिकेट से इतर स्पोर्ट्स फिल्मों में मिथुन से पहले दारा सिंह भी बॉक्सर नाम की एक फिल्म कर चुके थे और उनकी पहलवानी के करिश्मे लोग कुछ दूसरी फिल्मों में भी देख चुके थे, लेकिन देश में फिटनेस को लेकर युवाओं के सजग होने का पहला दौर मिथुन चक्रवर्ती की फिल्म बॉक्सर से ही माना जा सकता है। सलमान की साइकिलिंग वाली फिल्म मैंने प्यार किया और ऋतिक रोशन की कहो ना प्यार है की फिटनेस तो बहुत बाद की बातें हैं।

लेकिन, सवाल इस बार सिर्फ फिटनेस या किसी सितारे की शोहरत का नहीं है। सवाल इस बार एक ऐसे चलन का है, जिसने अगर कामयाबी के दो चार पाठ और पढ़ लिए तो खिलाड़ियों की जीवनियों पर बनने वाली फिल्मों की एक परंपरा हिंदी सिनेमा में भी नई ताकत पा सकती है। हिंदी सिनेमा में स्पोर्ट्स पर बनने वाली अन्य फिल्मों का जिक्र करने से पहले ये समझना जरूरी है कि आखिर हिंदी सिनेमा क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों को लेकर इतना सीरियस क्यूं नहीं होता? इसकी गहराई में जाने से पहले समझना ये भी जरूरी है कि विदेश में जो स्पोर्ट्स फिल्में बनती हैं, उनका आधार क्या होता है? ये सही है कि विदेश में स्पोर्ट्स फिल्मों की एक अलग श्रेणी सिनेमा में पूरी तौर पर विकसित हो चुकी है पर सच ये भी है कि ये फिल्में मुख्यतया किसी न किसी खिलाड़ी की निजी जिंदगी की किसी बड़ी जीत से प्रेरणा पाती हैं। इस तरह की फिल्में बनाने के लिए वहां पहले से लिखा साहित्य बहुतायत में उपलब्ध है। अगर बॉक्सर जेक ला मोटा के जीवन पर मशहूर निर्देशक मार्टिन स्कॉरसेसे ने रेजिंग बुल बनाने में कामयाबी पाई तो इसकी एक बड़ी वजह ये थी कि मार्टिन के पास इस खिलाड़ी के बारे में जानने के तमाम साधन थे। विदेशी सिनेमा में खिलाड़ियों की जीवनियों पर बनने वाली फिल्मों की लंबी लिस्ट है और हिंदी सिनेमा में पान सिंह तोमर महज एक अदना सा अगला कदम है। मीर रंजन नेगी जैसे हॉकी खिलाड़ी के जीवन पर बनी चक दे इंडिया को भले इसके लेखक जयदीप साहनी ने तब असल जिंदगी पर बनी फिल्म मानने से इंकार कर दिया हो, लेकिन तब शायद ये बाजार की मजबूरी रही हो। जयदीप साहनी ने वाकई एक काल्पनिक कहानी लिखी या फिर 2002 के कॉमनवेल्थ खेलों में भारतीय महिला हॉकी टीम की जीत की सच्ची पटकथा परदे पर उतारी, इसे लेकर बहस हो सकती है, पर सच यही है कि जयदीप को ये फिल्म लिखने में अखबारों में छपे उन तमाम लेखों, आलेखों ने भरपूर मदद की, जिन्होंने इस जीत की नायिकाओं के बारे में विस्तार से खोजबीन की। यानी कि एक सच्ची जिद और मजबूत जीवट की कहानी को परदे पर उतारने की पहली शर्त है इस बारे में शोध के लिए तमाम सामग्री का मौजूद होना। पर, जीवट अगर तिगमांशु धूलिया जैसा हो तो यह अनिवार्यता भी धरी की धरी ही रह जाती है।

हालांकि, मेहरा को भाग मिल्खा भाग के लिए तिगमांशु की तरह अपनी कहानी के लिए सालों बीहड़ में नहीं भटकना पड़ा है। भाग मिल्खा भाग की शूटिंग इन दिनों पूरी रफ्तार में हैं। मेहरा कहते हैं, मिल्खा सिंह के बुलंदियों पर पहुंचने से पहले का रास्ता बहुत ही मार्मिक और संघर्षों से भरा हुआ है। एक अनाथ के तौर पर पले बढ़े मिल्खा में हौसला शुरू से था। बिना मां-बाप के बच्चों को जैसी मेहनत बचपन में करनी होती है, मिल्खा ने उससे ज्यादा परिश्रम किया। मिल्खा के मां-बाप बंटवारे के दौरान की हिंसा में मारे गए थे। उस दौर में अपने लिए खेल में इतना ऊंचा मुकाम बनाना किसी जीवट वाले इंसान के ही बस में हो सकता है। मिल्खा के बारे में जितना मैंने जाना उस हिसाब से मैं कह सकता हूं कि हम सब कुछ करने के लिए अपने आस पास प्रेरणाएं तलाशते रहते हैं, लेकिन मिल्खा अपनी प्रेरणा खुद थे। और, उनके जीवन का बस यही पहलू मैं परदे पर उतारना चाहता हूं। पान सिंह तोमर के बाद मिल्खा सिंह यानी एक और एथलीट। लेकिन, ऐसे नायक हमारे समाज में हर तरफ फैले हुए हैं। एथलेटिक्स में पी टी ऊषा, टेनिस में विजय अमृतराज व सानिया मिर्जा, बैंडमिंटन में प्रकाश पादुकोण, पी गोपीचंद और सायना नेहवाल, फुटबॉल में वाइचुंग भूटिया जैसे तमाम नायक नायिकाएं हैं, जिन पर अगर संवेदनशील तरीकें से फिल्में बनें तो लोग पसंद कर सकते हैं। इनके अलावा भी तमाम ऐसे नायक हैं, जिनके बारे में लोग ज्यादा नहीं जानते।

