रविवार, 27 मई 2012

कॉपीराइट कानून में बदलाव: बेबसी के दिन बीते रे भैया..

किसी भी रचना का सृजन होते ही उसका कॉपीराइट उसके रचयिता के पास हो जाता है। इसके लिए अलग से किसी तरह के पंजीकरण की जरूरत नहीं है। बस कानूनी विवाद उठने पर रचयिता को ये साबित करने की जरूरत होती है कि फलां रचना उसने अमुक समय पर तैयार कर ली थी। अपनी ही रचना अपने पास रजिस्टर्ड लिफाफे से भेज उसे यूं ही सीलबंद रहने देने या फिर उसे अपनी ही ई मेल आईडी पर मेल करके उसे बिना खोले पड़े रहने देने के तरीके इसके लिए कामयाब तरीके माने जाते रहे हैं। पर, क्या हो जब आपके लिखे या गढ़े की चोरी हो जाए? या कोई और ही इसका कारोबारी इस्तेमाल करने लगे? संसद के दोनों सदनों से पारित हुए कॉपीराइट कानून संशोधन अधिनियम 2011 का मसौदा पढ़ने के बाद ऐसी ही कुछ और नुक्ता-चीनियों के बारे में विस्तार से ख़ास आपके लिए ये ख़ास जानकारी।

© पंकज शुक्ल

ज्यादा दिन नहीं हुए हैं। युवाओं के बीच छोटे और बड़े परदे पर कोका कोला का एक विज्ञापन खूब चर्चा में रहा। इस विज्ञापन में इमरान खान और कल्कि कोएचलिन एक पुराने गाने के रीमिक्स वर्जन पर हंसते, मुस्कुराते और शरारतें करते नजर आते हैं। पृष्ठभूमि में बजने वाला ये गाना था, तुम जो मिल गए हो तो ये लगता है, के जहां मिल गया..। हिंदी सिने संगीत के स्वर्णिम युग कहे जाने वाले साठ और सत्तर के दशक के ऐसे तमाम गाने हैं जो गाहे बेगाहे विज्ञापनों और अब फिल्मों में भी अपने रीमिक्स अवतार के साथ सुनाई देने लगे हैं। गीतकार को लाख एतराज हो, गायक लाख ना नुकुर करे और संगीतकार अपनी बनाई धुन के साथ बलात्कार ना होने देने के लाख चीखे चिल्लाए, कुछ दिनों पहले तक इसका कोई असर होता नहीं था। पर, अब ये सब शायद नहीं होगा। या कम से कम इन तीनों की मर्जी के बगैर नहीं होगा। वजह? संसद के बजट सत्र में पास हुए कॉपीराइट कानून संशोधन अधिनियम 2011 पर राष्ट्रपति की मुहर लगते ही ये सब करना गैर कानूनी हो जाएगा।
क्या हैं ये नए संशोधन? और इसके कानून बनने से सिनेमा के कायदों में क्या असर आने वाला है? इसे समझने के लिए अब भी हिंदी सिनेमा के ज्यादातर लेखक और गीतकार हाथ-पांव मार रहे हैं। कलर्स के लिए मशहूर सीरियल बालिका वधु के संवाद लिखने वाले राजेश दुबे इंतजार कर रहे हैं कि जावेद अख्तर मनोरंजन जगत के लेखकों की बैठक बुलाएं और इस बारे में तफ्सील से खुलासे करें। इसी महीने के पहले इतवार को मुंबई में लेखकों की सबसे बड़ी संस्था फिल्म राइटर्स एसोसिएशन के चुनाव हुए। फिल्म जगत के तमाम बड़े लेखकों के प्रोग्रेसिव राइटर्स ग्रुप ने अपने ज्यादातर उम्मीदवार इसमें जिता लिए। गॉडमदर जैसी फिल्म बनाने वाले विनय शुक्ला अब इस एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं। लेकिन, जावेद अख्तर को अपना अगुआ मानने वाला ये प्रोग्रेसिव राइटर्स ग्रुप शायद अब तक समझ ना पाया हो कि जावेद अख्तर ने अपनी बिरादरी के लिए नए कानून में क्या बटोरा है? और विनय शुक्ला जैसे हुनरमंदों के लिए क्या खो दिया है? आइए थोड़ा और विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं।

