सोमवार, 25 जून 2012

फितरत में नहीं अड्डेबाजी-कबीर कौशिक

अगर सिनेमा एक तिलिस्म है तो निर्देशक कबीर कौशिक इसके एक ऐसे तालिस्मान हैं, जिन्हें समझना मुश्किल नहीं तो इतना आसान भी नहीं है। उनका निर्देशकीय कौशल काबिल ए दाद होता है पर, रिश्तों में उनका यकीन न बन पाना उन्हें हर फिल्म के साथ दो कदम आगे और चार कदम पीछे ले जाता है। कबीर कौशिक के करियर की चौथी फिल्म मैक्सिमम रिलीज के लिए तैयार है, लेकिन बिरले ही जानते हैं कि इस अकड़फूं डायरेक्टर का ताल्लुक बिहार के एक मशहूर सियासी खानदान से है और मशहूर हिंदी पत्रकार स्व.घनश्याम पंकज के वह बेटे हैं। कबीर कौशिक से उनके नए दफ्तर में एक खास मुलाकात।

© पंकज शुक्ल

हर फिल्म के बाद आपसे एक नए दफ्तर में मुलाकात होती है। मुलाकात भी क्या, करीब करीब जबरन घुस आते हैं हम आपके दफ्तर में। ये आप दुनिया से इतने कटे कटे और अकेले क्यूं रहते हैं?
-(एक शरारत भरी मुस्कान तैरती है चेहरे पर) सिनेमा मेरा प्यार है, मेरा जुनून है। मैं मुंबई में होता हूं तो सिर्फ इसी के बारे में सोचता हूं। मेरी मसरूफियत इसके अलावा मेरी कंसलटेंसी एजेंसी और कुछ दीगर कामों को लेकर भी रहती है। खाली वक्त मिलता है तो पढ़ता हूं या फिर स्कवैश खेलता हूं। बाकी फालतू की लफ्फाजी और गॉसिपबाजी में मेरा यकीन शुरू से नहीं रहा। मेरा मानना है कि आपका संपर्क जितना विस्तृत और विशाल होता जाता है, आपके सोचने का तरीका उतना ही दूसरों से प्रभावित होने लगता है। इस मायावी दुनिया में अपने जैसा बना रहने का सबसे साधारण फॉर्मूला जो मुझे समझ आता है, वह है अपने में मगन रहना। अड्डेबाजी मेरी फितरत में ही नहीं है।

सहर, चमकू, हम तुम और घोस्ट और अब मैक्सिमम। सात साल में चार फिल्में किसी भी हिंदी फिल्म निर्देशक के इतराने के लिए काफी हैं। पर आप अब भी कम ही खुलते हैं लोगों से। इल्जाम ये भी लगता है आप पर कि आप जिनके ज्यादा करीब होते हैं, वे सब आपसे जल्दी ही दूर हो जाते हैं?
-पंकज जी..। आप क्यूं ऐसा कह रहे हैं? मैंने कहा न ये सब मेरी फितरत में ही नहीं है। लोग आते हैं। मेरे साथ काम करते हैं और फिर अपना रास्ता पकड़ लेते हैं। मैंने कभी किसी को बंधन में नहीं रखा। और, न ही मैं किसी बंधन में रहने में यकीन करता हूं। हां, मैं मानता हूं कि इस सफर में मुझसे भी गलतियां हुई हैं। कुछ छोटी मोटी गलतियां हैं तो कुछ बड़ी गलतियां भी हुई हैं। पर, ये मेरे सबक हैं। मैंने इनसे सीखा है। सबक ये है कि ये गलतियां दोबारा ना हों। और, सीखा ये है कि कारोबार की इस नगरी में कारोबार ही अंतिम सत्य है। बाकी सब मिथ्या है।

क्या ये भी मिथ्या है कि मैक्सिमम की शूटिंग से ऐन दो दिन पहले आपके सबसे करीबी दोस्त अरशद वारसी ने फिल्म में काम करने से मना कर दिया था?
-लेकिन, इससे हुआ क्या? फिल्म की शूटिंग तो उसी तारीख को शुरू हुई। हां, वह रोल अब फिल्म में नसीर साब कर रहे हैं, बिना स्क्रिप्ट में एक भी लाइन के फेरबदल के। अरशद को शायद पहले रोल पसंद आया था लेकिन बाद में उनका ख्याल बदला और उन्हें लगा कि ये रोल उनके लिए मुफीद नहीं है। वह फैसला लेने के लिए आजाद हैं, मैं इसमें क्या कर सकता था।

