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सोमवार, 19 दिसंबर 2016

जा तू कोयल हो जा!



तेरी मीठी बोली है,
मिसरी बहुत ही घोली है,
बनी ठनी औ सजी धजी सी
गठरी बातों की खोली है,
इस पल इस घर,
उस पल उस घर,

रहे पैर तू रोज बदलती,
जा तू पायल हो जा!


मतलब से है बात करे तू,

फुर्सत का है प्यार करे तू,

सुने ना तेरी कू कू जो भी,
उससे हर पल रार करे तू,
इधर भी कूके, उधर भी कूके,
आंचल तेरा हर घर फूंके,

रहे घोसले रोज बदलती
जा तू कोयल हो जा!



पंशु 19122016
(picture used for reference only, no copyright infringement intended)

शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

अफसोस, तुम मेरे मित्र बन सके..।


सच्ची सच्ची तो तुमने 
सारी झूठी बातें कहीं,
कभी कसमों तो कभी 
वादों से रूठी बातें कहीं,



बेमेल सी सुलगती बुझती 
वो जगरातें कहीं,
कभी दिल से न निकलीं 
वो मुलाकातें कहीं,


ऐसा कैसे किया तुमने?
तुम तो राम के पड़ोसी थे,
कैवल्य की धरती के करीबी,
गो रक्ष पीठ के वासी थे,


लखन की धरती के लाल,
ये गोरखधंधा कहां पाया?
समंदर के पानी से भी खारा,
मंथरा सा संबल कहां पाया?




प्रण प्राण प्रतिष्ठा के ग्राहक,
वणिक को लजाते जगयाचक !

तुम ब्रह्ण न पा सके, 
चांद में भी न झलक सके,
सुदामा को तुमने लजाया,
चाणक्य भी न बन सके।

पर
अफसोस, तुम मेरे मित्र बन सके..।

- पंशु

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

श्वेतसम कौमार्य !

तुम चपल हो चंचला हो,
मैं अधिक मधुमास सा,
चोंच भर सा प्रेम का रस
दंभ क्यूं ब्रज रास सा !

बिंब तुम प्रतिबिंब तुम हो
मैं तनिक नटराज सा
रक्त की रजधार का सत
आरंभ यूं निज ताप का !

(pic used only for referential purpose)


सत की डुबकी शांत तुम हो
फैलना नवरास सा
दाग आंचल पर अमिट कर
सानंद सती संताप का!

देवता की देह तुम हो
या रज अधर सहवास का?
प्रेरणा के प्रेम बनकर
किन्नर कुंवरि अभिसार का!

सृष्टि का आश्चर्य तुम हो
उतंग जल पाताल का
कृष्ण से जन्मांत प्रेमी
स्वप्न के स्वर राज का!

नववधू सा रूप तुम हो
निज नहीं कुछ पास का
चांद चंचल से चपल चर
श्वेतसम कौमार्य का!

तुम चपल हो चंचला हो,
मैं अधिक मधुमास सा,
चोंच भर सा प्रेम का रस
दंभ क्यूं ब्रज रास सा !

पंशु 10102015




(Inspired from “The Virgin in White” by Ramya Vasishta)

सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

बहुत दिनों की बात है..


बहुत दिनों की बात है
फिज़ा को याद भी नहीं
ये बात आज की नहीं
बहुत दिनों की बात है

शबाब पर बहार थी
फिज़ा भी खुशगवार थी
ना जाने क्यों मचल पड़ा
मैं अपने घर से चल पड़ा
किसी ने मुझको रोककर
बड़ी अदा से टोककर
कहा था लौट आइए
मेरी कसम ना जाइए



पर मुझे ख़बर ना थी
माहौल पर नज़र ना थी
ना जाने क्यूं मचल पड़ा
मैं अपने घर से चल पड़ा
मैं शहर से फिर आ गया
खयाल था के पा गया
उसे जो मुझसे दूर थी
मगर मेरी ज़रूर थी


और इक हसीन शाम को

मैं चल पड़ा सलाम को
गली का रंग देखकर
नई तरंग देखकर
मुझे बड़ी खुशी हुई
मैं कुछ इसी खुशी में था
किसी ने झांककर कहा
पराए घर से जाइए
मेरी कसम ना आइए

वही हसीन शाम है
बहार जिसका नाम है
चला हूं घर को छोड़कर
ना जाने जाऊंगा किधर
कोई नहीं जो टोककर
कोई नहीं जो रोककर
कहे के लौट आइए
मेरी कसम ना जाइए..




-सलीम मछलीशहरी

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

फरिश्तों का ग़र पता होता !!



फरिश्तों का ग़र पता होता...।

फरिश्तों का ग़र पता होता,

ना वो बच्चा बिन मां बाप का होता,
सिसकती ना पहाड़िन वो,
याद में फौजी प्यारे की,
ना उस बूढ़ी अकेली मां,
का हर दिन, रात सा होता..
फरिश्तों का ग़र पता होता।

फरिश्तों का ग़र पता होता,

ना हरिया खुदकुशी करता,
ना गिनती सूद की वो सेठ ,
पहाड़ों के साथ यूं करता,
ना वो बूढ़ा हथेली पर,
लिफाफे ख्वाब के बुनता..
फरिश्तों का ग़र पता होता।

फरिश्तों का ग़र पता होता,

ना उसके हाथ की मेहंदी,
का रंग यूं राहे गुजर रहता,
ना वो ईंटों के घरौंदों में,
बसर करता, सफर करता,
ना दिन रात होते टीस के,
फरिश्तों का ग़र पता होता...

-पंशु 02052011

(चित्र व्यावसायिक उपयोग के लिए नहीं है। अगर इसके रचयिता को इस्तेमाल पर आपत्ति हो, तो इसे हटाया जा सकता है)

रे सूरज!


रे सूरज!


Pic: Pankaj Shukla 25102014

रे सूरज!
कैसा तू हठधर्मी है?

रोज समय से उग जाता है
रोज समय से छिप जाता है
चाल वही है ढाल वही है
कहां कहां तू बिछ जाता है?

रे सूरज!
कैसा तू हठधर्मी है?

नहीं तेरा है ध्यान मान पे,
ना पंडित के अर्ध्यदान पे,
मुंह फेरे तू चलता जाता,
गौर तो कर तू स्वाभिमान पे?

रे सूरज!
कैसा तू हठधर्मी है?

नीयत तेरी विंध्याचल सी है
प्रकृति तेरी अस्ताचल की है
क्यूं लेता तू ये आराधन?
नियति तेरी छल आंचल की है!

पंशु 22012016


शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

श्वेतसम कौमार्य!



तुम चपल हो चंचला हो,
मैं अधिक मधुमास सा,
चोंच भर सा प्रेम का रस
दंभ क्यूं ब्रज रास सा !

बिंब तुम प्रतिबिंब तुम हो
मैं तनिक नटराज सा
रक्त की रजधार का सत
आरंभ यूं निज ताप का !

(pic used only for referential purpose, no copyright infringement intended)


सत की डुबकी शांत तुम हो
फैलना नवरास सा
दाग आंचल पर अमिट कर
सानंद सती संताप का!

देवता की देह तुम हो
या रज अधर सहवास का?
प्रेरणा के प्रेम बनकर
किन्नर कुंवरि अभिसार का!

