रविवार, 6 मई 2012

मैं सबसे बड़ी नौटंकी वाली हूं: परिणिति

कम ही होता है ऐसा कि कोई लड़की बस एक फिल्म करे और बाजार में लोग उसे उसके किरदार के नाम से बुलाने लग जाएं। लेडीज वर्सेस रिकी बहल की डिंपल चड्ढा के साथ यही हुआ। मशहूर अदाकारा प्रियंका चोपड़ा की चचेरी बहन परिणिति अपनी दूसरी फिल्म में एक ऐसी मुसलमान लड़की का किरदार कर रही हैं, जो गालियां देती हैं, लड़कों को दौड़ाती है और जरूरत पड़ने पर गोली भी चला देती है। असल जिंदगी में नॉन स्टॉप मेल का तमगा पा चुकी परिणिति से एक खास मुलाकात यशराज फिल्म्स के दफ्तर में।

© पंकज शुक्ल

तो खुश तो बहुत होगी आज? और, ये नॉन स्टॉप मेल का क्या चक्कर है?
-ये नाम शायद मेरे यार दोस्तों ने दिया होगा। मैं बोलती हूं तो मुझे रोकना मुश्किल हो जाता है। लोग देखते रह जाते हैं और मैं बोलती चली जाती हूं। शायद मैं बहुत कुछ कहना चाहती हूं। ये आदत मुझे मेरी मां से मिली। वो अब भी ऐसे ही बोलती हैं, घर वाले कहते हैं मैं मां पर गई हूं। रही बात खुश होने की तो मुझसे ज्यादा मेरी मां खुश हैं। रोज टेलीविजन पर मेरे प्रोमो देखती हैं, अखबारों में मेरे बारे में पढ़ती हैं। पापा खुश हैं। दोनों छोटे भाई खुश हैं और मैं इसलिए खुश हूं कि अब तक जो कुछ भी दिखाया या छापा जा रहा है, सब अच्छा अच्छा ही है।

लेकिन गनीमत रही कि लंदन में सब कुछ अच्छा अच्छा नहीं हुआ, नहीं तो शायद हिंदी सिनेमा को एक काबिल अदाकारा से हाथ धोना पड़ता?
-सही कह रहे हैं शायद आप। अभिनेत्री बनने की बात मैंने मुंबई आने से पहले सोची तक नहीं थी। अंबाला में पढ़ाई पूरी की और वहां से सीधे इंग्लैंड। मैं इन्वेस्टमेंट बैंकर बनना चाहती थी। तो मैनचेस्टर में जाकर एडमीशन ले लिया। ट्रिपल ऑनर्स किया। मैं तेज थी पढ़ाई में। मैं शुरू से यही सोचती थी कि पढ़ाई के बाद नौकरी मिलना मुश्किल नहीं होगा। लेकिन इधर मेरी पढ़ाई पूरी हुई, उधर मंदी का दौर आ गया। जहां भी मैं इंग्लैंड में इंटरव्यू के लिए जाती, लोग कहते कि तुम यहां की नहीं हो इसलिए तुम्हें नौकरी नहीं दे सकते। इंग्लैंड तो क्या उन दिनों तो हर तरफ रिसेशन चल रहा था सो छह आठ महीने के लिए मैं मुंबई आ गई। अंबाला जाकर वहां करती भी क्या? मुझे मुंबई में ही कहीं नौकरी या इंटर्नशिप करनी थी।

फिर यशराज फिल्म्स में नौकरी कैसे मिली?
मैं मुंबई आई तो उन दिनों दीदी (प्रियंका चोपड़ा) यहां यशराज फिल्म्स के स्टूडियो में प्यार इंपॉसिबल के लिए शूटिंग कर रही थी। मुझे लगा कि ये तो बहुत कमाल जगह है। मैंने पूछा कि क्या यहां कोई दफ्तर वफ्तर भी है जहां मैं काम कर सकती हूं। यहां मेरी मुलाकात रफीक से हुई जिन्होंने कहा कि मुझे नौकरी सिर्फ प्रियंका की कजिन होने की वजह से नहीं मिल सकती तो छह महीने मैंने यहां खुद को साबित किया। कॉफी बनाने से लेकर मैंने सब काम किया। छह महीने बाद मैंने इंटरव्यू दिया। और, तब जाकर नौकरी मिली। लेकिन, काम के छह महीने बाद ही मुझे लगने लगा कि ये 10 से 5 वाला काम मुझसे होगा नहीं। इस बीच मुझे एक्टिंग को करीब से जानने का मौका भी मिल रहा था। इसी दौरान मुझे ऐक्टिंग से प्यार हो गया। आमतौर पर लोग समझते हैं कि ऐक्टर बस यूं ही होते है, बस मेकअप कराकर आए, एक दो डॉयलॉग बोले और मोटी रकम लेकर चल दिए। लेकिन अब पता चला कि ये आसान काम नहीं है। स्कूल में खूब नाटक किए हैं मैंने। घर पर भी नौटंकी करती ही रही हूं। सच पूछा जाए तो मैं सबसे बड़ी नौटंकी वाली हूं।

