शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

ये वक़्त ए इद्दत है..

सितमगर को मालूम, है खा़क़ ए मंज़िल मकां,
ये मेला कब्र का, यूं साज ओ सामां क्यूं है।

अज़ल का ख़ौफ़, है पैबस्त ए पेशानी शिक़न,
सफर ये सब्र का, यूं ज़ुल्म ओ दामां क्यूं है।



ज़फ़ा की जुस्तजू, शिद्दत से पुर ओ इमां से,
यही तरीक़ अजल से, यूं ग़म ए गिरेबां क्यूं है।

नहीं मैं दूर, ना तुझसे ना इस ज़माने से,
ये वक्त ए इद्दत है, यूं शाम ए परेशां क्यूं है।

ये तेरा दामन, रंगेगा और अभी छीटों से,
तू है शैदाई, यूं सहर ए तमाशा क्यूं है।



अज़ल-मौत। पैबस्त-समाया। पेशानी-माथा। अजल- क़यामत का पहला दिन। इद्दत- तलाक़ के बाद पुनर्विवाह से पहले की न्यूनतम मियाद। सहर- सुबह।


© पंकज शुक्ल। 2011।

चित्र सौजन्य- फिल्म 'प्यासा'