मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

भरत कर मनन भारत का...


पुरुष छह, दिन तीन,
गुणा औ अट्ठारह दिन का,
नहीं रहा कुरुक्षेत्र,
रण ये दिन गिन गिन का।

स्वयं सब पांडव बताते,
कौरव औ होंगे कौन,
के बन शिखंडी कौन,
बनेगा तूण का तिन तिनका।

के फिर शय्या पर पितामह,
औ द्वंद्व है चिंतन का,
रही है दिल्ली कांप,
ये अभिशाप पुर हस्तिन का।

कांचन पुरी का मध्य,
औ मौन ये संजय का,
युवराज का रण राग,
गांधारी के तम गगन का।

खुर तेग है किस ओर,
द्वापर नहीं कलयुग का,
अब व्यास गद्दी छोड़,
भरत कर मनन भारत का।

(पंशु. 27122011)


फोटो : गिरीश श्रीवास्तव

रविवार, 25 दिसंबर 2011

चुनावों से ऐन पहले परदे पर गूंजेगा पवार को पड़ा थप्पड़

अक्षय खन्ना की नई फिल्म ‘गली गली चोर है’ में सिस्टम के गाल पर आम आदमी का थप्पड़ पड़ने वाला है। जाहिर है ये दृश्य आपको दिल्ली में पवार के गाल पर पड़े थप्पड़ की याद भी दिलाएगा। सिस्टम से जूझते भारत कुमार की वापसी आप सब को मुबारक़ हो..

पंकज शुक्ल

केंद्रीय मंत्री और एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार के गाल पर पड़े आम आदमी के तमाचे की गूंज जल्द ही आपको बड़े परदे पर सुनाई देने वाली है। दिलचस्प बात ये है कि ‘गली गली चोर है’ नाम की भोपाल में शूट हुई जिस फिल्म में एक आदमी द्वारा एक नेता को थप्पड़ मारे जाने का ये सीन फिल्माया जा चुका है, उसके निर्माताओं में एनपीसी के ही एक बड़े नेता की पत्नी भी शामिल हैं। फिल्म का पहला ट्रेलर सेंसर बोर्ड पास कर चुका है और इसे फिल्म डॉन 2 के प्रिंट्स के साथ जोड़ने की कसरत शुक्रवार को देर शाम तक चलती रही। छोटे परदे पर ये धमाकेदार ट्रेलर एक जनवरी से प्रकट होने वाला है।

पांच राज्यों के चुनाव सिर पर हों, अण्णा हजारे के अनशन की मुंबई में जगह तय हो चुकी हो, चारों तरफ भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल बन रहा हो, तो भला हिंदी सिनेमा पर इसका असर कैसे न पड़े? तो तमाम सुपरहिट कॉमेडी फिल्मों के लेखक रूमी जाफरी बतौर निर्देशक जो तीसरी फिल्म लेकर दर्शकों के सामने विधानसभा चुनावों से ठीक पहले बड़े परदे पर लौट रहे हैं, उसका पूरा का पूरा कलेपर ही इंडिया अगेन्स्ट करप्शन आंदोलन की ब्रांडिंग करता नजर आता है।

अक्षय खन्ना अभिनीत फिल्म के जो अंश मैंने खासतौर से देखने में कामयाबी पाई, उसमें एक जगह एक नेता आम आदमी से कहता है, ये जो शहर शहर में तुम लोगों ने मोमबत्ती गैंग बना रखा है, उससे कुछ नहीं होने वाला। कितना भी तुम लोग मोमबत्तियां जला लो, हमारे भीतर का लोहा नहीं पिघलने वाला।


** महाराष्ट्र के एनसीपी नेता सचिन अहीर की पत्नी ने बनाई फिल्म ‘गली गली चोर है’ * टीम अण्णा के धरना स्थलों पर बजेगा 'गली गली चोर है' का शीर्षक गीत **