तो यशराज में नौकरी करते करते यशराज फिल्म्स की हीरोइन बन गईं?
नहीं, इसकी भी एक कहानी है। मेरे साथ जो हुआ वो किसी के साथ दोबारा भी होगा, पता नहीं। मेरी कहानी ऐसी है कि मैं अपने ऊपर खुद फिल्म बनाना चाहती हूं। मैं एक पंजाबी लड़की, हट्टी कट्टी मोटी, मैनचेस्टर रिटर्न, यहां मनीष शर्मा की मैनेजर बन गई। नवंबर में मेरी उससे बात हुई ऐक्टिंग को लेकर। दिसंबर में बैंड बाजा बारात आने वाली थी। वो हंसने लगा। फिर कोई महीने भर बाद एक दिन वो बोला कि शानू शर्मा से मिल लो। शानू यशराज की कास्टिंग डायरेक्टर है। शानू ने मुझे कैमरे पर शूट किया। उसी रात आदि (आदित्य चोपड़ा) को दिखाया कि ये लड़की मार्केटिंग की नहीं है। इसके अंदर ऐक्टिंग का कीड़ा है। ये सब इधर मुझे बिना बताए चलता रहा और एक महीने बाद मैंने नौकरी से इसलिए इस्तीफा दे दिया कि मुझे ऐक्टिंग स्कूल ज्वाइन करना है। अगले दिन मनीष ने फोन करके बुलाया। शायद संडे था। उसने कहा कि तुम यशराज फिल्म्स के साथ तीन फिल्मों की डील साइन कर रही हो। मुझे तो समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ? यूं लगा कि पांचवीं में पढ़ाई की कोशिश कर रही लड़की को एकदम से पीएचडी दे दी गई हो।

तो यूं एकाएक प्रमोशन पाने वाली परिणिति का डिंपल से जोया तक का प्रमोशन कैसा रहा?
हां, इश्कजादे मेरी पहली सोलो फिल्म है और जोया का किरदार डिंपल चड्ढा से बिल्कुल अलग है। फिल्म की कहानी एक काल्पनिक छोटे शहर की है। दो लौंडा लौंडिया हैं जिन्हें बचपन से सिर्फ एक ही नुस्खा सिखाया गया है, नफरत करना। एक दूसरे को देखो तो बस गोली से उड़ा दो। लड़की होते हुए भी मैं गोली चला देती हूं। गाली गलौज भी करती हूं। लेकिन फिर कुछ होता कि दोनों का नजरिया बदल जाता है। लड़की को लगता है कि ये लड़का है तो जानवर लेकिन है कुछ मेरे जैसा ही है। लड़के को लगता है कि ये लड़की है तो पटाखड़ी पर इसमें कोई बात है। मेरी ही जात की है।

और इशकजादे के बाद की क्या प्लानिंग है?
मेरा सिनेमा को लेकर अप्रोच बिल्कुल रीयल है। मुझे इसके ग्लैमर से कोई प्यार नहीं है। कल को मैं फ्लॉप हो गई तो वापस जाकर बैंक की नौकरी कर सकती हूं। अगर मैं एक्टर बन सकती हूं तो कोई भी लड़की एक्टर बन सकती है। एक छोटे से शहर की लड़की, जिसे बैंकर बनना था, 12 वीं में मैंने टॉप किया। अपनी बहन के ग्लैमर से जो प्रभावित नहीं होती थी वो अगर एक्टर बन सकती है तो कोई भी एक्टर बन सकता है। मेरा तो यही कहना है कि कुछ बनना है तो बस मेहनत करो। तुम कहां से हो? क्या किया है? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर दिल में है तो वो हो सकता है। रही बात प्लानिंग की तो मैं जिंदगी में कुछ भी प्लान करने में यकीन नहीं करती क्योंकि एक ही प्लानिंग अब तक की थी बैंकर बनने की वो बन नहीं पाई। मैं बहुत नॉर्मल लड़की है, मुझे सब कुछ पसंद है। मुझे जब जो जिस सिचुएशन में सही लगेगा, वो मैं करने को तैयार हूं।

इन बातों से कुछ कुछ बगावत की बू भी आती है?
-बगावत? नहीं, नहीं। ऐसा कुछ मत लिख दीजिएगा। मैं बहुत ही शरीफ लड़की हूं (ठहाका लगाकर हंसती रहती हैं)। अरे, सर। मुंबई में हैं तो क्या हुआ? हीरोइन भी बन गए तो क्या हुआ? अपना अलग घर लेकर भी मुझे यहां अपनी बहन को रिपोर्ट करना होता है। रोज वहां अंबाला में अपनी मां को रिपोर्ट करना पड़ता है। यारी रोड पर अपना घर ले लिया। लेकिन, वहां भी छापा पड़ता रहता है। अभी चार दिन पहले दीदी का एकाएक फोन आया कि कि मैं आ रही हूं। सिर्फ आधा घंटा पहले बताया। चाहो भी तो कुछ बदल नहीं सकते। बस छापा पड़ा। घर चेक हुआ। लेकिन, फिर भी मैं अपनी दीदी को बहुत प्यार करती हूं। अपने घरवालों को बहुत प्यार करती हूं। ये इन लोगों का प्यार, हिम्मत और हौसला ही है, जो मुझे यहां तक ले आया है। आगे अब मेरे चाहने वालों की दुआएं काम आएंगी।