सोमवार, 28 नवंबर 2011

अब नहीं सताएगा पिया बसंती

उस्ताद सुल्तान खान नहीं रहे। संगीत के करोड़ों कद्रदानों को ये खबर इतवार के दिन मायूस कर गई। किसी ने कहा एक और हीरा चला गया। किसी ने 71 साल की उम्र में भी उनकी जिंदादिली को याद किया तो किसी ने बताया कि कैसे उनके गुर्दों ने हाल ही में काम करना बंद कर दिया था। साल 2011 को पता नहीं हुनरमंदों से क्या दुश्मनी है। अभी भूपेन हजारिका को ऊपर पहुंचे देर ही कितनी हुई है।


सिनेमांजलि/ पंकज शुक्ल

साजिंदों और हुनरमंदों की ऊपरवाले के यहां दिनोंदिन मजबूत होती महफिल में जब उस्ताद सुल्तान खान की रूह गाएगी, तो शायद ऊपरवाला भी दिल मसोस कर ही रह जाएगा। वह कहते थे, मेरा रियाज़ नहीं गाता, मेरी रूह गाती है। बड़ा कलाकार होने के साथ साथ वो बड़े दिलवाले भी थे। 11 साल पहले की बात है। उन दिनों उनका अलबम पिया बसंती रिलीज हुआ था और दिल्ली के एक पंचसितारा होटल में तय हुई कोई दस मिनट की मुलाकात कैसे एक घंटे से ऊपर निकल गई, ना मुझे पता चला और न उन्हें। मुंह में गुटखा दबाए वो बोलते रहे। पर ये भी कहते रहे, मैं बोलता कम हूं। तुम लिखना चाहो तो लिखो। या ऐसे ही बात करते हैं।



मैं मस्तमौला इंसान हूं। जहां उस्ताद दिखे, भीतर का शागिर्द जाग गया। बड़े गुलाम अली खान हो या ओंकारनाथ ठाकुर, फय्याज़ खान या फिर सिद्धेश्वरी देवी सब मेरे उस्ताद हैं।


फिर बातें होती रहीं। उनके बचपन की कि कैसे कुश्ती और फुटबॉल से अलग कर एक दिन वालिद उस्ताद गुलाब खान ने उनके हाथ में सारंगी थमा दी। जैसे उनके वालिद और उनके पहली की उनकी सात पुश्तों को सारंगी से इश्क़ था, सुल्तान खान को भी हुआ। अपने वालिद की तरह गायिकी भी उनकी बेजोड़ रही। पर शोहरत अपने वतन से ज्यादा परदेस में मिली। वह कहते, यहां किसी के साथ बजाते तो बस साजिंदे ही कहलाते। वहां ऐसा नहीं है। वहां संगत करने वाले को भी मुख्य फनकार जितनी ही इज्जत मिलती है। प्रिंस चार्ल्स की 50वीं सालगिरह के लिए मिले न्यौते के बारे में भी वो अक्सर बताते।

फुटकर फुटकर मुलाकातें उनसे कई दौर की हुईं। ऐसी ही एक मुलाक़ात में मैं पूछ बैठा, आपको इंदौर घराने का बजैया माना जाता है, पर आपके हुनर में तो अलहदा चीजें भी बताई जाती हैं। उस्ताद ने उस दिन खुलकर बताया, मैं मस्तमौला इंसान हूं। जहां उस्ताद दिखे, भीतर का शागिर्द जाग गया। बड़े गुलाम अली खान हो या ओंकारनाथ ठाकुर, फय्याज़ खान या फिर सिद्धेश्वरी देवी सब मेरे उस्ताद हैं। शायद यही वजह रही कि बाद में उन्होंने एक खास अलबम भी इसीलिए निकाला और इस अलबम में उन्होंने तीन अलग अलग राग, तीन अलग अलग घरानों आगरा घराना (फय्याज़ खान), पटियाला घराना (बड़े गुलाम अली खान) और इंदौर घराना (उस्ताद आमिर खान) के हिसाब से गाए। लेकिन फिर भी इंदौर घराने के वो ताउम्र सबसे करीब रहे। कहते थे, उस्ताद आमिर खान साहब मेरे सबसे बड़े आदर्श रहे। उनकी तान और सरगम का मैं बहुत बड़ा मुरीद हूं।

पद्म भूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा देश विदेश में तमाम पुरस्कार उस्ताद सुल्तान खान के नाम के साथ जुड़कर सम्मानित होते रहे। और, वो वक्त के साथ आगे बढ़ते रहे। फिल्म हम दिल दे चुके सनम में अलबेला सजन आयो रे गाने के चंद दिनों बाद मिलने पर उस्ताद ने यूं ही बात चलने पर कहा था, संगीत सब जगह एक सा है। संगीत मेरे लिए ईश्वर है। उसके रूप अलग अलग हो सकते हैं। तो फिल्म हो या पश्चिमी संगीत, मेरे लिए सुरों की इबादत हर जगह एक जैसी है।