टीम अण्णा के 27 दिसंबर से दिल्ली और मुंबई में प्रस्तावित धरना और अनशन कार्यक्रमों में फिल्म का शीर्षक गीत ‘गली गली चोर है’ बज सके इसके लिए फिल्म के निर्देशक रूमी जाफरी की टीम अण्णा के सदस्यों से मुलाकात हो चुकी है। तैयारी फिल्म के कलाकारों को अण्णा के अनशन स्थल पर भी ले जाने की है। फिल्म में एक नेता को भोपाल के एक आम आदमी द्वारा थप्पड़ मारे जाने का दृश्य रखे जाने की वजह पूछे जाने पर निर्देशक रूमी जाफरी का दावा है कि जिस दिन फिल्म की यूनिट भोपाल से शूटिंग निपटाकर लौटी, उसी रात फिल्म में काम कर रहे सतीश कौशिक ने उन्हें फोन कर इस खबर की जानकारी दी। लेकिन, ये पूछे जाने पर कि एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार को मारे गए थप्पड़ से प्रेरित दृश्य वाली फिल्म के निर्माताओं में एनसीपी नेता सचिन अहीर की पत्नी संगीता अहीर का होना भी क्या महज संयोग है? रूमी जाफरी ने कोई टिप्पणी करने से इन्कार कर दिया।

video

एनसीपी नेता सचिन अहीर को एनसीपी में छगन भुजबल का काफी करीबी माना जाता है। लेकिन, अजित पवार के महाराष्ट्र में एनसीपी की कमान थामने के बाद से सुर्खियों में रहने के शौकीन सचिन अहीर पार्टी में हाशिए पर हैं। अपनी पत्नी संगीता अहीर के नाम से फिल्में बनाने वाले और हर साल गोविंदा उत्सव में बड़े बड़े सितारों को बुलाने वाले सचिन अहीर के करीबियों के मुताबिक सियासी थप्पड़कांड को फिल्म में शामिल करने के पीछे सोची समझी रणनीति है और इसीलिए फिल्म के पहले ही ट्रेलर में इसे खासतौर से शामिल किया गया है।

रविवार, 11 दिसंबर 2011

मैं ग़ालिब नहीं, आनंद बक्षी बनना चाहता हूं...

क्या आप जिंदगी को जीने में यकीन करते हैं? तो जाहिर है गाना भी गाते होंगे। सबके सामने न सही, अकेले में ही सही। जरा सोचिए तो कौन सा गाना है जो आपके जेहन में बार बार उभरता रहता है। जाहिर है इस गीत में कोई न कोई कविता जरूर छुपी होगी। पर क्या आपको लगता नहीं कि हिंदी सिनेमा के गीतो से कविता धीरे धीरे गायब हो रही है? तीन अलग अलग धाराओं के गीतकारों जावेद अख्तर, इरशाद कामिल और जलीस शेरवानी से बातचीत में जानने की कोशिश की गई कि क्या है इसकी वजह?

पंकज शुक्ल

जावेद अख्तर जब कहते हैं कि हिंदुस्तान मूल रूप से गाने वालों का देश रहा है और हिंदी सिनेमा के मौजूदा संगीत में गाने की तरफ तवज्जो कम और बाजे की तरफ ज्यादा हो चली है, तो बात को सिरे से पकड़ने की कोशिशें करना हर उस शख्स के लिए लाजिमी हो जाता है जो कभी बाथरूम में, कभी रात के अंधेरे में, कभी स्टीयरिंग हाथ में लिए या कभी बस यूं ही तनहाई में गुनगुनाते रहने का आदी रहा है। लेकिन, हम जो गाने गुनगुनाते हैं, वो कौन से गाने हैं? क्या हम शीला, मुन्नी, जलेबी गाते हैं? या फिर हम अब भी फाया कुन फाया कुन, पी लूं तेरे भीगे भीगे, तेरे मस्त मस्त दो नैन के साथ साथ एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा, ही गुनगुनाते हैं। हिंदी सिनेमा के गीतों से कविता गायब होती जा रही है। पर साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, गोपाल दास नीरज, योगेश, संतोष आनंद का लिखा लोग अब भी गुनगुनाते हैं, गाते हैं और इन गानों के शब्दों के मायने तलाशते हैं, फिर हिंदी सिनेमा के गीतों से कविता गायब क्यूं हो रही है?

