रविवार, 23 अक्तूबर 2011

‘नायिकाओं में पहनावे की तमीज नहीं रही’ : हेमा मालिनी


पंकज शुक्ल

“मैं नारी हूं। मैं परंपराओं की जननी भी हूं तथा उनका निर्वाह करने वाली भी। संसार मुझ पर मोहित है तो इतिहास गर्वित है। मुझमें जीवित है वो सारी नारियां जो अपने आदर्श चरित्र यहां स्थापित कर के गई हैं। मैं अतीत भी हूं और वर्तमान भी और आने वाले कल का उत्तरदायित्व भी।“ ये पंक्तियां भले हेमा मालिनी के नए संगीत नाटक नारी की हों, पर हेमा मालिनी पर सौ फीसदी सटीक बैठती हैं। इन पंक्तियों को हेमा ने निजी जीवन में भी जीकर दिखाया है। हेमा मालिनी से एक खास मुलाकात।

नायक प्रधान हिंदी सिनेमा में नायिका का आम दर्शकों से जो एक अनदेखा रिश्ता हुआ करता था, वो अब ग्लैमर की चकाचौंध में कहीं खो सा गया है। इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
हिंदी सिनेमा में नायिका की जब तक गर्ल नेक्सट डोर वाली छवि रही लोगों को उसमें अपने सपनों के अक्स नजर आते रहे। इसकी वजह ये थी कि तब की नायिकाओं ने जमीन से जुड़े किरदारों को ज्यादा तवज्जो दी। शर्मिला टैगोर जैसी नायिकाओं ने इस परंपरा को मजबूत दी थी। मैंने भी उस दौर में ऐसे तमाम किरदार निभाए। हर किरदार फिल्म संन्यासी जैसा नहीं हो सकता न, तो रजिया सुल्तान और मीरा जैसे किरदार भी निभाने की हिम्मत होनी चाहिए। ड्रीम गर्ल होना अच्छा है पर ड्रीम गर्ल हर जगह नहीं हो सकती। उस दौर में जब मैंने लाल पत्थर में काम किया तो लोग कहते थे कि ऐसे किरदार लोगों को अच्छे नहीं लगेंगे। लेकिन, हकीकत ये है कि ऐसे किरदारों में खासी मेहनत करनी होती है। अब तो नायिकाएं पैंट शर्ट और जीन्स पहनती हैं। कम कपड़े पहनती हैं और कभी कभी तो वो भी नहीं होता। पहनावे से भी नायिका की अलग छवि बनती है, लेकिन अफसोस की बात है कि हिंदी सिनेमा की नायिका में पहनावे की तमीज खत्म होती जा रही है।

यानी कि फिल्मी सितारों को लेकर जो पहले एक रहस्य का माहौल बना रहता था वो अब नहीं रहा?
इसके लिए कुछ टेलीविजन जिम्मेदार है, कुछ इंटरनेट और कुछ बदलता वक्त। अब तो हर सितारा टेलीविजन पर मौजूद रहता है। अभी हमारी फिल्म टेल मी ओ खुदा का म्यूजिक लॉन्च हुआ तो मैं खुद लोगों से पूछ रही थी कि उसकी रिपोर्ट टेलीविजन पर आई कि नहीं। पहले ये बंद मुट्ठी होती है, पर ये मुट्ठी अब खुल चुकी है और खुली मुट्ठी की अहमियत तो आप जानते ही हैं। अब हर चीज व्यावसायिक हो गई है। सितारों को फिल्म की लागत वसूल करने के लिए सब जगह जाना पड़ता है। पहले हम लोग छुप कर रहते थे। पहले सितारों के चाहने वाले उन्हें तलाशा करते थे, अब हम खुद अपने आप को हर जगह तलाशते रहते हैं। शाहरुख खान इन दिनों हर जगह भागे भागे नजर आते हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि आजकल सिनेमा बनाने में पैसा बहुत लगता है और इसकी वसूली में हम लोगों की जान निकल जाती है।

