रविवार, 17 जून 2012

कामयाब होने से ज्यादा मुश्किल बेहतर इंसान बनना- मिथुन चक्रवर्ती



फुटपाथ से उठकर सतरंगी आसमान पर छा जाने वाले मिथुन चक्रवर्ती हिंदी सिनेमा के आखिरी सुपर सितारे हैं। दो वक्त की रोटी कमाने के लिए कभी टैक्सियों पर स्टिकर चिपकाने वाले मिथुन बाद में देश में सबसे ज्यादा व्यक्तिगत आयकर चुनाने वाले रईस भी बने। अपने प्रशंसकों के बीच प्रभुजी के नाम से पूजे जाने वाले मिथुन चक्रवर्ती बता रहे हैं कामयाबी के कुछ अनोखे मंत्र।

© पंकज शुक्ल

दादा, वैसे तो आपके बारे में जितना जानने की कोशिश की जाए कम है, और आप हैं कि अपनी संघर्ष यात्रा के बारे में ज्यादा कुछ लोगों को बताते भी नहीं हैं, ऐसा क्यों?
-शायद मेरी आदत नहीं रही शुरू से अपने बारे में ज्यादा बात करने की। आप ने तो मुझे बरसों से देखा है। मुझे अपनी मार्केटिंग करने का शौक कभी नहीं रहा। मैं कर्म करने में विश्वास करता हूं। ईश्वर में आस्था रखता हूं और कोशिश में रहता हूं कि ये जीवन जिन ऋणों को चुकाने के लिए मिला है, वे सारे समय रहते पूरे कर सकूं। जीवन एक ऐसा चक्र है जिसमें उतार चढ़ाव, यश अपयश, ऊंच नीच सब लगी रहती है। इससे परेशान होने वाला ही जीवन को जी नहीं पाता। मेरा फलसफा रहा है कि दूसरों के बीच खुशियां बांटते रहो, आपके बीच खुशियां खुद चलकर आएंगी। मेरी खुशियां भी हमेशा खुशियां बांटने से ही बढ़ीं हैं।

आपने एक बार कहा था कि आप उस इंसान की आखिरी आशा हो जिसकी कोई आशा पूरी न हुई हो। आज भी आपके यहां निर्माताओं की कतार लगी रहती है, पर अब तो आप उतनी फिल्में नहीं करते?
-ये दिलचस्प है कि लोग मुझे अब भी मुख्य भूमिकाओं के लिए साइन करने आते हैं। क्षेत्रीय भाषाओं के निर्देशक अब भी मुझे बतौर हीरो रिटायर नहीं होने देना चाहते। हिंदी फिल्मों में मेरे बाद दो तीन पीढ़ियां आ चुकी हैं तो वहां मैं अब अपने हिसाब से फिल्में करता हूं। दूसरा मेरा क्या मानना है कि किसी चीज को ज्यादा घिसने से उसकी चमक चली जाती है। मैं जीवन के आखिरी दिन तक काम करना चाहता हूं, इसके लिए जरूरी है कि मैं उतना ही काम करूं जितना मेरे लिए सही है। मैंने हर तरह का समय देख लिया, अब तो बस मैं सिनेमा का होकर उसका लुत्फ लेना चाहता हूं।

फिल्म मृगया में अपनी पहली ही फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार जीतने के बाद पहला इंटरव्यू देने से पहले आपने एक पत्रकार से मांगकर बिरयानी खाई थी, अब आप सैकड़ों लोगों का पेट खुद भरते हैं, इसे समय चक्र मानते हैं या कुछ और?
-मेरा ये स्पष्ट मानना रहा है कि कर्म और भाग्य दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। भाग्य अक्सर आपसे वही कर्म करवाता है जिसकी नियति आपके लिए शायद पहले से तय है। लेकिन, कर्म से भाग्य भी बदले जाते हैं। पक्की लगन और अनुशासन हो तो लक्ष्य पा लेने में दिक्कत कम होती है। दूसरे मेरा ये मानना है कि समय के हिसाब से भी हमें अपने लक्ष्य तय करने चाहिए। हमारे लक्ष्य छोटे छोटे और अनवरत बनते रहने चाहिए। हमें अपनी मंजिल पहले कदम में उतनी ही बनानी चाहिए, जितनी हमारी नजरों के सामने है। पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में मुझे देखकर मृणाल बाबू ने मुझे मृगया दे दी थी, लेकिन जरूरी नहीं कि हर कोयले को ऐसा जौहरी जीवन में मिल ही जाए। समय बदला है, जौहरी भी अब बाजार के हिसाब से हीरे तलाशने लगे हैं तो जाहिर है ऐसे में गुदड़ी के लालों को मौका नहीं मिल पा रहा है। लेकिन, मैं आखिरी इंसान नहीं हूं जो फुटपाथ से उठकर यहां तक आया। लोगों की उम्मीदें बंधती रहेंगी और लोग कामयाबी भी पाते रहेंगे।

