शनिवार, 24 सितंबर 2011

इरशाद कामिल : शैदाई तुझे कर गया ओए...

बिरले ही होते हैं ऐसे जो मायानगरी में अपना नाम बनाने का ख्वाब लेकर आएं और किस्मत की दस्तक उनके दरवाजे पर उम्मीद से पहले सुनाई दे जाए। पंजाब के मलेरकोटला से मुंबई आए इरशाद कामिल का नाम भी ऐसे ही बिरलों में शामिल हैं। इन दिनों मेरे ब्रदर की दुल्हन और मौसम फिल्मों के लिए लिखे उनके गानों की हर तरफ धूम है, और गुरुवार को हुए जीमा अवार्ड्स में उन्हें पी लूं..गाने के लिए मिला सर्वश्रेष्ठ गीतकार का एक और पुरस्कार। इरशाद ने अपने करियर के कुछ राज खोले हैं पंकज शुक्ल के सामने।


पहली बगावत
पिताजी चूंकि मलेरकोटला में के सरकारी स्कूल में केमिस्ट्री पढ़ाते थे लिहाजा हमारे बारे में भी ये तय सा हो गया था कि या तो मुझे डॉक्टर बनना है या फिर इंजीनियर। लेकिन, हमने भी साइंस के साथ ऐसी ऐसी रुसवाइयां की कि उसे भी हमेशा याद रहेंगी। बाकायदा साइंस में फेल होकर दिखाया और घर वालों ने भी साइंस की सोहबत से हमें आजाद कर दिया। लिहाजा बीए में हिंदी और भूगोल ले ली। हिंदी थोड़ी आसान दिखती थी और चूंकि कुदरत से मोहब्बत शुरू से रही तो भूगोल के पहाड़, नदियां पसंद आने लगीं। 1990 में पंजाब यूनीवर्सिटी आ गया। वहां एमए किया, पीएचडी की। ट्रिब्यून और जनसत्ता जैसे अखबारों में नौकरी की और छोड़ भी दी। मुंबई आने की योजना पहले से थी पर मैं मुंबई उस तरह से नहीं आना चाहता था जैसे बाकी लोग आ जाते हैं। जान पहचान वाले एक दोस्त को मनाया। वो दिल्ली में था। उसने मुंबई साथ चलने का वादा किया तो मैं अप्रैल 2000 मैं अपनी बचत के पांच हजार रुपये लेकर दिल्ली आ गया। बस स्टैंड के सामने वहां टूरिस्ट कैंप है तिब्बती शरणार्थियों का। उस टाइम 200 रुपये का कमरा था। दोस्त बहाने मारते रहा और मेरे हजार रुपये चार पांच दिन में खर्च हो गए। आखिरकार, हिम्मत करके मैं एक दिन अकेले ही मुंबई के लिए निकल पड़ा।
पहला ब्रेक
पहली बार मुंबई आया तो दस-पंद्रह दिन घूम फिर कर मैं वापस चला गया। अगली बार फरवरी 2001 में यहां रुकने की तैयारी के साथ आया। पर इससे पहले मुझे चंडीगढ़ में ही एक सीरियल लिखने का काम मिल गया। ये बतौर लेखक मेरा पहला सीरियल था, कहां से कहां तक जी टीवी के लिए। फिर दो चार पांच सीरियल और लिखे। इसी दौरान फिल्म सोचा ना था के निर्देशक इम्तियाज अली से मुलाकात हो गई। संदेश शांडिल्य संगीत निर्देशक थे उस फिल्म में और तय ये हुआ कि गाने लिखने के लिए कोई नया लड़का चाहिए। वजह ये बताई गई कि यहां के जो नामी गीतकार हैं वो नए निर्देशक अपने अरदब में लेने की फिराक में रहते हैं। संदेश से मैं कुछ दिन पहले ही मिला था। इम्तियाज से दो मिनट में ही ट्यूनिंग हो गई। सोचा ना था कई सारे लोगों की पहली पिक्चर थी। अभय और आयशा की पहली फिल्म थी। उस दिन मैं मारे खुशी के रात सो भी नहीं पाया। ये बात 2002 की है, हालांकि सोचा न था तीन साल बाद रिलीज हुई और उसके पहले लोगों ने मेरे गाने चमेली में सुन लिए। इस लिहाज से मेरी रिलीज हुई पहली फिल्म चमेली रही।
