रविवार, 9 अक्तूबर 2011

गीतों में लड़कियों को छेड़ने वाले शब्द ढूंढते हैं युवा: रनबीर कपूर

पंकज शुक्ल

परदादा धाकड़ अभिनेता, दादा अपने जमाने का सबसे बड़ा शो मैन, पिता हिंदी सिनेमा का सुपर स्टार और मां दमदार अदाकारा हो तो जाहिर है चौथी पीढ़ी पर दबाव आ ही जाता है। लेकिन करियर की पहली ही फिल्म फ्लॉप हो जाने के बावजूद रनबीर कपूर ने हिंदी सिनेमा में न सिर्फ अपनी अलग पहचान बनाई है बल्कि नई पीढ़ी के अभिनेताओं के बीच वो सबसे चमकते सितारे भी बन चुके हैं।

मुंबई में पला बढ़ा एक मेट्रो ब्वॉय फिल्म रॉक स्टार का जनार्दन जाखड़ कैसे बना?
जनार्दन जाखड़ जैसा किरदार वाकई मेरी जिंदगी के करीब कभी नहीं रहा। मैं तो वेक अप सिड जैसा सिड हूं। ये किरदार मेरा अब तक का सबसे मुश्किल किरदार रहा। ये दिल्ली के पीतमपुरा का एक जाट है जो हिंदू कॉलेज में पढ़ता है और जिसका सपना है रॉक स्टार बनना। इसे एक दिन कैंटीन वाला कहता है कि अगर जिंदगी में दुख दर्द आंसू नहीं सहा तो झंकार कहां से आएगी। जब तक तेरा दिल नहीं टूटता तब तक तू बड़ा कलाकार बन नहीं सकता। तो बस वो स्टीफेंस कॉलेज की जो सबसे हाईसोसाइटी वाली लड़की है, उसे पटाने की कोशिश करता है ताकि वो उसका दिल तोड़े। वहां से उनकी दोस्ती शुरू होती फिर उनकी आगे की 8-10 साल की स्टोरी है ये फिल्म।

रॉक स्टार में जो बैंड संस्कृति है, उसे आज के युवा कितना खुद को जोड़ पाएंगे?
आज के जो युवा हैं वो पश्चिम से ज्यादा प्रभावित रहते हैं, पर अपने यहां भी तो तमिल, तेलुगू और दूसरी भाषाओं में इतना सारा संगीत है जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है। आज के संगीतकार पश्चिम की धुनें और कंपोजीशन चुराकर संगीत बना रहे हैं, लेकिन मेरा मानना है कि अगर संगीत अपनी जड़ों से न जुड़ा हो तो कनेक्ट नहीं करेगा। रॉक स्टार के निर्देशक इम्तियाज की अली की भारतीय साहित्य के बारे में समझ बहुत है। उन्हें गालिब और रूमी जैसों का लिखा कंठस्थ है। इस फिल्म के गाने खटिया वाले गाने नहीं हैं। रिंग टोन वाले गाने नहीं है, उनका एक अलग स्तर है। जिन्हें गानों के बोलों और धुनों की कद्र होती है, रॉक स्टार के गाने उनके लिए हैं। हमने कोशिश की है, कुछ बेहतर देने की क्योंकि आज की पीढ़ी को बस डिस्को थेक वाले गाने चाहिए। उन्हें हर गाने में ऐसा कोई शब्द चाहिए होता है जिससे वो लड़कियों को छेड़ सकें। लेकिन हमने वैसा संगीत बनाने की कोशिश की जिसके लिए हिंदी सिनेमा को जाना जाता रहा है।

सांवरिया फ्लॉप हुई तो बुरा तो लगा लेकिन शायद ये सच्चाई से मेरा सामना भी था। फिल्म हिट होती तो मेरा दिमाग घूम सकता था। इस नाकामी ने मुझे बताया कि आप चाहे जितनी बड़ी फैमिली से हो लेकिन आपका काम ही आपको आगे बढ़ाएगा।