"जीवन में सब कुछ पा लेने के बाद भी परेशान बने रहने से बेहतर है सब कुछ पा लेने के लिए परेशान रहना। मुझे अपने अब तक के करियर से कोई गिला शिकवा नहीं है। जल्द ही अगली एक फिल्म पर भी काम शुरू होने जा रहा है।"-कबीर कौशिक



किसी निर्देशक का अपनी पहली ही कोशिश से फिल्म जगत में चर्चा का सबब बन जाना। खुद आमिर खान का एसएमएस करके अपने लायक किसी स्क्रिप्ट के होने पर संपर्क करने का संदेश भेजना और इसके बाद भी ये जद्दोजहद?
-फिल्म जगत का कारोबार वैसा रूमानी है नहीं, जितना बाहर से दिखता है। आपने तो इसे करीब से देखा और तकरीबन सारा कुछ जानते भी हैं इसके बारे में। आमिर को ध्यान में रखते हुए एक फिल्म लिखी गई थी, क़ज़ा। उस फिल्म में आमिर को आतंकवादी का किरदार करना था पर संयोग कहिए या कुछ और उन्हीं दिनों यशराज फिल्म्स की फिल्म फना शुरू हो गई। आमिर के बारे में जितना मुझे मालूम है, वह एक ही किरदार को दोहराने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखते। बाकी रही जद्दोजहद, तो यही तो जीवन है। ये खत्म हुई तो फिर जीवन कैसा? जीवन में सब कुछ पा लेने के बाद भी परेशान बने रहने से बेहतर है सब कुछ पा लेने के लिए परेशान रहना। मुझे अपने अब तक के करियर से कोई गिला शिकवा नहीं है। जल्द ही अगली एक फिल्म पर भी काम शुरू होने जा रहा है।

और, वह कोयला खदानों पर हम दोनों द्वारा मिलकर लिखी गई फिल्म खदान? अब तो अनुराग कश्यप उसी से मिलती जुलती थीम पर गैंग्स ऑफ वासेपुर लेकर आ रहे हैं। इस फिल्म से कितना खतरा महसूस होता है मैक्सिमम को?
-खदान का विषय अब भी जीवित है। उस फिल्म को लेकर एक बड़े सितारे से बात चली लेकिन बात बिना किसी निष्कर्ष के बीच में ही रुक गई। फिर मैं मैक्सिमम में व्यस्त हो गया। उस विषय पर मैं जल्द ही लौटूंगा। रही बात गैंग्स ऑफ वासेपुर की, तो उस फिल्म से मेरी फिल्म को रत्ती भर भी चुनौती मिलती नहीं दिखती। हां, अगर स्पाइडरमैन की बात करें तो बतौर निर्देशक मुझे थोड़ी सी सिहरन जरूर होती है। स्पाइडरमैन ऐसी फिल्म है जिसके सामने थिएटर में आना जिगरे का काम है। रही बात गैंग्स ऑफ वासेपुर की तो उससे मैक्सिमम की क्या टक्कर?

अच्छा ये बताइए। आप दिल्ली से हैं। ये अनुराग, दिबाकर, विशाल, इम्तियाज भी सब दिल्ली के ही हैं। सबका एक अच्छा खासा गैंग भी है जो मुंबई के स्थापित प्रोडक्शन घरानों से सींग लड़ाता रहता है, क्या आप ने कभी इस गैंग में शामिल होने के बार में सोचा?
-मैंने पहले ही कहा कि ये सब करना मेरी फितरत में शामिल नहीं है। मैं चाहता हूं कि लोग मेरा काम देखें और मेरे काम को सराहें या खारिज करें। फिल्ममेकिंग के अलावा और किसी बात के लिए मेरे बारे में खबरें लिखी जाएं, इसका मतलब तो ये हुआ कि मुझे अपने हुनर पर भरोसा नहीं है। अपने हुनर को छोड़ अगर कोई कलाकार या तकनीशियन अन्य किन्हीं वजहों से खबरों में बने रहने की कोशिश में हैं तो समझ लीजिए कि वह आपको घुमा रहा है। दूसरी बात ये कि मैं सिनेमा में अभी जुम्मा जुम्मा सात साल पहले आया हूं। ये सब यहां 18-20 साल से हैं। ये लोग जो भी है, जिस भी मुकाम पर हैं, वहां इनका पहुंचना बनता है क्योंकि इस शहर ने इन सबकी काफी घिसाई की है। मेरी घिसाई तो अब भी चल रही है। देखते हैं कि जिन्ना कब प्रकट होता है?