सृष्टि का आश्चर्य तुम हो
उतंग जल पाताल का
कृष्ण से जन्मांत प्रेमी
स्वप्न के स्वर राज का!

नववधू सा रूप तुम हो
निज नहीं कुछ पास का
चांद चंचल से चपल चर
श्वेतसम कौमार्य का!

तुम चपल हो चंचला हो,
मैं अधिक मधुमास सा,
चोंच भर सा प्रेम का रस
दंभ क्यूं ब्रज रास सा !

पंशु 10102015



(Inspired from “The Virgin in White” by Ramya Vasishta)

सोमवार, 4 मई 2015

सच और झूठ!

जब भी हमने

उन आँखों में 
थोड़ा सा सच 
पढ़ना चाहा,


शातिर की

भोली सूरत ने
एक दाग़ कहीं का 
धो डाला,


कारिंदे सब सब साजों के

मिल बैठ बजाएं 
तान कोई,


आख़िर क्या कोई छीन सका?

सच्चे मन का अभिमान कोई?


©  पंशु 04052015

बुधवार, 29 अप्रैल 2015

ये नाता है जो रूहों का....
पंशु 09102014


मेरी आंखों का दरिया ये
न उतरा है न उतरेगा।
ये नाता है जो रूहों का,
ना बदला है ना बदलेगा।
जरूरी था कि
हम दोनों फर्क इस बात का करते,
अगर है ये प्यार सच्चा है,
ना बदला है ना बदलेगा।

मेरी आंखों का दरिया ये
न उतरा है न उतरेगा।

मुझे सब है याद है अब भी,
तुम्हारे दिल की हर धड़कन,
मोहब्बत का मसीहा,
इक जो ख्वाबों से उठाया था।
मेरा ये फैसला अब भी
तुम्हारी ही इबादत है,
हूं काफिर तो होता हूं,
खुदा अब तू ही मेरा है।
तेरा हो फैसला अब तो,
मेरा जो था वो तेरा है।
क्या तुमको याद आता है,
मोहब्बत का हसीं मंजर,
क्या लगता है तुमको ये,
धड़कना दिल ये भूलेगा।

मेरी आंखों का दरिया ये
न उतरा है न उतरेगा।
ये नाता है जो रूहों का,
ना बदला है ना बदलेगा।


(राहत फतेह अली खान के गाए मशहूर गीत "तेरी आँखों के दरिया का, उतरना भी ज़रूरी था। मोहब्बत भी ज़रूरी थी , बिछड़ना भी ज़रूरी था l l" की प्रतिक्रिया में ये गीत 9 अक्टूबर 2014 को लिखा था।)

सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

फिर करेंगे यार मेेरे तुझसे, मेरे गम की बातें.

-पंशु-

(Picture used only for referential purpose, no commercial use intended.)

​दरो दीवार से क्या पूछो मेरे दम की बातें,
मेेरे उस यार से पूछो मेरे गम की बातें.

वो मिरा यार सहर में मुझे बहलाता है,
तुम हो कि शाम से पूछो मेरे गम की बातें.

इक ​​तेरे दोस्त से बस की शिकायत थोड़ी सी,
​अब​ ना कहना ना मालूम मेरे गम की बातें.

ये बातें वो बातें बची गुजरी सारी बातें,
जगरातें सोै रातें करतीं मेरे गम की बातें.

लौट आओ ना, बसते तो नहीं लगते हो,
फिर करेंगे यार मेेरे तुझसे, मेरे गम की बातें.

© पंशु। 13102014

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

तेरी खुशबुएं...

पंशु। 25092014





ये जो सूतों के 

धागों में बंधी हैं,

तेरी खुशबुएं 

मेरे ख्वाबों में बसी हैं।

इन लिहाफों में,

इन किताबों में,

इन हवाओं में,

इन फिज़ाओं में,

जागता हूं, सोचता हूं,

फिर सहमकर सिमटता हूं,

तेरी खुशबुएं,

मेरी सांसों में बसी हैं।

तेरी खुशबुएं 

मेरे ख्वाबों में बसी हैं।

ये जो सूतों के 

धागों में बंधी हैं,

तेरी खुशबुएं 

मेरे ख्वाबों में बसी हैं।

जब सिमट कर तू

आए पनाहों में,

गेसू तेरे यूं

बिखरे हैं शानों पे,

सूंघता हूं, ढ़ूंढता हूं,

फिर पलट कर खोजता हूं,

तेरी खुशबुएं 

मेरी रग रग में बसी हैं।

तेरी खुशबुएं 

मेरे ख्वाबों में बसी हैं।

ये जो सूतों के 

धागों में बंधी हैं,

तेरी खुशबुएं 

मेरे ख्वाबों में बसी हैं।


Text © Pankaj Shukla । 2014
(Pic not used for any commercial purpose)

रविवार, 21 सितंबर 2014

तुम कब आओगे?


-पं.शु.

तुम आओगे,
यही सोच के तो,
चौखट जागी है।

तुम आओगे,
यही सोच के तो,
चूल्हे की आग बाकी है।

तुम आओगे,
यही सोच के तो,
बाली उतारी है।

तुम आओगे,
यही सोच के तो,
हर रात भारी है।

तुम आओगे ना?

तुम कब आओगे,
के जब रात सहर
हो रही होगी?

तुम कब आओगे,
के जब आंख तर
रो रही होगी?

तुम कब आओगे,
के जब बिरहन रीत
बो रही होगी?

तुम कब आओगे,
के जब माहुर प्रीत
खो रही होगी?

तुम नहीं आओगे ना?


21092014 ।


Text © Pankaj Shukla । 2014
(Pic not used for any commercial purpose)

रविवार, 7 सितंबर 2014

तुमको लिख दूं? या रहने दूं..

पंशु


भीतर भीतर, सबसे छुपकर,
कुछ गाता तो हूं गुन गुनकर,
एक गीत कोई अमराई का,
संगीत किसी पुरवाई सा,

सांसों की चंचल छोर सही,
रुकती, बहती सी भोर सही,
सब कह दूं या रहने दूं?
तुमको लिख दूं? या रहने दूं..

संताप सहूं निष्पाप कहूं,
नवजीवन की पदचाप कहूं,

अधरों सी होती भोर दिखी,
उन्नत अवनत की छोर दिखी,

नभ गरजेगा, तम बरसेगा,
मन तृप्त हुआ क्यूं तरसेगा,
संबल कह दूं, या रहने दूं?
तुमको लिख दूं? या रहने दूं..

कातिक की पहली ओस कहूं,
या सावन का घनघोर कहूं,

शीतलता की दहक लिखूं,
केशों की रसती महक लिखूं,

यह श्लोक नहीं मनु स्मृति का,
आलोक यही है सहमति का,
परिणय रच दूं, या रहने दूं?
तुमको लिख दूं? या रहने दूं..