इन नए संशोधनों में एक और खास बात जो शामिल है वो ये कि अब किसी भी साहित्य, नाटक या संगीत से जुड़े सृजन को कोई भी इसके रचे जाने के पांच साल तक किसी भी सूरत में रीमिक्स या इसकी नकल के तौर पर बाजार में नहीं ला सकेगा।

रीमेक और रीमिक्स के पेंच
जिस गाने का लेख के शुरू शुरू में जिक्र किया गया वो है 1973 में रिलीज हुई फिल्म हंसते जख्म का गाना। थोड़ा दिमाग पर जोर डालें तो आपको याद आ जाएंगे गरजते बादलों के बीच अपने सफर से गुजरते नवीन निश्चल और प्रिया राजवंश और साथ ही याद आ जाएगा वो खूबसूरत गाना, तुम जो मिल गए हो..। अब जरा गौर कीजिए इस गाने के गीतकार और संगीतकार पर। गाना लिखा है कैफी आजमी यानी जावेद अख्तर साब के ससुर ने और इसे संगीत से संवारा कालजयी संगीतकार मदन मोहन ने। कैफी साहब अगर जिंदा होते तो क्या वो अपने सामने इस गाने का कोक वर्जन सुनना चाहते? जाहिर है आपका जवाब भी होगा, हरगिज नहीं। लेकिन अगर वो होते भी तो शायद इसका कोक वर्जन बनने से रोक नहीं पाते क्योंकि पहले के कानून के मुताबिक फिल्म में शामिल हो चुके किसी भी गाने को फिर से बेचने या उससे किसी तरह की दूसरी कमाई करने का अधिकार फिल्म के निर्माता का ही होता है और अमूमन ये अधिकार फिल्म निर्माता किसी न किसी संगीत कंपनी को बिना इसकी असली कीमत जाने बेच चुका होता। पर, अब कैफी साब की रूह चैन की सांस ले सकती है। उनकी किसी भी गजल या नज्म की ऐसी दुर्गति दोबारा नहीं होगी। कॉपी राइट कानून के नए संशोधनों के मुताबिक अब किसी भी गाने के फिल्म के अलावा किसी दूसरे इस्तेमाल के लिए उसके गीतकार, संगीतकार और गायक की भी इजाजत लेनी जरूरी होगी और निर्माता कैसा भी करार फिल्म बनाते वक्त साइन क्यूं न करा ले, ये अधिकार हमेशा रचयिता के पास सुरक्षित रहेंगे। इन नए संशोधनों में एक और खास बात जो शामिल है वो ये कि अब किसी भी साहित्य, नाटक या संगीत से जुड़े सृजन को कोई भी इसके रचे जाने के पांच साल तक किसी भी सूरत में रीमिक्स या इसकी नकल के तौर पर बाजार में नहीं ला सकेगा।
राज्यसभा सदस्य जावेद अख्तर ने जो लंबी लड़ाई लड़ी, उसके लिए उनका नाम लेखकों की बिरादरी में हमेशा हमेशा के लिए अमर रहेगा, क्योंकि अब किसी फिल्म का रीमेक बनने पर मूल फिल्म के लेखक की रजामंदी भी जरूरी होगी, और इसका सबसे पहला फायदा जावेद अख्तर को ही मिलने वाला है जिन्होंने बिना अपनी इजाजत सुपरहिट फिल्म जंजीर का रीमेक न बनने देने का मोर्चा संभाल रखा है। अमिताभ बच्चन की सुपरहिट फिल्म जंजीर निर्माता निर्देशक प्रकाश मेहरा ने बनाई थी और अपने पिता के अधिकार को विरासत में मिला समझ उनके बेटे इसकी रीमेक बनाने का कानूनी अधिकार भी अपने ही पास समझ रहे थे। ये सही है कि नए कानून में कोई लेखक अपने अधिकार अपने वारिसों या फिर किसी कॉपीराइट सोसाइटी को ही रॉयल्टी पाने के लिए स्थानांतरित कर सकेगा, लेकिन इससे उसके अपने इस लिखे रचे का संबंधित फिल्म के अलावा कहीं और इस्तेमाल होने पर इसकी कीमत वसूलने के अधिकार पर रोक नहीं लग सकेगी।


