रविवार, 25 सितंबर 2011

मुट्ठी में सिनेमा!

पंकज शुक्ल

सिनेमा हाल के दिनों तक करोड़ों का खेल माना जाता रहा है। खेल करोड़ों का अब भी है बस दाहिनी तरफ के जीरो अब एकाएक कम होने लगे हैं। अब पांच करोड़ रुपये का बजट नए सितारों को लेकर बनने वाली फिल्मों के लिए पर्याप्त माना जाने लगा है। और, हौसला रामगोपाल वर्मा और अनुराग कश्यप जैसा हो तो नॉट ए लव स्टोरी और दैट गर्ल इन येलो बूट्स जैसी फिल्में एक करोड़ के अरते परते भी बन सकती हैं।

सलमान खान की फिल्म बॉडीगार्ड की अब तक हो चुकी करीब 150 करोड़ रुपये की कमाई और उससे पहले अजय देवगन की फिल्म सिंघम द्वारा सिनेमा बाजार से बटोरे गए 100 करोड़ रुपये हिंदी सिनेमा के मंदी के दौर से पूरी तरह उबर आने के शुभ संकेत समझे जा रहे हैं। ये फिल्में बनी भी काफी बड़े खर्च के साथ हैं। लेकिन, हिंदी सिनेमा का एक और शगुन इस बीच हो चुका है और वो है फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों की फिल्मों के बजट घटाने के लिए फिल्ममेकिंग को लेकर बदलती सोच। अनुराग कश्यप की देश विदेश में सराही जा रही फिल्म दैट गर्ल इन येलो बूट्स, राम गोपाल वर्मा की चर्चित फिल्म नॉट ए लव स्टोरी और उससे पहले रिलीज हुई निर्देशक अमोल गुप्ते की फिल्म स्टैनली का डिब्बा तीनों की लागत निकालने में इसके निर्माता न सिर्फ कामयाब रहे बल्कि बिना किसी बड़े सितारे की मौजूदगी के भी इन फिल्मों ने मुनाफा भी कमा लिया है। हिंदी सिनेमा में कामयाबी का नया मंत्र है- कम लागत में फिल्म बनाओ, फिल्म के प्रचार प्रसार पर खूब लुटाओ और दर्शकों को सिनेमाघरों तक लाओ। जी हां, पूरे साल में सुपर डुपर हिट होने वाली गिनती की पांच छह फिल्मों से हिंदी सिनेमा अब आगे निकलने की तैयारी में है और ये बदलाव आया है सिनेमा बनाने की नई डिजिटल तकनीक से।
ये तकनीक क्या है? और कैसे इससे बचता है फिल्म निर्माण का खर्चा? इसकी जानकारी से पहले संक्षेप में जानना ये जरूरी है कि फिल्म की शूटिंग के बाद फिल्म के परदे तक पहुंचने के बीच में क्या क्या होता है? फिल्मों की शूटिंग परंपरागत तरीके में उन कैमरों से की जाती रही है, जिनमें रील डाली जाती है। आम तौर पर एक रील पर करीब चार मिनट की फिल्म शूट होती है और इस चार मिनट की रील की कीमत होती है 10 से 12 हजार रुपये के बीच। छोटे निर्देशकों की कोशिश होती है कि फिल्म की अंतिम लंबाई से औसतन चार गुणा से ज्यादा वो रीलें खर्च न करें, वहीं बड़े निर्देशक इनकी गिनती करने की परवाह नहीं करते और निर्माता बस फिल्म की शूटिंग के दौरान डिब्बे ही गिनता रह जाता है। शूटिंग होने के बाद ये रीलें फिल्म लैब भेजी जाती हैं। वहां इनको टेप पर ट्रांसफर किया जाता है जिसे कहते हैं टेली सिने। टेप पर आई फिल्मों को संपादन के बाद एक रफ कट तैयार होता है और इस रफ कट पर अंकित नंबरों के हिसाब से फिल्मों को डिजिटाइज किया जाता है। फिल्म का डिजिटल संस्करण तैयार होने के बाद इनका अंतिम संपादन होता है और उसके बाद स्पेशल इफेक्ट्स, डबिंग, बैकग्राउंड म्यूजिक डालकर इसे वो शक्ल देने की कोशिश की जाती है, जो हम सिनेमा के परदे पर देखते हैं।
डिजिटल सिनेमा ने फिल्म की शूटिंग से रील के डिब्बों को पूरी तरह हटा दिया है और बाजार में नए आए कैमरों ने फिल्म को डिजिटल फॉर्म में ही शूट करना शुरू कर दिया। स्टार की बजाय कहानियों पर ध्यान देने वाले निर्माता निर्देशकों की बांछें यहीं से खिलनी शुरू हुईं। शुरुआत हुई रेड कंपनी के बनाए डिजिटल कैमरे से। प्रतिदिन 10 से 12 हजार रुपये के किराए पर मिलने वाले इस कैमरे ने फिल्म निर्माण की लागत काफी हद तक घटाई, पर नए सिनेकार अब इसके आगे निकल गए हैं। और, ये मुमकिन हुआ है बाजार में आए उन कैमरों की मदद से जो बने तो स्टिल फोटोग्राफी के लिए थे, लेकिन जिनमें वीडियो शूट करने की भी सहूलियत है। कैमरों की बारीकी समझने के लिए हमें सिनेमैटोग्राफी के थोड़ा और विस्तार में जाना होगा।
दरअसल, किसी भी तस्वीर या फिल्म की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि वह रंगों के कितने बिंदुओं को जोड़कर बनी है। और इसके लिए एक शब्द इस्तेमाल होता है पिक्सेल। पारंपरिक तौर से इसे दो संख्याओं के जरिए व्यक्त किया जाता है जैसे कि अगर कहा जाए कि अमुक पिक्चर या फिल्म का रिजॉल्यूशन 640 गुणा 480 है तो इसका मतलब ये हुआ कि इस फिल्म या पिक्चर की 640 पिक्सेल कॉलम चौड़ाई में रंगों के 480 पिक्सेल कॉलम हैं। टेलीविजन पर दिखने वाली तस्वीरें आम तौर पर 720 गुणा 480 रिजॉल्यूशन की होती है और डीवीडी पर भी यही क्वालिटी होती है। कुछ चैनलों ने अब हाई डिफिनिशन (एचडी) प्रसारण शुरू किया है, जिनकी पिक्चर क्वालिटी 1280 गुणा 720 की होती है यानी कि टेलीविजन कितना ही बड़ा हो पिक्चर बिल्कुल साफ दिखेगी। दरअसल पर्दे के बड़े होते जाने की जरूरत के साथ ही किसी भी चीज को कैमरे पर उतारने के लिए इसकी गुणवत्ता का ध्यान रखना जरूरी हो जाता है। टीवी के लिए शूट किए गए किसी कार्यक्रम को अगर हम सिनेमा के बड़े परदे पर देखना चाहें तो उसमें हमें तस्वीरें फैली फैली सी दिखाई देंगी। इसीलिए, फिल्मों को इससे भी ज्यादा रिजॉल्यूशन यानी 2048 गुणा 1080 रिजॉल्यूशन पर शूट करना होता है। इससे बेहतर कोई भी क्वालिटी सिनेमा में अच्छी मानी जाती है, पर इससे कम नहीं। सिनेमा की शूटिंग के लिए इस्तेमाल होते रहे पारंपरिक कैमरों में लगने वाली 35 मिमी की रील इसी गुणवत्ता पर फिल्में शूट करती है।

