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मंगलवार, 26 अगस्त 2008

वो काली रात...


भोले शंकर (10). गतांक से आगे

फिल्म भोले शंकर के क्लाइमेक्स से ठीक पहले भोले और शंकर दोनों भाइयों में जमकर तनातनी होती है और इस धमाकेदार सीन में भोले (मनोज तिवारी) एक डॉयलॉग बोलता हैं, " भइया उ कालिख रात के हमहूं नइखी भूला पइनी, हम इहो मानअ तानी कि ओकर मार सबसे ज्यादा तहरा भुगते के पड़अल, लेकिन भइया तू जवन रास्ता पर चलअ तारअ, ओकर अंत त फेन ओइसने नू होइ। भइया, बस तू छोड़ द, हमहूं इ गीत संगीत के विदा ले तानी, चलअ गांवे खेती कइल जाइ, चलअ छोड़अ इ सब।"

लेकिन, आप लोगों को एक राज़ की बात बताना चाहता हूं और वो ये कि इस फिल्म की शूटिंग से पहले एक काली रात मुझे भी जागते हुए बितानी पड़ी और वो थी 20 नवंबर की रात। दरअसल हुआ यूं कि हमने 21 नवंबर से फिल्म भोले शंकर की शूटिंग मुंबई के कमालिस्तान स्टूडियो में रखी थी। सारी तैयारियां भी उसी लिहाज से चलती रहीं। लाखों रुपये ड्रेस और बाकी चीज़ों पर खर्च हो चुके थे। और 19 नवंबर को मिथुन चक्रवर्ती ने मुंबई पहुंचते ही धमाका किया कि वो फिल्म की शूटिंग नहीं कर सकते। आप समझ सकते हैं कि ऐसी स्थिति में फिल्म के प्रोड्यूसर और डायरेक्टर की क्या हालत हो सकती है? गलती मिथुन दा की भी नहीं थी, पूर्वी भारत की जिस फिल्म संस्था के सम्मानित पदाधिकारी थे, उसी संस्था ने किसी भी बांग्ला कलाकार पर भोजपुरी या मैथिली फिल्म में काम न करने का आदेश जारी कर दिया था।

पूरी गड़बड़ी दरअसल उसी समय शुरू हो गई थी, जब मिथुन चक्रवर्ती की एक हिट बांग्ला फिल्म कुली को भोजपुरी में डब करके रिलीज़ कर दिया गया। बस झगड़ा बढ़ता गया। पहले निर्माताओं और वितरकों की बिहार की एक संस्था ने मिथुन दा और उनके परिजनों की फिल्मों को बिहार और झारखंड में रिलीज़ ना होने देने का ऐलान किया और बदले में आ गया पूर्वी भारत की संस्था का फऱमान। और इन दो संस्थाओं की नाक की लड़ाई का पहला शिकार हुई फिल्म भोले शंकर। 20 नवंबर को पूर दिन हम लोग शूटिंग की तैयारियों को छोड़ मिथुन चक्रवर्ती को शूटिंग के लिए राज़ी करने की कोशिशों में लगे रहे। मिथुन दा उस दिन एम्पायर स्टूडियो में अपने बेटे मिमोह की फिल्म जिमी के किसी गाने की रिकॉर्डिंग में व्यस्त थे। हम लोग वहीं पहुंचे, दादा ने बस एक शर्त रखी कि अगर बिहार और झारखंड की संस्था उन पर लगाया बैन सशर्त वापस ले ले तो वो कोलकाता की संस्था से बात करके मामला खत्म करा देंगे और अगले दिन से भोले शंकर की शूटिंग शुरू हो जाएगी।

