रविवार, 10 जून 2012

चॉकलेटी हीरो बनना पसंद नहीं-इमरान हाशमी

एक सुपर फ्लॉप फिल्म से अपना करियर शुरू करने वाले इमरान हाशमी की गिनती इन दिनों हिंदी सिनेमा के उन चंद अभिनेताओं में होती है, फिल्म से जिनका नाम भर जुड़ा होने से टिकट खिड़की गुलजार हो जाती है। नौ साल की मेहनत के बाद इमरान हाशमी ने ये मुकाम पाया है। एक स्टार की बजाय एक अदाकार के तौर पर अपनी पहचान और मजबूत करने में लगे इमरान हाशमी से एक खास बातचीत।

© पंकज शुक्ल

तो आखिरकार आपने खुद पर लगा सीरियल किसर का धब्बा धो ही दिया। कितना मुश्किल रहा इस खांचे से खुद को बाहर निकालना?
-(हंसते हुए) हां, आप सही कह रहे हैं शायद। लेकिन, ये खांचा मैंने खुद नहीं गढ़ा अपने आसपास। शायद लिखने वालों को सहूलियत होती है किसी अदाकार को किसी खांचे में ढालकर उसकी एक खास मूरत गढ़ देने से। देखा जाए तो मेरी कोशिश शुरू से रही है कि मैं किसी खांचे में न फंसने पाऊं। इसे मेरी बदकिस्मती ही कहा जाएगा कि मुझे उन दिनों ऐसे निर्माता ही नहीं मिले, जो मुझ पर दांव लगाने का जोखिम उठा सकते। मेरी कदकाठी के हिसाब से लेखकों को किरदार नहीं समझ आए या कहें कि ऐसी कहानियां नहीं लिखी गईं, जिनमें कि लगता इमरान हाशमी फिट बैठेगा। लेकिन, अब हिंदी सिनेमा बदल रहा है। लोगों को बेहतर कहानियों में बेहतर मनोरंजन मिल रहा है। लोग ऐसी कहानियां पसंद कर रहे हैं, जिनमें कहने को कुछ है। तो जाहिर है कि मुझे भी अच्छा लग रहा है।

एक वक्त था जब इमरान हाशमी को एक खास किस्म की फिल्मों का ही हीरो समझा जाता था। पर, पहले वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई और फिर द डर्टी पिक्चर की कामयाबी ने लोगों का परिचय एक नए इमरान से कराया। ये एक योजना के तहत हुआ या बस यूं ही?
-मेरे किरदार कैसे हों या मैं कौन सी फिल्में करूं, इसे लेकर मैं सजग तो रह सकता हूं लेकिन किसी योजना के तहत सिनेमा में काम करना अक्सर मुश्किल ही होता है। मेरा ये मानना है कि हिंदी सिनेमा में लोगों को एक तय लकीर पर चलना सुखद लगता है। शायद इसलिए कि इसमें जोखिम कम होता होगा। बहुत कम अभिनेता ऐसे हैं जो अपनी बनी बनाई इमेज से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं। सबको ये लगता है कि एक बढ़िया जींस और ब्रांडेड जैकेट पहनकर अगर परदे पर खूबसूरत दिखने से ही गाड़ी चल रही है तो फिर अपने थोबड़े के साथ एक्सपेरीमेंट क्यूं करना? पर मैं आरामतलबी से अदाकारी करने का कायल शुरू से नहीं रहा। मुझे चॉकलेटी हीरो बनना पसंद नहीं। मैं अपने किरदारों से लोगों के बीच पहचान बनाने में यकीन रखता रहा हूं। जन्न्त 2 ने भी इस बात को पुख्ता किया और अब शंघाई में तो खैर जैसा मैं दिख रहा हूं, वो आप देख ही रहे हैं। पेट निकला हुआ है। दांत पान मसाले से रंगे हुए हैं। लेकिन, किरदार की यही जरूरत
है।

