बुधवार, 18 अप्रैल 2012

100 साल सिनेमा के: तरक्की के या गिरावट के?

हम हिंदुस्तानी परंपराओं से जश्न मनाने के शौकीन लोग हैं। हमें सिर्फ खुश होने का बहाना चाहिए। ढोल, ताशे और नगाड़े तो बस तैयार रहते हैं बजने के लिए। इस बार जश्न सिनेमा का हो रहा है। सौ साल के हिंदुस्तानी सिनेमा का। इस जश्न के बरअक्स तमाम बातें ऐसी हैं जिन पर बातें की जा सकती हैं, बहसें हो सकती हैं और गंभीर परिचर्चाएं आयोजित की जा सकती हैं। लेकिन, सिनेमा की सुध ही किसे है? न सरकार को और न सरोकार को। सिनेमा वहीं फिर से पहुंचता दिख रहा है, जहां से ये चला था।

© पंकज शुक्ल

कहते हैं कि सौ साल में हर वो संस्था अपनी पूर्णगति को प्राप्त हो लेती है जिसका जरा सा भी ताल्लुक आम लोगों से रहता है। जिस सिनेमा को बाहरगांव में गरीबी, रजवाड़ों, झोपड़पट्टियों और मदारियों के खेल तमाशों से शोहरत मिली, वो हिंदुस्तानी सिनेमा अब रा वन, रोबोट और कोचादईयान की वजह से विदेश में जाना जा रहा है। पाथेर पांचाली, मेघे ढाका तारा, सुजाता, देवदास, मुगल ए आजम, मदर इंडिया का जमाना अब गया, अब सिनेमा दबंग, वांटेड, सिंघम और सिंह इज किंग हो गया है। और, ये चलन केवल हिंदी सिनेमा का ही नहीं है बल्कि हिंदी सिनेमा में ये चलन दक्षिण की उन फिल्मों से आया है, जिन्हें बनाने वालों को सिनेमा का सिर्फ एक ही मतलब समझ आता है और वो है पैसा।

पैसा एंटरटेनमेंट से आता है और सिल्क स्मिता बनीं विद्या बालन ने अभी पिछले साल ही तो समझाया था कि एंटरटेनमेंट होता क्या है? एंटरटेनमेंट का ये नया मतलब फिल्म मेकर्स ने खुद निकाला है। नहीं तो ऐसा एंटरटेनमेंट तो पहले भी बड़े परदे पर होता रहा है। दक्षिण में श्रीदेवी और कमल हासन की शुरूआती फिल्में अगर आप देख लें तो शायद कांतिलाल शाह भी शरमा जाएं। बताने वाले बताते रहे हैं कि कैसे हिंदी सिनेमा में सुपर स्टार बनने के बाद श्रीदेवी ने अपनी तमाम बी और सी ग्रेड वाली फिल्मों के राइट्स खरीद कर उनके प्रिंट अपने कब्जे में कर लिए थे। ये बात कोई बीस-पचीस साल पहले की है, लेकिन उससे थोड़ा और पीछे जाएं तो सिनेमा में सेक्स का तड़का लगाने के लिए राज कपूर ने पहले पहल मेरा नाम जोकर में सिमी ग्रेवाल के सहारे, फिर सत्यम् शिवम् सुंदरम् में जीनत अमान के सहारे और राम तेरी गंगा मैली में मंदाकिनी के सहारे खुलेआम कोशिशें कीं। नारी सौंदर्य के बहाने हुई इन कोशिशों को कलात्मकता की सफेद लेकिन भीगी साड़ी में ढकने की वो कोशिशें अब तक जारी हैं और साथ ही जारी है सिनेमा और मनोरंजन का वो संघर्ष जो दादा साहेब फाल्के की बनाई पहली हिंदुस्तानी फिल्म राजा हरिश्चंद्र के साथ ही शुरू हो गया था। जाहिर है दूसरे कारोबारों की तरह सिनेमा भी सिर्फ एक कला शुरू से नहीं रहा। इसे कारोबार के लिए ही रचा गया और अब तक कारोबार ही इसे रच रहा है।

