
मुंबई
11 मई 2008
इतवार की सुबह सबेरे छह बजे उठना हो, तो ऐसा लगता है कि मानो काला पानी की सज़ा भुगतनी पड़ रही है। लेकिन पिछले करीब नौ महीनों से अगर खादिम मोहल्ला की गलियों में आबपाशी नहीं कर पाया, तो इसकी वजह रही एक ऐसा जुनून, जिसमें इंसान सब कुछ भुला देता है। ये जुनून है बड़े परदे पर एक कहानी को उतारने का, और आज अगर मैं मोहल्ले की गलियों में लौटा हूं तो इसलिए नहीं कि फिल्म का तकरीबन सारा काम आज सिरे तक पहुंच गया और निर्माता ने फिल्म को फाइनल मिक्सिंग के बाद बड़े परदे पर देखकर बेइंतेहा खुशी ज़ाहिर की, बल्कि उस फोन की वजह से जो सुबह सुबह बेटे ने दिल्ली से किया। बोला- मां को हैप्पी मदर्स डे बोल दीजिए। अब उसके लिए उसकी मां सबकी मां है, लेकिन ये फोन आते ही मुझे याद आई अपनी मां, जो आज भी रोज़ाना चार घंटे बिजली वाले एक गांव में शाम होते ही छत पर बैठकर पेड़ों की फुनगियों को निहारती है, कि पत्ता हिलेगा तो तन को हवा भी लगेगी।
तीन किलोमीटर रोज़ाना बस्ता लादकर पैदल जब हम छठी में पढ़ने जाते थे, तब भी जून की तपती दोपहर मां ऐसे ही बिताती थी, और आज भी उसकी गर्मियां ऐसे ही बीतती हैं। मांएं सुखी क्यों नहीं रह पातीं ? चिल्ला जाड़े की कड़कड़ाती ठंड में सुबह सुबह बर्फ जैसे ठंडे गोबर को उतने ही ठंडे पानी में मिलाकर अहाता लीपते मां को बचपन में कई बार देखा है। सुबह शाम कुएं से बीस बीस बाल्टी पानी भरने के बाद हाथों में जो ढड्ठे पड़ते थे, उन पर मां ने कई बार मरहम भी लगाया है। कोई पांच हज़ार फिट में फैले पूरे घर को लीपने के बाद पंद्रह लोगों का दो टाइम खाना, दो टाइम नाश्ता बनाने वाली मां ने कुछ तो हसरतें हम लोगों की निकरें धोते हुए पाली होंगी। पर, आज तक वो कभी बेटों ने जानी नहीं। मांएं खुलकर बोल क्यों नहीं पातीं?
हम गांव में ही थे, जब मां बुआ के घर कानपुर गईं थीं और वहां से संतोषी मां की फोटो और शुक्रवार व्रत कथा की किताब लेकर लौटी थीं। फिल्म जय संतोषी मां रिलीज़ होने के बाद पूरे देश में मुझ जैसे तमाम बच्चों से शुक्रवार की इमली छिन गई थी। कभी गलती से स्कूल में शुक्रवार को चाट भी खा ली, तो लगता था कि कुछ ना कुछ अनिष्ट होकर रहेगा। संतोषी माताएं हमारी मांओं जैसी क्यों नहीं होतीं? शायद वो शुक्रवार का दिन ही रहा होगा, जब आले मे रखा मट्ठा नीचे रखी बर्तनों की पेटी पर गिर गया था। मां ने उस दिन पीतल और कांसे के बर्तन बड़े जतन से मांज मांज कर चमकाए थे, और शाम होती ही सारे बर्तन कसैले हो गए। मां की आंखों की किसी कोर में उस दिन आंसू आ गए थे। मांएं इतनी संवेदनशील क्यों होती हैं?
