शनिवार, 4 अप्रैल 2009

मेरी पहली बड़ी स्टोरी और राजेंद्र वढेरा...


रायपुर, 4 अप्रैल, 2009।
मुरादाबाद जैसे छोटे शहरों में क्राइम रिपोर्टिंग करते हुए कोई संवाददाता किसी भी तरह की कैसी बड़ी से बड़ी स्टोरी कर सकता है? यही कि कभी कोई आईएसआई के एजेंट की गिरफ़्तारी पर ख़बर मिल जाए या किसी नए प्रशिक्षु आईपीएस के चाल-चलन पर रिपोर्टर की नज़र पड़ जाए। लेकिन, मैं इस मामले में खुशकिस्मत रहा। प्रियंका गांधी को रॉबर्ट वढेरा भाए या रॉबर्ट को प्रियंका अच्छी लगीं, इस पर मीडिया में कभी कुछ ज़्यादा लिखा नहीं गया। लेकिन, रॉबर्ट के पिता राजेंद्र वढेरा ने कोई 15 साल से पहले पहली बार दोनों के रिश्तों का खुलासा किया था, और तब ये ख़बर “अमर उजाला” अख़बार के सभी संस्करणों के पहले पन्ने पर छपी थी। ये ख़बर पढ़कर दिल्ली के तमाम पत्रकार मुरादाबाद पहुंचे और इन्हीं में से एक भावदीप कंग का एक वाक्य मेरे कानों में बहुत दिनों तक घूमता रहा – “You are wasting your time in Moradabad.”

मेरे काम को किसी दूसरे पत्रकार से मिली वो पहली बड़ी तारीफ़ थी और आज अगर मैं एक न्यूज़ चैनल का मैनेजिंग एडीटर बन पाया तो उसके पीछे रॉबर्ट – प्रियंका की वो स्टोरी और उसके बाद भावदीप कंग के उस वाक्य का बड़ा हाथ रहा है। उस दिन से पहली रात का पूरा वाकया कुछ इस तरह रहा कि अपना पूरा काम निपटा कर आदतन मैं रात कोई 11 बजे मुरादाबाद के सभी पुलिस थानों को फोन कर रहा था कि कहीं कोई लेट नाइट क्राइम तो नहीं हुआ। इसी समय पता चला कि शहर के किसी घर के आगे ब्लैक कैट कमांडोज खड़े हैं। कोई वीआईपी जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क से चलकर दिल्ली जा रहा है और कुछ देर के लिए शहर के एक घर में रुका है। रात में तो ख़ैर ज्यादा इस बारे में कुछ पता चला नहीं लेकिन अगली सुबह मैं इस मामले की तह में जाने के लिए निकल पड़ा। दो तीन घंटे की खोजबीन के बाद जो सामने आया, उसे पकड़कर आगे बढ़ा तो राजेंद्र वढेरा के घर तक जा पहुंचा। शुरुआती ना नुकुर के बाद राजेंद्र वढेरा बात करने को तैयार हो गए।

राजेंद्र वढेरा ने अपने घर के बाहर ही सड़क किनारे एक फोल्डिंग चेयर डालकर मुझसे बात शुरू कर दी। उन्होंने खुलकर बताया कि अपनी पत्नी से उनके रिश्ते बस नाम भर के रह गए हैं। अपने परिवार के बारे में उन्होंने और भी तमाम जानकारियां दीं। दोनों बेटों रिचर्ड और रॉबर्ट के बारे में बताया। बेटी मिशेल के बारे में भी बातचीत की। लेकिन, उस दिन की मेरी पड़ताल सिर्फ प्रियंका और रॉबर्ट की दोस्ती को लेकर थी और राजेंद्र वढेरा ने तब बताया था कि दोनों की दोस्ती बैले डांसिंग के दौरान हुई। उस दिन के बाद जब तक मैं मुरादाबाद में रहा राजेंद्र वढेरा से मेरी बातचीत होती रही। देश के प्रधानमंत्री रहे एक शख्स की बेटी से अपने बेटे की दोस्ती पर उन्हें नाज़ रहा हो, ऐसी कोई बात कभी इस बातचीत के दौरान सामने नहीं आई। उनकी आवाज़ टूटे रिश्तों का बोझ ढो रहे एक ऐसे शख्स की आवाज़ लगती थी, जिसने अपने सपनों को अपने सामने तार तार होते देखा। फिर 2001 में बेटी मिशेल की एक कार दुर्घटना में मौत और दो साल बाद यानी 2003 में ही बेटे रिचर्ड वढेरा की मौत ने शायद राजेंद्र वढेरा को भीतर तक तोड़ दिया।
राजेंद्र वढेरा मेरे लिए कभी मेरी पहली ऑल एडीशन बाइ लाइन वाली ख़बर के सूत्र भर नहीं रहे। मुरादाबाद छूटने के बाद उनसे मेरी बातचीत भी कम होती गई, लेकिन इस बातचीत के दौरान कई बार उन्होंने ऐसी बातों की तरफ़ इशारा किया, जो सुर्खियां बन सकती थीं। लेकिन, उन ख़बरों की ना तो पुष्टि संभव थी और ना ही उनके सिरे तलाशने की मेरी तरफ़ से ही कोई जद्दोजहद की गई। आज सुबह अख़बार में राजेंद्र वढेरा के निधन की ख़बर पढ़कर उनका चेहरा मेरी आंखों के सामने घूम गया। वही फोल्डिंग चेयर पर सफेद पाजामा और एक सामान्य सी शर्ट पहने बैठे राजेंद्र वढेरा का चेहरा।
राजेंद्र वढेरा अपने टूटे रिश्तों से लाचार थे। शायद, जो सुख पाने की लालसा में उन्होंने जवानी के जोश को दांव पर लगाया वो उम्र ढलने के साथ उनको शांति नहीं दे पाया। वो बातचीत में हताश लगते रहे, दिल्ली वो अक्सर आते जाते रहते थे, लेकिन दिल्ली ने भी शायद उनका दिल तोड़ा और इसी टूटे दिल के साथ वो दुनिया से विदा हो गए। राजेंद्र जी के निधन पर मुझे काफी अफसोस हुआ, मैं अख़बार पढ़ने के बाद देर तक दुखी भी रहा। लेकिन, वो मन्ना डे का गाया गाना है ना...कसमें वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या, कोई किसी का नहीं ये झूठे नाते हैं नातों का क्या...।