फिल्म कारोबार विशेषज्ञ व ट्रेड मैगजीन सुपर सिनेमा के संपादक विकास मोहन कहते हैं, हिंदी के निर्माता व निर्देशक आमतौर पर आलसी किस्म के होते हैं। उनका ज्यादातर काम सहायकों के भरोसे चलता है। लेकिन, अगर आप किसी की जीवनी पर फिल्म बना रहे हैं तो जाहिर है इस बारे में आपको शोध खुद करनी होगी। आपके सहायक की एक छोटी सी गलती आपका पूरा करियर दांव पर लगा सकती है। इसीलिए, हिंदी सिनेमा के फिल्मकार अक्सर अंडरवर्ल्ड पर पहले से बनी फिल्मों को बतौर रिसर्च इस्तेमाल करते हैं और उनका कैमरा उसी पर घूमता फिरता रहता है। पान सिंह तोमर या भाग मिल्खा भाग जैसी फिल्में जिद और जीवट दोनों मांगती हैं, और इसकी कमी हमारे यहां हमेशा से रही है।

संपर्क - pankajshuklaa@gmail.com

(नेशनल दुनिया समाचार पत्र की 29 अप्रैल 2012 की संडे मैगजीन की यह कवर स्टोरी है)

रविवार, 25 मार्च 2012

मैं एक अचंभा गाऊं, मैं मन के ठाठ सुनाऊं, जब कभी कभी ..

कैलाश खेर की गायिकी की दुनिया दीवानी है। उनके गाए अल्लाह के बंदे को संगीतकार ए आर रहमान तक अपना पसंदीदा गीत मानते हैं। उनके कैलासा बैंड ने पिछले आठ साल में दुनिया भर में 800 से ऊपर कंसर्ट किए हैं। वह नौजवानों में एक हौसला, एक विचार, एक संस्कृति पनपती देखना चाहते हैं। एक ऐसी परंपरा जिसमें देश सर्वोपरि हो। लेकिन, खुद कैलाश खेर को कितने लोग जानते हैं? कितने लोग जानते हैं उस बच्चे कैलाश के बारे में जो अपने पिताजी के साथ साइकिल के डंडे पर बैठकर गांव गांव गाने जाया करता था? और कितने जानते होंगे, उस युवा कैलाश के बारे में जिसने कभी ऋषिकेश में कर्मकांड सीखकर अमेरिका में पंडिताई को अपना करियर बनाने का फैसला किया था?