07092014


Pic & Text © Pankaj Shukla। 2014









बुधवार, 8 जनवरी 2014

बेटी ही बचाएगी

गया वो ज़माना जब हम गुहार लगाते थे, बेटी बचाओ, बेटी बचाओ। अरे, बेटी तो खुद हमको बचा रही है। न मां होती न हम होते। वही तो सृष्टि की शुरूआत है। वही तो घर, समाज और परिवार को बचाती है। तो अब हमें ये मान लेना चाहिए – बेटी ही बचाएगी। मेरी ये नई कविता इन्हीं भावनाओं को समर्पित है। हिंदी के सबसे बड़े अख़बारों में से एक “अमर उजाला” की अनोखी पहल “बेटी ही बचाएगी” के लिए लिखी गई इस कविता को मशहूर अभिनेत्री माधुरी दीक्षित ने स्वर दिए हैं।

पंकज शुक्ल

(फिल्म 'गुलाब गैंग' के अपने किरदार रज्जो देवी के गेटअप में माधुरी दीक्षित और फिल्म के निर्माता अनुभव सिन्हा मुंबई में 'बेटी ही बचाएगी' मुहिम का पोस्टर जारी करते हुए)

मां
आशीर्वाद देगी
और,
पैरों पर
चलना सिखाएगी।

बहन
साथ देगी
और,
इज़्ज़त से
जीना सिखाएगी।

बीवी
हौसलों को
परवाज़ देगी
और,
ताक़त
बटोरना सिखाएगी।

और, बेटी?

बेटी तो
घर की लक्ष्मी थी,
है और रहेगी..

और, जब भी
घर, परिवार
और समाज पर
मुसीबत आएगी,

बेटी ही बचाएगी।
बेटी ही बचाएगी।

© पंकज शुक्ल 2014

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

मुझे यश लेना नहीं आता : धर्मेंद्र

धर्मेंद्र से मिलना हिंदी सिनेमा के उस दौर में पहुंच जाने जैसा होता है, जब सुपरस्टार वाकई सुपरस्टार हुआ करते थे। लेकिन, धर्मेंद्र शोहरत की बजाय इंसानियत को जीते हैं। खुद को पुरस्कारों के मामले में बदनसीब मानते रहे धर्मेंद्र को भारत सरकार ने अब जाकर पद्मभूषण से सम्मानित किया है। उनसे एक खास बातचीत।

© पंकज शुक्ल। 2012

76 साल की उम्र में 52 साल सिनेमा के नाम कर दिए आपने। क्या फर्क महसूस करते हैं, तब के और आज के सिनेमा में?
-सिनेमा एक काल्पनिक जिंदगी है। जमीनी हकीकत से चीजें यहां अक्सर बिल्कुल जुदा होती हैं। मेरी मां हमेशा कहती रहती थी कि ये अच्छी जगह नहीं है। मैं मशहूर हुआ तो मेरी मां यहां आई थी। मेरी रोज रोज की भागदौड़ और यहां के माहौल को देखने के बाद उसने कहा कि मेरी तो दुआ है कि किसी का बेटा ऐक्टर न बने। मैंने पूछा भी कि मां तू ऐसा क्यों कहती है। तो वो बोली, आप हर फिल्म के साथ जीते हो, हर फिल्म के साथ मरते हो। मैं अपने बेटे को मरते नहीं देखना नहीं चाहती। मेरे पिता भी मेरे फिल्मों में आने के खिलाफ थे। लेकिन, अब जमाना और है। अब माता पिता खुद अपने बच्चों को हीरो बनाने में लगे रहते हैं।

लेकिन, कम से कम अपने बेटों को तो आपने भी हीरो बनाने की कोशिश की। यही मेहनत आपने अपनी बेटी एशा के लिए नहीं की, भला क्यों?
-मेरे फैसले अक्सर मेरी तहजीब और मेरे संस्कारों से निकलते हैं। मेरा अब भी मानना है कि फिल्म इंडस्ट्री लड़कियों के लिए बहुत मुश्किल जगह है। दूसरे एक बेटी के लिए एक बाप कितना ख्याल करता है ये तो एक बेटी का बाप ही जान सकता है। अभिनय तो दूर की बात है, मैंने तो एशा को खेलने के लिए भी नहीं बाहर जाने दिया। एशा एक अच्छी फुटबॉल खिलाड़ी रही है। उन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर खेल रही थी और अपनी टीम के साथ देश के अलग अलग हिस्सों में जाना चाहती थी पर मैंने जाने नहीं दिया। अब पछताता भी हूं अपने इन फैसलों को लेकर कि क्यूं उसे तब नहीं जाने दिया। जाने दिया होता तो शायद आज देश की फुटबॉल कैप्टन होती। सच ये भी है कि अब जमाना बदल गया है। लड़कियां लड़कों से कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। पायलट बन गई हैं, कितने हजार फुट से नीचे उतर रही है। पर इस सबके बावजूद मेरा अब भी ये मानना है कि ये फिल्म लाइन बहुत ही काल्पनिक है।

अभिनय का जज्बा आपमें अब भी कायम है। इतना हौसला कहां से लाते हैं?
-अभिनय मेरे लिए एक तपस्या रही है। मेरी इबादत है ये। इस फिल्म जगत में मेरा हर करम एक सजदा है। शुरू शुरू में मेरी एक ही धुन रहती थी कि मुझे ऐक्टर बनना है। और, ये धुन बनी रहे इसके लिए कभी हौसला नहीं खोया। कई बार ऐसा हुआ है कि मैं मुंबई में मीलों पैदल चला हूं काम के सिलसिले में, लेकिन चेहरे पर एक शिकन तक नहीं आने दी। इसके साथ एक बात और रही जिसने मेरा हौसला बनाए रखा वो था अपनी जिम्मेदारियों का एहसास। मैं भले मुंबई आ गया लेकिन मैंने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ा। जब शुरू शुरू में पहली बार पैसा आया तो मैंने पहली कार एक फिएट खरीदी। उस वक्त मेरे भाई अजित ने मुझसे कहा कि तुम स्टार बन गए हो। एक हैरल्ड ले लो। हैरल्ड उस जमाने की बड़ी फैशनेबल कार होती थी। ऊपर से खुल जाती थी। तो मैंने कहा कि नहीं फिएट ही लेनी है। इसलिए कि गर ऐक्टर के तौर पर नहीं चल पाया तो इसे टैक्सी बनाकर चला लेंगे। कम से कम अपनी जिम्मेदारियां तो निभा सकेंगे और लौटकर सानेवाल नहीं जाना पड़ेगा। मुझे तो लगता है कि भगवान हमारी सुनता जरूर है। मैं तो ऊपरवाले का बहुत बहुत शुक्रगुजार हूं, जो मुझे अंगुली पकड़कर यहां तक ले आया और देश दुनिया में करोड़ों चाहने वाले दिए।

मेरा निजी तौर पर ये मानना है कि आप किसी भी पेशे में हों, कितने भी कामयाब हों, आपका इंसान बने रहना बहुत जरूरी है। मेरा ये भी मानना है कि कोई अगर आपके दरवाजे पर आपसे मिलने पहुंच जाता है तो उससे मिलना जरूर चाहिए।
उत्तर भारत खासकर पंजाब, हरियाणा से आने वाले पर्यटक अक्सर ये कहते सुने जाते हैं कि मुंबई में दो ही चीजें देखने लायक हैं। एक समंदर दूसरा धर्मेंदर। इस चाहत को आप किस तरह लेते हैं?
-(ठहाका लगाकर हंसते हैं) एक चीज मैं आपको बताऊं कि लोग मुझे सुपरस्टार समझकर नहीं बल्कि एक इंसान की तरह प्यार करते हैं। डार्लिंग डी का नाम आप लोगों ने अब तो मेरे नाम के साथ जोड़ दिया है। पर मुझे जो मोहब्बत मिली, वो शायद मेरी मेहनत का नतीजा है। इसके बावजूद मेरा निजी तौर पर ये मानना है कि आप किसी भी पेशे में हों, कितने भी कामयाब हों, आपका इंसान बने रहना बहुत जरूरी है। मेरा ये भी मानना है कि कोई अगर आपके दरवाजे पर आपसे मिलने पहुंच जाता है तो उससे मिलना जरूर चाहिए। हम आखिर अभिनेता बनते क्यों हैं? चाहत पाने के लिए ही ना? तो जो हमारे चहीते हैं, उनको चाहत देनी चाहिए। मेरा उसूल है कि-
कोई मुस्कुरा देता हूं मैं हाथ बढ़ा देता हूं,
कोई हाथ बढ़ा देता है मैं सीने से लगा लेता हूं,
कोई सीने से लगा लेता है मैं दिल में बसा लेता हूं..

