रविवार, 29 जनवरी 2012

मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती थी: विद्या बालन

संघर्ष के बाद मिलने वाली कामयाबी ही असली कामयाबी मानी जाती है और कामयाबी अगर विद्या बालन जैसी हो तो फिर उसे माना जाता है वो चलन जिसके पीछे जमाना चलने को बेताब हो जाता है। हिंदी सिनेमा में अरसे से भ्रांति रही है कि यहां महिला चरित्र प्रधान फिल्में बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलती हैं। लेकिन, जो काम हेमा मालिनी से लेकर श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित नहीं कर पाईं, वो विद्या बालन ने कर दिखाया है। विद्या बालन से एक खास बातचीत।

© पंकज शुक्ल। 2012.

सिनेमा में शुरुआत अगर संघर्ष से हो और वो भी ऐसे संघर्ष से जबकि लगातार दो दो फिल्में शुरू होने के बाद बीच में बंद ही हो जाएं, तो अक्सर हिम्मत साथ छोड़ने लगती है। अपनी पहली हिंदी फिल्म परिणीता से पहले के सफर का कभी अब ख्याल आता है?
-नाकामी हमें हौसला देती है। बशर्ते हम इसके इशारे समझें। जीवन में कुछ भी कभी भी बेकार नहीं होता। जो होता है किसी न किसी मकसद से होता है। पढ़ाई के दौरान या बाद में जो भी फिल्में मुझे शुरू के दिनों में मुझे मिलीं और फिर पकड़ से छूट गईं, उन्होंने उस वक्त तो बहुत हताश किया था। लेकिन अब समझ में आता है कि ऐसा क्यूं हुआ? ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि किस्मत ने मेरे लिए उससे बड़ी चीजें तय कर रखी थीं। मतलब ये कि अगर हम सफर में ठोकरें खातें हैं तो वे हमें और सतर्क होने और ज्यादा मजबूती से कदम बढ़ाने की सीख देती हैं। हर नाकामी को मैंने एक सबक की तरह लिया और अपनी कोशिश नहीं छोड़ी।

तो आखिर आप का नाम हो ही गया और वो भी किसी बड़े सितारे की मदद के बगैर?
-हां, कुछ लोगों का नाम उनके काम से होता है, मेरा बदनाम होकर हुआ है..(हंसती हैं) मेरी फिल्म द डर्टी पिक्चर का ये डॉयलॉग देखा जाए तो इस वक्त के लिए बिल्कुल मुफीद है। बस मैंने एक लीक से हटकर किरदार करने का हौसला दिखाया और वो कहते हैं न हिम्मते मर्दा मदद ए खुदा। तो कभी कभी ये कहावत हिम्मत ए जनाना पर भी लागू हो जाती है। लोग कहते हैं कि इश्किया, नो वन किल्ड जेसिका और द डर्टी पिक्चर, ये तीनों फिल्में बिना किसी बड़े सितारे के कामयाब हुई हैं। पर मेरा इस बारे में ये कहना है कि कोई भी फिल्म अपनी पूरी टीम की वजह से कामयाब होती है। इन तीनों फिल्मों में मेरे किरदार अलहदा थे और मेरा मानना है कि इनका इस तरह से लिखा जाना भी इनकी कामयाबी की मुख्य वजह रही। मेरा अभिनय तो इस सामूहिक प्रयास का एक हिस्सा भर है। लेकिन, इन तीनों फिल्मों के निर्माता और निर्देशकों ने मुझे इन किरदारों में देखा तो उनका भी योगदान कम नहीं है।