शाहरुख खान को आपने बड़े परदे पर पहला ब्रेक दिया था। तब के और आज के शाहरुख खान में आपको क्या तब्दीली नजर आती है?
शाहरुख खान एक बहुत ही प्यारा इंसान है। उसकी शख्सीयत में तब से लेकर अब तक जमीन-आसमान का अंतर आ गया है। कहां से उसने अपना करियर शुरू किया था और आज कहां पहुंच गया। ये हमेशा मेरे लिए गर्व की बात रहेगी कि मैंने इस कलाकार को अपनी फिल्म के लिए सबसे पहले चुना। मुझे इस बात की भी खुशी होती है कि जिस कलाकार को मैंने चुना, वो पूरी दुनिया को पसंद आया। लेकिन, निजी तौर पर शाहरुख बिल्कुल नहीं बदला है। वो अब भी पहले जैसा प्यारा इंसान है। टेल मी ओ खुदा के म्यूजिक रिलीज का न्यौता देने के बाद भी मुझे यकीन नहीं था कि वो अपने व्यस्त कार्यक्रमों से वक्त निकाल पाएगा। लेकिन, वो आया और इस मौके पर उसने जो बातें की, उसने मेरे दिल में शाहरुख के लिए इज्जत और बढ़ा दी है।
रही बात विजयाराजे सिंधिया पर घोषित हुई फिल्म की तो मुझे नहीं लगता कि अब वो पूरी हो पाएगी। इसे मृदुला सिन्हा बना रही हैं, जिन्होंने विजयाराजे सिंधिया के साथ काफी वक्त गुजारा। लेकिन वो लेखक हैं, सिनेमा के समीकरणों से वो अनजान हैं। फिल्म बनाने के लिए ढेर सारा पैसा चाहिए होता है। पर खुद सिंधिया परिवार ने कभी इस फिल्म के निर्माण में न तो कभी मदद की और ना ही कोई उत्साह दिखाया। यहां तक कि ग्वालियर में शूटिंग की इजाजत तक नहीं दी।

और, फिल्म टेल मी ओ खुदा का विचार कैसे आया?
मैंने एक अखबार में एक लड़की के बारे में पढ़ा था। भारत में जन्मी और ऑस्ट्रेलिया में पली बढ़ी ये लड़की जब बड़ी हुई तो उसे लगने लगा कि उसके आसपास के बच्चे उस जैसे नहीं हैं। तब उसे पता चला कि उसे गोद लिया गया था। किसी भी इंसान को अगर पता चले कि जिन लोगों के साथ उसने इतना लंबा वक्त गुजारा वो उसके असली माता पिता ही नहीं तो उस पर क्या गुजरती होगी? इसी विचार पर ये फिल्म बनी है। ऐसे कितने लोग होंगे भारत में और पूरी दुनिया में, जिन्हें लोग अनाथालयों से गोद ले जाते हैं। एपल के स्टीव जॉब्स को भी कितनी तड़प हुई होगी, जब उन्हें पता चला होगा कि वो एक गोद ली हुई संतान हैं। ऐसे ही एक शख्स के बारे में मैं जानती हूं जो जम्मू कश्मीर में फौज के बहुत बड़े अफसर हैं। वो अब भी अपने असली माता पिता की तलाश में लगे हुए हैं।

अनाथालय में जो बच्चे छोड़ दिए जाते हैं, उसकी वजह क्या आप सिर्फ गरीबी को मानती हैं या कुछ और?
मैंने खुद जितना ऐसे बच्चों के बारे में जाना है, उसके लिहाज से कह सकती हूं कि अनाथालय में बच्चों को सिर्फ मां छोड़ती है। पिता का इसमें शायद उतना हाथ नहीं रहता क्योंकि अनाथालयों में छोड़े जाने वाले ज्यादातर बच्चे बिन ब्याही मांओं की संतान होते हैं। कुछ गरीब घरों के बच्चे भी अनाथालय में छोड़ दिए जाते हैं, लेकिन मैंने देखा है कि कुछ बहुत अमीर माता पिता भी लगातार बेटियों के जन्म लेने पर अपनी बेटियों को अनाथालय छोड़ आते हैं। मैं वृंदावन गई थी तो वहां भी मुझे बताया गया कि वहां के आश्रमों में पलने वाली तमाम लड़कियों के माता पिता बहुत अमीर लोग हैं।