और, मां का वो चेहरा तो सामने आते ही जैसे पूरा संसार जम सा जाता है, जब मां ने अपने सबसे छोटे बेटे के लिए किडनी देने का फैसला किया था। लखनऊ एम्स के गलियारे में जिस तरह हम दोनों भाई, बहन, और पापा मां के सामने बैठे थे, ऐसा लग रहा था, मानो मां को कसाई के हाथों सौंपने जा रहे हैं। तीसरा भाई जिसने अभी ये भी नहीं समझा कि जवानी क्या होती है, शायद पढ़ाई के बोझ के मारे या किसी शुक्रवार को इमली खाने की वजह से आईसीयू में मौत से बख्शीश मांग रहा था। मांएं कसौटी पर बार बार क्यों कसी जाती हैं? मां की कुर्बानी काम ना आ सकी। छोटा भाई घर तो लौटा, लेकिन इस बार भी उसे भगवान के यहां जाने की जल्दी थी। कमबख्त, मेरे मुरादाबाद से लौटने का इंतज़ार भी न कर सका। बस स्ट्रेचर पर बेहोशी की हालत में मिला। मेरा हाथ लगते ही बोला- भाईजी स्कोर क्या हुआ है? क्रिकेट बहुत देखता था वो, उसे क्या पता कि भगवान उसकी गिल्ली कब की उड़ा चुके हैं। मेरा बेटा भी क्रिकेट बहुत खेलता है। छोटे भाई को भगवान ने जिस तारीख को अपने पास बुलाया, उसके ठीक नौ महीने बाद- ना एक दिन आगे ना एक दिन पीछे- इन महाशय ने अपनी दादी की गोद गंदी की। और, अब इतने बड़े हो गए हैं कि फोन करके मदर्स डे याद दिलाते हैं? हम जैसे गांव वालों को माएं मदर्स डे पर याद क्यों नहीं आतीं?
और चलते चलते वो गाना जो मां के लिए हमने बचपन में सीखा था...
तुझको नहीं देखा हमने कभी
पर इसकी ज़रूरत क्या होगी..
ऐ मां, तेरी सूरत से अलग
भगवान की सूरत क्या होगी..
कहा सुना माफ़...
पंकज शुक्ल
Sunday, May 11, 2008
मां
Wednesday, November 21, 2007
राजा हसन: ख़ालिस देसी आवाज़
राजा हसन ने मेरी फिल्म भोले शंकर के लिए जो गाना गाया है। उस पर ब्लॉगिंग भी शुरू हो चुकी है। लिंक यहां पेस्ट कर रहा हूं। फिल्ममेकिंग को अंदर से देखने की जितनी कोशिश अब तक की है, उसने कई सबक़ सिखाए हैं। कैमरे के सामने जगमगाने वाले चेहरों की काली करतूतें भी एक एक कर सामने आ रही हैं। इन की परत दर परत खोलने का समय जल्द ही आएगा। फिलहाल अपने भीतर के पत्रकार को लंबी छुट्टी पर भेजा हुआ है। जब एक फिल्मकार सोएगा, तो एक पत्रकार जागेगा। तब तक के लिए इस लिंक का आनंद लीजिए। राजा हसन के चाहने वालों को उनका मेरी फिल्म में गाया गाना निराश नहीं करेगा, ये मेरा वादा भी है और भरोसा भी। जय भोले शंकर।
http://www.rajahasan.com/?p=298
Tuesday, October 16, 2007
लागा सिनेमा में दाग

पंकज शुक्ल
