मंगलवार, 13 सितंबर 2011

दाग अच्छे हैं...

सिल्क स्मिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। सिनेमा ने उनको जीते जी कभी वो इज्जत नहीं बख्शी जो अब एकता कपूर जैसी निर्माता उन पर पूरी एक हिंदी फिल्म बनाकर उन्हें देने जा रही हैं। कौन थी सिल्क स्मिता? कैसे वो बनी सिल्क स्मिता? और क्या होता था सिल्क स्मिता होने का मतलब? आइए, करते हैं कोशिश सिल्क स्मिता के इस तिलिस्म को सुलझाने की।


पंकज शुक्ल
दाग अच्छे हैं। एक मशहूर उत्पाद के विज्ञापन की ये लाइन हिंदी सिनेमा के लिए इन दिनों बिल्कुल मुफीद साबित हो रही है। सिंघम और बॉडीगार्ड जैसी फिल्मों में भले आदर्श नायक की बड़े परदे पर वापसी ने आम सिनेमा दर्शकों की भीड़ सिनेमाघरों तक पहुंचा दी हो, लेकिन समाज की बंदिशों के परदों में छुपे और अब तक अतीत के पन्नों में कैद रहे किरदार भी अपनी कमजोरियों के साथ रुपहले परदे पर मौजूदगी दर्ज कराने को बेताब हो चले हैं। छोटे परदे पर परंपराओं और रिश्तों के ताने बाने बुनती रहीं निर्माता एकता कपूर बड़े परदे पर इस मौजूदा प्रयोगात्मक चलन की मशाल लेकर सबसे आगे हैं और इस बार उनकी टीम ने सिनेमा के कैनवास पर उकेरा है एक ऐसा किरदार, जिसे लेकर जितने मुंह उतनी बातें होती रही हैं।

अस्सी के दशक के दक्षिण भारतीय सिनेमा में मादकता के नए बिंबों के सहारे दुनिया भर में मशहूर हुई अदाकारा सिल्क स्मिता को जीते जी कभी वो इज्जत नसीब नहीं हुई जो हिंदी सिनेमा उन पर एक पूरी फीचर फिल्म बनाकर उसे देने जा रहा है। सिल्क स्मिता की शोहरत का ये आलम था कि हिंदी सिनेमा भी उसे उस वक्त अपनाने के मोह से खुद को बचा नहीं पाया। सिल्क स्मिता कौन थी? कहां से आई? और क्यों हिंदी सिनेमा के पांच बड़े प्रोडक्शन घरानों में शुमार बालाजी टेलीफिल्म्स को क्यों इस फिल्म को बनाने की सूझी? इस पर बात करने से ज्यादा ये जानना जरूरी है कि आंध्र प्रदेश में राजमुंदरी के एल्लुरू 2 दिसंबर 1960 को जन्मी विजयालक्ष्मी कैसे पहले स्मिता बनी और फिर सिल्क स्मिता। ये वो नाम है जिसने एक समय दक्षिण भारतीय सिनेमा को अपने यौवन के जादू से हिलाकर रख दिया था और उस दौर की कोई भी फिल्म वितरक तभी खरीदते थे जब उसमें कम से कम सिल्क स्मिता का एक गाना जरूर हो।

अपने दस साल के छोटे से करियर में करीब पांच सौ फिल्मों में काम करने वाली सिल्क स्मिता का परिवार इतना गरीब था कि घर वाले उसे सरकारी स्कूल में भेजने तक का खर्च उठाने में नाकाम रहे। चौथी क्लास में पढ़ाई छूटी और पहला काम उसे मिला फिल्मों में मेकअप असिस्टेंट का। वो शूटिंग के दौरान हीरोइन के चेहरे पर शॉट्स के बीच टचअप का काम किया करती। और, यहीं से उसकी आंखों में पलने शुरू हुए ग्लैमर के आसमान पर चांद की तरह चमकने के सपने। जिस हीरोइन का वो टचअप किया करती थी, उसी के खैरख्वाह फिल्मेकर से उसने दोस्ती की पींगें बढ़ाईं और 1979 में मलयालम फिल्म इनाये थेडी में पहली बार लोगों ने परदे पर देखी एक ऐसी लड़की जो गोरी नहीं थी, छरहरी नहीं थी, जिसकी अदाओं में शराफत नहीं थी और जिसकी आंखें आम लड़कियों की तरह शर्म से झुकती नहीं थी।