कॉपीराइट कानून के दांव
कॉपीराइट कानून संशोधन विधेयक पहली बार नवंबर 2010 में राज्यसभा में पेश किया गया था, लेकिन इसके कुछ प्रावधानों पर आपत्ति के बाद इसे संसद की स्थायी समिति के पास विचार के लिए भेजा गया। समिति ने इसमें कई सुझाव दिए और इसके बाद संबंधित संशोधनों के साथ संशोधित विधेयक 2011 तैयार किया गया। कॉपीराइट कानून में संशोधनों के बाद के नए कानून को समझने के लिए ये भी जरूरी है कि इसकी जरूरत क्यों आई, इसे भी समझा जाए। दरअसल, देश में अभी तक लागू रहे कॉपीराइट एक्ट 1952 के सेक्शन 2 (डी) के मुताबिक देश में बनी किसी भी सिनेमैटोग्राफ फिल्म या साउंड रिकॉर्डिंग के मामले में इसका निर्माता ही इसका रचयिता होता है। अगर कानून के सेक्शन 17 को भी इसके साथ पढ़ा जाए तो पता चलता है कि ऐसे किसी भी सृजन का एक मात्र कॉपीराइट निर्माता के पास ही होता है और ये सेक्शन ये भी स्पष्ट करता है कि इसके किसी भी तरह के अधिकार किसी को देने या स्थानांतरित करने का एकमात्र अधिकार निर्माता के पास ही था। ऐसा होने की सूरत में फिल्म के निर्देशक से लेकर इसके गीतकार, संगीतकार, लेखक या किसी दूसरे कलाकार के पास इसका कोई अधिकार नहीं था। इसके मुताबिक भले फिल्म निर्देशक का दिमाग ही फिल्म बनाने के लिए लगता रहा हो, पर नैतिक अधिकारों को छोड़ उसका फिल्म के ऊपर कोई कानूनी अधिकार नहीं होता। चूंकि फिल्म का निर्देशक कानून के सेक्शन 2 (जीजी) के तहत भी कलाकार नहीं है, लिहाजा वह कानून के सेक्शन 38 के तहत किसी तरह के अधिकार पर दावा नहीं कर सकता। यही नहीं, अभी तक के कानून के सेक्शन 38 (ए) के मुताबिक एक बार अगर कोई कलाकार किसी सिनेमैटोग्राफ फिल्म में काम करने की मंजूरी दे देता है तो कॉपीराइट कानून के सेक्शन 38 के तहत वह किसी भी अधिकार का मालिक नहीं रह जाता।

नए कानून से सहूलियतें
राज्यसभा और लोकसभा से पारित होने के बाद कॉपीराइट एक्ट अमेंडमेंट बिल, 2011 के कानून बनने को लेकर अब दिल्ली ज्यादा दूर नहीं है। पर, कानून में जिस संशोधन को लेकर मुंबई की लेखक बिरादरी जावेद अख्तर को सिर आंखों पर बिठाने के लिए बिछी बिछी सी नजर आ रही है, उन नए संशोधनों के बाद अगर जावेद अख्तर से सबसे ज्यादा नाराज कोई बिरादरी हो सकती है तो वो है फिल्म निर्देशकों की बिरादरी, जिनसे मुताल्लिक संशोधन संसद की स्थायी समिति ने खारिज कर दिया और कुल मिलाकर अब किसी फिल्म के अधिकारों में हिस्सेदारी या तो निर्माता की है या फिर लेखक और गीतकारों की। लेखक भी तब जब वो उसका मूल सृजक हो। किसी और के लिखे को फिल्म की पटकथा में तब्दील करने वाला पटकथा लेखक इस अधिकार से भी गया। दरअसल, कॉपीराइट कानूनों में ये संशोधन लंबे समय से लंबित थे। विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (डब्ल्यूआईपीओ) के साथ हुई कॉपीराइट संधि और डब्ल्यूआईपीओ परफॉरमेंस एंड फोनोग्राम ट्रीटी पर हस्ताक्षर करने के साथ ही भारत के लिए 1957 से चले आ रहे कॉपीराइट कानून में संशोधन जरूरी था।