पिछले हफ्ते जो दो फिल्में रिलीज़ हुईं, उनमें से एक ‘लागा चुनरी में दाग’ का शुरुआती कारोबार देखकर बड़े बड़े फिल्म पंडितों के होश फाख़्ता हैं। अपनी दिलरुबा यानी ऐश्वर्या राय से शुभ परिणय के बाद छोटे बच्चन की कतार से ये तीसरी फ्लॉप फिल्म हो सकती है। इनमें से ‘राम गोपाल वर्मा की आग’ में वो स्पेशल एपीयरेंस में थे जबकि ‘झूम बराबर झूम’ और ‘लागा चुनरी में दाग’ यशराज फिल्म्स की महात्वाकांक्षी फिल्मों में से रहीं। पहले दिन के शुरुआती शोज में महज 15 से 20 फीसदी का कलेक्शन करने वाली फिल्म ‘लागा चुनरी के दाग’ का कारोबार बाद में कुछ सुधरा तो है लेकिन फिल्म की ओपनिंग इतनी ठंडी रहेगी ये किसी ने सोचा तक नहीं था। नाकामी ये किसी फिल्म या किसी सितारे की नहीं, बल्कि एक सोच की है। सोच, जिसे महान निर्देशक बी आर चोपड़ा के छोटे भाई यश चोपड़ा की कंपनी यशराज फिल्म्स पानी दे रही है। ये सोच है सिर्फ बड़े सितारों को लेकर सुनी सुनाई सी कहानियों पर फिल्में बनाने की। ऐसा नहीं है कि यशराज फिल्म्स ने सिर्फ मसाला फिल्में ही इधर बनाईं, इन्होंने ‘काबुल एक्सप्रेस’ जैसी लीक से इतर फिल्म पर भी दांव लगाया लेकिन ऐसा दांव एक बार चूक जाने के बाद छोड़ देने के लिए नहीं होता।
सिनेमा में यशराज फिल्म्स के योगदान को कोई नकार नहीं सकता। लेकिन, इधर यशराज फिल्म्स के नए सिनेमा में योगदान को लेकर एक बहस शुरू हुई है। और ये बहस शुरू की है बाग़ी तेवरों वाले लेखक निर्देशक अनुराग कश्यप ने। अनुराग से पहली मुलाक़ात ‘शूल’ के समय मनोज बाजपेयी के साथ हुई थी और इस बात को देखकर हैरानी होती है कि इतनी ठोकरें खाने और इतनी परेशानी झेलने के बाद भी इस शख्स के भीतर की आग अभी चुकी नहीं है। ये शख्स फीनिक्स की तरह हर बार राख से उठ खड़ा होता है, अपने डैने फैलाए, एक नई उड़ान के लिए। बात यशराज फिल्म्स की इन दिनों चल रही है उनकी नई फिल्म ‘लागा चुनरी में दाग’ को लेकर। गुणी निर्देशक प्रदीप सरकार को यशराज फिल्म्स में काम करने का मोह ही ऐसी फिल्म बनवा सकता है, इस फिल्म को बनाने में कितनी उनकी चली और कितनी यशराज फिल्म्स के कर्णधारों की, कहा नहीं जा सकता।
यशराज फिल्म्स हिंदी सिनेमा का ऐसा बैनर है, जिसे हर दूसरा निर्देशक गाली देता है। डेढ़ दशक से ज़्यादा की फिल्म पत्रकारिता में मुझे ऐसा बिरला ही मिला, जिसने यशराज फिल्म्स की बड़े सितारों पर पकड़ को लेकर आहें ना भरी हों। लेकिन ये ही इकलौता बैनर भी है जिसने हिंदी सिनेमा का चेहरा बदलने का बीड़ा सबसे पहले उठाया। लेकिन क्या ये चेहरा महज ‘चक दे इंडिया’ जैसी इक्का दुक्का फिल्में बनाकर बदल सकता है। और वो भी तब जब इस फिल्म पर खुद यशराज फिल्म्स को ही ज़्यादा एतबार नहीं था। कम लोगों को ही ये बात पता होगी, कि अपनी फिल्में थिएटर में अपनी शर्तों पर रिलीज़ करने वाले यशराज फिल्म्स ने इस फिल्म को लेकर कोई चूं चां नहीं की। फिल्म कुछ अपनी थीम के चलते और कुछ शाहरुख खान के चलते करोड़ों का कारोबार कर चुकी है, लेकिन इस फिल्म ने एक बार फिर बता दिया है कि यशराज फिल्म्स की बाज़ार की नब्ज़ पर पकड़ ढीली हो रही है। यशराज फिल्म्स की कारोबारी समझ की कलई पहली बार ‘खोसला का घोसला’ से खुली थी, जब अपने ही क्रिएटिव हेड की कंपनी में आने से पहली बनाई गई फिल्म में इस कंपनी को दम नज़र नहीं आया।