जवाब मशहूर गीतकार जलीस शेरवानी देते हैं, आज हम अनपढ़, अनभिज्ञ और अज्ञान लोगों के बीच अपनी रोटी कमाने को मजबूर हैं। जो लोग हमसे काम ले रहे हैं वो कविता को नहीं समझते। वो सिर्फ पैसे को समझते हैं। कुछ ढंग का लिखकर इनके पास ले जाओ तो कहते हैं ये बहुत ओल्ड स्कूल थॉट है, हमें कुछ नया चाहिए। कोई हुकर लाइन लेकर आओ।
हिंदी सिनेमा के गीतों से कविता के लुप्त होने का दर्द जावेद अख्तर ज्यादा शिद्दत से महसूस करते हैं। वह कहते हैं, लेकिन हम कुछ कर नहीं सकते। मेरे पास तो लोग इसीलिए गाने लिखवाने नहीं आते। वे कहते हैं, अरे इसके पास मत जाओ। ये तो पोएट्री लिख देता है। अब बताइए पोएट्री नहीं लिखी जाएगी गीतों में तो फिर क्या लिखा जाएगा। मुझे जो चीज समझ आ रही है वो ये कि हमारे समाज में जो हाल के बरसों मंे तेजी आई है, वो हर जगह अपना असर छोड़ रही है। हम लोगों का चैन जा रहा है। समाज का ठहराव जा रहा है और चीजों को गहराई में जाकर समझने का हमारे पास वक्त नहीं है। ऐसा लोग कहते हैं। तो गीतों में भी ये ठहराव और ये चैन अब नहीं दिखता। कसूर जितना सिनेमा बनाने वालों का है उतना ही देखने और सुनने वालों का। हो सकता है कल को हमारे भीतर कहीं न कहीं ठहराव आना शुरू हो जाए और फिर से हमें गीतों में चैन और सुकून मिलने लगे।

गीतकार इरशाद कामिल इससे भी आगे जाकर दो बातें कहते हैं। वह कहते हैं, सिनेमा और साहित्य का जुड़ाव भले ज्यादा न हो पाया हो लेकिन जब तक अदब की दुनिया में शोहरत पाए लोगों ने सिनेमा की संगत कायम रखी, सिनेमा ज्यादा बिगड़ा नहीं। मैं तो कहता हूं कि हिंदी सिनेमा में लिखे गए गीतों में कविता कायम रखी जा सकती है और ये हिंदी साहित्य का हिस्सा भी हो सकती है। क्यों आखिर अदब और सिनेमा का अलम साथ साथ नहीं चल सकता। इरशाद कामिल ने हाल के तीन चार बरसों की तमाम हिट फिल्मों मसलन जब वी मेट, मेरे ब्रदर की दुल्हन, रॉक स्टार, वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई के गीत लिखे हैं। वह कहते हैं, मैं धुनकी धुनकी लागे भी लिखता हूं तो लिखता हूं कि तू हवा पानी आग है, तू दगा दानी दाग है, क्या ये कविता नहीं है? हिंदी सिनेमा के गीतों को सिर्फ बाजारू चीज समझने की आदत सिनेमा देखने वालों की है।

जलीस शेरवानी को इरशाद कामिल की इस बात से नाइत्तिफाकी है। वो कहते हैं, अदब की दुनिया खुद ही अपने आप में सिमटी रहती है। वो हिंदी सिनेमा को सही नजरिए से नहीं देखती, ये और बात है कि साहित्य के बड़े बड़े नाम सिनेमा से जुड़ने के लिए पहले भी हाथ पांव मारते रहते थे और आज भी मारते हैं। पर, जल्द ही इन लोगों को भी समझ में आ जाता है कि सिनेमा में दो वक्त की रोटी कमाने के लिए तमाम समझौते करने पड़ते हैं। आनंद बक्षी से बड़ा गीतकार मैं किसी को नहीं मानता, लेकिन कितनी इज्जत दी उनको हिंदी कविता के पैरोकारों या साहित्य के अलमबरदारों ने। किसी के जाने के बाद उसे महान बताना, उसकी याद में मुशायरे करना और बात है, उसके जीते जी उसको अदब में इज्जत न मिले तो क्या फायदा। मैं तो रोटी सिनेमा के गीतों से कमाता हूं और लिखने की कसक मुशायरों के लिए लिखकर अलग से पूरी करता हूं।