बिहार और झारखंड मोशन पिक्चर्स एसोसिएशन के माई बाप कहे जाने वाले डॉक्टर सुनील ही ऐसा कर सकते थे, और मेरा इससे पहले उनसे कोई परिचय भी नहीं था। एक दो शुभचिंतकों ने सलाह भी दी कि सीधे डॉक्टर सुनील को फोन कीजिए और वो इतने नेक इंसान हैं कि किसी निर्माता का नुकसान नहीं होने देंगे। लेकिन मैंने इस मामले में मनोज तिवारी की मदद लेना उचित समझा। मनोज तिवारी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पूरा किस्सा अपने हाथ में ले लिया। डॉक्टर सुनील को उन्होंने फोन भी किया और ये भी कहा कि शाम तक मिथुन दा और उनके परिजनों पर बिहार झारखंड में लगे बैन को वो हटवा देंगे और इस बारे में फैक्स भी मंगवा लेंगे। मैंने यही बात मिथुन दा को बताई, वो अपना काम खत्म करके घर जा चुके थे, लेकिन जाने से पहले वो अपने करीबी विजय उपाध्याय को हमारे दफ्तर में बिठा गए, ये कहकर कि अगर मेरे पास फैक्स आ जाए तो विजय उन्हें इत्तला करेंगे और वो अगले दिन आठ बजे कमालिस्तान पहुंच जाएंगे शूटिंग करने।

सूरज ढल गया, रात घिर आई, तारे निकल आए, लेकिन फैक्स नहीं आया। थोड़ी देर बाद मनोज तिवारी भी दफ्तर आ गए। वो भी हमारी परेशानी में बराबर परेशान दिखे। गुलशन भाटिया जी कहां तो अपनी पहली फिल्म के पहले दिन की शूटिंग के लिए दिल्ली से आए थे, और कहां गले पड़ गई ये मुसीबत। मनोज तिवारी ने एक दो फोन और किए और फिर मुझे खुद लगने लगा कि बात बन नहीं पाएगी। लिहाजा मैंने भाटिया जी से सलाह ली कि हम लोग मुंबई का शेड्यूल कैंसल कर देते हैं और अगले शेड्यूल की तैयारी करते हैं। फिल्म का अगला शेड्यूल मुंबई का शेड्यूल खत्म करते ही एक दिसंबर से लखनऊ में था। मैंने कहा कि जब तक हम लखनऊ में शूटिंग करेंगे तब तक मामला शायद निपट जाए। भाटिया जी और मनोज तिवारी दोनों को मेरी सलाह ठीक लगी और आधी रात के बाद करीब दो बजे हम लोग दफ्तर से निकले सुबह की शूटिंग कैंसिल करने का फैसला लेकर। घर पहुंचकर नींद कहां आनी थी, बस सोचता रहा कि आखिर वजह क्या है, क्या ईश्वर इम्तिहान ले रहा है। कहते हैं कि ईश्वर कुछ भी देने से पहले परीक्षा ज़रूर लेता है। अब लगता है कि शायद ऐसा ही था। हरिवंश राय बच्चन ने अपने बेटे अमिताभ को नैनीताल के शेरवुड स्कूल में एक सीख दी थी, "मन का हो तो अच्छा ना हो तो और भी अच्छा।" इस लाइन का फलसफा समझने का वक्त एक बार और सामने था। वो काली रात शायद मैं भी कभी भूल नहीं पाऊंगा। अंजोरियो होने को थी, लेकिन नींद ना जाने कहां खो चुकी थी। आज बस इतना ही, अगले अंक में भोले शंकर की शूटिंग के पहले दिन के बारे में कुछ बातें।

कहा सुना माफ़,
पंकज शुक्ल
निर्देशक- भोले शंकर

शुक्रवार, 22 अगस्त 2008

मौली की मस्ती, उज्जयनी की उड़ान



भोले शंकर (8) गतांक से आगे...