यशराज फिल्म्स को हिंदी सिनेमा में काम करने वाले चंद लोग ऐसा बरगद मानते हैं जो अपने आस पास किसी नए पौधे को उगने नहीं देता। हर बड़े कलाकार को ये बैनर अपनी मुट्ठी में रखना चाहता है, वो चाहे अमिताभ बच्चन हों या फिर शाहरुख खान। सलमान खान और जॉन अब्राहम जैसे कुछ कलाकार हैं जो अपना अलग आशियाना बनाने की कूवत रखते हैं, लेकिन इनके इस बैनर में काम ना करने की अपनी वजहें हैं और इनमें से सबसे बड़ी है इन सितारों का मर्दानापन। ये जो भी बात सोचते हैं, उसे खुलकर कहते हैं। ‘लागा चुनरी में दाग’ बनते वक़्त तमाम बातें अभिषेक बच्चन के जेहन में भी आई होंगी, लेकिन वो कहने से कतराते रहे। फिल्म की हीरोइन अगर रानी मुखर्जी हों और फिल्म यशराज फिल्म्स की हो तो भला दूसरे के लिए कुछ कर दिखाने का मौका ही कहां बचता है। लेकिन जो बात लोगों को बार बार खाए जा रही है वो ये कि आखिर कब तक ये बैनर ऐसी फिल्में बनाता रहेगा।
बहस सिर्फ कथानक की ही नहीं, बहस इस बात की भी है कि आखिर सिनेमा को नए सितारे देने की ज़िम्मेदारी किसकी है। ऋतिक रोशन के बाद से हिंदी सिनेमा एक नए सितारे को तरस रहा है। और, गौरतलब बात ये है कि कपूर खानदान के नए चेहरे रनबीर को रुपहले परदे पर लाने का सेहरा बंध रहा है एक विदेशी कंपनी सोनी पिक्चर्स के सिर। राकेश रोशन अपने बेटे को ही प्रमोट करते रहेंगे। यशराज फिल्म्स को बच्चन परिवार और शाहरुख खान से आगे सोचने की फुर्सत नहीं है। रामगोपाल वर्मा भी घूम फिरकर इसी दायरे में आ जाते हैं। रवि चोपड़ा भी अपने ताऊ के रास्ते पर ही हैं। विधु विनोद चोपड़ा की दौड़ भी सीमित है तो फिर आगे आएगा कौन? अनिल कपूर की इस बात के लिए ताऱीफ़ करनी चाहिए कि इसकी शुरुआत उन्होंने ‘गांधी-माई फादर’ बनाकर की, लेकिन अगर ऐसी फिल्म को भी ऑस्कर में भेजने लायक ना माना जाए तो फिर हिंदी सिनेमा के दामन को दागदार होने से बचाएगा कौन?
Saturday, October 13, 2007
कहानियों की भूलभुलैया
-पंकज शुक्ल
निर्देशक प्रियदर्शन की नई फिल्म भूलभुलैया देखते समय एक ख्याल बार बार मन में आता है और वो ये कि हिंदी फिल्मों के दर्शक अब वाकई नए के लिए तैयार हैं। पेड़ों के इर्द गिर्द नायक को नायिकाओं के साथ कमर मटकाते देखने में अब उन्हें ज़्यादा दिलचस्पी नहीं रही। शाहरुख खान की फिल्म चक दे इंडिया को भले इस नए चलन की शुरुआत का श्रेय दिया जाता हो लेकिन निर्देशक फज़ल ने इसकी शुरुआत मलयालम सिनेमा में कोई 14 साल पहले मनिचित्राताझु बनाकर कर दी थी। ये वही फिल्म जिस पर निर्देशक पी वासु ने पहले कन्नड़ में आप्तामित्रा नाम की फिल्म बनाई और फिर सदी के महानतम नायकों में से एक रजनीकांत को लेकर तेलुगू में सुपरहिट फिल्म चंद्रमुखी बनाई। प्रियदर्शन ने इसी कहानी को हिंदी में चित्रलेखा के नाम से पेश करने का ऐलान किया था और यही फिल्म अब भूलभुलैया के नाम से दर्शकों के सामने है।