इन हालात के लिए जावेद अख्तर हिंदी सिनेमा के मौजूदा गीतों पर हावी होते संगीत को जिम्मेदार मानते हैं। वह कहते हैं, अब तो सिर्फ शोर सुनाई देता है। शब्द सुनाई कहां देते? कोई अच्छी लाइन आती भी है, तो उससे पहले तबले, ड्रम या किसी और वाद्य की ऊंची थाप चलने लगती है। ये संगीत का ऊंचा शोर, थाप, ये तो पश्चिम की निशानी रही है। भारत देश मूल रूप से गवैयों का देश रहा है और हम गाना गाने में यकीन करते हैं, गाना बजाने में नहीं। हिंदी सिनेमा के संगीत में गाने के बोलों की बजाय संगीत से श्रोता को आकर्षित करने की प्रवृत्ति ने ही सिनेमा के गीतों से कविता को नदारद कर दिया है।


इन हालात के लिए जावेद अख्तर हिंदी सिनेमा के मौजूदा गीतों पर हावी होते संगीत को जिम्मेदार मानते हैं। वह कहते हैं, अब तो सिर्फ शोर सुनाई देता है। शब्द सुनाई कहां देते? कोई अच्छी लाइन आती भी है, तो उससे पहले तबले, ड्रम या किसी और वाद्य की ऊंची थाप चलने लगती है। ये संगीत का ऊंचा शोर, थाप, ये तो पश्चिम की निशानी रही है। भारत देश मूल रूप से गवैयों का देश रहा है और हम गाना गाने में यकीन करते हैं, गाना बजाने में नहीं। हिंदी सिनेमा के संगीत में गाने के बोलों की बजाय संगीत से श्रोता को आकर्षित करने की प्रवृत्ति ने ही सिनेमा के गीतों से कविता को नदारद कर दिया है। इरशाद कामिल भी हिंदी सिनेमा के गीतों में कविता को न सिर्फ बनाए रखने के हिमायती हैं बल्कि खुद को हिंदी साहित्य और सिनेमा के बीच का पुल बनाने के लिए भी तैयार हैं। वह कहते हैं, अगर अच्छा लिखा जाएगा तो अच्छा सुना भी जाएगा। मैं तकरीबन रोज ही किसी न किसी फिल्म में गीत लिखने के प्रस्ताव को ना कह देता हूं। जबकि लोग मुझे मुंहमांगी कीमत देने का प्रस्ताव भी देते हैं लेकिन मैं जानता हूं कि अच्छा लिखने के लिए मुझे खुद को लालची बनने से रोकना होगा। मैं कम लिखना चाहता हूं लेकिन बेहतर लिखना चाहता हूं। अभी तक तो इसमें कामयाबी भी मिली है और लोगों ने अच्छे गीतों को सराहा भी है।

पर, इरशाद कामिल बनना और इस बने पर टिके रहने की जिद रखना सबके बूते की बात नहीं दिखती। इरशाद अपनी कामयाबी के लिए जहां अपने पुराने दोस्त और निर्देशक इम्तियाज अली के खुद गालिब और रूमी के करीब होने को भी श्रेय देते हैं, वहीं अरसे से फिल्मों के लिए संवाद लिखते रहे और सलमान खान की तमाम फिल्मों के लिए सुपरहिट गीत लिख चुके जलीस शेरवानी साफ कहते हैं, मुझे गालिब बनकर भूखा नहीं मरना। मैं आनंद बक्षी बनना चाहता हूं।

© पंकज शुक्ल। 2011

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

“वो दौर और था, ये दौर और है..”