सिनेमा और कारोबार के बीच एक बहुत महीन फासला रहा है। कुछ कुछ वैसा ही जैसे कि नग्नता और अश्लीलता में होता है। हिंदी समेत तमाम दूसरी भाषाओं में सिनेमा ने कुछ बेहतरीन पड़ाव पचास और साठ के दशक में पार किए। तब भी भारत का सिनेमा विदेश जाता था। सराहा जाता था और पुरस्कार भी पाता था। पर तब तक सिनेमा पथभ्रष्ट नहीं हुआ था। और तब तक सेंसर बोर्ड में ऐसे लोग भी नहीं आए थे जो कैसे इसकी ले लूं मैं, जैसे विज्ञापन तो सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए पास कर देते रहे हों लेकिन फिल्म में तिब्बत के झंडे को लेकर उनका सामाजिक बोध एकदम से जाग जाता रहा हो। देखा जाए तो भारत में सिनेमा के सौ साल एक ऐसी बेतरतीब उगी फसल है, जिसे काटने वाले और अपना बताने वाले बहुत हैं, लेकिन इसका रकबा बढ़ाने की और बाकी की बंजर जमीन पर हल चलाने की कोशिश करने वाले गिनती के भी नहीं बचे हैं। अपने आसपास से कहानियां बटोरने वाला भारतीय सिनेमा कब धीरे धीरे डीवीडी सिनेमा में बदल गया, लोगों को पता तक नहीं चला।

असल कहानियों का टोटा
ब्लैक फ्राइडे, पांच, देव डी और गुलाल जैसी फिल्मों से मशहूर हुए निर्देशक अनुराग कश्यप कहते हैं, भारतीय सिनेमा की कोई एक पहचान नहीं है। हॉलीवुड फिल्मों की बात चलते ही हम कह देते हैं कि वहां सिनेमा तकनीक से चलता है। हमारे यहां तकनीक अभी उतनी सुलभ नहीं है। हर निर्माता सिर्फ तकनीक को सोचकर सिनेमा नहीं बना सकता। भारतीय सिनेमा की एक पहचान जो पिछले सौ साल में बनी है, उसमें मुझे एक बात ही समझ आती है और वो है इसकी सच्चाई। सिनेमा और सच्चाई का नाता भारतीय सिनेमा में शुरू से रहा है। बस बदलते दौर के साथ ये सच्चाई भी बदलती रही है और बदलते दौर के सिनेकार जब इस सच्चाई को परदे पर लाने की सच्ची कोशिश करते हैं, तो बवाल शुरू हो जाता है। अनुराग की फिल्मों के सहारे भारतीय सिनेमा के पिछले बीस पचीस साल के विकास को भी समझा जा सकता है। अनुराग कश्यप भले अपने संघर्ष के दिनों को पीछे छोड़ आए हों और अपनी तरह के सिनेमा की पहचान भी बना चुके हों, लेकिन उनका सिनेमा पारिवारिक मनोरंजन के उस दायरे से बाहर का सिनेमा है, जिसे देखने के लिए कभी हफ्तों पहले से तैयारियां हुआ करती थीं। एडवांस बुकिंग कराई जाती थीं और सिनेमा देखना किसी जश्न से कम नहीं होता था। अब सिनेमा किसी मॉल में शॉपिंग सरीखा हो चला है। विंडो शॉपिंग करते करते कब ग्राहक शोरूम के भीतर पहुंचकर भुगतान करने लग जाता है, खुद वो नहीं समझ पाता। जाहिर है सिनेमा बस एक और उत्पाद भर बन जाएगा तो दिक्कत होगी ही।
किसी भी देश के मनोरंजन में उसकी मिट्टी की खुशबू न हो तो बात लोगों के दिलों तक असर कर नहीं पाती है। भले दिबाकर बनर्जी जैसे लोगों को लगता हो कि हिंदुस्तान का साहित्य अब ऐसा बचा ही नहीं जिस पर सिनेमा बन सके, पर असल दिक्कत सिनेमा के साथ तकनीशियनों के आराम की भी है। काशीनाथ सिंह के मशहूर उपन्यास काशी का अस्सी पर सनी देओल जैसे सितारे के साथ फिल्म बना रहे डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी कहते हैं, सिनेमा खुद को बनाता है। हमें बस एक ऐसा कथ्य तलाशना होता है, जिसके जरिए हम दर्शकों के दिल को टटोल सकें। भारतीय सिनेमा के उत्थान और पतन जैसी ऐतिहासिक बातों में न पड़ा जाए तो भी ये तो कहा ही जा सकता है कि भारत में सिनेमा दो खांचों में बंटा दिखता है। इसमें एक सिनेमा वो है जिसमें सिर्फ टिकट खिड़की का मनोविज्ञान काम कर रहा होता है। ये सिनेमा सिर्फ टिकट खिड़की पर भीड़ जुटाने में यकीन रखता है। दूसरी तरह का सिनेमा भी टिकट खिड़की पर भीड़ तो देखना चाहता है, लेकिन उसे बनाने वाला ये भी चाहता है कि तीन घंटे सिनेमाघर में बिताने के बाद दर्शक खुद पर खीझता हुआ बाहर न निकले। मनोरंजन हो, लेकिन स्वस्थ हो, बस दूसरी तरह का सिनेमा यही चाहता है। लेकिन, इसके लिए रास्ता बहुत कठिन है और इस पर आपको अपनी सोच का हमसफर मिलेगा भी, ये आखिर तक ठीक नहीं होता। द्विवेदी की बातों में दम नजर आता है। रीमेक पर रीमेक बना रहे सिनेमा में वाकई असल कहानियां खोजने वाले गिनती के हैं।