भूलभुलैया उन दर्शकों के लिए ज़्यादा बड़ी भूलभुलैया है, जो प्रियदर्शन को बस कॉमेडी फिल्मों की वजह से जानते हैं। जिन लोगों ने प्रियदर्शन की हिंदी में शुरुआती फिल्में मसलन मुस्कुराहट, गर्दिश, विरासत, काला पानी और डोली सजाके रखना देखी हैं, उन्हें पता है कि प्रियदर्शन को जज्बात की रेत पर रिश्तों की रस्साकशी कराने में महारत हासिल है। कॉमेडी के करतब तो प्रियन ने काला पानी और डोली सजा के रखना की नाकामी के बाद दिखाने शुरू किए।
भूलभुलैया का कहानी एक ऐसे जोड़े की कहानी है, जो आधुनिक सोच विचारों का है और जिसे इन बातों के बावजूद अपने
पुश्तैनी महल में रहने से परहेज नहीं, कि ये महल अतृप्त आत्माओं का डेरा है। जो दर्शन भूल भुलैया को एक कॉमेडी फिल्म समझकर देखने पहुंचे, उनके लिए फिल्म की कहानी एक झटका है। लेकिन हंसाने के मसाले प्रियन ने एक ऐसी फिल्म में ढूंढ लिए हैं, जो एक प्रेम कहानी की तरह शुरू होकर, हॉरर, सस्पेंस और थ्रिलर तक का सफर बखूबी सफर करती है। इस जोड़े यानी सिद्धार्थ (शाइनी आहूजा) और अवनी (विद्या बालन) के सामने जब अजीबोगरीब घटनाएं होने लगती हैं, तो सिद्धार्थ अपने नजदीकी दोस्त आदित्य (अक्षय कुमार) को अमेरिका से महल में बुलवा लेता है। आदित्य पेशे से मनोचिकित्सक है और उसका काम ये पता लगाना है कि आखिर इस महल में भूतों के किस्से शुरू कैसे हुए? आदित्य को अपने मिशन में गुरुजी (विक्रम गोखले), राधा (अमिषा पटेल) आदि का अच्छा साथ मिलता है।
प्रियदर्शन की ये फिल्म इंटरवल के बाद भले थोड़ा लंबी लगती हो, लेकिन दर्शकों का मनोरंजन करने में ये कामयाब रहती है। पहले दिन सिनेमाहॉल पर लगी हाउसफुल की तख्ती इस बात की ताकीद करती है कि प्रयोगात्मक सिनेमा के लिए हिंदी सिनेमा के दर्शक अब तैयार हो चुके हैं। प्रियन की इस फिल्म में अगर किसी ने वाकई काबिले तारीफ काम किया है तो वो है विद्या बालन। पहले नई नवेली दुल्हन और फिर महल की दंतकथाओं के किरदार मंजुलिका के चोले में घुसकर विद्या बालन ने जो काम किया है वैसा हाल के दिनों में हिंदी फिल्मों की किसी अभिनेत्री ने शायद ही किया हो। अक्षय कुमार तो खैर इस तरह के किरदारों में महारत ही रखते हैं, सहारा असरानी, राजपाल यादव, मनोज जोशी और रसिका ने भी अच्छा दिया है। तकनीकी रूप से फिल्म दस में दस अंक पाती है। संगीत पहले से ही एफएम चैनलों पर धूम मचा रहा है। सप्ताहांत के लिए मनोरंजन के लिहाल से फिल्म बुरी नहीं है।
Monday, October 1, 2007
माफ़ीनामा !!!