© पंकज शुक्ल

अपने बेटे कबीर को देखकर आपको बचपन तो खूब याद आता होगा?
कबीर की क्या कहें, मैं तो खुद अभी बचपन में ही हूं। मेरा तो शरीर बढ़ रहा है। मैं वैसा ही हूं भोला बचपन जैसा। बचपन ना हो तो मैं कुम्हला कैसे जाता? मैं तो दाता की कृपा मानता हूं कि मुझे उसने रोका हुआ है। मेरी यही प्रार्थना दिन रात रहती है कि मेरा बचपन न छीन लेना नहीं तो मैं कहीं का नहीं रहूंगा क्योंकि कि ये दिमाग वालों की दुनिया में दिल वालों का जो खेल है वो बहुत भारी है। इस खेल में सच्चा आदमी टिक नहीं पाता।
किसी भी कलाकार के लिए जमीन से जुड़े रहना या विनम्र बने रहना कितना जरूरी है?
कलाकार? अरे कलाकार तो कितने हैं यहां। समुद्र है। मेरे तो ईश्वर ने मुझे अकस्मात एक ऐसे क्षेत्र में डाल दिया, जिसके बारे में मैंने कभी सोचा तक नहीं था। उन्होंने जैसे त्रिलोक दिखाए थे पार्वती को, वैसे ही मुझे दिखाया। जब मैं टूट चुका था। जब मैंने दुख से दुखी होना बंद कर दिया था। तब भगवान आए हैं मेरे लिए प्रेरणा पर। और ऋषिकेश से मैं सीध्ो यहां मुंबई आ गया। मुझे खुद पता नहीं कि मैं यहां क्यूं आया? फिल्मी दुनिया के बारे में एक अक्षर का ज्ञान तक नहीं था मुझे। ये तक ज्ञान नहीं कि आर डी बर्मन जैसे के गाने तो सुपरहिट हैं लेकिन वो हैं कौन से?
अच्छा? तो इसके चलते तो कभी गोटी भी फंसी होगी आपकी?
2006 के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में शंकर महादेवन मुझे अपने साथ ले गए गोवा। वहां किसी चैनल वाले ने शो से पहले सवाल ही कर दिया कि दुनिया आर डी बर्मन की फैन है तो आप को उनका संगीत कैसा लगता है। मैंने कहा कि उनको फैन कौन नहीं है। तो रिपोर्टर ने कहा कि उनका कोई फेवरिट गाना जो आपको पसंद हो। मैं घबरा गया। मैंने कहा कि उनको तो कोई भी गाना आंख बंद करके ले लीजिए सारे ही फेवरिट हैं। तो रिपोर्टर ने कहा कि गाकर सुना दीजिए ना। अब मुझे लगा कि मैं फंस रहा हूं। मैंने देखा कोई आजू बाजू कोई खड़ा हो तो मैं पूछं कान में कि कोई जल्दी गाना बता भाई। फिर एकदम से भगवान याद आए।तो एकदम बुद्धि आई कि वही गाना जो शो में गाना है। शंकर ने बोल रखा था कि जै जै शिवशंकर गाना है। तो मैंने ये गाना गा दिया। किसी तरह बाबा ने बचा लिया। बाद में शान ने मुझसे बोला कि क्या वाकई आप आर डी बर्मन के किसी गाने के बारे में नहीं जानते। मैंने कहा कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो शायद गुफाओं में ही रहे हों जिंदगी की शायद।
यानी कि आपने कभी किसी को फॉलो नहीं किया?
होता यही है जो पढ़ाकू हैं। जो मेथड को फॉलो करते हैं। नियमों को, फॉर्मूलों को फॉलो करते हैं तो वो बस फॉर्मूले की ही दुनिया तक सीमित रह जाते हैं। नया वही रचेगा जो फॉर्मूलों के पार हो। उसको दाता रचता है। मैं ट्रेंड फॉलो नहीं करता। मैं ट्रेंड रचता हूं। मैं ये अपनी बड़ाई नहीं कर रहा लेकिन मैंने ये अनुभव किया है। साक्षीभाव और दृष्टा भाव से। मैं देख पाता हूं कि मुझे चीजें कभी कभी अपने आप हो जाती हैं। एमटीवी कोक कार्यक्रम के दौरान इसका बाकायदा अनुभव भी हुआ मुझे।
फिर तो इस रास्ते में तमाम अड़चनें भी आई होंगी?
सबसे पहली बात तो ये कि मैं किसी भी मुसीबत से डरता हूं नहीं। ये एक बहुत खतरनाक चीज हो जाती है जब आप डर से डरना बंद कर देते हैं और दुख से भागना बंद कर दें। तब दाता का सिंहासन डोलता है ऐसा मुझे लगता है। जितने साधकों की हमने कहानियां सुनी है उन सबने जिद करके ही दुनिया बदली है। कामयाबी और शोहरत देने से पहले ईश्वर तमाम मुश्किलें, तमाम अड़चनें खड़ी करता है। हमारे सामने मोह, माया और ना जाने कैसे कैसे जाल बिछाता है? उससे बच गए तो बस..फिर सबकुछ वही आपके लिए करता है।
लेकिन जैसी ये मायानगरी है, वहां तो सच्चे का बोलबाला कम ही हो पाता है?
ऐसा नहीं है। मैं यहां आया और यहां आने के बाद ही ये जीवन शुरू हुआ। तय हुआ कि मैं अलग करूंगा। अपने हिसाब से करूंगा। अपने ही गीत बनाउंगा। शब्दों का चयन भी अपना ही होगा। आमतौर पर जो शब्द किताबों और अखबारों में लिखे जाते हैं, उन्हें मैं नहीं लिखता। मैं भाषा में नहीं लिखता, मैं बोलियों में लिखता हूं। अगर आप आज की युवा दुनिया को ये चीजें उनके ही अंदाज में न पकड़ाएं तो कुछ दिनों बाद ये सब संग्रहालय में चली जाएंगी। जैसे मैंने एक गीत में लिखा चांदण में। तो इस शब्द को लेकर बहुत लोग अपना ज्ञान लगाते हैं। एक टीवी शो में एक बहुत बड़े विद्वान से बात हो गई तो हमने टोका कि नहीं ऐसा नहीं है।
तो कैलाश के कैलाश खेर बनने की शुरूआत कहां से होती है?