और, मैक्सिमम के बाद?
-अक्सर लोग मुझसे कहते हैं कि मेरी फिल्मों की नायिकाएं जितनी सशक्त होती हैं, उतना विस्तार उनके किरदारों को मेरी कहानियों में मिल नहीं पाता। तो इस बार जिस कहानी पर काम चल रहा है वह पूरी तरह से नायिका प्रधान कहानी है। बहुत ही दमदार किरदार है, पर उस पर विस्तार से बात फिर कभी।

संपर्क- pankajshuklaa@gmail.com

रविवार, 17 जून 2012

कामयाब होने से ज्यादा मुश्किल बेहतर इंसान बनना- मिथुन चक्रवर्ती



फुटपाथ से उठकर सतरंगी आसमान पर छा जाने वाले मिथुन चक्रवर्ती हिंदी सिनेमा के आखिरी सुपर सितारे हैं। दो वक्त की रोटी कमाने के लिए कभी टैक्सियों पर स्टिकर चिपकाने वाले मिथुन बाद में देश में सबसे ज्यादा व्यक्तिगत आयकर चुनाने वाले रईस भी बने। अपने प्रशंसकों के बीच प्रभुजी के नाम से पूजे जाने वाले मिथुन चक्रवर्ती बता रहे हैं कामयाबी के कुछ अनोखे मंत्र।

© पंकज शुक्ल

दादा, वैसे तो आपके बारे में जितना जानने की कोशिश की जाए कम है, और आप हैं कि अपनी संघर्ष यात्रा के बारे में ज्यादा कुछ लोगों को बताते भी नहीं हैं, ऐसा क्यों?
-शायद मेरी आदत नहीं रही शुरू से अपने बारे में ज्यादा बात करने की। आप ने तो मुझे बरसों से देखा है। मुझे अपनी मार्केटिंग करने का शौक कभी नहीं रहा। मैं कर्म करने में विश्वास करता हूं। ईश्वर में आस्था रखता हूं और कोशिश में रहता हूं कि ये जीवन जिन ऋणों को चुकाने के लिए मिला है, वे सारे समय रहते पूरे कर सकूं। जीवन एक ऐसा चक्र है जिसमें उतार चढ़ाव, यश अपयश, ऊंच नीच सब लगी रहती है। इससे परेशान होने वाला ही जीवन को जी नहीं पाता। मेरा फलसफा रहा है कि दूसरों के बीच खुशियां बांटते रहो, आपके बीच खुशियां खुद चलकर आएंगी। मेरी खुशियां भी हमेशा खुशियां बांटने से ही बढ़ीं हैं।

आपने एक बार कहा था कि आप उस इंसान की आखिरी आशा हो जिसकी कोई आशा पूरी न हुई हो। आज भी आपके यहां निर्माताओं की कतार लगी रहती है, पर अब तो आप उतनी फिल्में नहीं करते?
-ये दिलचस्प है कि लोग मुझे अब भी मुख्य भूमिकाओं के लिए साइन करने आते हैं। क्षेत्रीय भाषाओं के निर्देशक अब भी मुझे बतौर हीरो रिटायर नहीं होने देना चाहते। हिंदी फिल्मों में मेरे बाद दो तीन पीढ़ियां आ चुकी हैं तो वहां मैं अब अपने हिसाब से फिल्में करता हूं। दूसरा मेरा क्या मानना है कि किसी चीज को ज्यादा घिसने से उसकी चमक चली जाती है। मैं जीवन के आखिरी दिन तक काम करना चाहता हूं, इसके लिए जरूरी है कि मैं उतना ही काम करूं जितना मेरे लिए सही है। मैंने हर तरह का समय देख लिया, अब तो बस मैं सिनेमा का होकर उसका लुत्फ लेना चाहता हूं।

फिल्म मृगया में अपनी पहली ही फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार जीतने के बाद पहला इंटरव्यू देने से पहले आपने एक पत्रकार से मांगकर बिरयानी खाई थी, अब आप सैकड़ों लोगों का पेट खुद भरते हैं, इसे समय चक्र मानते हैं या कुछ और?
-मेरा ये स्पष्ट मानना रहा है कि कर्म और भाग्य दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। भाग्य अक्सर आपसे वही कर्म करवाता है जिसकी नियति आपके लिए शायद पहले से तय है। लेकिन, कर्म से भाग्य भी बदले जाते हैं। पक्की लगन और अनुशासन हो तो लक्ष्य पा लेने में दिक्कत कम होती है। दूसरे मेरा ये मानना है कि समय के हिसाब से भी हमें अपने लक्ष्य तय करने चाहिए। हमारे लक्ष्य छोटे छोटे और अनवरत बनते रहने चाहिए। हमें अपनी मंजिल पहले कदम में उतनी ही बनानी चाहिए, जितनी हमारी नजरों के सामने है। पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में मुझे देखकर मृणाल बाबू ने मुझे मृगया दे दी थी, लेकिन जरूरी नहीं कि हर कोयले को ऐसा जौहरी जीवन में मिल ही जाए। समय बदला है, जौहरी भी अब बाजार के हिसाब से हीरे तलाशने लगे हैं तो जाहिर है ऐसे में गुदड़ी के लालों को मौका नहीं मिल पा रहा है। लेकिन, मैं आखिरी इंसान नहीं हूं जो फुटपाथ से उठकर यहां तक आया। लोगों की उम्मीदें बंधती रहेंगी और लोग कामयाबी भी पाते रहेंगे।