भला हो, गूगल वालों का जिन्होंने अपने ही ब्लॉग पर वापस पहुंचने का नया रास्ता बना दिया, वरना हम तो वापस इस ब्लॉग पर आने की उम्मीद ही छोड़ बैठे थे। कहां तो हम कम से कम हर हफ्ते कुछ ना कुछ लिखने का इरादा ठाने बैठे थे और कहां पूरा महीना हो गया, यहां कुछ भी ना लिख पाए।
ख़ैर अब पासवर्ड भूलने की गलती ना होने पाए, इसके लिए इंतजाम कर लिया है, उम्मीद करता हूं कि ये इंतजाम पुख़्ता रहेगा। तो भइया शुरुआत करते हैं ज़िंदगी की नई भूल भुलैया से, जिसका नाम है सिनेमा। वैसे नई तो नहीं कहेंगे क्योंकि जोधपुर में दूसरी क्लास में गुलज़ार साहब की 'परिचय' ना दिखाए जाने पर घर में किया गया बाल हठ हमें अब भी याद है। फिर राज कपूर की 'बॉबी' , देवर फिल्म्स की 'हाथी मेरे साथी' और कुछ और फिल्में उस दौरान देखीं, जब शायद ठीक से निकर का नाड़ा बांधना भी नहीं सीख पाए थे।
फिर शहर से हम गांव आ गए और कोई चार साल के इंटरवल के बाद देखने को मिली 'शोले'। रिपीट रन में भी हाउस फुल। घटी दरों पर फिल्में दिखाने का चलन अब बड़े शहरों में नहीं रहा वरना इससे बढ़िया बिज़नेस फंडा दूसरा कोई नहीं। वापस शहर आए तो इतनी फिल्में देखीं कि आगे-पीछे सबका हिसाब बराबर हो गया। ग्रेजुएशन में तो बस हर दिन का यही एजेंडा रहा कि अखबार के कॉलम में छपने वाली फिल्मों के नामों में से कोई अनदेखी नहीं होनी चाहिए। यानि कि किताबी पढ़ाई कम और सिनेमा की कढ़ाई ज़्यादा होती रही। माफी घर वालों से भी मांगने का दिल करता है कि उनकी मेहनत की कमाई हमने पढ़ाई में कम और सिनेमा देखने में ज़्यादा खर्च की।
अब इसकी पाई पाई चुकाने का वक़्त आ चुका है। फीचर फिल्म बनाने का जो कीड़ा हम सालों से दबाए बैठे थे, उसने कूकून से बाहर आने का रास्ता पा लिया है। हौसला मिला तो दादा मिथुन चक्रवर्ती की हां, जो बस एक बार मनुहार करने पर रिश्तों को निभाने की ख़ातिर अपने करियर की पहली भोजपुरी फिल्म में काम करने के लिए हां कहे बिना नहीं रह सके। दादा लाजवाब हैं। घर पर बुलाते हैं तो बिल्कुल अपनों की तरह मिलते हैं। ना किसी सुपर स्टार सा गुरूर और ना ही किसी फिल्मी सितारे जैसा नख़रा। भगवान उनको और उनके घरवालों को बरकत बख्शे।
भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार मनोज तिवारी ने भी अपनापन दिखाया और वोट फॉर खदेरन (मनोज तिवारी का किसी नेशनल न्यूज़ चैनल पर पहला शो बिहार चुनाव के दौरान हमारे ही खुराफ़ाती दिमाग की उपज रही) को याद करते हुए फिल्म के लिए हां कर दी। लेकिन सबसे मुश्किल काम अब तक का रहा फिल्म के लिए एक अदद हीरोइन तलाश करना। कितनी हसीनाओं ने अपने जलवे दिखाए, कुछ ने तो और भी ना जाने क्या क्या दिखाने का इशारा भी किया। लेकिन हमें चाहिए थी एक ऐसी लड़की, जो हुस्न की नुमाइश की बजाय अदाकारी का दम भरती हो। मुंबई जैसे शहर में हीरोइन्स की कोई कमी नहीं हैं, लेकिन ये मूक सिनेमा काल में होतीं तो शायद बेहतर होता। अदाकारी से किसी को कोई लेना देना नहीं। सब आएंगी, अपनी चंद बिंदास सी तस्वीरें लेकर। और भोजपुरी तो दूर हिंदी में भी एक संवाद बोलना हो तो पहले दो गिलास पानी पिएंगी।
ख़ैर, नाशिक जैसे छोटे शहर की एक लड़की ने हमारे हौसले पर पानी फिरने से बचाया। सुभाष घई जैसे पारखी की फिल्म किसना में एक छोटा रोल कर चुकी वृषाली भांबेरे सिनेमा के आसमान पर पहली कुंलाचे भर रही है। वृषाली की पहली भोजपुरी फिल्म श्रीमान ड्राइवर बाबू रिलीज़ के लिए तैयार है। मनोज तिवारी (अपनी फिल्म के भोले) की गौरी वो ही बनने जा रही है। वृषाली मुंबइया नस्ल की नहीं है। वो अपने हुनर के बूते कुछ करना चाहती है। पिता मराठी के लेखक रहे हैं।
शुरुआती टीम बन चुकी है। यशराज फिल्म्स के दो और महारथी सिनेमैटोग्राफर राजू केजी और एसोसिएट डायरेक्टर मनोज सती भी कंधे से कंधा मिलाने को तैयार हैं। के सी बोकाडिया के गुरबत के दिनों के साथी रहे मुकेश शर्मा भी साथ हैं। गुणी संगीतकार धनंजय मिश्रा ने अपना बाजा कस लिया है, पसीना पसीना हैं वो कि हमारे जैसा कोई पागल भोजपुरी में भी संगीत को लेकर इतनी मेहनत उनसे करा सकता है, लेकिन फिल्म के गीतों का जो शुरुआती ख़ाका बना है, वो मन के तार हिला देने वाला है। बाकी सब भोले शंकर के हाथों में हैं...।
जारी...