- हिंदी सिनेमा में भ्रांति रही है कि यहां महिला चरित्र प्रधान फिल्में बॉक्स ऑफिस पर कमाई नहीं कर पातीं। हेमा मालिनी से लेकर श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित तक ने इस तरह की कोशिशें की लेकिन आपने तो इस धारणा का ध्वंस करने के लिए हैट्रिक ही लगा दी। क्या वजह हो सकती है इस भ्रांति की और आपके किरदारों को मिली शोहरत की?
-मैं ऐसा नहीं कहूंगी कि मेरे पहले जिन अभिनेत्रियों ने इस तरह की कोशिशें की, वो कामयाब नहीं रहीं। हर कामयाबी को हमें कमाई के पैमाने से नहीं नापना चाहिए। रेखा जी ने न सिर्फ इस तरह की फिल्में कीं, बल्कि बॉक्स ऑफिस और समीक्षकों दोनों को चौंकाया भी और दोनों का दिल भी जीता। तो हो सकता है कहीं न कहीं थोड़ी बहुत प्रेरणा वहां से भी मुझे मिलती रही हो। वैसे सच पूछा जाए तो अभिनय का चस्का मुझे माधुरी दीक्षित की अदाकारी देख कर ही लगा। एक जमाना था जब मैं दिन भर एक दो तीन..(माधुरी दीक्षित की फिल्म तेजाब का गाना) गाती रहती थी और नाचती रहती थी। अक्सर होता ये भी था कि हमारे घर कोई आता और किसी बड़े के डांस का डा कहने भर पर मैं थिरकने लगती थी। तब मैं वाकई माधुरी दीक्षित बनना चाहती थी। रही बात उन किरदारों की जिनका आपने जिक्र किया है, तो मुझे लगता है समय बदल रहा है। लोगों की पसंद बदल रही है। लोग फिर से कथानक और किरदारों को तवज्जो देने लगे हैं तो इस नए चलन का तो स्वागत ही किया जाना चाहिए।

लेकिन क्या ऐसा नहीं है कि बार बार महिला प्रधान फिल्में करने और उनके सफल भी होते जाने से लोग आपके पास ऐसी ही फिल्में लेकर आने लगें और संदेश ये भी जा सकता है कि आप नायक प्रधान फिल्में ही नहीं करना चाहतीं?
-आप सही कह रहे हैं। लेकिन मैंने न तो कभी खुद को सीमाओं में बांधा और न ही कभी किसी तरह के दायरे में खुद को कैद किया है। मैंने ऐसा कोई फैसला नहीं किया है कि मैं सिर्फ महिला किरदार प्रध्ाान फिल्मों में ही काम करूंगी। हां, मेरे प्रशंसक मुझे सशक्त और केंद्रीय किरदारों में पसंद कर रहे हैं तो मैं उनकी शुक्रगुजार हूं। लेकिन, अगर मेरे पास अच्छी फिल्में आती हैं जो हीरो ओरिएंटेड हैं और उनमें मेरे लिए भी कुछ करने को है तो मैं बेशक उन्हें करने को तैयार हूं।

लेकिन ये संयोग ही है कि आपकी अगली जो फिल्म कहानी रिलीज होने जा रही है, वह इश्किया, नो वन किल्ड जेसिका और द डर्टी पिक्चर के ही दौर को आगे बढ़ाती है। क्या है इस फिल्म में आपका किरदार?
-हम जीवन में तमाम लोगों पर भरोसा करते हैं। लेकिन, क्या हो अगर हमें पता चले कि जिस इंसान पर हम भरोसा करते रहे, वो इंसान है ही नहीं। बस मेरी अगली फिल्म कहानी की यही कहानी है। इस फिल्म में मैं एक गर्भवती महिला विद्या बागची का रोल कर रही हूं, जो अपने होने वाले बच्चे के पिता को खोज रही है। जिन तीन फिल्मों का आपने नाम लिया, उनसे ये फिल्म इस लिहाज से अलग है कि इसमें एक रहस्य है जो आपको आखिर तक बार बार चौंकाता है। इससे ज्यादा इस किरदार के बारे में बातें करने से मुझे डर है कि मैं लालच में पूरी कहानी ही न बता जाऊं तो अच्छा होगा कि आप मुझे ज्यादा न कुरेदें।

चलते चलते एक निजी सवाल। इन दिनों आपके करोड़ों के बंगले और आपके दोस्त सिद्धार्थ रॉय कपूर के बड़े चर्चे हैं। कहीं वाकई शहनाई तो नहीं बजने जा रही?
-जिस दौर से मैं इन दिनों गुजर रही हूं, वो दौर किसी अभिनेत्री के करियर में बड़ी मुश्किल और बड़ी किस्मत से आता है। मैं फिलहाल इस वक्त का मजा लेना चाहती हूं और कुछ भी मेरे दिमाग में फिलहाल नहीं है। मैं इस कामयाबी का पूरा लुत्फ उठाना चाहती हूं और चुनौतियों भरे कुछ किरदार और करना चाहती हूं। बाकी सब इसके बाद।

pankajshuklaa@gmail.com

'संडे नई दुनिया' पत्रिका के 29 जनवरी 2012 अंक में प्रकाशित