पंकज शुक्ल

इसी साल आजादी की सालगिरह से ऐन पहले मुलाकात हुई देव आनंद से। मिलने के लिए वक्त मांगने पर फोन का जवाब खुद दिया। फोन वो खुद ही उठाते थे। दूसरी तरफ से आती हैलो की आवाज फोन करने वाले को एक मिनट के लिए ऊपर से नीचे तक रोमांचित कर देने के लिए काफी थी। न कहीं आज के सुपर सितारों सा चारों तरफ पसरा छद्म आवरण और न ही खुद पर किसी तरह का गुमान। अतीत से किसी तरह की मोहब्बत नहीं और सपने उनके जैसे जैसे हकीकत में बदलते जाते, थोड़ा और फैलते जाते, शायद कभी न पूरे होने के लिए।

शिकायत वो लोग करते हैं, जिन्हें दूसरों से उम्मीद होती है। मुझे अब किसी से क्या चाहिए? मैंने जितना चाहा, मुझे उससे सौ गुने से भी ज्यादा मिला। जितनी उम्र लोगों की होती है, उससे ज्यादा वक्त तो मैं फिल्मों में काम कर चुका हूं।


कहते थे, मैं सपनों में जीने का आदी हूं। ये सपने मुझे लगातार काम करते रहने के लिए उकसाते हैं। ये पूरे हो गए तो मैं पूरा हो जाऊंगा। आखिरी सपना देवसाब का था तो बस हरे रामा हरे कृष्णा को फिर से बनाने का। हालांकि बस यही एक बात ऐसी थी जो उनके अपने उसूलों से मेल नहीं खाती थी। कम लोग ही जानते होंगे कि कभी प्रीतिश नंदी और अजय देवगन ने उनकी फिल्म गाइड को फिर से बनाने के लिए देव साब की चौखट न जाने कितनी बार लांघी होगी। सारी बातों मुलाकातों का लब्बोलुआब यही रहा कि गाइड दोबारा नहीं बनेगी। बातों बातों में उस दिन यूं ही मैं भी पूछ बैठा, आप रीमेक के जब इतने खिलाफ हैं, तो हरे रामा हरे कृष्णा फिर क्यूं बनाना चाहते हैं? बोले, पंडित जी आप तो तकदीर को मानते होंगे। मैं आज के युवाओं को बताना चाहता हूं कि उनकी तकदीर उनके हाथों में हैं। नशा, ड्रग्स, जुआं ये सब आज भी वैसा ही है जैसा तब था। सियासत में नए लोगों को आना चाहिए। मेरी बस यही एक कोशिश अपने मुकाम तक नहीं पहुंच सकी।

वो मुलाकात राज कपूर के बारे में उनकी राय जानने को लेकर थी। सब जानते हैं कि देव साब अतीत की यादों में जाने से सख्त नफरत करते रहे। बातचीत की शुरुआत में लगा भी कि शायद देव साब बात करेंगे नहीं। लेकिन, उनकी रंगीन फिल्म हम दोनों की यादों से मैंने बातों का सिरा पकड़ा। वो बताने लगे कि कैसे उन्होंने अपनी तमाम पुरानी हीरोइनों को बुलाया। दिलीप साब को भी बुलाया। शाहरुख खान को भी बुलाया और टीना अंबानी को भी। सब जानते हैं कि इनमें से कोई नहीं आया। हम दोनों के रंगीन संस्करण की रिलीज के प्रीमियर के मौके पर। लेकिन कम लोग ही जानते हैं कि उन्होंने कभी किसी की बात का रंज नहीं माना। बोले, शिकायत वो लोग करते हैं, जिन्हें दूसरों से उम्मीद होती है। मुझे अब किसी से क्या चाहिए? मैंने जितना चाहा, मुझे उससे सौ गुने से भी ज्यादा मिला। जितनी उम्र लोगों की होती है, उससे ज्यादा वक्त तो मैं फिल्मों में काम कर चुका हूं।