पिक्चर क्वालिटी की बस इतनी सी समझ किसी भी फिल्म के बजट में आश्चर्यजनक तरीके से कटौती कर देती है। दैट गर्ल इन यैलो बूट्स को हिंदी सिनेमा में डिजिटल तकनीक से शूट हुई पहली फिल्म इस लिहाज से माना जाता है कि अनुराग कश्यप ने इसे बजाय किसी फिल्म कैमरे के स्टिल फोटोग्राफी के लिए बने कैमरे कैनॉन 5 डी पर शूट किया। कैनॉन ने अपने इस कैमरे में वीडियो मोड की शूटिंग के लिए जो तकनीकी विकास किए, वो किसी भी घटना को 1920 गुणा 1080 रिजॉल्यूशन में शूट करते हैं। सिनेमा की भाषा में इस टू के (2 के) गुणवत्ता कहते हैं। सिर्फ डेढ़ लाख की कीमत के इस कैमरे ने इन दिनों मायानगरी में हंगामा मचा रखा है। कोई भी निर्देशक बस अपने साथ एक सिनेमैटोग्राफर और सीन में काम करने वाले कलाकारों को लेकर फिल्म शूट करने निकल लेता है। फिल्म के सेट पर लगने वाले 100 से 150 लोगों की यूनिट का मेला भी अब ऐसी फिल्मों की लोकशन पर नहीं दिखता। अनुराग कश्यप कहते हैं फिल्म के कारोबार में बने रहने के लिए नए लोगों को सबसे पहले अपनी फिल्म के बजट को नियंत्रित करना होगा। फिल्म की शूटिंग को पिकनिक मानने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा और पूरा ध्यान अपनी कहानियों पर लगाना होगा। अंतर्राष्ट्रीय मॉडल नताशा सिक्का के साथ बियॉन्ड नाम की एक प्रयोगात्मक फिल्म बना रहे निर्देशक शिराज हैनरी कहते हैं कि अक्सर नए निर्देशकों की फिल्मों पर पैसा लगाने के लिए निर्माता तैयार नहीं होते, पर डिजिटल तकनीक ने ये संघर्ष भी कम कर दिया है। अब अगर आपके पास दमदार कहानी हो तो पचास लाख से लेकर एक करोड़ रुपये तक में भी अच्छी फिल्म बनाई जा सकती है। अगर ऐसी किसी फिल्म को एक दो अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाते हैं तो फिल्म को बेचने में भी फिर ज्यादा झंझट नहीं उठाना पड़ता।