Thursday, August 30, 2007
...हुनर दिखाया तो दस्ते हुनर भी जाएगा (दुबई मुशायरा- 3)
आज की शाम मंज़र भोपाली साहब के नाम!
मंज़र भोपाली
16.08.2007 - दुबई
वक्त के तकाजों पर ग़र हम जिए होते
क्यूं हमारे होठों पर मर्सिए होते
आपकी जगह होते हम जो बागबां अब तक
हमने सारे फूलों में रंग भर दिए होते
इज़्ज़तों से से बढ़कर हमको जान प्यारी है
वर्ना हमने जिल्लत के घूंट क्यूं पिए होते
सितमगरों का ये फरमान, ये घर भी जाएगा
ग़र मैं झूठ ना बोला, तो ये सिर भी जाएगा
बनाइए ना किसी के लिए भी ताजमहल
हुनर दिखाया तो दस्ते हुनर भी जाएगा
ये शहर वो है वफ़ाओं को मानता ही नहीं
यहां तो रायगा ख़ून ए ज़िगर भी जाएगा
ये मांएं चलती हैं बच्चों के पाओं से जैसे
उधऱ ही जाएंगी, बच्चा जिधर भी जाएगा
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उस घर के किसी काम में बरक़त नहीं होती
जिस घर में भी मां बाप की इज्ज़त नहीं होती
हम मारे गए तेरी मोहब्बत के भरोसे
दुश्मन कोई होता तो ये हालत नहीं होती
इस क़ातिले आलम से ना रख अमन की उम्मीद
जल्लाद की आंखों में मुरव्वत नहीं होती
लगता है मुझे यूं तुझे छूना भी गुनाह है
जबतक तेरी आंखों की इजाज़त नहीं होती
कोई भी रुत हो सफ़र को निकलना पड़ता है
शिकम के वास्ते कांटों पर चलना पड़ता है
ज़रा सा वक़्त गुजर जाए गफ़लतों में अगर
तो अच्छे अच्छों को फिर हाथ मलना पड़ता है
ये ज़िंदगी की हक़ीक़त नसीब है सबका
कि शाम होते ही सूरज को ढलना पड़ता है
जारी...
दीपिकाएं बुझती नहीं हैं.....