लोग अक्सर यही समझते रहे कि देव साब और राज कपूर की पटती नहीं थी। फिल्म इश्क, इश्क, इश्क के प्रीमियर पर राज कपूर द्वारा जीनत अमान को सबके सामने चूमने और देव आनंद की खोज होने के बावजूद जीनत के राज कपूर की तरफ लगातार खिंचते जाने पर भी बातें हुईं। वो बोले, जीनत ने क्या किया, क्यंू किया, क्या सोचकर किया? इन सब बातों में मैं नहीं जाना चाहता। हां, मैं अब भी जीनत को अपनी खोज मानता हूं, पर शायद तब मैंने ही ज्यादती की होगी उस पर अपना अधिकार जताकर। जीनत मुझे अमरजीत (हम दोनों के निर्देशक) की पार्टी में मिली थी। उस शाम ने उसकी तकदीर बदल दी। ऐसा ही कुछ और भी हीरोइनों के साथ हुआ, जिनके लिए मैं मिडास टच बना। टीना मुनीम (अब टीना अंबानी) से मेरी मुलाकात यूं ही एक शूटिंग पर हुई। वो शायद मेरी फिल्म की शूटिंग देखने आई थी। उसने उस दिन मेरा ऑटोग्राफ भी लिया। वहीदा को गुरुदत्त लेकर आए थे हैदराबाद से सीआईडी के लिए, लेकिन गाइड में उन्हें लेने का फैसला मेरा था। हेमा मालिनी को गोल्डी ने जॉनी मेरा नाम में लिया, उन दिनों हेमा हर डायरेक्टर से कहा करती थी, मुझे देव आनंद के साथ काम करना है।

फिर से राज कपूर से अपने रिश्तों के बारे में कुरेदने पर देव साब बोले, राज से मेरा कभी कोई झगड़ा नहीं रहा। दिलीप साब की तो मैं आज भी बहुत इज्जत करता हूं। हम तीनों ने एक साथ बुलंदियों को छुआ, लेकिन आज के दौर की तरह हमने कभी एक दूसरे के खिलाफ कहीं भी कोई उल्टी सीधी बात नहीं की। पंडित जी वो दौर और था, ये दौर और है। मैं तो बस साहिर की लाइनों की तरह अब भी जीता हूं..मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया। हर फिक्र को..? गाने की लाइन यहीं छोड़कर वो मुस्कुराए। बाकी लाइन मुझे गाकर पूरी करनी ही पड़ी। क्या पता था, वो आधी लाइन तामउम्र यादों की तस्वीर बनकर साथ रह जाएगी।

© पंकज शुक्ल। 2011

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

वो उनवान ए उस्ताद, ये नाशुक्री नस्ल

उस्ताद सुल्तान खान के लिए लिखी गई सिनेमांजलि को आप लोगों ने पढ़ा, समझा और सराहा, इसके लिए तहे दिल से शुक्रिया। लोगों ने उस्ताद साब के बारे में और जानने की उत्सुकता दिखाई और इंदौर के घराने में उनके शामिल होने के बारे में भी जानना चाहा। पेश है उस्ताद पर लिखी सिनेमांजलि की ये दूसरी और अंतिम कड़ी।

सिनेमांजलि/ पंकज शुक्ल

उस्ताद सुल्तान खान भले सोमवार को जोधपुर के कब्रिस्तान में अपने वालिद की बगल में हमेशा हमेशा के लिए सो गए, पर वो हिंदुस्तानी संगीत पर जो एहसान कर गए हैं, उसे चुकता कर पाना आने वाली नस्लों के भी बस की बात नहीं होगी। उस्ताद तो खैर वो बाद में बने, लेकिन उस्तादी के अपने फन का पहला मुजाहिरा उन्होंने तभी कर दिया था जब अपने पहले उस्ताद और वालिद गुलाब खान के लाख समझाने पर भी उन्होंने गायिकी की बजाय सारंगी बजाने को ही अपना पहला इश्क़ बनाया। ये वो दौर था जब उस्ताद अब्दुल करीम खान और उस्ताद बड़े गुलाम अली खान की देखादेखी उस्ताद अमीर खां तक सारंगी छोड़ गायिकी का पहलू थाम बैठे थे।


लता मंगेशकर ने उन्हें अपने घर लगातार तीन महीने रखा। और जब खय्याम जैसे संगीतकार के साथ गालिब को गाने की बारी आई तो लता ने भी उस्ताद सुल्तान खान की सारंगी का ही सहारा लिया। खय्याम और उस्ताद सुल्तान खान का साथ फिल्म उमराव जान तक बदस्तूर जारी रहा और आशा भोसले भी इस फिल्म की तमाम गजलों में बजाई गई उस्ताद की सारंगी की कायल हुए बिना न रह सकीं।