तो इसकी वजह क्या आप समाज में लड़कियों के जन्म को स्वीकार न कर पाने की प्रवृत्ति को भी मानती हैं?
मैंने हाल ही में तीस मिनट का जो संगीत नाटक बनाया है नारी। इसके पीछे मूल सोच यही है। इसमें मेरा किरदार कहता है, कन्या के जन्म के समाचार से मातम छा जाता है। इस वंश प्राप्ति पर जग बधाई देने से कतराता है। कन्या का आना जाना क्यूं दुर्भाग्य दिखाई देता है? जग में आने से पूर्व ही जग झट से उसे विदाई दे देता है। जिन्हें पुत्र कहते उनकी भी सृष्टि कहां से होगी? नारी न रही तो नूतन जग की सृष्टि कहां से होगी? जिसकी हत्या की वो क्या पता आगे चलकर क्या होती? इस नवयुग के निर्माण में उन कन्याओं का योगदान कितना होता। युग बदल रहा है अब अपनी चिंताधारा को भी बदलो। पुत्र रत्न है और कन्या विपदा इस भ्रम से तुम बाहर निकलो।
इसमें मेरी छोटी बेटी आहना रानी पद्मिनी बनकर आती है और एशा झांसी की रानी। ये दोनों कहती हैं, यदि देखना चाहते हो नारी की उड़ान को तो और ऊंचा कर दो आसमान को। दुर्भाग्य है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता को मानने वाले देश में कन्याओं को जन्म से पहले ही मार दिया जाता है।

अपने इन विचारों को आप छोटे परदे पर माटी की बन्नो जैसे धारावाहिकों के जरिए भी प्रकट करती रही हैं? आपको क्या लगता है कि टेलीविजन समाज के निर्माण में सार्थक भूमिका निभा पा रहा है?
टेलीविजन के लिए सारे मापदंड अब टीआरपी पर आकर खत्म हो जाते हैं। मैं टेलीविजन के पीछे नहीं भागती लेकिन फिर भी इसके लिए काम करते रहने की इच्छा मेरी रहती है। माटी की बन्नाो शायद गलत समय पर आया या कोई और वजह रही होगी। लेकिन, मैंने कोशिश बंद नहीं की है। एक और धारावाहिक पर भी काम चल रहा है। भारतीय नृत्य को लेकर भी छोटे परदे पर बहुत कुछ किया जा सकता है लेकिन हिंदी भाषी उत्तर भारत में नृत्य को बहुत नीची नजर से देखा जाता है हालांकि दक्षिण में इसे बहुत सम्मान हासिल है। मेरा मानना है कि नृत्य ईश्वर की आराध्ाना की उच्चतम उपासना पद्धति है। इसमें भक्त का पूरा शरीर भक्ति में तल्लीन हो जाता है। मैं ईश्वर का ध्ान्यवाद देती हूं कि उन्होंने मुझे अच्छी नृत्यांगना और लोकप्रिय अभिनेत्री दोनों बनाया। बतौर अभिनेत्री मिली लोकप्रियता का फायदा मेरी नृत्य साधना को मिला है, नहीं तो देश में ना जाने कितने लोग भरतनाट्यम करते हैं और मुझसे अच्छा भी करते हैं, लेकिन उनको लोग नहीं जानते।