गायक से अभिनेता बने किसी कलाकार की फिल्म के संगीत की बात हो और उससे ज़्यादा चर्चा दूसरे गायकों की जाए, तो कई बार ये अजीब सा भी लगता है और फिल्म के हीरो का मूड भी खराब कर सकता है। लेकिन, "भोले शंकर" के हीरो मनोज तिवारी के साथ ऐसा नहीं है। मनोज ने हमेशा नए कलाकारों को बढ़ावा दिया है और अभी पिछली बार ही वो बता रहे थे कि कैसे किंग फिशर एयरलाइंस की एक एयर होस्टेस के मंशा ज़ाहिर करने पर उन्होंने उसे भोजपुरी सिनेमा में काम करने का न्यौता दे डाला। अपने हनुमान बिपिन बहार को भी मनोज एक्टर बना चुके हैं। अच्छे चेहरों की उन्हें अच्छी पहचान है। खैर, हम बात कर रहे हैं फिलहाल "भोले शंकर" के संगीत की। वैसे हिंदी फिल्मों में भी ऐसा होता है, लेकिन आप भोजपुरी की बात करो तो सामने वाला गीतकार और संगीतकार छूटते ही पूछेगा, "आइटम सॉन्ग में किसे ले रहे हैं।" और ये सवाल पूछते समय उसके चेहरे के भाव ऐसे होंगे कि अगर आप शरीफ हुए तो तुरंत धरती के चार फिट नीचे चले जाएंगे, शर्म के मारे। ऐसा एक भी शख्स मुझे अब तक मिलना बाकी है, जिसने भोजपुरी फिल्म की बात चलने पर आइटम सॉन्ग की बात ना छेड़ी हो मानो भोजपुरी सिनेमा और आइटम सॉन्ग एक दूसरे के पर्यायवाची हों। हालांकि सिनेमा होता ही मनोरंजन के लिए लेकिन मनोरंजन के नाम पर भड़ैती और फूहड़ता मेरे गले नहीं उतरती। मेरा मानना है कि सही फिल्म वही (अगर आप यू सर्टिफिकेट के साथ बना रहे हैं) है, जो ससुर व बहू और पिता और बेटी एक साथ बैठकर देख सकें।

"भोले शंकर" बनाते वक्त एक बात मैंने पहले दिन से तय कर ली थी कि ये फिल्म राजश्री संस्कृति के ज़्यादा करीब होगी और भले ही मस्ती के लिए इसमें गाना हो लेकिन वो आइटम सॉन्ग तो कतई नहीं होगा। फिल्म "भोले शंकर" में मनोज तिवारी के साथ तीन लड़कियां हैं। मेन लीड में मोनालिसा, पैरलल लीड में लवी रोहतगी और स्पेशल एपीयरेंस में निराली नामदेव। मोनालिसा, जिनकी हिंदी फिल्मों में छवि एक बोल्ड अभिनेत्री की रही है, को "भोले शंकर" में एक मिडिल क्लास की घरेलू लड़की के तौर पर पेश किया गया है और मिर्च मसाला के लिए फिल्म में हैं लवी रोहतगी। लवी का किरदार उस हॉस्टल के वार्डन की लड़की का है, जहां रहकर भोले शहर में पढ़ाई करता है। और लवी के हिस्से में आया है फिल्म का सबसे मस्ती भरा गाना। ये आइटम गाना इसलिए नहीं है क्योंकि सिर्फ इस गाने के लिए लवी फिल्म में नहीं है। उनका पूरी फिल्म में खास रोल है और ये रोल है रंभा का जो भोले पर पहली ही नज़र में मर मिटी है। कॉलेज फंक्शन में भोले को चिढ़ाने के लिए रंभा गाना गाती है और इसके बोल हैं, "दिल के हाल बताई कइसे, किस्मत के मारी, अनाड़ी हमका मिला रे बालमा।" गाने के बोल और इसके पिक्चराइजेशन में मैंने इस बात का पूरा ख्याल रखा कि ये गाना किसी तरह से फूहड़ ना लगे। एक तो गाने की सिचुएशन के हिसाब से गाना कॉलेज में सारे स्टूडेंट्स और कॉलेज स्टाफ के सामने हो रहा है दूसरे जिम्मेदारी अनावश्यक अंग प्रदर्शन से हीरोइन को बचाने की भी थी।