स्मिता को करियर का बड़ा ब्रेक मिला 1980 में रिलीज हुई फिल्म वांडी चक्रम में। उसमें उन्होंने अपने किरदार को खुद डिजाइन किया और मद्रासी चोली को फैशन स्टेटमेंट बना दिया। इस फिल्म तक उनका नाम सिर्फ स्मिता ही था, लेकिन फिल्म में अपने किरदार सिल्क को मिली शोहरत को उन्होंने अपने साथ जोड़ते हुए अपना नाम सिल्क स्मिता कर लिया। उन्होंने सिल्क, सिल्क, सिल्क नाम की एक फिल्म में लीड रोल भी किया। 1980 से 1983 का दौर सिल्क स्मिता के करियर वो दौर था जिसमें उन्होंने करीब 200 फिल्में की। एक दिन में तीन तीन शिफ्टों में काम किया और एक एक गाने की कीमत 50 हजार रुपये तक वसूली। यही वो दौर था जब पूरी फिल्म बना लेने के बाद भी निर्माता सिर्फ उनके एक गाने के लिए अपनी फिल्मों की रिलीज महीनों तक रोके रहते थे। सिल्क स्मिता की शोहरत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शिवाजी गणेशन से लेकर रजनीकांत, कमल हासन और चिरंजीवी तक की फिल्मों में उनका कम से कम एक गाना उस वक्त की जरूरत बन चुका था। मसाला फिल्मों के निर्देशकों पर चल चुके इस जादू ने लीक से हटकर फिल्में बनाने वाले निर्देशकों बालू महेंद्रा और भारती राजा को भी अपनी चपेट में लिया। बालू महेंद्रा ने सिल्क स्मिता को अपनी फिल्म मूरनम पिराई में खास रोल दिया और इसे जब उन्होंने हिंदी में सदमा के नाम से बनाया तो सिल्क स्मिता को उसमें भी रिपीट किया।

जितेंद्र-श्रीदेवी और जितेंद्र-जया प्रदा की हिंदी फिल्मों के इसी दौर में सिल्क स्मिता ने हिंदी सिनेमा में प्रवेश किया। सदमा रिलीज होने के ठीक महीने भर पहले वो जीत हमारी नाम की फिल्म के जरिए मायानगरी के निर्माताओं को अपने हुा का जलवा दिखा चुकी थीं। और इसके बाद तो ताकतवाला, पाताल भैरवी, तूफान रानी, कनवरलाल, इज्जत आबरू, द्रोही और विजय पथ तक सिल्क स्मिता हिंदी सिनेमा के दर्शकों को अपनी शोहरत की वजह का एहसास कराती रहीं। लेकिन, शोहरत के दौर में अपने निजी जीवन को संतुलित न रख पाने की कीमत उन्हें करियर के ढलान पर आते ही चुकानी पड़ी। सिल्क स्मिता के एक करीबी मित्र ने उन्ंहें फिल्म निर्माता बनने का लालच दिखाया और सिर्फ दो फिल्मों के निर्माण में ही उन्हें दो करोड़ रुपये का घाटा हो गया। तीसरी फिल्म शुरू तो हुई पर कभी पूरी नहीं हो सकी। बैंक में घटती रकम और एक स्टार की जीवनशैली कायम रखने के दबाव ने सिल्क स्मिता को मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर कर दिया और 23 सितंबर 1996 को उनकी लाश उनके ही घर में पंखे से झूलती पाई गई। पुलिस ने इसे आत्महत्या का मामला मानते हुए ये केस बंद कर दिया, हालांकि ऐसे भी लोगों की कमी नहीं है जो इसे हत्या का मामला मानते हैं और इसके पीछे एक बड़ी साजिश की आशंका जताते रहे हैं।