और, आपसे लगी ऐसी ही छोटी छोटी उम्मीदों ने ऐश्वर्या राय को अपनी पहली ही फिल्म में आपकी हीरोइन बनने से वंचित कर दिया?
-अरे शुक्लाजी, वो बहुत पुरानी कहानी हो चुकी। लेकिन, आपकी बात सही है। मोहनलाल वाला रोल लेकर मणिरत्नम पहले मेरे पास ही आए थे। पर मैं करता क्या मेरी एक दर्जन से ज्यादा फिल्में फ्लोर पर थीं और अगर मैं इस रोल के हिसाब से बाल कटा लेता तो बाकी सारे निर्माताओं की फिल्में आगे खिसक जातीं। मैं नहीं चाहता था कि मुझे कोई बड़ा मौका मिले तो मेरे सहारे अपना घर बार छोड़े बैठे फिल्म निर्माताओं को नुकसान हो। अपना भला करके दूसरों को भला करना तो बहुत आसान है। मजा तो तब है कि आपको पता है कि दूसरे के इस भले में आपका नुकसान हो रहा है, पर आप को उसमें भी आनंद आता है। जीवन में कामयाब होना ज्यादा मुश्किल नहीं है, मुश्किल है बेहतर इंसान बनना।

और, वो एक ही साल भगवान और शैतान के किरदारों के पुरस्कृत होने का किस्सा?
-अभिनेताओं को भी ये गजब की नियामत हासिल है। वो हर फिल्म में क्या क्या भेस धरकर पर लोगों के सामने आते हैं? लेकिन क्या कभी हम सोचते हैं कि ये कितनी बड़ी चीज हमें ईश्वर ने दी है। स्वामी विवेकानंद की शूटिंग चल रही थी। लंच ब्रेक था और मैं एक पेड़ के नीचे बैठकर सिगरेट पीने लगा। कुछ महिलाएं वहां थोड़ी परे खड़े होकर सहमे सहमे मुझे देख रही थीं। फिर उनमें से दो तीन हिम्मत करके मेरे पास आईं। मैं फिल्म में रामकृष्ण परमहंस का किरदार कर रहा था। महिलाएं आईं और आते ही प्रणाम किया। फिर मेरी सिगरेट की तरफ इशारा किया। बोलीं, आप भगवान हैं। इसे मत पीजिए। मैं तो जैसे बैठे बैठे ही काठ का हो गया। इसके बाद पूरी फिल्म जब भी मैं गेटअप में रहा, मैंने सिगरेट को हाथ नहीं लगाया। इस फिल्म के लिए मुझे 1995 में अभिनय का एक और राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उसी साल फिल्म जल्लाद के लिए मुझे सर्वश्रेष्ठ खलनायक का पुरस्कार मिला। सलाम है ऐसे दर्शकों का जिन्होंने मुझे एक ही साथ भगवान के रूप में भी प्यार दिया और मैं खलनायक बना तो उसे भी सराहा।

हिंदी सिनेमा में हर बड़े सितारे ने अपने बेटे के लिए फिल्में बनाईं, आपने नहीं। ऐसा क्यों?
-मिमोह अपनी जगह बना रहा है हिंदी सिनेमा में। उसे पता होना चाहिए कि जिंदगी में जो कुछ मिलता है, वो बड़ी मेहनत और मुश्किल से मिलता है। मिमोह को मेहनत का मतलब समझ आ रहा है। अब वह जो भी बन रहा है उसमें उसका आत्मविश्वास शामिल है। रिमोह ने निर्देशन का कोर्स किया है विदेश से। वह कैमरे के पीछे अपना हुनर दिखाना चाहता है। उसकी एक डिप्लोमा फिल्म को कनाडा फिल्म फेस्टिवल में अवार्ड भी मिल चुका है। दोनों के सपोर्ट के लिए मैं हमेशा यहां हूं, लेकिन दोनों को हिंदी सिनेमा में जो भी मुकाम पाना है, वो अपनी मेहनत से ही पाना होगा।


संपर्क - pankajshuklaa@gmail.com