लेकिन ये शहर तो दूसरे ही किस्म का है। यहां लोग आपके प्यार को आपकी कमजोरी समझने लगते हैं। आपको भी इसका एहसास हुआ कभी?
-(कुछ देर सोचने के बाद) क्या कहूं? हम जाट हैं हमें कारोबार करना नहीं आता। फिल्म प्रोडक्शन में उतर कर हमने भी अपने हाथ जलाए हैं। लोग अपने बनकर आते रहे और हमारी ही जेब काटकर जाते रहे। आप यकीन नहीं करेंगे, हमने इतनी सुपरहिट फिल्में बनाईं पर कभी किसी फिल्म का ओवर फ्लो हमारे पास नहीं नहीं आया। घायल ने कितना बिजनेस किया, लेकिन इसके मुनाफे का हिस्सा हमारे पास तक नहीं आया। बेताब का नहीं आया। अब मेरा तो मानना है कि लोग ऐसे ही होते हैं। पर हमें इस सबमें अपना माथा नहीं खराब करना चाहिए, ऐक्टिंग करते रहना चाहिए।

और, सियासत का अनुभव कैसा रहा?
-मैं सियासत से पूरी तरह दूर हो गया हूं। मेरे हिसाब से किसी जज्बाती इंसान के बस का रोग नहीं है सियासत। हम अच्छा काम करना चाहते हैं, लेकिन लोग उसे भी नहीं करने देते। मेरी एक बात मानिए, कभी आपको मौका लगे तो मेरे निर्वाचन क्षेत्र जाकर पूछिएगा कि धर्मेंद्र ने कितना काम किया? जो काम वहां पचास साल में नहीं हो पाया वो मैंने किया। सच्ची सच्ची कहूं तो मुझे यश लेना नहीं आता। मुझे अपनी तारीफ में किसी के मुंह से कुछ कहलवाना नहीं आता। किसी किसी को ही आता है। ऐसे लोग कुछ ना करके भी अपनी तारीफें करवाते रहते हैं।

शायद इसीलिए पचास साल से ज्यादा वक्त फिल्म जगत में बिताने और एक से एक सुपरहिट फिल्में देने के बावजूद आपको बस गिनती के पुरस्कारों से ही संतोष करना पड़ा। कभी सोचते हैं इस बारे में?
-पहले बुरा लगता था फिर आदत हो गई। पहले सूट बूट पहनकर फिल्म पुरस्कारों में जाता था और पुरस्कार किसी और को मिल जाता था तो बुरा लगता था। फिर इसकी आदत हो गई। और, पुरस्कार देने भी शुरू किए तो दिया लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार। इस पुरस्कार को रिटायरमेंट पुरस्कार माना जाता है, लेकिन मेरा हौसला इसके बाद दोगुना हो गया। मैं नए उत्साह के साथ काम करने में जुट गया। सरकार का शुक्रगुजार हूं कि उसे मैं इतने साल भी याद रहा। लेकिन, मेरे दिल की बात पूछिए तो किसी भी कलाकार के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार होता है दर्शकों की तालियां, उनका प्यार, उनके दिल में अपने लिए छोटी सी जगह हमेशा हमेशा के लिए कायम रखना। दर्शकों की चाहत से बड़ा पुरस्कार कोई दूसरा नहीं होता।


pankajshuklaa@gmail.com

(संडे नई दुनिया पत्रिका के 5 फरवरी 2012 के अंक में प्रकाशित)

रविवार, 29 जनवरी 2012

मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती थी: विद्या बालन

संघर्ष के बाद मिलने वाली कामयाबी ही असली कामयाबी मानी जाती है और कामयाबी अगर विद्या बालन जैसी हो तो फिर उसे माना जाता है वो चलन जिसके पीछे जमाना चलने को बेताब हो जाता है। हिंदी सिनेमा में अरसे से भ्रांति रही है कि यहां महिला चरित्र प्रधान फिल्में बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलती हैं। लेकिन, जो काम हेमा मालिनी से लेकर श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित नहीं कर पाईं, वो विद्या बालन ने कर दिखाया है। विद्या बालन से एक खास बातचीत।

© पंकज शुक्ल। 2012.

सिनेमा में शुरुआत अगर संघर्ष से हो और वो भी ऐसे संघर्ष से जबकि लगातार दो दो फिल्में शुरू होने के बाद बीच में बंद ही हो जाएं, तो अक्सर हिम्मत साथ छोड़ने लगती है। अपनी पहली हिंदी फिल्म परिणीता से पहले के सफर का कभी अब ख्याल आता है?
-नाकामी हमें हौसला देती है। बशर्ते हम इसके इशारे समझें। जीवन में कुछ भी कभी भी बेकार नहीं होता। जो होता है किसी न किसी मकसद से होता है। पढ़ाई के दौरान या बाद में जो भी फिल्में मुझे शुरू के दिनों में मुझे मिलीं और फिर पकड़ से छूट गईं, उन्होंने उस वक्त तो बहुत हताश किया था। लेकिन अब समझ में आता है कि ऐसा क्यूं हुआ? ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि किस्मत ने मेरे लिए उससे बड़ी चीजें तय कर रखी थीं। मतलब ये कि अगर हम सफर में ठोकरें खातें हैं तो वे हमें और सतर्क होने और ज्यादा मजबूती से कदम बढ़ाने की सीख देती हैं। हर नाकामी को मैंने एक सबक की तरह लिया और अपनी कोशिश नहीं छोड़ी।

तो आखिर आप का नाम हो ही गया और वो भी किसी बड़े सितारे की मदद के बगैर?
-हां, कुछ लोगों का नाम उनके काम से होता है, मेरा बदनाम होकर हुआ है..(हंसती हैं) मेरी फिल्म द डर्टी पिक्चर का ये डॉयलॉग देखा जाए तो इस वक्त के लिए बिल्कुल मुफीद है। बस मैंने एक लीक से हटकर किरदार करने का हौसला दिखाया और वो कहते हैं न हिम्मते मर्दा मदद ए खुदा। तो कभी कभी ये कहावत हिम्मत ए जनाना पर भी लागू हो जाती है। लोग कहते हैं कि इश्किया, नो वन किल्ड जेसिका और द डर्टी पिक्चर, ये तीनों फिल्में बिना किसी बड़े सितारे के कामयाब हुई हैं। पर मेरा इस बारे में ये कहना है कि कोई भी फिल्म अपनी पूरी टीम की वजह से कामयाब होती है। इन तीनों फिल्मों में मेरे किरदार अलहदा थे और मेरा मानना है कि इनका इस तरह से लिखा जाना भी इनकी कामयाबी की मुख्य वजह रही। मेरा अभिनय तो इस सामूहिक प्रयास का एक हिस्सा भर है। लेकिन, इन तीनों फिल्मों के निर्माता और निर्देशकों ने मुझे इन किरदारों में देखा तो उनका भी योगदान कम नहीं है।