और, इस लोकप्रियता का फायदा आपको राजनीति में भी मिला? इसी के चलते मध्य प्रदेश से भाजपा की बड़ी नेता रहीं विजयाराजे सिंधिया के किरदार में आपको लेकर एक फिल्म भी शुरू हुई थी?
अब देखिए ना (मुस्कुराते हुए), मैं भी कहां से कहां तक का सफर करती रहती हूं। मैं फिल्में बनाती हूं, नृत्य करती हूं और दूसरी तरफ ये सब। लेकिन, मुझे वहां भी सम्मान मिला। भाजपा में कुछ बहुत अच्छे लोग हैं, विद्वान लोग हैं। वहां तो मैं बस सुनती रहती हूं, बैठकों में चुपचाप ज्ञान की बातें सुनती रहती हूं। रही बात विजयाराजे सिंधिया पर घोषित हुई फिल्म की तो मुझे नहीं लगता कि अब वो पूरी हो पाएगी। इसे मृदुला सिन्हा बना रही हैं, जिन्होंने विजयाराजे सिंधिया के साथ काफी वक्त गुजारा। लेकिन वो लेखक हैं, सिनेमा के समीकरणों से वो अनजान हैं। फिल्म बनाने के लिए ढेर सारा पैसा चाहिए होता है। पर खुद सिंधिया परिवार ने कभी इस फिल्म के निर्माण में न तो कभी मदद की और ना ही कोई उत्साह दिखाया। यहां तक कि ग्वालियर में शूटिंग की इजाजत तक नहीं दी।

अच्छा, अमिताभ बच्चन जब भी आप से अपनी किसी फिल्म का हिस्सा बनने की बात कहते हैं, आप झट से मान लेती हैं, लेकिन आपकी अपनी फिल्म टेल मी ओ खुदा का वो हिस्सा नहीं बने, ऐसा क्यूं?
पहले इस फिल्म के जो निर्देशक थे मयूर पुरी वो अमिताभ बच्चन के पास इस फिल्म का प्रस्ताव लेकर गए थे। मयूर के दिमाग में अमर, अकबर, एंथनी का विचार घूमता रहता था। लेकिन, फिल्म के लिए जो भावनाएं जरूरी थीं वो फिल्म में मयूर नहीं ला पा रहे थे। इसके बाद जब फिल्म के निर्देशन की कमान मैंने संभाली तो कहानी में काफी कुछ फेरबदल हुए और मुझे लगा कि धर्म जी इस रोल के लिए ज्यादा उपयुक्त रहेंगे। ये फिल्म डा विंची कोड की शैली में बनी फिल्म है, जिसमें कैमरा फिल्म की नायिका के नजरिए से चलता रहता है और दर्शकों को लगेगा कि वो खुद इन सब जगहों पर जा रहा है। ये आजकल की कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जैसी फिल्म नहीं है। मुझे लगता है कि आज की पीढ़ी के निर्देशकों को सीनियर कलाकारों से कायदे से काम लेना नहीं आता। ये या तो कलाकारों को पूरी बात ढंग से समझा नहीं पाते, या फिर हमेशा अति आत्मविश्वास का शिकार रहते हैं।

और, धर्म जी को निर्देशित करने का एहसास?
उन्हें अब कोई क्या निर्देशित करेगा। वो खुद इतने अच्छे कलाकार हैं। खुद इतने अच्छे सीन्स लिखते हैं। वो बहुत काबिल इंसान हैं। लेकिन अब भी सीन देने के बाद भागकर मॉनीटर देखने आते हैं। कभी कभी खुद ही बोलते थे, हेमा, ये सीन अच्छा नहीं गया। फिर से करते हैं। मेरा काम तो सिर्फ किसी सीन को शॉट्स में बांटने तक रहता था, बाकी वो इतने अच्छे इंसान हैं कि अपना सारा काम खुद ही कर लेते थे। सनी देओल में मुझे ध्ार्म जी के सारे गुण नजर आते हैं। सनी देओल खुद अपनी तरफ से रुचि लेकर एशा देओल की इस फिल्म की मदद कर रहे हैं और मुझे क्या चाहिए? बस।

© पंकज शुक्ल। 2011।