
अपन बात कर रहे थे अनुराग कश्यप की। बीते साल उन्होंने एक ऐसी कहानी को हाथ लगाया जिसे करीब करीब हर प्रोड्यूसर कूड़े में फेंक चुका था। संजय लीला भंसाली के असिस्सटेंट रहे विक्रमादित्य मोटवाने की ये कहानी अनुराग ने पढ़ी तो बहुत पहले थी लेकिन संजय सिंह के साथ मिलकर इसे बनाने का मुहूर्त तभी निकला। उड़ान बनी। चली नहीं चली, इसके आंकड़ों में ना भी जाएं तो सराही बहुत गई। असली हुनरमंद भी कभी पैसे के पीछे नहीं भागता, उसके लिए हौसला बढ़ाने के लिए बजी दो तालियां दोनों जहां की मन्नतें कुबूल होने जैसा होता है। विक्रमादित्य की इस फिल्म ने तमाम देसी विदेशी फिल्म फेस्टिवल्स में तारीफ पाई और मराठों के मैदान में आते आते एक ऐसी गंगा बन गई, जिसमें करोड़ों फूंक कर अपनी मर्जी का तमाशा करने वाले फिल्म अवार्ड्स अपने पाप धोने के लिए बार बार डुबकी लगा रहे हैं। उड़ान इन लोगों के लिए रिन साबुन की ऐसी बट्टी बन गई है जिससे दरअसल इन अवार्ड्स वालों को अपने दामन पर लगे दाग धोने की सहूलियत हो गई है।
अनुराग को उसूलों से समझौता करना न विरासत में मिला और उन्होंने अपने हौसले को समझौतो के आगे घुटने भी नहीं टेकने दिए। उनकी लड़ाई एक ऐसी व्यवस्था से रही है, जहां सितारों को भगवान माना जाता है। शोहरत की बुलंदियां छूने के बाद भी उनका ये जुझारूपन कायम है, अनथक और अविराम। उनके दफ्तर मेरा जाना अब तक दो ही बार हुआ है। मुंबई के उपनगर अंधेरी में आरामनगर का ये इलाका अपने नाम के लिहाज से बिल्कुल उलट है। यहां हर वक्त जिंदगी बेतरतीब सी बिखरी दिखती है। फिल्म निर्माताओं के दफ्तरों के सामने काम पाने की चाहत रखने वाले युवाओं की बेतरतीब कतारें, रास्ते में बेतरतीब से खड़े पेड़ या फिर फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप के दफ्तर तक पहुंचने का बेतरतीब रास्ता। दफ्तर के रिसेप्शन पर एक फ्रेम में लगा फिल्म नो स्मोकिंग का पोस्टर भी इसी का एक्सटेंशन मालूम होता है। पोस्टर पर छपा है - इन सिनेमाज 26 अक्टूबर 2007। इसके नीचे अलग से टाइप करके चिपकाया गया है - आउट ऑफ सिनेमाज 30 अक्टूबर 2010। अपने हर लफ्ज पर दाद की चाह रखने वालों के शहर में अपनी ही फिल्म के पोस्टर पर अपने ही हाथों चिपकाई गई ये चिप्पी अनुराग कश्यप की शख्सीयत का सबसे छोटा लेकिन सबसे सटीक परिचय है।
उड़ान के किरदारों की मनोदशा की चुगली अनुराग के दफ्तर की दीवारें करती हैं। फिल्म रिलीज से पहले हुई बातचीत में अनुराग ने कहा था, अपने यहां टीन एजर्स को लेकर हल्ला तो बहुत है, लेकिन सच पूछें तो उनको जानने की कोशिश हम ईमानदारी से कर नहीं रहे। पहले जो संवाद दो पीढ़ियों के बीच कभी कभार ही होता था, वह अब खूब होता है लेकिन फिर भी कहीं न कहीं कुछ न कुछ दूरी जरूर है। हम टीनएजर्स के लिए फिल्में भी इसीलिए ईमानदारी से नहीं बना पाते। इस आयुवर्ग में सिर्फ कैंडीफ्लॉस रोमांस ही नहीं होता। ये पीढ़ी कांतिशाह के अंगूर भले देखती हो लेकिन वह हम सबसे बहुत आगे है। उसे अपने कल की हमसे ज्यादा चिंता है। जिस उम्र में हम लोग अश्लील साहित्य की तरफ आकर्षित होते थे, उस उम्र तक आते आते तो ये पीढ़ी सब कुछ देख भी चुकी होती है और उससे उकता भी चुकी होती है। आज 40 की उम्र के लोग भले अकेले में इंटरनेट पाने पर पॉर्न साइट्स पर जाना न चूकते हों, लेकिन आज के टीनएजर्स अकेले होते हैं तो भी अमूमन ऐसा नहीं करते। अनुराग की यही पारखी नज़र उन्हें बाकी के निर्देशकों से अलग करती है।
अनुराग की तारीफ में लिखना हिंदी सिनेमा में अपने दुश्मन बढ़ाने जैसा ही है। इसके खामियाजे से मैं दो चार हो भी चुका हूं। लेकिन, फिल्म शूल के वक्त दिल्ली के फिल्म्स डिवीजन ऑडीटोरियम के बाहर फुटपाथ किनारे मिले अनुराग और आज के अनुराग में फर्क ना दिखना ही इसकी भरपाई कर देता है। अपन बेझिझक उनके पाले में खड़े हो सकते हैं, क्योंकि जो तटस्थ हैं, वक्त उनका भी इतिहास किस तरह लिखेगा, फिलहाल तो मालूम नहीं।
-पंकज शुक्ल
sachmuch apko padna achchha lagta hai.
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