रामगोपाल वर्मा की फिल्म नॉट ए लव स्टोरी की लोकेशन पर बामुश्किल डेढ़ दर्जन लोग इकट्ठा होते थे। वर्मा ने ये पूरी फिल्म एक करोड़ रुपये से भी कम बजट में बना डाली। फिल्म के प्रचार प्रसार पर एक करोड़ रुपये और खर्च किए और फिल्म की लागत व प्रचार प्रसार की कुल लागत से दो गुने से भी ज्यादा की कमाई पहले ही हफ्ते में कर डाली। हिंदी सिनेमा में कभी कथ्य के फिल्मांकन का नया दौर शुरू करने वाले रामगोपाल वर्मा ने फिल्म मेकिंग के इन नए प्रयोगों को आगे भी जारी रखने का संकल्प जताया है। वह भी मानते हैं कि हिंदी सिनेमा अब दो समानांतर धाराओं पर जल्दी ही चलता नजर आएगा जिसकी एक धारा में होंगे बड़े सितारे और बड़े बजट की फिल्में, जबकि दूसरी धारा होगी ऐसे सिनेकारों की, जो कहानियां सुनाएंगे और फिल्में बनाएंगे बहुत ही कम बजट में।
डिजिटल सिनेमा के इस नए अपारंपरिक रूप के कद्रदान मायानगरी में तेजी से बढ़ रहे हैं। निर्देशक अमोल गुप्ते की फिल्म स्टैनली का डिब्बा इन प्रयोगों से भी दो कदम आगे की फिल्म रही है। गुप्ते ने ये फिल्म स्कूली बच्चों के साथ बिना इन बच्चों की स्कूली पढ़ाई का एक दिन भी नुकसान कराए बनाई है। पूरे एक साल अमोल गुप्ते अपने कैनॉन 5 डी कैमरे के साथ हर शनिवार हाफ डे के बाद इन बच्चों के साथ काम करते रहे। अक्सर बच्चों को बताया जाता कि उन्हें एक नाटक की रिहर्सल करनी है और बिना किसी फिल्मी तामझाम के उनका कैमरा बिना इन बच्चों की जानकारी के शूटिंग करता रहता। इस फिल्म को जिन लोगों ने भी देखा है वो बच्चों के स्वाभाविक अभिनय की तारीफ किए बिना नहीं रहता। बस ये दर्शक नहीं जानते हैं, तो इतना कि ये फिल्म कैसे बनी है? डिजिटल सिनेमा के इस दौर को अपनाकर तमाम और सिनेकार भी सिनेमा की इस नई धारा का हिस्सा बन चुके हैं और जो नहीं बने हैं वो बनने की तैयारी कर रहे हैं।