गुरुवार, 20 नवंबर 2008

बेरोज़गारी से दो दो हाथ...


भोले शंकर (21)॥गतांक से आगे...

फिल्म भोले शंकर की कहानी अब तक आप लोगों को काफी कुछ साफ हो चुकी होगी। ये कहानी एक विधवा मां और उसके दो बेटों की है। ये कहानी बताती है कि कैसे एक बेसहारा मां अपने बच्चों को अपने बल बूते पाल पोस कर बड़ा करती है। ये कहानी बताती है कि कैसे समाज के उसूल एक औरत से उसकी शादीशुदा ज़िंदगी का सुख छीन लेते हैं। और, ये कहानी ये भी बताती है कि अगर इंसान चाहे और परिवार का साथ मिले तो गांव का भी एक बच्चा पढ़ लिखकर अपने बूते कुछ बन सकता है। इसके लिए ज़रूरी नहीं कि वो सरकारी नौकरी ही करे, बेरोजगारी अपने देश की बड़ी समस्या है और इससे देश के किसी भी कोने का युवा वर्ग अछूता नहीं है। लेकिन अगर आज के युवा बजाय सीधी सादी सरकारी नौकरी के, किसी हुनर में अपना हाथ साफ करें, तो रोज़गार के अवसर आज भी कम नहीं हैं। चूंकि मेहनत का रास्ता कठिन और परेशान कर देने वाला होता है, लिहाजा कई बार बुरी संगत में पड़कर शंकर जैसे लोग गलत रास्तों पर भी निकल जाते हैं, लेकिन भोले जैसे लोग चाहें तो राह भटके लोगों को भी फिर से विकास की मुख्यधारा में जोड़ सकते हैं।

इधर भोले शंकर की मेकिंग हर दिन आप तक नहीं पहुंच पा रही है। इसके लिए मैं आप लोगों से माफी चाहता हूं। कुछ नित्य जीवन की उठा पटक और कुछ दूसरे प्रोजेक्ट्स के लिए भागदौड़ के चक्कर में इस बार अंतराल कुछ लंबा ही हो गया। चुनाव आते हैं, वादे होते हैं, लेकिन नेताओं की गाड़ियों के गुबार की तरह हर बार पीछे रह जाते हैं आम लोगों के सपने। ऐसा ही एक सपना फिल्म भोले शंकर के भोले ने देखा है। लेकिन मां की संगीत से दूर रहने की ज़िद के आगे उसने अपना सपना कुर्बान कर दिया। दोस्त यार सब जानते हैं कि भोले बढ़िया गाता है। भोले के गुरुजी भी चाहते हैं कि किसी दफ्तर में क्लर्की या खेत में किसानी करने की बजाय भोले अपने इस हुनर को रियाज़ से मांजे और गांव का नाम पूरी दुनिया में रौशन करे। लेकिन, मां की मर्जी जब तक नहीं होती, वो भला कैसे मीलों दूर मुंबई जा सकता है।

तमाम असमंजस के बाद मां भोले को मुंबई जाने की इजाज़त दे भी देती है, लेकिन शोहरत के शिखर पर पहुंचना आसान नहीं होता। जैसा कि मैं पहले भी लिख चुका हूं कि भगवान कोई बड़ा ईनाम देने से पहले हमारी काबिलियत का इम्तिहान ज़रूर लेता है, भोले की भी ऐसी ही परीक्षा होती है। और, लखनऊ में गानों की शूटिंग के बाद हमें करनी थी उस सीन की शूटिंग जिसमें भोले के सब्र का ये इम्तिहान होना है। भोले ने अपनी गायिकी के गुण दिखाकर म्यूज़िक कंपनी के अफसरों का दिल तो जीत लिया है, लेकिन म्यूज़िक कंपनी चाहती है कि भोले भोजपुरी रैप तैयार करे। रैप का वैसे तो दूसरी लोक भाषाओं से संगम हो चुका है, ये वो विधा है जिसके ज़रिए आज की पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ने की कोशिश करती है। पंजाबी की पश्चिमी देशों में लोकप्रियता की एक बड़ी वजह ये भी है, वहां की पुरानी पीढ़ी ने आज के नौजवानों को अपने लोकगीतों को उनके हिसाब से ढालने की मोहलत दे दी है। पंजाबी पॉप और रैप का कनाडा और ब्रिटेन जैसे देशों में इस तरह के संगीत का भरा पूरा बाज़ार है। और, अब वक्त आ गया है जब भोजपुरी को भी विदेशों में पली बसी नई पीढ़ी से जोड़ा जाए। इसी सोच के मद्देनज़र हमने फिल्म भोले शंकर में एक भोजपुरी रैप सॉन्ग भी रखा।

