मंगलवार, 16 मार्च 2010

कौन हसरत मोहानी?


कैसा लगेगा आपको अगर आप आज़ादी की लड़ाई में अपना सब कुछ स्वाहा कर देने वाले किसी गुमनाम से स्वतंत्रता सेनानी पर कोई फिल्म बनाने निकलें और उसके गांव पहुंच कर पहला सवाल ही आपका माथा खराब कर दे। जी हां, ये वाकया मेरे साथ अबकी हुआ उत्तर प्रदेश की राजधानी से कुछ ही दूर बसे गांव मोहान में। मैंने गांव की पुलिस चौकी के पास लगे मजमे में मौजूद लोगों से पूछा कि जनाब हसरत मोहानी का कोई पुश्तैनी मकान या फिर उनकी कोई यादगार यहां है क्या? जवाब में सवाल आया – कौन हसरत मोहानी? ये सवाल नहीं, इससे ज्यादा कुछ और है। जो नस्ल अपने ही पुरखों को भूल जाए और उनका नाम तक ना याद रख पाए, उसकी मौजूदा पुश्त से आगे क्या उम्मीद की जा सकती है। यही नहीं, मशहूर इतिहासकार एस पी सिंह से जब मैं इस मसले पर बात करने पहुंचा तो उन्होंने देश में इतिहास लेखन के मौजूदा हालात पर बड़ी नाउम्मीदी जताते हुए अफसोस किया कि उनके तीस साल के करियर में ये पहला मौका था जब कोई उनसे हसरत मोहानी पर बात करने आया। तो क्या भारत में इतिहास लेखन भी पूर्वाग्रहों और खास खेमों के इर्द गिर्द ही सिमटा रह गया? लगता तो यही है। जिस किसी भी शख्स ने आज़ादी की लड़ाई में कांग्रेस या कहें कि महात्मा गांधी की विचारधारा की मुख़ालिफ़त की, उसे ही दूध की मक्खी की तरह ना सिर्फ कांग्रेस से बल्कि इतिहास से भी बेदखल कर दिया गया। और, ऐसा आज भी हो रहा है।

समाज के बने बनाए आदर्श पुरुषों की तरफ दूसरे नजरिए से देखने की कोशिश कम ही होती है। आमतौर पर समाज पहले से बने बनाए मापदंडों को मानकर ही आने वाले कल की तैयारी में जुट जाता है, लेकिन देखा जाए तो दुनिया के बदलते राजनीतिक हालात और ख़ासकर अपने देश भारत में बदलती सामाजिक आर्थिक हालत के मद्देनज़र कुछ बातों पर फिर से गौर करना ज़रूरी है। पहला तो ये कि क्यों आखिर मुसलमान शब्द सुनते ही लोगों के जेहन में आतंकवाद ही कौंध जाता है। क्या ये तुरंत हुआ है, या फिर समाज में विद्वेष के बीज बोने की ये बरसों से चल आ रही सोची समझी रणनीति की कामयाबी है। क्या इस देश को आज़ाद कराने में मुसलमानों ने कोई योगदान नहीं किया? क्या इतिहास में सिर्फ जिन्ना ही हुए हैं, हसरत मोहानी नहीं। बहुत कम लोग जानते हैं कि मशहूर ग़ज़ल – चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है – लिखने वाले हसरत मोहानी ही दरअसल देश में पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाले पहले सियासी नेता थे। तब तो मोहनदास करमचंद गांधी भी इसके पक्ष में नहीं थे। हसरत मोहानी ने ही पहले पहल स्वदेशी आंदोलन की नींव डाली और एक बार तो भयंकर जाड़े में भी अपने किसी रिश्तेदार के यहां पूरी रात ठिठुरते ठिठुरते इसलिए काट दी, कि उनको ओढ़ने के लिए रखे गए कंबल पर मेड इन इंग्लैंड लिखा था।

लाखों में एक होते हैं वो जो अपने वतन के लिए कुर्बान होने का जज़्बा रखते हैं, गिनती के थे वो जिन्होंने फ़ाकाकशी में भी अपने वतन की साख पर आंच नही आने दी। और बस हसरत ही हैं वो जो तिलक के शागिर्द बनकर बापू के लिए नज़ीर बन गए। मज़हब के नाम पर मुल्क के बंटवारे की आख़िरी दम तक मुख़ालिफ़त करने वाले हसरत मोहानी गरम दल के कांग्रेसी थे। मौलाना फज़लुर हसन हसरत यानी हसरत मोहानी की शख्सीयत की तरफ गौर करना आज के माहौल में इसलिए भी ज़रूरी है कि अब कुछ ऐसी मिसालें लोगों के सामने लाना ज़रूरी हैं, जो इस देश की गंगा जमुनी तहज़ीब में दिखती दरारों को पाटने में मदद कर सकें। हज करने के लिए हिंदुस्तान से मक्का तक पैदल जाने वाले हसरत मोहानी को कान्हा में भी दिलचस्पी थी। लोगों ने भले उन पर कुफ़्र का इल्जाम लगाया हो, लेकिन भगवान कृष्ण की तस्वीर कभी उनसे अलग नहीं हुई। इनकी किताब जिहाद ए हसरत एक बार फिर बाज़ार में है, कौम के लोगों को ये बताने के लिए कि जिहाद का मतलब क्या है? और कैसे जिहाद के ज़िरए दो कौमों को एक करने के लिए हसरत मोहानी ने अपना सब कुछ नीलाम हो जाने दिया।

लेकिन, क्या वजह है कि हसरत मोहानी की यादों के निशान अब उनके अपने गांव में भी ज्यादा नहीं बचे हैं। इसके लिए कौन गुनहगार है। पार्कों और पत्थर के हाथी लगवाने पर करोड़ों रुपये स्वाहा करने वाली सरकार क्या इस शख्स के नाम पर एक स्मारक या एक सरकारी पुस्तकालय तक नहीं बनवा सकती, जहां उनका लिखा साहित्य शोध करने वालों को एक जगह मुहैया हो सके। और सूबे की सरकार ही क्यों दिल्ली की सरकारों ने भी तो आज तक इस पिछड़े ज़िले के सबसे चमकदार नेता की याद बचाए रखने के लिए कुछ नहीं किया। पिछले चुनाव से ठीक पहले हसरत मोहानी के नाम पर मुसलमानों की खेमेबंदी करने की एक कोशिश ज़रूर इस ज़िले में हुई, लेकिन चुनाव के बाद ऐसा कुछ नहीं किया गया कि लोग इस कोशिश की ईमानदारी पर शक़ न करते।

(जारी..)