शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

तेरी खुशबुएं...

पंशु। 25092014





ये जो सूतों के 

धागों में बंधी हैं,

तेरी खुशबुएं 

मेरे ख्वाबों में बसी हैं।

इन लिहाफों में,

इन किताबों में,

इन हवाओं में,

इन फिज़ाओं में,

जागता हूं, सोचता हूं,

फिर सहमकर सिमटता हूं,

तेरी खुशबुएं,

मेरी सांसों में बसी हैं।

तेरी खुशबुएं 

मेरे ख्वाबों में बसी हैं।

ये जो सूतों के 

धागों में बंधी हैं,

तेरी खुशबुएं 

मेरे ख्वाबों में बसी हैं।

जब सिमट कर तू

आए पनाहों में,

गेसू तेरे यूं

बिखरे हैं शानों पे,

सूंघता हूं, ढ़ूंढता हूं,

फिर पलट कर खोजता हूं,

तेरी खुशबुएं 

मेरी रग रग में बसी हैं।

तेरी खुशबुएं 

मेरे ख्वाबों में बसी हैं।

ये जो सूतों के 

धागों में बंधी हैं,

तेरी खुशबुएं 

मेरे ख्वाबों में बसी हैं।


Text © Pankaj Shukla । 2014
(Pic not used for any commercial purpose)