इस गाने के बोल के लिहाज से मुझे सारेगामापा फाइनलिस्ट मौली दवे की आवाज़ बिल्कुल फिट लगी। गानों की रिकॉर्डिंग जब हमने शुरू की, तो मौली भारत में नहीं थीं। उनके घर में किसी बुजर्ग का इंतकाल हो चुका था और वो मातम में शरीक़ होने अमेरिका गई हुई थीं। मौली को जल्द ही वर्ल्ड टूर पर निकलना था और हमें जल्द से जल्द गानों की रिकॉर्डिंग करनी थी ताकि शूटिंग पर निकला जा सके। भोले शंकर का गाना गाने के लिए मौली अमेरिका से आईं, और दाद देनी होगी इस कलाकार की जिसने पूरी रिकॉर्डिंग के दौरान एक बार भी ये नहीं लगने दिया कि उसके घर में अभी अभी कोई हादसा हुआ है। मौली की आवाज़ में एक अलग सी कशिश है। उसकी आवाज़ रेशमी सी है और यही बात हमें इस गाने के लिए चाहिए थी। मौली जिस दिन भोले शंकर का गाना गाने स्टूडियो में आईं, उस दिन जगजीत सिंह जी भी अपने स्टूडियो में आए हुए थे। मौली को देखकर वो भी खुश हुए। और उसके गाने की खुलकर तारीफ भी की। मुझे पूरा यकीन है कि जब "भोले शंकर" में आप मौली की आवाज़ सुनेंगे तो आपको भी लगेगा कि वाकई ये लड़की हीरा है, ज़रूरत है तो बस कुछ और जौहरियों की, जो इसे थोड़ा और तराश सकें। "भोले शंकर" में मैंने मौका दिया तो उसके बाद मौली को कई और भोजपुरी गानों का भी मौका मिला। और अब तो वो भोजपुरी के लिए नियमित तौर पर गा रही हैं।

सारेगामापा की ही एक और फाइनलिस्ट उज्जयनी ने भी फिल्म "भोले शंकर" के एक गाने में अपनी आवाज़ दी है। और उज्जयनी के लिए हमने करीब एक हफ्ते का इंतज़ार भी किया। लेकिन उज्जयनी ने इस इंतज़ार के नतीजे को अपनी मधुर गायिकी से एक मीठे फल में तब्दील कर दिया। सारेगामापा के चार कलाकारों को अपनी फिल्म में मौका देकर मैंने इन बच्चों के लिए एक नई राह खोली है, "भोले शंकर" शायद पहली फिल्म बन गई है जिसमें सारेगामापा के इतने कलाकार एक साथ गा रहे हैं। इन बच्चों ने उड़ान तो सही ली है, अब बस इन्हें लगातार उड़ते रहना है और नज़र जमाए रखनी है अच्छे संगीत और अच्छे गीतों पर। फिल्म "भोले शंकर" की संगीत यात्रा आज सातवें दिन विराम लेती है। संगीत के भी सात सुर होते हैं और ये भी अजब संयोग है कि फिल्म के संगीत की बात भी हमने सात दिनों में ही जान समझ ली, अब कल से शुरुआत होगी कैमरे के कारीगरों के कमाल की। पढ़ते रहिए, कइसे बनल भोले शंकर।

कहा सुना माफ़,

पंकज शुक्ल
निर्देशक- भोले शंकर

शुक्रवार, 15 अगस्त 2008

मनोज तिवारी की 'मृदुलता'