पहला जश्न
चमेली पिक्चर में प्रोड्यूसर की मेहरबानी कहिए या मोहब्बत। कि मेरा नाम ओपनिंग क्रेडिट्स में नहीं है। एंड क्रेडिट्स में मेरा नाम है, सीडी और अलबम पर भी नाम है। लेकिन फिल्म की शुरुआत होते वक्त परदे पर नाम देखने की खुशी अलग ही होती है। तो वहां नाम नहीं देखकर बहुत ज्यादा मायूसी हुई। हालांकि अब मालूम हो चुका है कि यहां आपके हुनर से ना तो यहां निर्माताओं को मोहब्बत होती है और ना ही लगाव। क्रिएटिविटी उनके लिए माल है जिसे बाजार में बिकना होता है। खैर, मेरे नाम के साथ पहला होर्डिंग लगा फन रिपब्लिक में सोचा ना था फिल्म का। इम्तियाज उन दिनों पास में ही रहते थे, उन्होंने वहां फिल्म की होर्डिंग देखी तो रात 11.30 बजे मुझे फोन किया। मैं रात 12 बजे वहां होर्डिंग देखने गया। हम दोनों बड़े खुश हुए। पोस्टर पर नाम पहली बार लिखा देखा था। बस वहीं सेलीब्रेशन हो गई। हालात जैसे भी थे हौसले बहुत बड़े थे। हम दोनों ने तब एक एक सिगरेट पी कर जश्न मनाया।
पहला फिल्मफेयर
आपको ये जानकर शायद अचरज हो कि मुझे लव आजकल के गाने आज दिन चढ्या के लिए जब पहला फिल्मफेयर पुरस्कार मिला तो उससे पहले मेरा कभी नॉमीनेशन भी नहीं हुआ। जब वी मेट के लिए मेरा नॉमीनेशन नहीं हुआ। चमेली के लिए कोई नॉमीनेशन नहीं हुआ। लेकिन अब मुझे लगता है कि अवार्ड किसी एक खास गाने के लिए यहां नहीं दिया जाता। अवार्ड यहां शायद किसी कलाकार के हाल फिलहाल के पूरे काम को देखकर दिया जाता है। पहला अवार्ड जब मिला तब मैं आठवी कतार मंे बैठा था। गुलजार, प्रसून जोशी, जावेद अख्तर के साथ मेरा नॉमीनेशन हुआ तो मैं तो इतने से ही खुश था। मैं खुद को समझाकर गया था कि पुरस्कार नहीं मिलेगा बस अवार्ड फंक्शन देखकर लौट आना है। फिर स्टेज से नाम एनाउंस हुआ तो 15-20 सेकेंड के लिए मैं पूरी तरह से ब्लैंक हो गया। मुझे यकीन नहीं हुआ कि मुझे मिला है अवार्ड। थोड़ी देर बाद अपने आप में आया और अपनी कुर्सी से मंच तक जाने के लिए जो 25 कदम मैंने बढ़ाए उनमें अपनी बीती 10 साल की पूरी जिंदगी दोबारा देख ली। गुलजार साब के शब्दों में कहें तो जिस चीज की आपको तमन्नाा रही हो और वो मिल जाए तो जमीन तो पैरों के तले से खिसकती ही है, कई बार सिर से आसमान भी खिसक जाता है। लेकिन ये चाहत भी बस पहले पुरस्कारों तक ही रहती है। अब तक सब रीटेक जैसा मालूम होता है। मैं बस अच्छा काम करना चाहता हूं और चाहता हूं कि मेरे नाम के साथ जो उम्मीदें हिंदी सिनेमा के गीतों को पसंद करने वालों की बंध्ा गई हैं, उन पर खरा उतरता रहूं।