सबसे पहले पिताजी मेहर सिंह खेर एकतारे पर गाते थे। उस एकतारे की जो टोन थी वो हमको बहुतअच्छी लगती थी। वो तुंबे में बजता था। बनाते भी थे खुद। गाते भी थे खुद। कहीं से एक तार का जुगाड़ कर लिया। तुंबा मतलब जो सीताफल का निकलता है। पहले वो सूखा होता है। फिर उसे गीला करते हैं। उनके पास एक था एकतारा और एक था दुतारा। मेरे ताऊजी और पिताजी दोनों गाते थे। सत्संग करते थे। कबीर वाणी, मीरा को गाते थे। गुरुनानक को गाते थे। उनसे पूछो कि क्या गा रहे हो तो वो बता नहीं पाते थे। उन्होंने भी शायद सुना होगा दादा से परदादा से। और वो गांव का एक चलन भी है। मैंने तो देखा है कि पूरी दुनिया की लोक संस्कृति एक ही है। यूरोप जाओ। साउथ अफ्रीका जाओ। जो ये जिप्सी म्यूजिक बोलते हैं। कंट्री म्यूजिक वो सब जगह का एक ही जैसा होता है। मुझे गाने का शौक दो साल की उम्र से लगा। मैं गाने लगा। जब मैं गाता था तो सबसे ज्यादा तालियां मुझे ही मिलती थीं। पिताजी हमको साइकिल के डंडे पर बिठाके, कपड़ा बांध लेते थे, और ले जाते थे। तब सीट लगाने के भी पैसे नहीं थे। अरसे बाद फिर किसी तरह दया खाकर डेढ़ रुपये में पिजाती ने साइकिल के डंडे पर एक सीट लगवाई। हमें तो लगा कि बीएमडब्लू मिल गई। पहला वाद्य जो हमने छुआ तो वो पिताजी की एकतारा ही था। उससे अंगुली भी कट गई थी। वो निशान आज भी है।
दुनिया भर में घूमने के दौरान कोई तो लम्हा होगा जो भूलना चाहो तो भी नहीं भूलता?
हम अमेरिका गए थे गाने के लिए। एक बात बताऊं। अमेरिका में जितने भारतीय है उनमें से 99 फीसदी प्लास्टिक हो चुके है। भारत से या इसकी संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है उनका। वो वहां बैठते हैं, उनकी तारीफों के पुल बांधते हैं और यहां की बुराई करते हैं। तो शो के दौरान एक बुजुर्ग महिला आईं। अटलांटा की बात है। वे पैर छूने लगीं। हम न पैर छूते हैं और न छुआते हैं। हम दिल को छूते हैं। तो वो पैर छूने लगीं और मैं सकपकाकर पीछे हट गया। बाद में जब हम गा रहे थो तो वो स्टेज के पास एक कागज रख गईं। हमें लगा कि कोई रिक्वेस्ट होगी कि अल्ला के बंदे गा दो या रंग दींणी गा दो। लेकिन वो एक पत्र था जिसमें लिखा था, मेरे माता-पिता भारतीय हैं। मैं यहीं पैदा हुई और पली। लेकिन मुझे आपमें ईश्वर दिखता है। भारत दिखता है। सिर्फ आप लोगों के संगीत से ही हम यहां के मनहूस माहौल में हौसला रखते हैं। वो लम्हा मैं कभी नहीं भूल सकता और वो पत्र मेरे जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार है।
इतनी शोहरत, इतनी दौलत और इतना प्यार पाने के बाद भी कोई सपना शेष है?
सच पूछिए तो इस ग्लैमर नगरी में तो मेरा कोई सपना ही नहीं था। यहां आने के बाद भी मेरा कोई उद्देश्य ही नहीं था। मेरे तो उद्देश्य था कि मैं ऋषिकेश में कर्मकांड सीखूंगा आचार्य की डिग्री लेकर अमेरिका चला जाऊंगा। किसी मंदिर में काम करूंगा। मेरे पिताजी ने जो काम किया है वहीं काम मैं थोड़ा अंग्रेजी बोल कर करूंगा। तब तो सर्ववाइल ऑफ द फिटेस्ट वाली मानसिकता में जी रहा था मैं। मेरे सपने बड़े होते तो मैं किसी हीरो को देखता उनको फॉलो करता। हीरोइनों को देखता। मुझे तो यहां के बारे में पता ही नहीं था। चित्रहार और विविध्ा भारती ही संगीत का इकलौता जरिया थे। और फिल्मों के बारे में आम आदमी जितनी जानकारी थी। मुझे तो जो अनुभव लगता है, वो ये कि अगर आपके सपने न हों तो ईश्वर आपके लिए सपने देखने लगता है। इस वक्त 15 करोड़ के घर में बैठे हैं हम। 10 साल भी नहीं हुए मुझे मुंबई आए। तो ये चमत्कार है। ये मेरे दाता कर रहे हैं। जैसे मेरा दो साल का बेटा कबीर मुझसे कुछ मांग नहीं रहा, लेकिन मैं उसके लिए कर रहा हूं। दूसरे लोग कर रहे हैं। तो वैसा ही रिश्ता मेरा मेरे ईश्वर के साथ है। मेरे लिए मेरे सपने मेरा ईश्वर देखता है।
और ऐसा कोई अनुभव जो आप अपने प्रशंसकों के साथ साझा करना चाहें?
ये जो मेरे नए अलबम रंगीले में बाबाजी गाना है, वो ऐसा ही एक अनुभव है। उसका मतलब यही है। जब मेरी पत्नी शीतल गर्भवती थी। छह महीने का गर्भ था उन दिनों और मेरी पत्नी कहा करती कि मुझे इतने ख्वाब आ रहे हैं आप क्यूं नहीं कुछ देख रहे हो। भगवान आपको सपने क्यूं नहीं दिखाते। मेरे मुंह से निकला, मैं सपना नहीं देखते। सपने मुझे देखते हैं। बस मुझे विचार मिला। रात के दो बजे मैं अपने रियाज के कमरे में भागा और रात के तीन बजे ये गाना तैयार किया,
मैं एक अचंभा गाऊं,
मैं मन के ठाठ सुनाऊं,
जब कभी कभी ।
ओ मेरे बाबाजी,
निहारें असमान से...