- हिंदी सिनेमा में भ्रांति रही है कि यहां महिला चरित्र प्रधान फिल्में बॉक्स ऑफिस पर कमाई नहीं कर पातीं। हेमा मालिनी से लेकर श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित तक ने इस तरह की कोशिशें की लेकिन आपने तो इस धारणा का ध्वंस करने के लिए हैट्रिक ही लगा दी। क्या वजह हो सकती है इस भ्रांति की और आपके किरदारों को मिली शोहरत की?
-मैं ऐसा नहीं कहूंगी कि मेरे पहले जिन अभिनेत्रियों ने इस तरह की कोशिशें की, वो कामयाब नहीं रहीं। हर कामयाबी को हमें कमाई के पैमाने से नहीं नापना चाहिए। रेखा जी ने न सिर्फ इस तरह की फिल्में कीं, बल्कि बॉक्स ऑफिस और समीक्षकों दोनों को चौंकाया भी और दोनों का दिल भी जीता। तो हो सकता है कहीं न कहीं थोड़ी बहुत प्रेरणा वहां से भी मुझे मिलती रही हो। वैसे सच पूछा जाए तो अभिनय का चस्का मुझे माधुरी दीक्षित की अदाकारी देख कर ही लगा। एक जमाना था जब मैं दिन भर एक दो तीन..(माधुरी दीक्षित की फिल्म तेजाब का गाना) गाती रहती थी और नाचती रहती थी। अक्सर होता ये भी था कि हमारे घर कोई आता और किसी बड़े के डांस का डा कहने भर पर मैं थिरकने लगती थी। तब मैं वाकई माधुरी दीक्षित बनना चाहती थी। रही बात उन किरदारों की जिनका आपने जिक्र किया है, तो मुझे लगता है समय बदल रहा है। लोगों की पसंद बदल रही है। लोग फिर से कथानक और किरदारों को तवज्जो देने लगे हैं तो इस नए चलन का तो स्वागत ही किया जाना चाहिए।

लेकिन क्या ऐसा नहीं है कि बार बार महिला प्रधान फिल्में करने और उनके सफल भी होते जाने से लोग आपके पास ऐसी ही फिल्में लेकर आने लगें और संदेश ये भी जा सकता है कि आप नायक प्रधान फिल्में ही नहीं करना चाहतीं?
-आप सही कह रहे हैं। लेकिन मैंने न तो कभी खुद को सीमाओं में बांधा और न ही कभी किसी तरह के दायरे में खुद को कैद किया है। मैंने ऐसा कोई फैसला नहीं किया है कि मैं सिर्फ महिला किरदार प्रध्ाान फिल्मों में ही काम करूंगी। हां, मेरे प्रशंसक मुझे सशक्त और केंद्रीय किरदारों में पसंद कर रहे हैं तो मैं उनकी शुक्रगुजार हूं। लेकिन, अगर मेरे पास अच्छी फिल्में आती हैं जो हीरो ओरिएंटेड हैं और उनमें मेरे लिए भी कुछ करने को है तो मैं बेशक उन्हें करने को तैयार हूं।

लेकिन ये संयोग ही है कि आपकी अगली जो फिल्म कहानी रिलीज होने जा रही है, वह इश्किया, नो वन किल्ड जेसिका और द डर्टी पिक्चर के ही दौर को आगे बढ़ाती है। क्या है इस फिल्म में आपका किरदार?
-हम जीवन में तमाम लोगों पर भरोसा करते हैं। लेकिन, क्या हो अगर हमें पता चले कि जिस इंसान पर हम भरोसा करते रहे, वो इंसान है ही नहीं। बस मेरी अगली फिल्म कहानी की यही कहानी है। इस फिल्म में मैं एक गर्भवती महिला विद्या बागची का रोल कर रही हूं, जो अपने होने वाले बच्चे के पिता को खोज रही है। जिन तीन फिल्मों का आपने नाम लिया, उनसे ये फिल्म इस लिहाज से अलग है कि इसमें एक रहस्य है जो आपको आखिर तक बार बार चौंकाता है। इससे ज्यादा इस किरदार के बारे में बातें करने से मुझे डर है कि मैं लालच में पूरी कहानी ही न बता जाऊं तो अच्छा होगा कि आप मुझे ज्यादा न कुरेदें।

चलते चलते एक निजी सवाल। इन दिनों आपके करोड़ों के बंगले और आपके दोस्त सिद्धार्थ रॉय कपूर के बड़े चर्चे हैं। कहीं वाकई शहनाई तो नहीं बजने जा रही?
-जिस दौर से मैं इन दिनों गुजर रही हूं, वो दौर किसी अभिनेत्री के करियर में बड़ी मुश्किल और बड़ी किस्मत से आता है। मैं फिलहाल इस वक्त का मजा लेना चाहती हूं और कुछ भी मेरे दिमाग में फिलहाल नहीं है। मैं इस कामयाबी का पूरा लुत्फ उठाना चाहती हूं और चुनौतियों भरे कुछ किरदार और करना चाहती हूं। बाकी सब इसके बाद।

pankajshuklaa@gmail.com

'संडे नई दुनिया' पत्रिका के 29 जनवरी 2012 अंक में प्रकाशित

सोमवार, 23 जनवरी 2012

बिना खान सितारों के सहारे बनूंगी नंबर वन! - कंगना रनौत


सपने होते ही हैं सच कर दिखाने के लिए, लेकिन तब जब आप इन्हें खुली आंखों से देखें। हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से कस्बे में आंखें खोलनी वाली कंगना रनौत ने हिंदी सिनेमा में आने के महज पांच साल के भीतर अपने सपने सच कर दिखाए हैं। लेकिन, जैसा कि आमतौर पर हर कामयाबी के साथ होता है, उनके अरमान भी अब आसमान छूने को बेताब हैं। सलमान खान से अपनी कथित नजदीकियों, हताश-निराश किरदारों से बाहर निकलने की अपनी कोशिशों और आने वाले कल को लेकर देखे गए नए सपनों को कंगना ने साझा किया दुनिया के सबसे बड़े होटलों में से एक दुबई के मेदान होटल में हुई मुलाक़ात के दौरान।

© पंकज शुक्ल। 2012

मंडी (हिमाचल प्रदेश) से दिल्ली और दिल्ली से बरास्ते सिनेमा लाखों लोगों के दिलों तक। मंजिलें तो खैर अभी और भी हैं, पर खुद कंगना की नजर में कंगना अब कहां है?
-मैं अब फिल्म जगत में खुद को काफी तनाव रहित माहौल में पाती हूं। मैंने मुंबई में काफी संघर्ष किया है और यहां तक कि तमाम फिल्में मिल जाने के बाद भी दो तीन साल पहले तक ये तय नहीं था मेरा यहां क्या होगा? लेकिन मेरे प्रशंसकों ने मुझे पसंद किया और फिल्म जगत के लोग भी अब मुझे जानते हैं। ये लोग ये भी जानते हैं कि मुझे हिंदी सिनेमा की आम हीरोइन की परंपरागत छवि वाले किरदार पसंद नहीं है। यही कंगना की नई इमेज है। तमाम निर्माता निर्देशक अब मेरे पास उन्हीं किरदारों के प्रस्ताव लेकर आते हैं, जो न सिर्फ चुनौतीपूर्ण होते हैं, बल्कि जिनमें अभिनय की असीम संभावनाएं भी होती हैं।