कहां गए वो लोग?
कहानियों के बाद सिनेमा के सौ साला जश्न के दौरान अगली बात निकलती है निर्देशन की। ऐसा क्यूं कर है कि अजीज मिर्जा, श्याम बेनेगल, रमन कुमार, बी आर इशारा और सागर सरहदी जैसे फिल्म निर्देशकों को इन दिनों पहले फिल्में बनाने के लिए और फिर बन जाने पर उन्हें बेचने के लिए सौ जगह सिर पटकने पड़ रहे हैं। सागर सरहदी की फिल्म चौसर लिखने वाले राम जनम पाठक कहते हैं, सिनेमा अब मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों को टटोलने का माध्यम नहीं रह गया है। ये माध्यम अब सिद्दीक जैसे लोगों का है जो एक ही फिल्म को अलग अलग तड़का लगाकर अलग अलग भाषाओं में बनाते रहते हैं। पाठक मानते हैं कि सिनेमा की सामाजिक सोच अकाल मृत्यु का शिकार हो चुकी है और अब यहां सिर्फ वही तीर मार सकता है जिसकी जेब में पैसा हो और जिसके निशाने पर भी बस पैसा ही हो। पैसे का बोलबाला सिनेमा में हमेशा से रहा है पर सिनेमा में भी नकारात्मक प्रवृत्तियों का प्रतिकार ही किया है। मशहूर निर्देशक जहानु बरूआ के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे पटकथा लेखक निलय उपाध्याय कहते हैं, सिनेमा के सौ साल का सबक यही है कि यहां हुनर के बजाय तिजोरी का सम्मान होने लगा है। भारतीय सिनेमा खासकर हिंदी सिनेमा एक ऐसी अंधी सड़क पर रफ्तार लगा चुका है, जिसके मोड़ों और मंजिल के बारे में उसे खुद नहीं पता। सिनेमा अब सिनेमा रहा ही नहीं, वह खालिस मनोरंजन का बाजार बन चुका है। एक ऐसा बाजार जहां एक रुपये लगाकर सौ रुपये कमाने का जुआ खेला जा रहा है और जिसकी फड़ पर फेंके जा रहे पत्तों में हर बार तीन इक्के निकलने ही निकलने जरूरी हैं। ऐसे में ये तीनों इक्के किसके पास निकलेंगे जाहिर है ये पहले से तय होता है। भारतीय सिनेमा की अब विदेशी फिल्म समारोहों में बात होती है तो या तो किसी वाद विवाद के चलते या फिर देह के दर्शन के चलते। अब न लोगों को गुरुदत्त याद रहे, ना के आसिफ। यहां तक कि मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और रमेश सिप्पी तक लोगों को बीते जमाने की बातें लगने लगे हैं।

शो जस्ट गोज ऑन
सौ साल के सिनेमा के सफर में अगर दक्षिण के नामचीन कलाकारों में एन टी रामाराव, राजकुमार, जय ललिता जैसे दर्जनों सितारों के नाम लगातार आते हैं तो पश्चिम और पूरब के सितारों में ये गिनती कलाकारों की कम और सितारों की ज्यादा होती है। इस मामले में सिनेमा के साथ चारों दिशाओं में एक हादसा एक सा हुआ और वह है नए कलाकारों का सिनेमा में प्रवेश करीब करीब बंद हो जाना। सिनेमा अब करोड़ों का हो चला है और पिछले बीस साल में एक भी निर्माता ने करोड़ों का दांव किसी ऐसे लड़के पर नहीं खेला है जिससे उसका दूर दूर का कोई नाता तक न हो। हिंदी सिनेमा का आखिरी सुपर स्टार रणवीर कपूर जिस खानदान से है वो तो सबको पता ही है, उनसे पहले जो सुपर सितारा 2001 में बड़े परदे पर नमूदार हुआ वो ऋतिक रोशन भी फिल्मी परिवार का ही है। सिनेमा को नजदीक से जानने वालों को भी अब समझ में आता है कि अब सिनेमा नहीं बस प्रोजेक्ट बनते हैं। हर निर्देशक किसी न किसी सितारे को पकड़ने की जुगाड़ में कई कई साल गुजार देता है। अशोक कुमार, पृथ्वीराज कपूर आदि के जमाने के बाद भले पहले राज कपूर, देव आनंद, दिलीप कुमार, फिर अमिताभ बच्चन, राजेश खन्नाा, ध्ार्मेंद्र, विनोद खन्नाा, राजेंद्र कुमार और मिथुन चक्रवर्ती तक आते आते सिनेमा में अपने बूते कुछ बन दिखाने या कर सुनाने वालों की गिनती कम होती रही हो, पर तय ये भी रहा कि सिनेमा ने नए का स्वागत करना बंद नहीं किया। लेकिन, तीसेक साल पहले मिथुन चक्रवर्ती के सुपर स्टार बनने के बाद से फुटपाथ पर फाकाकशी करने वाले किसी आम इंसान ने रुपहले परदे पर शोहरत का सबसे ऊंचा शिखर नहीं पाया। और, हिंदुस्तानी सिनेमा की पतन गाथा की शुरूआत भी बस वहीं से शुरू होती है।