आपके अब तक के सारे किरदार एक दूसरे से काफी अलग रहे हैं, इसमें आपकी अभिनय की शिक्षा का कितना योगदान है?
मैं बचपन से अभिनेता बनना चाहता था। मैं किरदारों को लेकर बोर नहीं होना चाहता। मेरी कोई इमेज नहीं है। साथ ही मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि मुझे अब तक बहुत ही अच्छे निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिला। अदाकारी के बारे में जो जानता हूं, उसका श्रेय मैं संजय लीला भंसाली को देना चाहता हूं। मैं ऐसे निर्देशकों के साथ काम करना चाहता हूं जो फिल्म के जरिए कुछ कहना चाहते हैं। अगर निर्देशक को अपनी फिल्म को लेकर जुनून है तो आधा काम तो वहीं हो जाता है। रही बात अभिनय की शिक्षा की तो मैंने न्यूयॉर्क के ली स्ट्रासबर्ग थिएटर एंड फिल्म इंस्टीट्यूट से मैथड एकटिंग सीखी है पर मैं अदाकारी के इस तरीके को बिल्कुल नहीं मानता हूं। मेरा मानना है कि अदाकारी का हर अभिनेता का अपना अलग मेथड होता है।

किसी भी सितारे की कामयाबी में उसकी इमेज का बहुत बड़ा योगदान होता है और आपकी इमेज खराब करने के लिए तो मुंबइया गॉसिप मिल दिन रात काम करती दिखती है?
गॉसिप कॉलमों में क्या छपता है, मैं इस पर ज्यादा ध्यान नहीं देता। शुरू शुरू में इस सबको लेकर दिक्कत होती थी पर मेरा मानना है कि एक अभिनेता को अपने काम से मतलब रखना चाहिए। लगातार अच्छा काम करते जाने से कुछ दिनों बाद लोग भी इस तरह की बातें नहीं पूछते और आपके काम की तरफ ही ध्यान देने लगते हैं। मेरी अभी कोई इमेज नहीं है। और वो जमाना भी गया जब कलाकार एक इमेज लेकर चलते थे। एक जैसी ही फिल्में करते थे। इस बारे में मैं आमिर खान का अनुयायी हूं जिन्होंने हर फिल्म में नए लुक का चलन हिंदी सिनेमा में शुरू किया।

लेकिन, डेल्ही बेली में काम करने से आपने मना कर दिया था? और रीमेक के चलन के बारे में आपका क्या कहना है?
हां, डेल्ही बेली पहले मेरे पास ही आई थी। लेकिन तब मैं अपने करियर के साथ पंगा नहीं लेना चाहता था। मेरी एक जिम्मेदारी है अपने दर्शकों को लेकर। मैं ऐसी फिल्में करना चाहता हूं जिन्हें मैं अपने माता पिता के साथ देख सकूं। वैसे डेल्ही बेली एक कामयाब फिल्म है और इसकी स्क्रिप्ट भी अच्छी थी। रही बात रीमेक की तो मुझे नहीं लगता है कि ऐसा कहानियों की कमी की वजह से हो रहा है। हां, ये दिक्कत जरूर है कि अब फिल्में लिखने वाले खुद निर्देशक बन रहे हैं। मेरा मानना है कि फिल्में लिखने वाले अगर बड़े निर्देशकों के लिए फिल्में लिखें तो काफी अच्छा काम हो सकता है। हां, मैं रीमेक कभी नहीं करूंगा।

मैं अगले साल या उसके अगले साल अच्छी कहानी मिलने पर एक फिल्म निर्देशित करना चाहूंगा। मैं श्री 420 जैसी फिल्म बनाना चाहूंगा जिसका कोई संदेश भी हो।


आमिर, सलमान, शाहरुख की तिकड़ी के बाद लोग शाहिद, रनबीर और इमरान की तिकड़ी का नाम लेते हैं?
ये सही है कि शाहिद कपूर और इमरान खान अच्छा काम कर रहे हैं। मैं भी सही समय पर सही किरदार कर पा रहा हूं तो इसमें मेरे निर्देशकों का बड़ा योगदान रहा है। लेकिन, आमिर, सलमान या शाहरुख जैसी ऊंचाई पाने के लिए हम तीनों को बहुत मेहनत करनी होगी। हमें और चुनौती वाले किरदार करने होंगे तभी शायद हम वहां तक पहुंच सकें। इन लोगों के पीछे बहुत बड़ा काम और बहुत सारी मेहनत है। वहां पहुंचने के लिए बहुत कड़ी मेहनत और लगन की जरूरत होगी। मेरा पूरा ध्यान अब इसी तरफ है ताकि मैं इनसे भी आगे जाने की सोच सकूं।