कम ही होता ऐसा कि किसी कलाकार को पहली ही फिल्म में फिल्मफेयर पुरस्कार मिल जाए और करियर के दो साल के भीतर अभिनय का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल जाए। पर, जिन फिल्मों के लिए आपको ये पुरस्कार मिले, उन्होंने ही आपके करियर में अड़ंगा भी लगाया, आप ऐसा मानती हैं कि नहीं?
-आप सही कह रहे हैं। गैगस्टर, वो लम्हें और फैशन जैसे किरदार मेरे पास अनगिनत आते थे। लेकिन, फैशन के आते आते मुझे लग गया था कि इस खांचे में बांधते ही मेरा सफर रुक जाएगा। उन दिनों मेरे पास सारे प्रस्ताव एक दुखी लड़की या जीवन से हताश-निराश लड़की के ही आते थे। तो मैंने जानबूझकर तनु वेड्स मनु, डबल धमाल और रास्कल्स जैसी फिल्में कीं। इनमें से कुछ फिल्में नहीं भी चलीं लेकिन मैं मानती हूं कि मैं किसी खांचे में बंधने से बच गई। रास्कल्स की नाकामी के बारे में आप पूछें तो मेरा मानना है कि जो हो जाता है वो हो जाता है। ऐसी फिल्मों की कहानी भी नहीं होती है। ऐसी फिल्में बस बन जाती हैं। जैसे गोविंदा जी की फिल्में बना करती थीं। तो ऐसी फिल्में कभी चल जाती हैं। कभी नहीं भी चलतीं। अब आगे भी जो मैं फिल्में कर रही हूं, उनमें भी मेरे किरदार ऐसे हैं, जिनमें जान है। मैं अपनी अदाकारी को अभी और आगे ले जाना चाहती हूं और इस मामले में अपने को किसी दायरे में बांधकर कतई नहीं रखना चाहती। मुझे उम्मीद है कि क्रिश 2, तनु वेड्स मनु 2 और डेढ़ इश्किया में मेरी मेहनत को लोग सराहेंगे।

अपने किरदारों को लेकर आप अक्सर समालोचकों के निशाने पर रही हैं, किस तरह से लेती हैं आप अपनी आलोचना को?
-सच पूछें तो मैं अपनी आलोचकों की बहुत बहुत शुक्रगुजार हूं। मैं ये भी नहीं कहूंगी कि जितना श्रेय मुझे मेरी सफलता का मिलना चाहिए था वो नहीं मिला। मेरे बारे में जो भी अच्छा या बुरा लिखा जाता है, वो मैं सब पढ़ने की कोशिश करती हूं। मेरा मानना है कि मेरे करियर को संवारने और उसे नई दिशा देने में आलोचनाओं का सबसे बड़ा हाथ रहा है। मेरे हताश निराश किरदारों के बारे में बार बार लिखा गया तो शायद उसी ने मुझे तनु वेड्स मनु करने के लिए प्रेरित किया। मेरा मानना है कि अगर हम आलोचना को भी सकारात्मक तरीके से लें, तो हमें खुद को बदलने में काफी मदद मिल सकती है।

लोग अक्सर मुझे सलमान कैंप से जोड़ते हैं और मुझे उनका करीबी मानते हैं। लेकिन कोई भी हीरोइन किसी कैंप की तब होती है जब वो उस हीरो के साथ फिल्म करे। लेकिन, मेरी तो कोई फिल्म फिलहाल सलमान खान के साथ नहीं बन रही। महेश मांजरेकर की एक फिल्म को लेकर हम लोगों ने काफी मेहनत भी की, लेकिन अभी तक उसकी स्क्रिप्ट ऐसी नहीं लिखी जा सकी जो सलमान खान को प्रभावित कर सके।

लेकिन हिंदी सिनेमा में वूमन ओरिएंटेड फिल्मों का चलन लौटाने को लेकर जो हंगामा द डर्टी पिक्चर के वक्त हुआ, वो आपकी फिल्म तनु वेड्स मनु के वक्त तो नहीं हुआ? जबकि इसकी शुरूआत तो इसी फिल्म से मानी जानी चाहिए।
-हो सकता है आपकी बात में दम हो। पर मैं ये नहीं कहूंगी कि मुझे जितनी श्रेय मिलना चाहिए था वो नहीं मिला। यहां नायकों के कंधे पर रखकर बंदूक चलाने की लोगों को आदत है। ये कहा जाता रहा है कि यहां कोई हीरो चाहेगा तो ही कोई लड़की काम करेगी। पर विद्या बालन की हिम्मत की तारीफ फिर भी करना चाहूंगी। बहुत लोगों को शायद पता न हो पर द डर्टी पिक्चर का प्रस्ताव पहले मेरे पास ही आया था। लेकिन तब शायद मैं किरदारों के चयन को लेकर इतना बहादुर नहीं थी। मेरा मानना है कि किसी भी कलाकार के करियर में एक वक्त आता है जब वो इतिहास बनाने की कूवत हासिल कर लेता है। विद्या की फिल्म ने 125 करोड़ रुपये का कारोबार किया है और वाकई उन्होंने हिंदी सिनेमा में एक इतिहास बना डाला है।

ज्यादा बड़ी बात ये है कि विद्या ने ये इतिहास बिना शाहरुख खान, आमिर खान या सलमान खान की मदद के हासिल किया है। आपको क्या मानना रहा है कि कोई हीरोइन यहां क्या बिना शाहरुख खान, आमिर खान और सलमान खान के साथ काम किए भी नंबर वन हीरोइन बन सकती है?
-क्यों नहीं? बिल्कुल बन सकती है। बल्कि मैं खुद अगले दो साल में ये करके दिखा दूंगी। लोग अक्सर मुझे सलमान कैंप से जोड़ते हैं और मुझे उनका करीबी मानते हैं। लेकिन कोई भी हीरोइन किसी कैंप की तब होती है जब वो उस हीरो के साथ फिल्म करे। लेकिन, मेरी तो कोई फिल्म फिलहाल सलमान खान के साथ नहीं बन रही। महेश मांजरेकर की एक फिल्म को लेकर हम लोगों ने काफी मेहनत भी की, लेकिन अभी तक उसकी स्क्रिप्ट ऐसी नहीं लिखी जा सकी जो सलमान खान को प्रभावित कर सके। मुंबई हीरोज की मैं ब्रांड अंबेसडर हूं तो इसके हर मैच के दौरान खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाने के लिए मैं मौजूद रहती हूं, बस। रही बात मेरी अपनी तरक्की को तो मैं मानती हूं कि मैं अभी ज्यादा मैच्योर रोल नहीं करना चाहती। मैं अभी सिर्फ 25 साल की हूं और अभी नाच गाने वाले, प्यार मोहब्बत वाले और थोड़ा बहुत लोगों को गुदगुदाने वाले माधुरी दीक्षित जी और श्रीदेवी जी वाले रोल कर सकती हूं। पांच साल बाद शायद मैं थोड़ा गंभीर किस्म के रोल भी फिर से करना चाहूं।