भोले शंकर (6)गतांक से आगे..
गायकों के अभिनेता बनने की परंपरा भारतीय सिनेमा में बहुत पुरानी है। के एल सहगल हों या किशोर कुमार, सुरैया हों या मुकेश कोई कैमरे के सामने आने के आकर्षण से खुद को बचा नहीं पाया। नई पीढ़ी की बात करें तो सोनू निगम से लेकर पलाश सेन, लकी अली, वसुंधरा दास, हरभजन मान और यहां तक कि अब अदनान सामी भी हीरो बनने को तैयार हैं। इन सबने गायिकी में शोहरत के सोपान चढ़ने के बाद अदाकारी की तरफ छलांग लगाई। भोजपुरी गायक मनोज तिवारी का नाम भी इसी कड़ी में आता है। मनोज तिवारी ने जो भी कमाया है, अपनी मेहनत और अपनी काबिलियत के बूते कमाया है। गांव देहात के रीति रिवाज वो अब भी मानते हैं, बड़ों को पैलगी करना और सम्मान करना इस कलाकार की सबसे बड़ी खूबी है। भोजपुरी सिनेमा को दोबारा जीवन दान किसने दिया, इसे लेकर अक्सर बड़े बड़े दावे होते रहते हैं, लेकिन एक बात तो सबको माननी ही पड़ेगी, कि ससुरा बड़ा पइसावाला की कमाई ही वो दांव था जिसने तमाम निर्माताओं की तिजोरियां भोजपुरी सिनेमा के लिए खुलवा दीं। हिंदी सिनेमा के बड़े बड़े अभिनेताओं ने भी उन्हीं भोजपुरी फिल्मों में काम करने के लिए हामी भरी जिनमें से ज़्यादातर में मनोज तिवारी हीरो थे। ये फिल्में मनोज तिवारी को कैसे मिलीं? इस पर ना भी जाया जाए, तो कम से कम मनोज तिवारी के भोजपुरी सिनेमा के विकास में योगदान को नकारा नहीं जा सकता।

फिल्म भोले शंकर की मेकिंग की शुरुआत हमने इसके म्यूज़िक की बात से की थी। पूरी फिल्म में नौ गाने हैं, और ऐसा शायद पहली बार हुआ कि मनोज तिवारी की फिल्म में आधे से ज्यादा गानों में दूसरे कलाकारों को मौका मिला है। और पाठकों को ये जानकर आश्चर्य हो सकता है कि भोले शंकर के गानों को लेकर मनोज तिवारी से बस और बस एक बार ही सिटिंग हुई। वैसे तो गीतकार बिपिन बहार को भोजपुरी सिनेमा में मनोज तिवारी का हनुमान माना जाता है, लेकिन फिल्म भोले शंकर में बिपिन बहार भी खिसक कर डायरेक्टर के पाले में आ गए। फिल्म के एक एक गाने पर बिपिन बहार खूब कसे गए और कहते हैं कि तबला या ढोलक जितनी कसी होती है, आवाज़ भी उसकी उतनी ही दमदार निकलती है। मनोज तिवारी के सुपरहिट गाने 'एम ए में लेके एडमीशन कंपटीशन दे ता' को मैं फिल्म भोले शंकर में शामिल करने की योजना तब से बनाए था, जब इसकी कहानी बस फाइनल ही हुई थी। लेकिन, इस गाने की सिचुएशन और सीन का मूड देखकर मनोज तिवारी ने इसकी बजाय अपना एक और गाना मुझे सुझाया। मनोज तिवारी का मान मैंने रखा और बजाय अपनी पसंद का गाना रखने के मनोज तिवारी की पसंद का गाना ही फिल्म में रखा। हालांकि बाद में मुझे पता चला कि जिस गाने की सिफारिश मैंने अपनी फिल्म के लिए की थी, वो गाना मनोज तिवारी ने किसी और फिल्म के लिए दे दिया है, उस दिन मुझे बहुत आत्मिक कष्ट भी हुआ। मैंने ये बात अपने एक दो करीबी लोगों से साझा भी की। लेकिन, जब मनोज तिवारी का बताया गया दूसरा गाना बनकर तैयार हुआ, तो दिल को तसल्ली हुई। और वो इसलिए क्योंकि गाना यही बेहतर बन पड़ा है।
नौकरी के लिए भटकते युवाओं के इस पसंदीदा गाने - 'दौड़त धूपत चप्पल जूता फाट गइले भाईजी, नौकरिया नहीं मिलल मन उदास भइले भाईजी' - से जुड़ी हर बात दिलचस्प है। वैसे तो जब इस गाने को आप सुनेंगे तो लगेगा कि इसका म्यूज़िक वाकई शानदार है और गाना सुनकर ये भी लगेगा कि इसकी रिकॉर्डिंग लाइव यानी फुल आर्केस्ट्रा के साथ की गई है। लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी, कि जब मनोज तिवारी ने ये गाना रिकॉर्ड किया तब इसका म्यूज़िक तैयार ही नहीं हुआ था। संगीतकार धनंजय मिश्रा ने पूरा गाना क्लिक पर रिकॉर्ड किया और मनोज तिवारी की रिकॉर्डिंग हो जाने के बाद इसका संगीत तैयार किया। यही नहीं, इस गाने की शूटिंग का भी किस्सा बहुत दिलचस्प है। जिस दिन लखनऊ के इंटरनेशन सेंटर फॉर स्पेशल एजूकेशन में ये गाना शूट होना था, उस दिन किसी बात को लेकर मनोज तिवारी का मूड खराब हो गया। हमें रात में घुप्प अंधियारा होने के बाद हॉस्टल में इसकी शूटिंग करनी थी। ठंड उस दिन कड़ाके की पड़ रही थी और कॉन्टीन्यूटी के हिसाब से मनोज को केवल शर्ट पैंट पहन कर गाना रिकॉर्ड करना था। लाइटिंग हो गई, साथी कलाकार तैयार हो गए। मनोज तिवारी को बुलाया गया। मनोज आए और आते ही बोले इतनी ठंड में शूटिंग नहीं कर पाऊंगा। तुरंत उनके लिए थर्मल इनर वियर का इंतजाम कराया गया। ये इंस्टीट्यूट लखनऊ से बिल्कुल बाहर है और रात दस बजे इसका इंतजाम कैसे हुआ, ये बात बस हम लोग ही जानते हैं।