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

शुक्रिया! लिकर किंग

सौ करोड़ भारतीयों की भावनाएं आख़िरकार अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में तार तार होने से बच गई। लिकर किंग के नाम से मशहूर बिज़नेसमैन विजय माल्या ने राष्ट्रपिता की पीतल की प्लेट-कटोरी, चप्पल, घड़ी और ऐनक दूसरे देश जाने से बचा ली। बापू की इस अमानत की नीलामी जब सरकार नहीं रोक पाई, तो माल्या ने इनकी सबसे बड़ी बोली लगाकर इन्हें खरीद लिया।

बापू पूरा जीवन सीना तान के चले। तब भी जब अंग्रेजों ने दक्षिण अफ्रीका में उन्हें रेल के डिब्बे से बाहर फेंक दिया। तब भी जब बिहार में नील के खेती करने वालों को उन्होंने उनका हक़ दिलाया। और, तब भी जब नाथूराम गोडसे की पिस्तौल उनके सीने के सामने तन चुकी थी।

बस बापू का सिर झुक जाता था तो गरीब देशवासियों की लाचरगी देखकर, उनकी गरीबी देखकर और उनकी आंखों में पलने वाले सपनों को चकनाचूर होते देखकर। मोहनदास करमचंद गांधी को सुभाष चंद्र बोस ने बापू कहा। देशवासियों से खून मांगने वाले एक सेनानी का अहिंसा को सबसे बड़ा हथियार बताने वाले दूसरे सेनानी को दिया गया ऐसा सम्मान कि पूरे देश ने साबरमती के इस संत को अपना बापू मान लिया।
बापू का पूरा जीवन विरोधाभासों से घिरा रहा। वो पूरे देश के बापू थे, लेकिन उनका अपना बेटा उनके सिद्धांतों का बाग़ी हो गया। बापू की प्रतिमा से चंद कदमों की दूरी पर संसद में बहस के नाम पर करोड़ों फूंक देने वाले तमाम नेताओं ने बापू से शायद ही कुछ सीखा हो। लेकिन सौ करोड़ भारतीयों की उम्मीदों पर पानी फिरने से बचाने का काम एक ऐसे शख्स ने किया, जिससे शायद बापू जिंदा होते तो कन्नी काटकर निकल जाते। जी हां, एक शराब का सबसे बड़ा विरोधी और दूसरा देश का लिकर किंग।
चांद पर तिरंगा लहराने वाले सौ करोड़ भारतीयों के पास अपने बापू की घड़ी, उनकी ऐनक, उनकी पीतल की कटोरी प्लेट और उनकी चप्पलें जल्द वापस आएंगी। सरकार जहां चूक गई, वहां कारोबार जगत के एक नुमाइंदे ने देशवासियों की उम्मीदें सांसत में फंसने से बचाईं। माल्या पहले भी टीपू की तलवार हिंदुस्तान ला चुके हैं। शुक्रिया, लिकर किंग। आपकी तिजोरी से कम हुए 18 लाख डॉलर, सौ करोड़ हिंदुस्तानी फिर भी चुका सकते हैं, लेकिन, बापू की विरासत बचाने की जो कीमत है, उसे अशर्फियों से भी नहीं तौला जा सकता।