संपर्क - pankajshuklaa@gmail.com

बुधवार, 14 मार्च 2012

... दूसरी बस पकड़ता तो इनकम टैक्स के छापे मार रहा होता-प्रीतम


हिंदी सिनेमा में निर्देशक फिल्म बनाने के लिए सुपर स्टार के चक्कर काटता है। सुपर स्टार फिल्म के लिए हां कहने से पहले फिल्म के प्रोड्यूसर का नाम जानना चाहता है और हर फिल्म प्रोड्यूसर अपनी फिल्म को हिट कराने के लिए प्रीतम का संगीत चाहता है। ताज्जुब होता है प्रीतम के दफ्तर में फिल्म निर्माताओं को उनके लिए दो दो घंटे इंतजार करते देखकर, ये वो प्रोड्यूसर हैं जिनके लिए दूसरे लोग उनके दफ्तर में घंटों इंतजार करते हैं। ये हैं प्रीतम चक्रवर्ती। हिंदी सिनेमा के मौजूदा दौर के चोटी के संगीतकार।

© पंकज शुक्ल

संगीतकार प्रीतम को तो दुनिया जानती हैं लेकिन कोलकाता के उस प्रीतम चक्रवर्ती को कैसे लगी संगीत की धुन जो कभी आईएएस पीसीएस की तैयारी किया करता था?
-सच पूछिए तो मुझे कभी पता नहीं था कि मैं कभी सिनेमा की दुनिया में भी आऊंगा। मिडिल क्लास फैमिली का लड़का था। स्कूल कॉलेज में बैंड वगैरह में गा बजा लेता था। लेकिन, संगीत निर्देशन? ना बाबा ना। सपने में भी नहीं सोचा था। जो कुछ अब तक होता गया बिना किसी प्लानिंग के होता गया। शायद पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट पहुंचने के बाद ही मेरा ध्यान इस तरफ गया या कहें कि रुझान इस तरफ हुआ।

लेकिन पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट तो आप साउंड इंजीनियर बनने आए थे?
-हां, इसका भी दिलचस्प वाकया है। क्या है उन दिनों मैं अखबार में जो भी किसी कंपटीशन का विज्ञापन निकलता था, भर देता था। पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट का विज्ञापन देखा तो साउंड इंजीनियरिंग का कोर्स ही मुझे कुछ समझ में आया। पापा को भी लगा कि लड़का इंजीनियर बनना चाहता है। उन्हीं दिनों सेंट्रल एक्साइज और इनकम टैक्स का भी विज्ञापन निकला। वो भी मैंने भरा था। तो मजे की बात देखिए दोनों का इम्तिहान एक ही दिन और एक ही वक्त होना था।

फिर कैसे तय हुआ कि पुणे इंस्टीट्यूट की लिखित परीक्षा ही देनी है?
-कुछ तय नहीं हुआ। और न ही कुछ तय कर पाने की मनोदशा थी मेरी। हमारे पड़ोस में एक इनकम टैक्स अफसर रहते थे। उनका रुआब ज़बर्दस्त था। तो घर से निकला तो सोचा कि इनकम टैक्स वाला टेस्ट ही देना चाहिए। बस स्टॉप आ गया। वहां भी टेंशन थी तो एक कप चाय पी। दिलचस्प बात देखिए कि दोनों परीक्षाओं के सेंटर को एक ही बस जाती थी। 240 नंबर की। साउथ की तरफ जो बस जाती थी उधर फिल्म इंस्टीट्यूट की परीक्षा वाला सेंटर था और नॉर्थ की तरफ जाने वाली बस के रूट में इनकम टैक्स वाला परीक्षा सेंटर था। मैंने तय किया कि जो बस पहले आएगी उसी में चढ़ जाऊंगा। पहली बस साउथ की तरफ जाने वाली आई और मैं संगीतकार बन गया। नहीं तो शायद कहीं इनकम टैक्स अफसर बनकर छापा मार रहा होता।

फिर पुणे में रहते हुए वहां की स्टूडेंट फिल्म का संगीत तैयार करना आपने शुरू किया और बन गए फिल्म संगीतकार?
-पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट ने मुझे बहुत कुछ दिया। तीसरे साल में ही मुझे एक सीरियल में संगीत देने का मौका मिला और मेरा मुंबई आना जाना शुरू हो गया। उम्र काफी कम थी और मन में होता था कि लोग थोड़ा बुद्धिजीवी समझें तो सिगरेट पीनी शुरू कर दी। ये लत मुझे वहां फर्स्ट ईयर से ही लग गई। सिगरेट शायद सामाजिक तौर पर थोड़ा स्वीकार्य नशा है इसलिए लड़के इसकी तरफ जल्दी आकर्षित होते हैं। लेकिन, इससे बुरा नशा भी कोई नहीं क्योंकि इसे छोड़ना बहुत मुश्किल होता है।

हिंदी सिनेमा में शोहरत के जिस मुकाम पर आप हैं, वहां पहुंचने के बाद तो किसी को भी किसी के ऐब पर एतराज़ नहीं होता, लेकिन फिर भी आपको सिगरेट छोड़े काफी अरसा हो चुका है?
-सिगरेट बहुत बुरी लत है। इसे छोड़ने की मेरी तमाम कोशिशें बेकार रही हैं। लेकिन कभी न कभी तो आपकी ये लत छोड़नी ही होती है। मैंने भी छोड़ी। कभी 15 दिन, कभी दो महीने लेकिन हर बार दोबारा शुरू हो जाती। फिर एक बार किसी ने मुझे कहा कि डॉक्टर बोले उससे पहले खुद छोड़ देनी चाहिए ये लत। कभी न कभी तो डॉक्टर ये बात बोलेगा ही। अभी नहीं तो हार्ट अटैक आने के बाद।

तो आपके लिए वो पल कब आया?
-मैं बांग्लादेश गया हुआ था एक शो के लिए। वहां मुझे ज़बर्दस्त खांसी हुई। इतनी ज़बर्दस्त कि मैं गा भी नहीं पाया। अगले दिन मैंने बिल्कुल सिगरेट नहीं पी। खांसी आने पर पहले भी दो चार बार में छोड़ चुका था। क्या है कि बीमारी में सिगरेट छोड़ना आसान होता है। तो इस बार मैं लौटा तो मुझे एक किताब पढ़ने को मिली। मेरी पत्नी को उसके जन्मदिन पर किसी ने कुछ किताबें दी थीं। उनमें ये किताब भी थी। कॉलिन जेम्स की ये पॉकेट बुक मेरे लिए वरदान साबित हुई। साल भर हो चुका है सिगरेट छोड़े। लेकिन लोग ये भी कहते हैं कि सिगरेट छोड़ने के लिए कम से कम सात साल चाहिए होते हैं। मैं बस ये प्रार्थना करता हूं कि ये लत दोबारा न लगे।