और, आपसे लगी ऐसी ही छोटी छोटी उम्मीदों ने ऐश्वर्या राय को अपनी पहली ही फिल्म में आपकी हीरोइन बनने से वंचित कर दिया?
-अरे शुक्लाजी, वो बहुत पुरानी कहानी हो चुकी। लेकिन, आपकी बात सही है। मोहनलाल वाला रोल लेकर मणिरत्नम पहले मेरे पास ही आए थे। पर मैं करता क्या मेरी एक दर्जन से ज्यादा फिल्में फ्लोर पर थीं और अगर मैं इस रोल के हिसाब से बाल कटा लेता तो बाकी सारे निर्माताओं की फिल्में आगे खिसक जातीं। मैं नहीं चाहता था कि मुझे कोई बड़ा मौका मिले तो मेरे सहारे अपना घर बार छोड़े बैठे फिल्म निर्माताओं को नुकसान हो। अपना भला करके दूसरों को भला करना तो बहुत आसान है। मजा तो तब है कि आपको पता है कि दूसरे के इस भले में आपका नुकसान हो रहा है, पर आप को उसमें भी आनंद आता है। जीवन में कामयाब होना ज्यादा मुश्किल नहीं है, मुश्किल है बेहतर इंसान बनना।

और, वो एक ही साल भगवान और शैतान के किरदारों के पुरस्कृत होने का किस्सा?
-अभिनेताओं को भी ये गजब की नियामत हासिल है। वो हर फिल्म में क्या क्या भेस धरकर पर लोगों के सामने आते हैं? लेकिन क्या कभी हम सोचते हैं कि ये कितनी बड़ी चीज हमें ईश्वर ने दी है। स्वामी विवेकानंद की शूटिंग चल रही थी। लंच ब्रेक था और मैं एक पेड़ के नीचे बैठकर सिगरेट पीने लगा। कुछ महिलाएं वहां थोड़ी परे खड़े होकर सहमे सहमे मुझे देख रही थीं। फिर उनमें से दो तीन हिम्मत करके मेरे पास आईं। मैं फिल्म में रामकृष्ण परमहंस का किरदार कर रहा था। महिलाएं आईं और आते ही प्रणाम किया। फिर मेरी सिगरेट की तरफ इशारा किया। बोलीं, आप भगवान हैं। इसे मत पीजिए। मैं तो जैसे बैठे बैठे ही काठ का हो गया। इसके बाद पूरी फिल्म जब भी मैं गेटअप में रहा, मैंने सिगरेट को हाथ नहीं लगाया। इस फिल्म के लिए मुझे 1995 में अभिनय का एक और राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उसी साल फिल्म जल्लाद के लिए मुझे सर्वश्रेष्ठ खलनायक का पुरस्कार मिला। सलाम है ऐसे दर्शकों का जिन्होंने मुझे एक ही साथ भगवान के रूप में भी प्यार दिया और मैं खलनायक बना तो उसे भी सराहा।

हिंदी सिनेमा में हर बड़े सितारे ने अपने बेटे के लिए फिल्में बनाईं, आपने नहीं। ऐसा क्यों?
-मिमोह अपनी जगह बना रहा है हिंदी सिनेमा में। उसे पता होना चाहिए कि जिंदगी में जो कुछ मिलता है, वो बड़ी मेहनत और मुश्किल से मिलता है। मिमोह को मेहनत का मतलब समझ आ रहा है। अब वह जो भी बन रहा है उसमें उसका आत्मविश्वास शामिल है। रिमोह ने निर्देशन का कोर्स किया है विदेश से। वह कैमरे के पीछे अपना हुनर दिखाना चाहता है। उसकी एक डिप्लोमा फिल्म को कनाडा फिल्म फेस्टिवल में अवार्ड भी मिल चुका है। दोनों के सपोर्ट के लिए मैं हमेशा यहां हूं, लेकिन दोनों को हिंदी सिनेमा में जो भी मुकाम पाना है, वो अपनी मेहनत से ही पाना होगा।


संपर्क - pankajshuklaa@gmail.com