अब बारी आई शूटिंग की। कैमरामैन राजूकेजी ने पहले शॉट के लिए क्रेन वगैरह लगाकर पूरी तैयारी कर ली थी। कोरियोग्राफर रिक्की भी बाकायदा अपने स्टेप्स वगैरह के साथ तैयार थे। तभी मेरे और मनोज के बीच एक आइडिया उपजा। मेरा मानना था कि ये गाना पूरी तरह फ्री स्टाइल होना चाहिए, बिल्कुल कैंपस की रॉ अपील के साथ। लेकिन इसके लिए स्टेडीकैम की ज़रूरत पड़ती और वो उस समय लखनऊ में मिलना मुमकिन नहीं था। एरी 3 जैसे वजनी कैमरे को कंधे पर रखकर शूटिंग करना आसान नहीं होता और शायद कोरियोग्राफर व कैमरामैन इसके लिए तैयार भी नहीं होते। लेकिन मेरी परेशानी को मनोज तिवारी ने एक पल में भांप लिया। भोजपुरी सिनेमा का ये शायद पहला गाना होगा, जिसकी कोरियोग्राफी मनोज तिवारी ने खुद की। मनोज तिवारी ने मुझसे मॉनीटर पर जाकर बैठने को कहा, और पूरे गाने की कमान अपने हाथ में ले ली। कोरियोग्राफर रिक्की समझ ही नहीं पाया कि ये क्या हो रहा है। मैंने कहा बस जो हो रहा है उसे शूट करते जाओ। यूनिट का हर सदस्य परेशान कि मनोज तिवारी को ये क्या हो गया। क्यों वो कोरियोग्राफर की बात नहीं सुन रहे। बस जो हो रहा था वो मैं जानता था और जानते थे मनोज तिवारी।

गाने की शूटिंग खत्म हुई। अगले दिन से मनोज तिवारी का लखनऊ में काम खत्म था। यूनिट के ज़्यादातर लोग इस बात को लेकर चर्चा करते रहे कि मनोज तिवारी ने जो किया वो ठीक नहीं किया। मैंने तब जाकर सबको बताया कि ये सब पूरी प्लानिंग के तहत हुआ। हम लोगों ने मुंबई आकर गाना एडिट किया और फिल्म की तकनीकी टीम ने जब इसका फाइनल वर्जन देखा तो हर कोई दंग रह गया। ऐसा कैंपस सॉन्ग अब तक भोजपुरी में तो क्या हिंदी सिनेमा में भी कम ही देखने को मिला है। आज बस इतना ही, कल बात मौली, पूनम यादव और उज्जयनी की।

कहा सुना माफ़,

पंकज शुक्ल
निर्देशक- भोले शंकर