और, आज जिस दृश्य की मैं बात करने जा रहा हूं वो फिल्म में ठीक इस भोजपुरी रैप के पहले आता है। ये वो सीन है जब भोले मुंबई में शंकर के घर से तैयार होकर निकलता है और उसे शो से पहले रिहर्सल करना है। रिहर्सल से ठीक पहले कैसे शंकर की असलियत भोले के सामने खुलती है, इसकी चर्चा बाद में कभी होगी। आज इस सीन की बात। तो भोले घर से निकलकर हॉल में पहुंच चुका है। ना मां को पता है कि भाइयों के बीच क्या हुआ और ना ही गुरुजी जानते हैं कि भोले परेशान क्यों है? ये पूरा सीन करीब 18 शॉट्स में पूरा हुआ, जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूं कि भोजपुरी सिनेमा में किसी सीन को कम से कम शॉट्स में पूरा करने की परंपरा चली आ रही है और शायद इसीलिए भोजपुरी सिनेमा को वो दर्जा अब तक हासिन नहीं हुआ जो बस एक एक प्रदेश की भाशा होने के बावजूद तमिल, तेलुगू और मलयालम सिनेमा को हासिल हो चुका है। भोजपुरी सिनेमा के ज़्यादातर कलाकार से लेकर तकनीशियन तक काम को किसी तरह निपटाने में लगे रहते हैं, मेरी और मनोज तिवारी की तक़रार की वजह यही रही।

इस पूरे सीन में गौरी के आने से पहले तक मनोज तिवारी को बस एकाध लाइन के ही संवाद बोलने थे, बाकी पूरा उनका अभिनय बस चेहरे पर भावों का प्रकटीकरण ही था। सीन शुरू होता और मैं माइक पर वो शंकर के वो संवाद बोलने लगता, जो भोले के अवचेतन मष्तिष्क में घुमड़ रहे हैं। शंकर की बातें याद कर करके भोले परेशान है। वो गा नहीं पा रहा है। गुरुजी आते हैं और भोले को हौसला बंधाते हैं, लेकिन भोले गा नहीं पा रहा। इस सारे सीन में भोले को अपने चेहरे पर परेशानी के भाव दिखाने थे और मनोज तिवारी का उस दिन मूड काफी खुशनुमा था। लेकिन एक दो बार सीन को लेकर मेरी और मनोज तिवारी की तक़रार हुई तो मैं भी थोड़ा तनाव में आ गया और मनोज तिवारी भी। परंतु ये बात मैंने ज़ाहिर नहीं होने दी क्योंकि मुझे तो वैसे भी मनोज तिवारी के चेहरे पर तनाव ही चाहिए था। अब सिचुएशन ये बनी कि मनोज तिवारी मेरी किसी बात से चिढ़कर तनाव में थे और मैं शॉट पर शॉट लिए जा रहा था क्योंकि उनके चेहरे पर ठीक वैसे ही भाव आ चुके थे, जैसे मुझे अपने सीन के लिए चाहिए थे।

तनाव का सीन खत्म हुआ तो एंट्री होनी थी गौरी यानी मोनालिसा की। मोनालिसा की ऐक्टिंग तो वैसे ही परफेक्ट होती है। उसे इस सीन में पहले भोले का हौसला बंधाना था और भोले के फिर भी ना गा पाने पर रोते हुए हॉल से बाहर भाग जाना था। महज दो तीन रिहर्सल में ही सारे शॉट्स ओके हो गए हालांकि इस सीन को भी मैंने छह शॉट्स में बांटा था। मोनालिसा ने इन शॉट्स में भी कमाल की ऐक्टिंग की है। अगले दिन मनोज तिवारी का पैकअप था, मैंने मनोज से चार दिसंबर से 15 दिसंबर तक का ही समय लिया था और आज तेरह दिसंबर ही थी। अगले दिन सुबह सुबह हमने मनोज के कुछ सीन्स उस गाने की खातिर लिए जिसमें रंभा स्टेज शो के दौरान भोले को रिझाने की कोशिश करती है। गाना हम पहले ही शूट कर चुके थे, बस अगले दिन सुबह सुबह हमने मनोज तिवारी, गोपाल के सिंह और अजय आज़ाद को बिठाकर तीनों के रीएक्शनस शूट किए और हो गया हमारा लखनऊ से रवानगी का वक्त। तय शेड्यूल से एक दिन ही हमारा लखनऊ शेड्यूल पूरा हो गया। अगले अंक में हम लौटेंगे मुंबई और जानेंगे कि फिल्म भोले शंकर के लिए मिथुन चक्रवर्ती के पहले दिन की शूटिंग से पहले हुई कितनी भागदौड़? आप पढ़ते रहिए – कैसे बनी भोले शंकर?

और हां, चलते चलते आज की ताज़ा खबर। आजीवन ब्रह्मचारी रहने की ठाने बैठे फिल्म भोले शंकर के असिस्टेंट डायरेक्टर अज़य आज़ाद पर गोरखपुर की एक मेनका का जादू चल गया है। कल रात वो सात फेरे लेकर गृहस्थी की गाड़ी के हकैया बन गए हैं। अजय आज़ाद को भोले शंकर की पूरी टीम की तरफ से हार्दिक बधाई।

कहा सुना माफ़,
पंकज शुक्ल
निर्देशक- भोले शंकर