
दर ओ दीवार कभी बनते हैं घरों से सजते हैं,
रहा करे सुपुर्द ए खाक़ मेरी बसुली, कन्नी मेरी।
दरिया ए दौलत में उसे सूकूं के पानी की तलाश,
तर बतर करती बूंद ए ओस सी चवन्नी मेरी।
तू सही है गलत मैं भी नहीं ना कोई झगड़ा है,
वो आसमां उक़ूबत का ये घर की धन्नी मेरी।
मेरी गुलाटियों औ मसखरी को मजबूरी न समझ,
उछाल रुपये सा न मार ग़म की अठन्नी मेरी।
रगों में इसकी खून मेरा तो हो दूध तेरा भी,
सर ए दुनिया रहे चमके तेरी लाडो मुन्नी मेरी।
© पंकज शुक्ल। 2011।
waaaaaaaaaaaaaah apratim kavita ..
ReplyDelete:) वैसे तो तारीफ हर किसी की मुस्कुराहट देती है, पर तारीफ जौहरी करे तो थोड़ा इतराने हीरा भी लगता है। धन्यवाद डॉक्टर साहिबा।
ReplyDeleteपंकज सर,
ReplyDeleteबहुत खूब लिखा है आपने.
बहुत बहुत शुक्रिया ब्रजमोहन भाई..
ReplyDeleteआपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
ReplyDeleteप्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
अवगत कराइयेगा ।
http://tetalaa.blogspot.com/
आभार वंदना जी आपकी हौसला अफजाई का। तेताला का ख़ासतौर से धन्यवाद।
ReplyDeleteवाह ...बहुत खूब ।
ReplyDeleteदरिया ए दौलत में उसे सूकूं के पानी की तलाश,
ReplyDeleteतर बतर करती बूंद ए ओस सी चवन्नी मेरी।
bahut khoobsoorat panktiyan hai sir.adbhud.
बहुत गहन भाव लिए सुन्दर गज़ल ...
ReplyDeleteLAJAWAB...NAYE KAAFIYON NE RANG JAMA DIYA...BADHAI SWIIKAREN
ReplyDeleteसदा जी..बहुत बहुत शुक्रिया।
ReplyDeleteहेमंत मिश्रा - धन्यवाद मिश्रा जी। आपके संदेश मिलते रहते हैं। जल्दी ही आपसे बात करता हूं। ईश्वर आपको स्वस्थ, सानंद व सदमार्ग पर रखे।
ReplyDeleteसंगीत जी- शुक्रिया, अरसे बाद आपकी दाद मिली। बहुत अच्छा लगा। :)
ReplyDeleteनीरज गोस्वामी- आपकी कसौटी पर खरा निकला तो चमकना सुफल रहा नीरज जी। काफिया, रदीफ़ और बहर का ज्यादा ज्ञान तो नहीं है लेकिन कोशिश जारी है।
ReplyDeleteमेरी गुलाटियों औ मसखरी को मजबूरी न समझ,
ReplyDeleteउछाल रुपये सा न मार ग़म की अठन्नी मेरी।
बहुत जबरदस्त प्रस्तुति. बधाई.
धन्यवाद रचना जी। आपकी तारीफ मेरा हौसला बढ़ाती है।
ReplyDeleteदरिया ए दौलत में उसे सूकूं के पानी की तलाश,
ReplyDeleteतर बतर करती बूंद ए ओस सी चवन्नी मेरी।
bahut khub shukla ji wakai dilko chhugai apki ye pankati