
वो जो हलचल है तेरे दिल में मेरी हरक़त है,
मेरी जुंबिश ही तेरे हुस्न की ये बरक़त है।
मेरी गुस्ताख़ नज़र ने तुझे फिर से देखा,
तू कुछ औऱ खिली, और रंगीं शफ़क़त है।
गुम हूं पास तेरे तू ही ढूंढती मुझको,
मेरे सीने में छिपी क्या ये तेरी हसरत है।
तेरे करीब हूं, फिर भी जुदा सी तू मुझसे,
मेरी तदबीर से संवरी ये किसकी किस्मत है।
तेरा ये गोरा रंग, फितरत मेरी ये काली सी,
ना तू मंदिर में रहे फिर भी मेरी इबादत है। (पं.शु.)
पेंटिंग सौजन्य- संगीता रोशनी बाबानी
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
जवाब देंहटाएंप्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (7/2/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com
शुक्रिया वंदना जी। आपका उत्साहवर्द्धन मेरा हौसला बढ़ाता है।
जवाब देंहटाएंbahut sundar likha hai aapne.......pankti pankti ati sundar
जवाब देंहटाएंधन्यवाद अना जी।
जवाब देंहटाएंमेरी गुस्ताख़ नज़र ने तुझे फिर से देखा,
जवाब देंहटाएंतू कुछ औऱ खिली, और रंगीं शफ़क़त है।
गुम हूं पास तेरे तू ही ढूंढती मुझको,
मेरे सीने में छिपी क्या ये तेरी हसरत है।
वाह...वाह...वाह...लाजवाब...दाद कबूल अक्रें.
नीरज
शुक्रिया नीरज भाई..
जवाब देंहटाएंखूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
जवाब देंहटाएंसादर,
डोरोथी.
बहुत बहुत धन्यवाद. डोरोथी बहन.
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