कहानी थोड़ा फिल्मी है
सिल्क स्मिता के निर्देशक मिलन लूथरिया की फिल्म डर्टी पिक्चर की पहली झलक सामने आने के साथ ही आई है ये खबर कि अब निर्देशक श्याम बेनेगल भी बिपाशा बसु को लेकर इसी से मिलती जुलती कहानी पर एक फिल्म बनाने जा रहे हैं। एक हीरोइन के शीर्ष पर पहुंचने और फिर वहां से लुढकने की कहानी ही निर्देशक मधुर भंडारकर की फिल्म हीरोइन की भी कहानी है। परवीन बाबी के अमिताभ बच्चन और कबीर बेदी से रिश्तों पर महेश भट्ट पहले ही निर्देशक मोहित सूरी के साथ वो लम्हे बना चुके हैं। परवीन बाबी से खुद अपने रिश्तों को लेकर उन्होंने फिर तेरी कहानी याद आई और अर्थ जैसी फिल्में बनाईं। इसी तरह गायक किशोर कुमार के व्यावसायिक और निजी जीवन को लेकर एक फिल्म की चर्चा अरसे से हिंदी फिल्म जगत में होती रही।
दूर से चमकीले दिखने वाले फिल्म जगत के ग्लैमर की कड़वी सच्चाइयों को सत्य घटनाओं पर आधारित इन फिल्मों के अलावा काल्पनिक कहानियों के जरिए भी परदे पर उतारा जा चुका है, जिनमें रामगोपाल वर्मा की रंगीला, मस्त और नाच जैसी फिल्में शामिल हैं। वर्मा की फिल्म मस्त खुद उनके श्रीदेवी को लेकर दीवानेपन की कहानी है। हाल के दिनों में निर्देशक तनुजा चंद्रा ने इसी तरह फिल्म स्टार बनाई। रोहित जुगराज ने सुपरस्टार, केन घोष ने चांस में डांस, राजकुमार संतोषी ने हल्ला बोल, जोया अख्तर ने लक बाइ चांस में ग्लैमर की दुनिया में परदे के पीछे के सच को सामने लाने की कोशिश की।


देसी सौंदर्य की प्रतिमूर्ति थी सिल्क स्मिता
अनामिका

सिल्क स्मिता ने बीस साल पहले जो किया, उसे समझने के लिए हमें आज के दौर में नहीं बल्कि बीस साल पीछे जाना होगा। ये वो दौर था जब परदे पर श्रीदेवी का जादू चला करता था। लेकिन हर भारतीय स्त्री तो श्रीदेवी जैसी सुंदर नहीं हो सकती। सिल्क स्मिता ने चाहे बिकनी पहनी, साड़ी पहनी हो, या फिर हॉट पैंट्स और बुनाई वाले ब्लाउज पहने हो, उनके हर पहनावे में आम भारतीय नारी को अपनी कल्पनाएं नजर आईं। शायद कम ही लोग जानते होंगे लेकिन सिल्क स्मिता के दीवाने जितने पुरुष थे, उससे कहीं ज्यादा बड़ा प्रशंसक वर्ग उस दौर में उनका महिलाओं में था। और, ऐसा इसलिए क्योंकि सिल्क स्मिता ने उस दौर में समाज की वर्जनाएं तोड़ भारतीय महिलाओं की बरसों से दबी कुचली दैहिक संतुष्टि की इच्छाओं को प्रकट करने का रूपक दिया था। सिल्क ने उन भावनाओं को परदे पर जिया जिनकी झलक हमें खजुराहो के मूर्ति शिल्प में ही मिलती रही।
ऐसा नहीं है कि इन इच्छाओं को किसी और नायिका या खलनायिका ने हिंदी सिनेमा में उनसे पहले करने की कोशिश ही नहीं की, लेकिन सिल्क स्मिता का आम नायिका से विपरीत आम महिला के ज्यादा करीब होना उनके हक़ में गया। भारतीय फैशन की जहां तक बात की जाए तो सिल्क स्मिता ने ही दक्षिण भारतीय नायिकाओं को लो वेस्ट साड़ी पहनने की प्रेरणा दी। रही बात आज के दौर की तो मौजूदा दौर में सिल्क स्मिता का देशी यौवन परदे पर प्रदर्शित करने के लिए एक हीरोइन को पहले तो प्लास्टिक सर्जन की जरूरत होगी क्योंकि जीरो फीगर के इस दौर में उनके जैसी मादकता दिखाने वाली कोई हीरोइन नहीं है। इस किरदार के सबसे करीब मेरी नजर से विद्या बालन ही हैं। हालांकि वो निजी जीवन में थोड़ा संकोची और शर्मीली हैं, लेकिन सिल्क स्मिता को समझने के लिए उनके बदन को देखने से ज्यादा उनकी मनोदशा को पढ़ना जरूरी है।