यानी कि मौका मिले तो इमरान हाशमी को परदे पर बदसूरत दिखने में भी परहेज नहीं होगा?
-कह सकते हैं। लेकिन बदसूरत शब्द का इस्तेमाल क्यूं करें? हमारे आपके बीच जैसे लोग होते हैं, वे सब के सब फिल्मों में दिखने वाले सितारों जैसे तो नहीं होते। कोई कलाकार अगर फिल्म में भी सुपरस्टार दिखता रहे तो फिर शायद निजी जिंदगी में सुपरस्टार बने रहने के उसके दिन पूरे होने लगते हैं। अगर आप फिल्म मदर इंडिया को याद करें तो उसमें सुनील दत्त बदसूरत नहीं दिखते। वह एक ऐसे किरदार में दिखते हैं जो जमीन से जुड़ा है। तो इसके लिए जाहिर है उन्हें वैसा ही रंग ढंग और चाल चलन अपनाना होगा जो उनके किरदार पर अच्छा लगे। एक और फिल्म है अशोक कुमार की जिसमें उन्होंने अपनी इमेज को तोड़ने के लिए चेहर पर कोयला मला था। तो किरदारों के हिसाब से खुद को पेश करने के लिए एक कलाकार को हमेशा अपने स्टारडम के आभामंडल को तोड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए, और मैं यही कर रहा हूं। मेरा अपना मानना तो यही है कि फिल्म जगत में स्टार बनना आसान है, पर कलाकार बनना उतना ही मुश्किल।

शंघाई की बात करने से पहले जैसा कि आपने जन्नत 2 का जिक्र किया तो ये बताइए कि इस फिल्म का नायक सोनू जिस स्टाइल से अपना परिचय परदे पर कराता है, क्या वो हिंदी सिनेमा के नायक के पतनकाल की एक और पायदान नहीं बन जाता?
-शायद ठीक कह रहे हैं आप। फिल्म की रिलीज के बाद मेरी फिल्म के कुछ वितरकों से बात हुई। उन्होंने बताया कि अगर फिल्म में इतनी गालियां न होतीं तो फिल्म कम से कम 10 करोड़ रुपये का कारोबार और करती। क्या है, फिल्म में गालियां हों तो परिवार ही नहीं बल्कि कई बार जोड़े भी फिल्म देखने से कतरा जाते हैं। लोग अगल बगल बैठकर एक दूसरे से नजरें चुराते नहीं दिखना चाहते। जन्नत 2 का ये सबक है मेरे लिए और मैंने इसे दिल से सीखा भी है। रही बात शांघाई की तो ये फिल्म नेताओं के लुभावने वादों की असलियत को लोगों के सामने पेश करने की एक कोशिश है। जनता को बेवकूफ बनाकर सियासी लोग कैसे अपना मतलब सीधा करते हैं, इस पर फिल्म के निर्देशक दिबाकर बनर्जी ने बहुत ही सामयिक तरीके से कैमरा घुमाया है।

आपकी मौजूदा फिल्मों की लिस्ट और आने वाली फिल्मों की लिस्ट देखी जाए तो कहा जा सकता है कि आपने अपनी पीढ़ी के चोटी के तीन अभिनेताओं के बीच जगह बना ली है। अब आगे क्या इरादा है?
-मेरी हाल की फिल्मों की कामयाबी का श्रेय अगर आप सिर्फ मुझे देंगे तो ये उन बाकी लोगों के साथ काफी नाइंसाफी होगी जिन्होंने इन फिल्मों को कामयाब बनाने में पूरा योगदान दिया। फिल्म एक सामूहिक प्रयास होता है और इसमें किसी के काम को अलग करके नहीं देखा जा सकता। मेरी अगली फिल्मों चाहे वो घनचक्कर हो, राज 3 हो या फिर एक थी डायन हो, सबकी खासियत यही है कि इन फिल्मों की टीम बहुत अच्छी बन सकी है। बाकी अगर लोगों को लगता है कि मेरी मेहनत का रंग दिख रहा है तो इसके लिए मैं सबका शुक्रिया अदा करना चाहूंगा।