तो अपने प्रशंसकों खासकर युवाओं को क्या कहना चाहते हैं?
-जिस किताब की बात मैं कर रहा हूं, उसमें एक जगह ये बात लिखी है। किसी भी नशे को दोबारा शुरू करने के तमाम कारण होते हैं। कभी होता है कि चलो आज दोस्तों की पार्टी है, एक कश लगा लिया जाए। या कि आज मुझे बहुत तनाव है चलो एक सिगरेट पी लेता हूं। या कि जिस लड़की के लिए मैंने ये नशा छोड़ा वो तो अब मेरे साथ है नहीं तो क्यों ना दोबारा शुरू कर लिया जाए। मेरा कहना है कि आपको अपना आत्मविश्वास बनाए रखना है। आप नहीं चाहोगे तो आपको कोई लत लगेगी नहीं।

आपको नहीं लगता कि तंबाकू का इतना विरोध करने पर तंबाकू लॉबी आपके पीछे लग जाएगी? वो तो सार्वजनिक जगहों पर सिर्फ सिगरेट हाथ में पकड़े रहने के लिए सितारों को लाखों देती है?
-(ठहाका लगाकर हंसते हुए) यही तो खेल है सारा..।

(संडे नई दुनिया 11 मार्च 2012 के अंक में प्रकाशित)

सोमवार, 26 सितंबर 2011

तेरी लाडो मुन्नी मेरी...


दर ओ दीवार कभी बनते हैं घरों से सजते हैं,
रहा करे सुपुर्द ए खाक़ मेरी बसुली, कन्नी मेरी।

दरिया ए दौलत में उसे सूकूं के पानी की तलाश,
तर बतर करती बूंद ए ओस सी चवन्नी मेरी।

तू सही है गलत मैं भी नहीं ना कोई झगड़ा है,
वो आसमां उक़ूबत का ये घर की धन्नी मेरी।

मेरी गुलाटियों औ मसखरी को मजबूरी न समझ,
उछाल रुपये सा न मार ग़म की अठन्नी मेरी।

रगों में इसकी खून मेरा तो हो दूध तेरा भी,
सर ए दुनिया रहे चमके तेरी लाडो मुन्नी मेरी।

© पंकज शुक्ल। 2011।

रविवार, 25 सितंबर 2011

ज़िक्र इक शाम का...


ज़िक्र इक शाम का यूं कर आया,
सरे राह ख्वाबों का सफर उग आया,
वो नहीं ना उनकी बेचैनी सा आलम है,
मेरी आंखों में ये आब है किसका साया।

वो गुमज़ुबां सी बोली, उसने आंखों से सुना,
थिरकते पांव की खुरचन को सिरहाने पे बुना,
खिंची थी मेड़ सी, अब मिलने का मातम है,
तेरी हंसी तेरी मुस्कान से क्यूं फिर शरमाया
मेरी आंखों में ये आब है किसका साया,
ज़िक्र इक शाम का यूं कर आया,
सरे राह ख्वाबों का सफर उग आया।

कभी थी ताप अब छांव रुई के फाहे सी,
कसम दी कोसों की अब दिल में चाहे सी
कहीं ना दूर गया वो, उसी का आदम है,
ख़री बात पे टिक के वो कब का भर पाया,
मेरी आंखों में ये आब है किसका साया,
ज़िक्र इक शाम का यूं कर आया,
सरे राह ख्वाबों का सफर उग आया।

© पंकज शुक्ल। 2011।

Pic Courtesy: Nokia । Vfx: Sound N Clips।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

सलाम ए सितमगर..










लो आ गया वो फिर से उसी शहर उन्हीं गलियों में,
नसीब उसका, रिवायत वही राह ए गुजर बनने की।

ना कर वादे, वादों पे नहीं अब और ऐतबार उसे,
मर चुकी ख्वाहिश भी हमराह ए सफर बनने की।

अपने शागिर्द की उस्तादी का भरम वो तोड़ चला,
हो के रुसवा बढ़ी चाहत यूं रूह ए इतर बनने की।

उसका एहतराम वो संगदिल भी थोड़ा सनकी भी,
हो के बेगैरत पड़ी आदत ज़िक्र ए फिक़र बनने की।

उसने परखा परखने में कोई अपना नहीं निकला,
मुए की आदत थी मुई लख़्त ए जिगर बनने की।

© पंकज शुक्ल। 2011।

picture used for reference only. no commercial use intended.

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

ये वक़्त ए इद्दत है..

सितमगर को मालूम, है खा़क़ ए मंज़िल मकां,
ये मेला कब्र का, यूं साज ओ सामां क्यूं है।

अज़ल का ख़ौफ़, है पैबस्त ए पेशानी शिक़न,
सफर ये सब्र का, यूं ज़ुल्म ओ दामां क्यूं है।



ज़फ़ा की जुस्तजू, शिद्दत से पुर ओ इमां से,
यही तरीक़ अजल से, यूं ग़म ए गिरेबां क्यूं है।

नहीं मैं दूर, ना तुझसे ना इस ज़माने से,
ये वक्त ए इद्दत है, यूं शाम ए परेशां क्यूं है।

ये तेरा दामन, रंगेगा और अभी छीटों से,
तू है शैदाई, यूं सहर ए तमाशा क्यूं है।



अज़ल-मौत। पैबस्त-समाया। पेशानी-माथा। अजल- क़यामत का पहला दिन। इद्दत- तलाक़ के बाद पुनर्विवाह से पहले की न्यूनतम मियाद। सहर- सुबह।