नए संशोधनों की सबसे अहम बात है कलाकारों को दिया गया नैतिक अधिकार यानी मोरल राइट्स। मतलब कि अब अगर किसी फिल्म का रीमेक या किसी गाने का रीमिक्स बने तो इसके असली अभिनेता या गायक इस बिना पर हर्जाना मांग सकते हैं कि नई फिल्म या नए गाने ने उनकी मूल प्रस्तुति को बिगाड़ दिया है।

किसका नफा, किसका नुकसान?
जो नए संशोधन संसद के दोनों सदनों से पारित हो चुके हैं, उनके तहत एक खास प्रस्ताव कानून के सेक्शन 18 में भी जोड़ा जाएगा। ये प्रस्ताव खासतौर से गीतकारों और संगीतकारों के लिए बाध्यकारी है। इसके कानून बनने के बाद ये बिरादरी अपनी बौद्धिक संपदा के एवज में रॉयल्टी वसूलने या इन्हें आगे वितरित करने के लिए अपने कानूनी वारिसों या किसी कॉपीराइट सोसाइटी के अलावा किसी और की तैनाती नहीं कर सकती। इसके अलावा सेक्शन 19 में एक सब सेक्शन 9 भी जुड़ा है जिसका मतलब है कि किसी भी गीतकार या लेखक द्वारा किसी सिनेमैटोग्राफ फिल्म या साउंड रिकॉर्डिंग के लिए अपने कॉपीराइट देने का मतलब ये भी नहीं है कि अगर फिल्म निर्माता इनकी लिखी या रची चीजों का इस्तेमाल फिल्म के अलावा किसी और तौर पर करे तो उसमें इनकी हिस्सेदारी नहीं होगी। मतलब कि अब अगर फिल्म शैतान में हवा हवाई गाने का रीमिक्स हुआ तो इसके एवज में संगीत कंपनी ने जो रकम वसूली है, वो इसके गीतकार जावेद अख्तर और संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के प्यारेलाल और लक्ष्मीकांत के वारिसों के पास भी जानी चाहिए। यही नहीं मौजूदा कॉपीराइट कानून के सेक्शन 38 (3) और 38 (4) की जगह नए संशोधनों में सेक्शन 38 ए और 38 बी जोड़े गए हैं।
इन नए संशोधनों के मुताबिक किसी फिल्म के लिए एक बार अपनी प्रस्तुति के लिए रजामंदी दे देने के बाद किसी कलाकार का उस पेशकश को लेकर कानूनी प्रस्तुति अधिकार नहीं रह जाता, लेकिन ये प्रस्तुति देने वाले कलाकार को उस रकम का हिस्सा जरूर मिलेगा जो फिल्म के लिए की गई उसकी पेशकश का व्यापारिक इस्तेमाल फिल्म के अलावा किसी और तरीके से फिल्म के निर्माता द्वारा किए जाने पर मिलता है। मतलब कि अब अगर सोनू निगम का गाया ये दिल दीवाना किसी म्यूजिक रियल्टी शो में बजता है और म्यूजिक कंपनी इसके लिए पैसे वसूलती है तो इसमें से कुछ हिस्सा सोनू निगम के पास भी जाएगा। ये तो हुई पैसे की बात। नए संशोधनों की सबसे अहम बात है कलाकारों को दिया गया नैतिक अधिकार यानी मोरल राइट्स। मतलब कि अब अगर किसी फिल्म का रीमेक या किसी गाने का रीमिक्स बने तो इसके असली अभिनेता या गायक इस बिना पर हर्जाना मांग सकते हैं कि नई फिल्म या नए गाने ने उनकी मूल प्रस्तुति को बिगाड़ दिया है। यानी कि फिल्म डिपार्टमेंट में इस्तेमाल हुए गाने थोड़ी सी जो पी ली है..को लेकर चाहें तो बप्पी लाहिरी फिल्म निर्माता कंपनी वॉयकॉम 18 और ओबेराय लाइन प्रोडक्शंस पर दावा दाखिल कर सकते हैं।

संपर्क - pankajshuklaa@gmail.com