बुधवार, 14 सितंबर 2011

लिपि के बचने से बचेगी भाषा

अमिताभ बच्चन
हिंदी को लेकर छोटे शहरों में अब भी चेतना है। मेट्रो शहरों में भले अब हिंदी पर ज्यादा काम न हो रहा हो, पर शहरी कोलाहल से जो भी दूर है वह हिंदी से जुड़ा हुआ है। हिंदी को लेकर मेरी चिंता पूछी जाए तो वह इसकी लिपि को लेकर है। देवनागरी बहुत ही सरल और आत्मीय लिपि है, पर लोग इसे भूलते जा रहे हैं। इसे बाजार का दबाव कह कर भुला देना ठीक नहीं होगा क्योंकि किसी भी भाषा की पहचान उसकी लिपि से ही होती है। हिंदी को रोमन में लिखे जाने की प्रवृत्ति न सिर्फ गलत है बल्कि इसके विकास और प्रचार प्रसार में बाधक भी बनती जा रही है। इसके लिए जिम्मेदारी किसकी बनती है, इस पर बात करने की बजाय बहस इस बात पर हो सकती है कि इससे निजात कैसे पाई जाए।
"मैं बाबूजी की लिखी सारी रचनाओं को एक जगह एकत्र करने और उनसे जुड़ी स्मृतियों को उनके प्रशंसकों को समर्पित करने के लिए एक योजना पर काम कर रहा हूं। मेरी मनोकामना है कि मैं इलाहाबाद में बाबू जी के नाम पर एक स्मृति भवन बनवाऊं पर ये काम कब पूरा होगा मैं कह नहीं सकता।"

जाहिर है कि पहल उन लोगों को ही करनी चाहिए जिनके लिए हिंदी रोमन में लिखी जाती है। कंप्यूटर के आने के बाद हम लोग वैसे ही लिखना भूलते जा रहे हैं। अब तो हस्ताक्षर करते वक्त तक दिक्कत महसूस होती है। ऐसे में किसी भाषा की लिपि के संवर्धन में तकनीक का भी प्रयोग हो सकता है। मैं खुद भी अपने ब्लॉग या टि्वटर पर यदा कदा हिंदी को देवनागरी में ही लिखने की कोशिश करता हूं। मेरा मानना है कि अभ्यास करने से ये काम भी मुश्किल नहीं है।
भारत में पैदा हुए या भारत से संबंध रखने वाले विदेश में बसे लोगों में हिंदी को लेकर अब भी अकुलाहट देखी जाती है। वह हिंदी को अपने देश से जोड़े रखने का सेतु मानते हैं। अपने बाबूजी (डॉ. हरिवंश राय बच्चन) की कविताओं का पाठ करने जब मैं पिछले साल विदेश दौरे पर गया था, तो मेरे मन में यही आशंका थी कि हिंदी के प्रति लोगों का रुझान होगा भी कि नहीं। लेकिन श्रोताओं में भारतीयों के अलावा बड़ी संख्या वे विदेशी भी आए जिन्हें भारतीय परंपराओं और संस्कृति के बारे में जानने की ललक रहती है। हिंदी जोड़ने वाली भाषा है और इसको समृद्ध बनाने की जिम्मेदारी हम सबकी है। मैं अपनी तरफ से बस इतना प्रयास करता हूं कि हिंदी में जो कुछ मेरे सामने आए वो देवनागरी में ही लिखा हो। रोमन में लिखी गई हिंदी मुझे कतई पसंद नहीं है, जिस भाषा की जो लिपि है, उसे उसी में पढ़ना रुचिकर होता है। बाजार भी धीरे धीरे ही सही पर इसे समझ रहा है।
"पहल उन लोगों को ही करनी चाहिए जिनके लिए हिंदी रोमन में लिखी जाती है। कंप्यूटर के आने के बाद हम लोग वैसे ही लिखना भूलते जा रहे हैं। अब तो हस्ताक्षर करते वक्त तक दिक्कत महसूस होती है। ऐसे में किसी भाषा की लिपि के संवर्धन में तकनीक का भी प्रयोग हो सकता है। मैं खुद भी अपने ब्लॉग या टि्वटर पर यदा कदा हिंदी को देवनागरी में ही लिखने की कोशिश करता हूं।"

हिंदी के विकास इसमें लिखे गए साहित्य को सर्वसुलभ बनाने से ही होगा। मैं बाबूजी की लिखी सारी रचनाओं को एक जगह एकत्र करने और उनसे जुड़ी स्मृतियों को उनके प्रशंसकों को समर्पित करने के लिए एक योजना पर काम कर रहा हूं। मेरी मनोकामना है कि मैं इलाहाबाद में बाबू जी के नाम पर एक स्मृति भवन बनवाऊं पर ये काम कब पूरा होगा मैं कह नहीं सकता। इसके लिए हमें स्थानीय प्रशासन का सहयोग चाहिए होगा और इसके लिए प्रशासन में भी ऐसे प्रयासों के प्रति समर्पण की प्रथम आवश्यकता होती है।

प्रस्तुति-पंकज शुक्ल