© पंकज शुक्ल। 2011।

चित्र सौजन्य- फिल्म 'प्यासा'

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

इस्लाम का प्रोग्रेसिव चेहरा


राजधानी दिल्ली में चल रहे पुस्तक मेले में जाने वालों को इस बार एक खास बात नज़र आई और वो है यहां बंट रहे हरे सफेद पर्चे। आमतौर पर पुस्तक मेले में अलग अलग प्रकाशकों के कारिंदे नुक्कड़ों और प्रवेश द्वारों पर पुस्तक सूचियां या फिर अपने स्टाल का पता बताने वाली सामग्री बांटते नज़र आते हैं, लेकिन इन हरे सफेद पर्चों की तरफ ध्यान इनके मजमून को लेकर जाता है। आम तौर पर मेलों में आने वाले पाठक या तो इन पर्चों को लेते ही नहीं है या फिर लेने के बाद अगले कदम पर पड़ने वाली डस्ट बिन के हवाले इन्हें कर देते हैं। लेकिन, इन पर्चों को ध्यान से पढ़ने की ज़रूरत है, कम से कम उन लोगों को जिनके निशाने पर इस्लाम है या फिर जो इस्लाम के नाम पर दूसरों को निशाने पर रखते हैं। मेले में सबसे ज़्यादा पर्चे बांटे जा रहे हैं वर्क यानी वर्ल्ड ऑर्गनाइजेशन ऑफ रिलीजन्स एण्ड नॉलिज चैरिटेबल ट्रस्ट नाम की संस्था की तरफ से। एक हरे पर्चे की आखिरी लाइन है, “हिंदू शब्द के मूल से चलने पर हम देखते हैं कि यह स्थान वाचक शब्द है और यदि संविधान में संशोधन कर प्रत्येक भारत निवासी को हिंदू कहा जाए तो कोई विरोधाभास नहीं होगा और भारतीय मुसलमान भी सनातन धर्मियों की आवाज़ में आवाज़ मिलाकर कह सकेंगे, गर्व से कहो हम हिंदू हैं।“

यह पर्चा मेले में “हिंदू कौन है?” शीर्षक के साथ बांटा जा रहा है। पर्चे में पहले तो हिंदू शब्द की उत्पत्ति और इसके एक धर्म होने के आधार पर सवाल उठाए गए हैं, लेकिन फिर बात पहुंच जाती है वहां, जहां से वंदे मारतम् का विरोध करने वालों के दावों की हवा निकलती दिखाई देती है। इसके मुताबिक इस्लाम के पहले ईशदूत का भारतीय होना इस्लाम का भारतीय मूल का धर्म सिद्ध करता है। इसके अलावा अंतिम ईशदूत हज़रत मुहम्मद को भारत की ओर से जन्नत की सुगंध आना, निश्चित रूप से भारत को विश्व के सभी मुसमलमानों की पुण्य भूमि करार देता है। हिंदुस्तान की तारीफ में आगे लिखा गया है कि हजरत मुहम्मद के जन्म के पूर्व से ही अरब निवासी हमारी सुंदर भूमि को हिंद कहते थे। अरब देशों में सुंदर स्त्रियों का नाम हिंदा रखा जाता था। बहुत हदीसों में हिंद शब्द भारत के लिए प्रयुक्त हुआ है। यह भी कहा गया है कि हिंद नाम अरबी मूल का है।

ऐसा ही एक और हरा पर्चा मेले में “मानवता का दूत” शीर्षक के साथ बांटा जा रहा है। लेकिन उसकी चर्चा से पहले मेले में बिक रही एक किताब “फ्रीडम ऑफ रिलीज़न एंड टॉलरेंस इन इस्लाम” का ज़िक्र ज़रूरी हो जाता है। ये किताब इस्लामिक आतंकवाद की जड़ पर चोट करती है। कुरान शरीफ की आयतों का ज़िक्र करते हुए ये किताब उन लोगों को संदेश देने की कोशिश करती है जो आतंक की राह पर चल चुके हैं। अमेरिका पर अपहृत विमानों के ज़रिए किए गए 9/11 के हमले की मुख़ालिफत करते हुए ये किताब कुरान शरीफ का हवाला देते हुए कहती है कि एक मुसलमान को अच्छा हमसफर और उतना ही अच्छा हमराही होना चाहिए। किसी भी मुसलमान को अपने सहयात्री को नुकसान पहुंचाना ग़लत है, बारूद से विमान को उड़ाना या फिर हवाई जहाज को ले जाकर टकरा देने जैसी बात तो किसी मुसलमान को सोचनी भी नहीं चाहिए। किताब के एक सफे पर यह भी लिखा है कि इस्लाम एक मुसलमान को गैर मुसलमानों के साथ भी शांति, सद्भाव और मित्रवत रहने की सीख देता है। इसमें अनजान पड़ोसी के साथ भी अच्छे व्यहार की बात कहते हुए इस अनजान पड़ोसी के साथ किसी भी तरह से यानी जाति, धर्म या देश के आधार पर भेदभाव को गलत ठहराया गया है।

बात यहीं तक रुकती नहीं है, ये किताब कुरान की उन आयतों का चुन चुन कर ज़िक्र करती है, जिन्हें आज के वक्त में इस्लाम को मानने वाले हर शख्स को पढ़ना और इन पर अलम करना ये किताब ज़रूरी मानती है। जिहाद पर इस किताब में खास तौर से अलग से चर्चा की गई है। कुरान शरीफ की आयतों का हवाला देते हुए इसमें कहा गया है कि जिहाद का पहला मतलब जंग नहीं है। फिर हदीस का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि जिहाद का बेहतरीन उदाहरण है कायदे से किया गया हज़ और जिहाद का मतब है अपने आप से जंग खुद को एक नैतिक और आध्यात्मिक तौर पर एक बेहतर इंसान बनाने के लिए। यही नहीं मुसलमान के मायने को साफ करते हुए ये किताब कहती है –कि मुसलमान वो है जो गुस्से पर काबू करे और लोगों को माफ करे।