चलते चलते, एक सवाल आपकी अगली फिल्म क्रिश की सीक्वेल को लेकर। क्या आप फिल्म में वही रोल कर रही हैं जो पहले चित्रांगदा सिंह को दिया गया था? कुछ बताएंगी इस रोल के बारे में?
-मेरी जो बात फिल्म के निर्देशक राकेश रोशन जी से हुई, उसके मुताबिक ये रोल मेरी कद काठी के हिसाब से ही लिखा गया। स्क्रिप्ट में भी कई जगहों पर कंगना ही लिखा हुआ है। पहले जब मेरे पास इस फिल्म का प्रस्ताव आया था तो मैं दूसरी फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त थी। इसीलिए राकेश जी ने कुछ और लोगों को भी इस किरदार के लिए सोचा। पर, बाद में फिल्म की शूटिंग आगे खिसकी तो तब तक मेरे पास भी वक्त निकल आया। बस, इसके बाद ही मैं फिल्म का हिस्सा बन गई। फिल्म में मेरा किरदार एक सुपरवूमन का किरदार है और ये विवेक ओबेरॉय के अपोजिट बिल्कुल नहीं है। फिल्म में मेरी एक अलग तरह की प्रेम कहानी है, पर इस साइंस फिक्शन में मेरे किरदार का ज्यादा जोर एक्शन दृश्यों पर है। फिल्म के लिए चीन से आए हुनरमंद मुझे ये सिखा रहे हैं। हो सकता है, इस फिल्म के बाद मुझे हिंदी सिनेमा की एक्शन हीरोइन का तमगा मिल जाए।

विशेष- कंगना का कहना है कि उनका सरनेम हिंदी अखबारों में अक्सर गलत लिखा जाता है। कंगना का सही सरनेम रनौत है और वह चाहती हैं कि इसे ऐसे ही लिखा जाए। सुधी पाठकों की सूचनार्थ :)

pankajshuklaa@gmail.com

(संडे नई दुनिया के 22 जनवरी 2012 के अंक में प्रकाशित)

रविवार, 22 जनवरी 2012

फिल्म वयस्कों के लिए : मनोरंजन सबके लिए..?


देश में सरकार की तरफ से सिनेमा का सबसे बड़ा पुरस्कार दादा साहब फाल्के पुरस्कार जिन धुंदीराज गोविंद फाल्के के नाम से दिया जाता है, उनकी आत्मा लोकप्रिय पुरस्कारों के नए स्तर को देखकर जरूर दुखी होगी। लेकिन, शुचिता के पक्षधर करें भी तो क्या? क्योंकि खुद भारत सरकार पिछले साल सलमान खान की दबंग को संपूर्ण मनोरंजन देने वाली पूरे भारत में बनी फिल्मों में से सबसे अच्छी फिल्म मान चुकी है। नतीजा साफ है कभी वयस्क फिल्में दिखाने वाले थिएटरों के आसपास भी दिखने से डरने वाले बच्चे अब पीठ पर स्कूल का बस्ता टांगे झुंड बनाकर द डर्टी पिक्चर देखने पहुंचते हैं।



© पंकज शुक्ल

कहते हैं सिनेमा बड़ा हो गया है। बात भी सही है। अगले साल किसी भारतीय द्वारा बनाई देश की पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र के निर्माण के सौ साल पूरे हो रहे हैं। हिंदी सिनेमा के निर्देशकों की संस्था इसके जश्न की तैयारियां भी शुरू कर चुकी है और इसे लेकर मुंबई से दिल्ली तक हलचल भी तेज है। ये वही सिनेमा है जिसके प्रचार के लिए बनने वाले पोस्टरों पर पहले बड़ा बड़ा लिखा रहता था- संपूर्ण पारिवारिक मनोरंजन फिल्म। पर, जरा रुककर सोचिए तो जरा, और बताइए उस फिल्म का नाम जो आपने पिछली बार पूरे परिवार के साथ देखी हो।

शायद दिमाग पर जोर डालना पड़ रहा हो। जी हां, सिनेमा अब परिवार के साथ देखने लायक बचा ही नहीं है और हिंदी सिनेमा के सबसे अहम माने जाने वाले तीन लोकप्रिय पुरस्कारों स्क्रीन पुरस्कार, फिल्म फेयर पुरस्कार और जी पुरस्कार में से जिस पहले पुरस्कार से इस सीजन की बोहनी हुई है, उसने वाकई बता दिया है सिनेमा बड़ा हो गया। पिछले साल देल्ही बेली के एक गाने को सेंसर बोर्ड ने देश भर के टीवी चैनलों पर प्रसारित करने की मंजूरी दी। उत्तर भारत की एक भदेस गाली को तोड़मरोड़ कर बने इस गाने को सुनने के बाद निर्देशक राम गोपाल वर्मा ने कहा, हमें आमिर खान का शुक्रिया अदा करना चाहिए जिन्होंने पूरी एक पीढ़ी को एकदम से बड़ा कर दिया। बात भले तंज में कही गई हो, लेकिन इसके निहितार्थ हिंदी सिनेमा के उस नए चलन को पुख्ता करते हैं जिसमें अब शाहरूख खान बिकाऊ रहें हों या न रहें पर सेक्स ही कामयाबी की पहली गारंटी बन गया है।

किसी भी उद्योग में दिए जाने वाले पुरस्कार उस क्षेत्र की गुणवत्ता, चलन और चरित्र को ही नहीं दर्शाते बल्कि पुरस्कृत कलाकृतियों को इनका मानक भी मान लिए जाने की परंपरा रही है। तो, क्या अब हिंदी सिनेमा में आने वाली कलाकारों और निर्देशकों की नई पीढ़ी सिर्फ द डर्टी पिक्टर, शैतान और देल्ही बेली को अपना आदर्श नहीं मानेगी? एक्सप्रेस समूह की पत्रिका स्क्रीन द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों में इस साल जिस तरह केवल वयस्कों के लिए बनी फिल्मों ने जी भरकर पुरस्कार जीते, उससे तो यही लगता है कभी हाशिए पर रहने वाला और आमतौर पर अछूत समझे जाने वाला एडल्ट सिनेमा ही अब मुख्य धारा का सिनेमा बन चुका है। और, ऐसा है तो फिर क्या इसे बदलते समाज का आईना नहीं कहा जाना चाहिए? छोटे परदे पर पॉर्न स्टार सनी लिओन की मौजूदगी को अपना लेने वालों के लिए घर से बाहर सिनेमाघर के अंधेरे और एकांत में शायद यही सब कुछ एंटरटेनमेंट है। जैसे कि विद्या बालन अपनी फिल्म द डर्टी पिक्चर में कहती भी हैं, फिल्म केवल तीन वजहों से चलती है-एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट। और मैं एंटरटेनमेंट हूं। लेकिन लोग यह भूल जाते हैं कि ये बात वो किरदार कह रहा है जो फिल्म जगत में कभी आइटम गर्ल से आगे गया ही नहीं। पर अब हर हीरोइन आइटम बनना चाहती है। आइटम यानी मुंबइया टपोरी भाषा का वो शब्द जो निचले तबके में आमतौर पर किसी ऐसी लड़की के लिए इस्तेमाल होता है, जो छिछोरे छोकरों को देखकर हमेशा मुस्कुराती है।