जी हां, कम लोगों की मालूम होगा कि ये तीनों उस्ताद दरअसल पहले सारंगी के ही शागिर्द थे। लेकिन, संगतों में हारमोनियम की बढ़ती धमक और सारंगी बजाने में आने वाले मुश्किलात को देखते हुए गुलाब अली चाहते थे कि बेटा भी इन उस्तादों की तरह सारंगी छोड़ गायिकी में अपना रसूख बनाए। सोचिए, अगर तब सुल्तान खान ने वालिद का कहा मान लिया होता तो सारंगी का आज कौन नाम लेवा होता। सुल्तान खान सारंगी के उस्ताद तो बने लेकिन इंसानियत के शागिर्द वो ताउम्र बने रहे। कम शागिर्द ही होंगे ऐसे जिन्होंने अपना पुश्तैनी घराना छोड़ अपने उस्ताद का घराना अपना लिया। उस्ताद अमीर खां ने ही सुल्तान खान को पहले पहल बंबई में अपनाया और इस मोहब्बत ने दोनों के बीच ऐसा मेल कराया कि सीकर घराने का पानी इंदौर घराने के दूध में मिलकर उसके जैसा ही हो गया।

ये वो वक्त था जब लता मंगेशकर ने उन्हें अपने घर लगातार तीन महीने रखा। और जब खय्याम जैसे संगीतकार के साथ गालिब को गाने की बारी आई तो लता ने भी उस्ताद सुल्तान खान की सारंगी का ही सहारा लिया। खय्याम और उस्ताद सुल्तान खान का साथ फिल्म उमराव जान तक बदस्तूर जारी रहा और आशा भोसले भी इस फिल्म की तमाम गजलों में बजाई गई उस्ताद की सारंगी की कायल हुए बिना न रह सकीं। बेगम अख्तर जैसी बेहतरीन गजलदां से लेकर फिल्मी फन के माहिर मोहम्मद रफी तक सब उनकी सारंगी के मुरीद रहे। बीच में मीना कुमारी ने जब अपनी लिखी शायरी को खुद आवाज़ देने की कोशिश की तो उन्हें भी सहारे के लिए बस एक ही नाम याद आया-उस्ताद सुल्तान खान।

फन के रईस और शोहरत के गरीब उस्ताद सुल्तान खान अक्सर मिलने पर कहा करते, तुम लोग मीडिया वाले, जिसको चाहो स्टार बना दो। पर क्या तुम लोग वाकई हुनर को पहचानते हो या बस दावतों के दौर चलने पर ही अच्छा अच्छा लिखते हो। हिंदी सिनेमा ने उनसे क्या क्या नहीं पाया। लेकिन, सुपर्दे खाक होने के वक्त तक साथ रहे तो बस दो नए संगीतकार सलीम-सुलेमान। उन्हें अक्सर इस बात पर रंज होता कि जिस फन के लिए उन्होंने अपनी जिंदगी गुजार दी, उसकी बजाय नई पीढ़ी ने उन्हें जाना तो उनकी गायिकी के चलते। और, इस्माइल दरबार अगर फिल्म हम दिल दे चुके सनम का अलबेला सजन गाना बनाते वक्त भी उस्ताद से गाने की जिद न करते, तो न शायद पिया बसंती होता और न ही हम जैसे संगीत के नाशुक्रों को पता चलता कि क्या था इस उस्ताद का उनवान..अल्ला हाफिज़, सुल्तान साब। जहां भी रहिए, बस सुर सजाते रहिए।

सोमवार, 28 नवंबर 2011

अब नहीं सताएगा पिया बसंती

उस्ताद सुल्तान खान नहीं रहे। संगीत के करोड़ों कद्रदानों को ये खबर इतवार के दिन मायूस कर गई। किसी ने कहा एक और हीरा चला गया। किसी ने 71 साल की उम्र में भी उनकी जिंदादिली को याद किया तो किसी ने बताया कि कैसे उनके गुर्दों ने हाल ही में काम करना बंद कर दिया था। साल 2011 को पता नहीं हुनरमंदों से क्या दुश्मनी है। अभी भूपेन हजारिका को ऊपर पहुंचे देर ही कितनी हुई है।