(अनामिका छावल मशहूर फैशन ब्रांड क्रॉसओवर बॉलीवुड की प्रबंध निदेशक हैं)


औरत होने का सबसे करीबी एहसास मिला- विद्या बालन
सिल्क स्मिता के किरदार पर परदे को उतारने के लिए हिंदी सिनेमा की मौजूदा दौर की नायिकाओं में से एकता कपूर ने विद्या बालन को चुना। सिनेमा और फैशन के जानकार भी मानते हैं कि इस किरदार के लिए विद्या बालन से बेहतर पसंद दूसरी नहीं हो सकती थी। पेश है विद्या से बातचीत के कुछ अंश
फिल्म डर्टी पिक्चर में काम करने का अनुभव कैसा रहा?
मेरे हिसाब से मुझे एक औरत होने के इतनी करीबी एहसास को महसूस करने का मौका पहले कभी नहीं मिला, जितना कि इस फिल्म की शूटिंग के दौरान हुआ। ये फिल्म औरत के इंद्रध्ानुषी रंगों को जीने का जश्न है। इसमें जीवन के तमाम रंग हैं, लेकिन एक ाी के जीवन में जितने विविध्ा रंग होते हैं, उनको पेश करने का ये सबसे करीबी मौका रहा।

लेकिन, एक साथ तीन तीन नायक?
ये तो सोने पर सुहागा जैसा रहा। वो कहते हैं ना कि एक से मेरा क्या होगा? लेकिन मजाक ना भी करूं तो भी ये बहुत ही रोचक और दिलचस्प रहा। नसीर साब के साथ तो मैं पहले ही काम कर चुकी हूं तो वो हर पल मेरा हौसला बढ़ाते रहे। इमरान के साथ काम करने को लेकर मैं थोड़ा संकोच में थी, पर उनके साथ भी मजा आया। और तुषार के साथ तो हैदराबाद में शूटिंग करते वक्त मैंने बहुत अच्छा वक्त गुजारा। सबसे बड़ी बात ये थी कि मैं एक ऐसे निर्देशक के इशारों पर काम कर रही थी जिसे ऐसे विषयों को संभालने में महारत हासिल है।

तो फिल्म के बाद आप भी सिल्क कहलाने के लिए तैयार हैं?
मैंने इस फिल्म में एक किरदार किया है। इस दौरान मैंने इस किरदार को न सिर्फ पूरी ईमानदारी से जीने की कोशिश की बल्कि ये भी ख्याल रखा कि इस खास किरदार के प्रशंसकों को मैं उतनी ही संतुष्टि दे पाऊं जितनी कि उन्हें इस कलाकार को देखते वक्त होती थी। मेरा काम यहीं खत्म हो जाता है और मुझे नहीं लगता कि फिल्म रिलीज होने के बाद मुझे लोग सिल्क के नाम से पुकारना चाहेंगे।