शायद ज़ी न्यूज़ की तत्कालीन संपादक अलका सक्सेना जी ने वो कॉल मुझे मॉरीशस से की थी, बस दो लाइनें और एक सवाल। “हम लोग यहां मार्केटिंग और सेल्स की टीम के साथ हैं। तुमने आज तक के मूवी मसाला से टक्कर के लिए जो बोले तो बॉलीवुड का कॉन्सेप्ट तैयार किया, वो अच्छा है। कितने दिन की नोटिस पर काम शुरू हो सकता है?” अलका जी जानती थी कि मेरा जवाब क्या होगा, लेकिन इसी भरोसे के साथ उनका बड़प्पन भी छुपा था और वो कि हर फैसला अपने सहयोगियों को भरोसे में लेने के बाद लेना। मैंने कहा कि वर्किंग हैंड्स मिलने के दो दिन बाद।
वो लौटीं और अगले दिन मेरी डेस्क पर एक बेहद खूबसूरत लेकिन घरेलू सी लगने वाली लड़की पहुंची। नाम-दीपिका तिवारी। परिचय- ज़ी सिने स्टार्स की खोज की फाइनलिस्ट। ख्वाहिश- मुट्ठी बढ़ाकर जल्द से जल्द आसमान समेट लेना। बोले तो बॉलीवुड की वो सबसे कामयाब एंकर बनी। उसके फैन्स भी खूब थे। खाड़ी देशों से अक्सर उसकी तारीफ के ख़त आते। मेहनत भी उसने खूब की और काम सीखने की लगन ने उसे जल्द ही एक अच्छा रिपोर्टर और कॉपी राइटर बना दिया।
दो साल पहले का अपना जन्मदिन मुझे अब भी याद है जब उसने मुझसे बोले तो बॉलीवुड की पूरी टीम को फिल्म दिखाने को कहा। मैंने दिखाई भी और अगले दिन वो पूरी टीम से चंदा करके मेरे लिए एक सुंदर सा पुलोवर बतौर बर्थडे गिफ्ट खरीद लाई। फिर पता नहीं उसे क्या हुआ, काम में उसका मन नहीं लगता। मैंने एक दिन डांटा तो एचआर तक शिकायत कर आई। फिर लौटकर माफी भी मांगी। शायद जो ख्वाब उसने देखे थे, उनमें रंग नहीं उतर पा रहे थे। एक दिन आकर बताया कि उसे किसी से प्यार हो गया है। और वो दोनों शादी करने वाले हैं। लड़के का नाम भी बताया। और फिर दो दिन बाद ही रात करीब 11 बजे रोते हुए फोन किया कि सर मुझे ले जाइए। उसका अपने ब्वॉय फ्रेंड से झगड़ा हो गया था और वो बारिश में नोएडा की किसी सड़क पर अकेली खड़ी थी। मैंने समझाया कि प्यार में फैसले प्यार से ही लिए जाते हैं, गुस्से में नहीं। किसी तरह दोनों में समझौता हुआ।
...लेकिन इस बार दीपिका का फोन नहीं आया। बस ख़बर आई कि वो दुनियादारी से हार चुकी है।
दीपिका, दूसरी लड़कियों के लिए एक मिसाल बनकर उभरी थी। लेकिन इससे पहले कि उसकी रौशनी फैल पाती, उसे ग्रहण लग गया। ग्रहण जल्द से जल्द ऐश की ज़िंदगी जीने का। इसीलिए उसने फिर से मुंबई की राह पकड़ी, फिर वापस दिल्ली लौटी। लेकिन इस बार उसके जीने का फलसफा बदला हुआ था। ज़िंदगी उसके लिए एक स्टेशन नहीं ट्रेन बन चुकी थी। वो हर फासला जल्द से जल्द पूरा कर लेना चाहती थी, बिना ये देखे कि आगे पटरियां हैं भी या नहीं। गाड़ी ने हिचकोले खाए, लेकिन वो नहीं संभली। वो अब ग्लैमर की दुनिया से दूर रहकर अपनी खुद की दुनिया बसाने को बेताब थी। वो हार्डकोर न्यूज़ एंकर बनना चाहती थी, लेकिन ग्लैमर का ठप्पा उससे उतरा नहीं। वो बरखा दत्त बनना चाहती थी, लेकिन दुनिया ने उसे दीपिका तिवारी से ऊपर उठने नहीं दिया।
दीपिका हारी नहीं, उसे हरा दिया गया। दीपिकाएं बुझती नहीं हैं, या तो तेज़ हवा का कोई झोंका उन्हें विदा कर देता है, या फिर तेल साथ छोड़ देता है। और पीछे अंधेरे में रह जाता है तो बस एक सवाल? काश, दीपिका ने फिर फोन किया होता? काश, कोई तो होता ऐसा जिससे वो अपना हर दुख कह पाती? तब शायद दीपिका की रौशनी आज भी कोई कोना रौशन किए होती।
दीपिका तुम जहां भी रहो, जगमगाती रहो...