तकनीक का उनवान
राजेंद्र कुमार की गोरा और काला, दिलीप कुमार की राम और श्याम, हेमा मालिनी की सीता और गीता से लेकर शाहरूख खान की ओम शांति ओम तक आते आते डबल रोल को ही सिनेमा की बेहतरीन तकनीक समझने वालों के नजरिए में भी कुछ ऐसा बदलाव आया है कि अब रा वन में अर्जुन रामपाल को एक ही फ्रेम में दस दस अवतारों में देखकर भी लोगों को अचंभा नहीं होता। दशावतारम व रोबोट के बाद अगली बारी विश्वरूपम् और कोचादईयान की है लेकिन मशहूर सिनेमैटोग्राफर विजय अरोरा कहते हैं कि हिंदुस्तानी सिनेमा में भावनाएं हमेशा तकनीक पर बाजी मारती रहेंगी। देश का आम दर्शक तीन घंटे के लिए जब सिनेमाघर में घुसता है तो कहीं न कहीं उसकी पीठ पर पसीने की कुछ बूंदें टिकी रह ही जाती हैं। परदेस में सिनेमा देखने आने वाले ज्यादातर लोग महंगी कारों से आते हैं, अपने यहां अब भी मल्टीप्लेक्स में सिनेमा देखने वाले ज्यादातर लोग ऑटो रिक्शा से आते हैं। बस सिनेमा का असल फर्क यहीं है। सिर्फ महंगे हॉलों में सिनेमा देखने भर से सिनेमा की परंपरा नहीं बदलती। सिनेमा की परंपरा इसे देखने वालों के जीवन में होने वाले बदलावों से बदलती है।

सूख रही संगीत सरिता
भारतीय सिनेमा की विदेश में एक बड़ी पहचान इसके संगीत की वजह से ही रही है। दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में बनाने वाले देश भारत में तकरीबन हर फिल्म में संगीत को तवज्जो दी जाती है और गाने इसकी पहचान रहते हैं। पर, अब ये संगीत सरिता अपने गोमुख में ही सूख रही है। मशहूर संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के प्यारे लाल कहते हैं, भारतीय सिनेमा ने पिछले बीस तीस साल में सबसे ज्यादा पतन अगर किसी विभाग में देखा है तो वो संगीत ही है। नए संगीतकारों में इन दिनों बस कुछ ऐसा कर देने की होड़ लगी है जो उनके गाने के मुखड़े को लोगों की जुबान पर चढ़ा दे या फिर जिसकी बीट्स पर कम कपड़ों वाली लड़कियां डिस्कोथेक में ठुमके लगा दें। धिक्कार है ऐसी तुकबंदियों पर जिसे लोग संगीत के नाम पर बेच रहे हैं। मैं मानता हूं कि संगीत को सबसे ज्यादा नुकसान पायरेसी ने पहुंचाया है, लेकिन ये भी संगीत कंपनियों का बस एक बहाना है। जितना पैसा पहले संगीत कंपनियां सीडी या कैसेट बेचकर नहीं कमा पाती थीं, उससे कहीं ज्यादा पैसा वो कॉलर ट्यून्स बेचकर कमा रही हैं, बस नीयत बदल गई है। सिने संगीत के स्वर्णिम काल की याद दिलाने पर प्यारे लाल कहते हैं, वो जमाना ही कुछ और था। सौ लोगों का आर्केस्ट्रा अगर किसी स्टूडियो में नहीं आ पाता था तो हम लोग रात में किसी पार्क में जाकर रिकॉर्डिंग कर लिया करते थे। पर अब ना वो हरियाली बची है, ना रातों का सन्नााटा और ना लोगों में संगीत का वो जुनून। हर कोई जल्दी में हैं। हर किसी को शॉर्टकट पता हो गए हैं। लेकिन सिनेमा का तिलिस्म शॉर्ट कट से नहीं उपजता, इसके लिए लंबी और थका देने वाली मेहनत करनी ही होती है।

संपर्क - pankajshuklaa@gmail.com

(यह आलेख नेशनल दुनिया के 15 अप्रैल 2012 के अंक में प्रकाशित हो चुका है)