पिछले कई दिनों से इस किताब के खास हिस्सों को अलग से पन्नों पर छाप कर भी मेले में बांटा जा रहा है और दिलचस्प बात ये भी है कि इस बार मेले में इस्लामिक साहित्य के छोटे ही सही पर जगह जगह लगे स्टालों पर दूसरे धर्मों के लोगों की खासी भीड़ भी दिख रही है। कुरान शरीफ़ के देवनागरी में तर्जुमे और अंग्रेजी अनुवाद की अच्छी खासी बिक्री हो रही है। मायने साफ है कि लोग इस्लाम को नज़दीक से जानने की उत्सुकता लिए आते हैं और इसी बहाने कुछ लोग ही सही पर इस्लाम के दामन पर चंद फिरकापरस्तों की तरफ से लगाए जा रहे दाग को धोने की कोशिश कर रहे हैं। ये सफेद हरे पर्चे बताते हैं कि इस्लाम पर बार बार उठती उंगली से एक तबका खासा परेशान है, और ये तबका चाहता है कि आतंक के हर हमले के बाद उंगली आतंकवादियों पर ही उठे, इस्लाम पर नहीं।

इस्लाम की शुरुआती वक्त की तारीफ करते हुए एक दूसरा हरा पर्चा भी मेले में मिला। मक्का शहर में जन्मे एक अनाथ बच्चे की कहानी कहता हुआ ये पर्चा धीरे धीरे हजरत मुहम्मद की शोहरत तक आता है। पर्चा कहता है कि इस्लाम को मानने वालों की तादाद ज्यों ज्यों बढ़ती गई, जुल्म व सितम का खात्मा हो गया। आतंकवाद का नाम व निशान न रहा। लोग दुख व दर्द में एक दूसरे के काम आने लगे। अनाथों और बेवाओं का संरक्षण करना लोग अपना कर्तव्य समझने लगे। गरीबों के लिए अमीरों की आमदनी में से ढाई फीसदी का अनिवार्य दान निर्धारित हुए। ईश्वर के बाद सबसे ज्यादा मान सम्मान की हक़दार मां को बनाया गया। शराब और जुए की लानत जड़ से समाप्त हो गई। लड़की के जन्म को शुभ माना जाने लगा। स्त्रियों के लिए विरासत में हिस्सा नियुक्त हुआ। इंसानों ही नहीं पशुओं के भी अधिकार मुकर्रर हुए, बदला लेने के बजाए माफी की शिक्षा दी गई। इन लाइनों को ध्यान से पढ़ें तो ये सारी बातें वहीं हैं जो एक विकसित समाज के लिए ज़रूरी होती हैं और जिनके लिए भारत समेत कई दूसरे देशों में बाद की सरकारों ने कानून तक बनाए। मतलब ये कि इस्लाम को दकियानूसी और रूढ़वादी मानने वालों तक ये बात पहुंचाने की कोशिश की जा रही है कि इस्लाम भी उतना ही प्रोग्रेसिव है जितना कि दुनिया के दूसरे धर्म। इस्लाम को इस पर्चे में इतिहास का सबसे अद्भुत और शांतिपूर्ण इंकलाब भी बताया गया है। ध्यान देने की बात ये भी है कि ये सारे पर्चे या तो हिंदी या फिर अंग्रेजी में हैं। उर्दू लिपि में कहीं कोई पर्चा बंटना नज़र नहीं आता यानी कि ये बात भी करीब करीब साफ़ है कि ये पर्चे बांटे किनके लिए जा रहे हैं।

इस्लाम को लेकर दूसरे धर्मों के लोगों के बीच हमेशा से भ्रांतियां रही हैं। अंग्रेजी में एक नए शब्द इस्लामोफोबिया का चलन भी शुरु हुआ और गैर मुस्लिम पढ़े लिखे लोगों के बीच इस शब्द का इस्तेमाल आजकल धड़ल्ले से होता है। न्यूयॉर्क और लंदन से निकला ये शब्द हाल ही में हुए प्रवासी भारतीय दिवस में भी खूब सुनाई दिया। मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में तो निर्देशक और लेखक सीना ठोंक कर कहते हैं कि उनकी फिल्म इस्लामोफोबिया पर बनी है। लेकिन, सोचने वाली बात ये है कि लोग इस्लाम से डरते हैं या फिर पाकिस्तान और अफगानिस्तान में छुपे बैठे उन दहशतगर्दों से जो अपने नापाक इरादों को जायज़ ठहराने के लिए इस्लाम का सहारा लेने लगते हैं। ये पर्चे अगर कुछ इशारा करते हैं तो यही कि अब इस्लाम को मानने वालों ने ही अपने बीच के इन चंद फिरकापरस्तों को अलग थलग करने की छोटी सी ही सही पर स्वागत योग्य पहल की है। कुरान शरीफ की आयतों के ज़रिए अगर इस्लाम के असली मकसद को सबके सामने लाया जाता है तो इसका खुले दिल से ख़ैरमकदम किया जा चाहिए। जैसा कि कुरान शरीफ़ भी कहती है – धर्म में ज़बर्दस्ती के लिए कोई जगह नहीं है। आमीन।

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