आरके फिल्म्स के भविष्य को लेकर आपका क्या सपना है?
कपूर खानदान की विरासत एक बड़ी जिम्मेदारी है। मेरा सपना है कि मैं आरके फिल्म्स के लिए एक फिल्म बतौर निर्माता-निर्देशक बनाऊं। जिस तरह की फिल्में राज कपूर ने बनाई वैसी हम बना नहीं सकते क्योंकि वैसे किरदार अब नहीं होते तो हमें आगे बढ़ना है। लेकिन उससे पहले मुझे अपने अभिनय पर भी ध्यान देना है क्योंकि यहां कामयाबी कब आपके हाथ से फिसल जाए पता नहीं होता। मैंने अपने पिता को देखा है कि कैसे लीड हीरो से कैरेक्टर आर्टिस्ट बनने पर इंसान तनाव से गुजरता है। लेकिन, आप अच्छे एक्टर हो तो आपका करियर कभी खत्म नहीं होता। मैं अगले साल या उसके अगले साल अच्छी कहानी मिलने पर एक फिल्म निर्देशित करना चाहूंगा। मैं श्री 420 जैसी फिल्म बनाना चाहूंगा जिसका कोई संदेश भी हो। मौजूदा वक्त के हिसाब से पूछें तो मैं राजू हिरानी की फिल्मों जैसी फिल्म बनाना चाहूंगा।

अपनी पहली फिल्म सांवरिया के फ्लॉप होने के एहसास के बारे में बताइए?
मैंने संजय लीला भंसाली के साथ इससे पहले फिल्म ब्लैक में बतौर सहायक निर्दशक काम किया था। सांवरिया फ्लॉप हुई तो बुरा तो लगा लेकिन शायद ये सच्चाई से मेरा सामना भी था। फिल्म हिट होती तो मेरा दिमाग घूम सकता था। इस नाकामी ने मुझे बताया कि आप चाहे जितनी बड़ी फैमिली से हो लेकिन आपका काम ही आपको आगे बढ़ाएगा। अब साढ़े तीन साल में मुझे लगता है कि लोग मुझे मेरे काम से जानने लगे हैं। मेरे माता-पिता कहीं बाहर जाते हैं तो लोग उन्हें रनबीर कपूर के माता-पिता के नाम से बुलाते हैं, ये उन्हें भी बहुत अच्छा लगता है।

कपूर खानदान रिश्तों में बड़ा यकीन करता है, इन दिनों का पारिवारिक मिलन कैसा होता है?
हम अब भी हर रविवार को एक साथ लंच करते हैं। मेरी दादी चेंबूर में रहती हैं। हम लोग वहीं जाते हैं। घर में इतने सारे बड़े बड़े सितारे हैं कि हम लोग तो बस किनारे ही हो जाते हैं। खाने के सब शौकीन हैं और बात भी करते हैं तो लगता है झगड़ा कर रहे हैं। हमारे लिए तो ये टेनिस मैच जैसा होता है, आंखें यहां से वहां नाचती रहती हैं, एक चेहरे से दूसरे चेहरे पर।

रॉक स्टार के बाद आप बर्फी कर रहे हैं, उसके बाद?
बर्फी का नाम पहले साइलेंस था। इसमें मैं गूंगा बहरा बना हूं तो लोगों ने समझा कि ब्लैक की तरह की फिल्म होगी। पर ये बच्चों की फिल्म है। बहुत ही दिल को छू लेने वाली फिल्म है। इसमें रोमांस भी है और फिर एक मर्डरमिस्ट्री। फिल्म के निर्देशक अनुराग बासु के साथ काम करने में मजा आ रहा है। वो खुद भी बहुत बड़े बच्चे हैं। बच्चों पर आज जो टीवी का जो प्रभाव है, उससे उन्हें थिएटर जाने का मन नहीं करता लेकिन अगर आप अच्छी फिल्म बनाओ तो बच्चे आते हैं। अजब प्रेम की गजब कहानी देखने बहुत बच्चे आए। इसके बाद मैं एक फिल्म जनवरी में वेक अप सिड के निर्देशक अयान मुखर्जी के साथ शुरू कर रहा हूं, निर्माता करण जौहर की इस फिल्म में मेरे साथ दीपिका पादुकोण होंगी।

© पंकज शुक्ल। 2011।