विद्या बालन कहती भी हैं, लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं आइटम नंबर क्यूं नहीं करती। अरे जब मैंने पूरी फिल्म ही आइटम गर्ल की कर दी तो आइटम नंबर का क्या?
लेकिन, हिंदी सिनेमा की नायिका की ऐसा ही मुस्कुराहाट कातिलाना है। और इसका असर दूर तक होता है। कभी केवल वयस्कों के लिए पोस्टर वाली फिल्मों के थिएटर तक जाने से पहले आसपास किसी परिचित की संभावित मौजूदगी की आहट लेते रहने वाले स्कूली बच्चे इस बार फिल्म द डर्टी पिक्टर दिखाने वाले सिनेमाघरों के सामने पीठ पर अपना बस्ता टांगे दर्जनों के झुंड में दिखाई दिए और फिल्मी विद्वानों ने इसे ही पिछले साल की सर्वोत्तम फिल्म भी माना। ऐसे में अगर पुरस्कार समारोह के दौरान विद्रूपता की सारी सीमाएं लांघते हुए फिल्म जगत के तीन पहले सितारों में से एक शाहरूख खान अगर पर तमाम तरह की भोंडी हरकतें अब करते भी हैं तो फिर गलत क्या? हौसला तो हम ने ही उनका बढ़ाया है। इस हौसले का ही नतीजा है कि मुंबई की पत्रकार वार्ताओं में उनकी देखादेखी अब ऋतिक रोशन भी कोई टेढ़ा मेढ़ा सवाल सुनकर सवाल करने वाली पत्रकार को अपने बेडरूम तक आने का न्यौता दे देते हैं, और वो भी सरेआम। कहीं से कोई विरोध नहीं, किसी पत्रकार संगठन के तरफ से कोई बयान तक नहीं। वजह? शायद अब हमें भी इसी में मजा आता है।

साल 2012 के पहले पुरस्कारों ने ये पूरी तरह साफ कर दिया कि सिनेमा की नायिका का पैमाना भी बदल रहा है। अब फिल्म में आइटम नंबर करने के लिए अलग से किसी मॉडल को ढूंढने की जरूरत नहीं होती। अब नंबर वन हीरोइन बनने की दावेदार कैटरीना कैफ खुद चिकनी चमेली बनने को तैयार है। अरसा पहले यही काम ऐश्वर्या राय ने करिश्मा कपूर की फिल्म शक्ति में इश्क़ कमीना में भी किया था। लेकिन मामला कभी मुख्य धारा का वैसे नहीं बना जैसा विद्या बालन ने फिल्म द डर्टी पिक्चर में कर दिखाया है। वह बीते साल की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री बन चुकी हैं तो जाहिर है कि अब होड़ उनसे आगे निकलने की ही होगी। ऐसे में हर दूसरी अभिनेत्री न पूरी फिल्म में सही तो कम से कम किसी गाने में ही सिल्क स्मिता सी सिल्की सिल्की दिखने की कोशिश तो करेगी ही। चिकनी चमेली इसी का विस्तार है। विद्या बालन कहती भी हैं, लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं आइटम नंबर क्यूं नहीं करती। अरे जब मैंने पूरी फिल्म ही आइटम गर्ल की कर दी तो आइटम नंबर का क्या? उनकी बात में दम है। और इसी दम का नतीजा है कि उनको बांग्ला साहित्य के भद्रलोक की परिणीता बनाकर बड़े परदे पर लाए मशहूर फिल्म निर्माता विधु विनोद चोपड़ा भी अब अपनी अगली फिल्म फरारी की सवारी में विद्या से एक आइटम नंबर कराने की सोच रहे हैं।

जमाना बदगुमानी के बोलबाले का है और इस मैली गंगा में नाक बंद करके भी सब हाथ धोना चाहते हैं। तो भला फिल्म पुरस्कार ही पीछे क्यूं रहें। स्क्रीन पुरस्कारों में बेहतरीन अदाकारा का तमगा पाने के बाद विद्या बालन अब जी सिने अवार्ड्स समारोह को थोड़ा और नमकीन बनाने की तैयारी में हैं। जमाने की बलिहारी देखिए जिन पुरस्कारों के लिए अभी तक जी चैनल शाहरुख खान और प्रियंका चोपड़ा की मेजबानी को ही अपना तुरुप का इक्का मान रहा था, वही चैनल अब बाकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर ये बता रहा है कि विद्या बालन इस समारोह में दक्षिण के सिनेमा में नायिका के तमाम बिंबों और प्रतिबिंबों को अपनी शोख अदाओं के जरिए मंच पर सजीव करेंगी। वजह यही है कि ज्यादा से ज्यादा विज्ञापनदाता इसके लिए आए आएं। एक पान मसाला कंपनी पहले ही इस गंगा में तरने के लिए डुबकी लगा चुकी है।

बात लड़कों की करें तो नई पीढ़ी के कलाकारों में इन दिनों आगे निकलने की होड़ रणबीर कपूर और इमरान खान में लगी है। रणबीर ने अपनी इमेज बचाए रखने के लिए भले देल्ही बेली से हाथ जोड़ लिए हों, पर इमरान खान इसे करके अब भी न सिर्फ गौरान्वित महसूस करते हैं बल्कि अपने मामू आमिर खान के साथ मिलकर इस बात की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरह ये फिल्म टेलीविजन पर भी आ जाए और उनके खास हुनर का जलवा हिंदुस्तान का बच्चा बच्चा देख ले। इस बारे में बात करने पर वह कहते हैं, हमने पहले ही लोगों का बता दिया था कि ये फिल्म बड़ों की फिल्म है। और, इसकी भाषा वो है जो आम तौर पर आजकल बड़े लोग आपस में बातचीत करते वक्त इस्तेमाल करते हैं। लेकिन, उन दृश्यों का क्या जो वात्स्यायन के कामसूत्र को भी मात करते हैं? इस सवाल पर वो चुप्पी साध जाते हैं। वो चुप्पी साधें तो साधें रहे पुरस्कार देने वालों को इसी फिल्म का स्क्रीनप्ले पिछले साल बनी सारी फिल्मों में द बेस्ट लगा, आखिर खुश तो आमिर खान को भी रखना है न। फिल्म को दो पुरस्कार और भी मिले। एडल्ट फिल्मों के जश्न की रही सही कसर एक ऐसी फिल्म ने पूरी कर दी जिसके निर्माता अनुराग कश्यप की छवि ही ऐसी फिल्में बनाने की है, जो पंरपराओं से विद्रोह करती हों और फिल्म को यू सर्टिफिकेट दिए जाने की सोचती तक न हों। घर वालों से पैसे ऐंठने के लिए अपने ही किसी साथी का अपहरण कर लेने की तरकीब बताती और तमाम तरह की सामाजिक बुराइयों का जलसा सजाती इस फिल्म के निर्देशक को साल के पहले ही पुरस्कार में बीते साल अपनी पहली फिल्म बनाने वाले सारे निर्देशकों में सर्वोत्तम माना गया। बलिहारी है जमाने की भी और बलिहारी है सिनेमा के इस बदलते रूप की, जिसमें सेक्स, ड्रग्स, नशा सब जायज है। कुछ नाजायज है तो बस पूरे परिवार के साथ फिल्म देखने आना।

(नई दुनिया 22 जनवरी 2011 के साप्ताहिक परिशिष्ट 'रंगोली' में प्रकाशित)