सिनेमांजलि/ पंकज शुक्ल

साजिंदों और हुनरमंदों की ऊपरवाले के यहां दिनोंदिन मजबूत होती महफिल में जब उस्ताद सुल्तान खान की रूह गाएगी, तो शायद ऊपरवाला भी दिल मसोस कर ही रह जाएगा। वह कहते थे, मेरा रियाज़ नहीं गाता, मेरी रूह गाती है। बड़ा कलाकार होने के साथ साथ वो बड़े दिलवाले भी थे। 11 साल पहले की बात है। उन दिनों उनका अलबम पिया बसंती रिलीज हुआ था और दिल्ली के एक पंचसितारा होटल में तय हुई कोई दस मिनट की मुलाकात कैसे एक घंटे से ऊपर निकल गई, ना मुझे पता चला और न उन्हें। मुंह में गुटखा दबाए वो बोलते रहे। पर ये भी कहते रहे, मैं बोलता कम हूं। तुम लिखना चाहो तो लिखो। या ऐसे ही बात करते हैं।



मैं मस्तमौला इंसान हूं। जहां उस्ताद दिखे, भीतर का शागिर्द जाग गया। बड़े गुलाम अली खान हो या ओंकारनाथ ठाकुर, फय्याज़ खान या फिर सिद्धेश्वरी देवी सब मेरे उस्ताद हैं।


फिर बातें होती रहीं। उनके बचपन की कि कैसे कुश्ती और फुटबॉल से अलग कर एक दिन वालिद उस्ताद गुलाब खान ने उनके हाथ में सारंगी थमा दी। जैसे उनके वालिद और उनके पहली की उनकी सात पुश्तों को सारंगी से इश्क़ था, सुल्तान खान को भी हुआ। अपने वालिद की तरह गायिकी भी उनकी बेजोड़ रही। पर शोहरत अपने वतन से ज्यादा परदेस में मिली। वह कहते, यहां किसी के साथ बजाते तो बस साजिंदे ही कहलाते। वहां ऐसा नहीं है। वहां संगत करने वाले को भी मुख्य फनकार जितनी ही इज्जत मिलती है। प्रिंस चार्ल्स की 50वीं सालगिरह के लिए मिले न्यौते के बारे में भी वो अक्सर बताते।

फुटकर फुटकर मुलाकातें उनसे कई दौर की हुईं। ऐसी ही एक मुलाक़ात में मैं पूछ बैठा, आपको इंदौर घराने का बजैया माना जाता है, पर आपके हुनर में तो अलहदा चीजें भी बताई जाती हैं। उस्ताद ने उस दिन खुलकर बताया, मैं मस्तमौला इंसान हूं। जहां उस्ताद दिखे, भीतर का शागिर्द जाग गया। बड़े गुलाम अली खान हो या ओंकारनाथ ठाकुर, फय्याज़ खान या फिर सिद्धेश्वरी देवी सब मेरे उस्ताद हैं। शायद यही वजह रही कि बाद में उन्होंने एक खास अलबम भी इसीलिए निकाला और इस अलबम में उन्होंने तीन अलग अलग राग, तीन अलग अलग घरानों आगरा घराना (फय्याज़ खान), पटियाला घराना (बड़े गुलाम अली खान) और इंदौर घराना (उस्ताद आमिर खान) के हिसाब से गाए। लेकिन फिर भी इंदौर घराने के वो ताउम्र सबसे करीब रहे। कहते थे, उस्ताद आमिर खान साहब मेरे सबसे बड़े आदर्श रहे। उनकी तान और सरगम का मैं बहुत बड़ा मुरीद हूं।

पद्म भूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा देश विदेश में तमाम पुरस्कार उस्ताद सुल्तान खान के नाम के साथ जुड़कर सम्मानित होते रहे। और, वो वक्त के साथ आगे बढ़ते रहे। फिल्म हम दिल दे चुके सनम में अलबेला सजन आयो रे गाने के चंद दिनों बाद मिलने पर उस्ताद ने यूं ही बात चलने पर कहा था, संगीत सब जगह एक सा है। संगीत मेरे लिए ईश्वर है। उसके रूप अलग अलग हो सकते हैं। तो फिल्म हो या पश्चिमी संगीत, मेरे लिए सुरों की इबादत हर जगह एक जैसी है।

शनिवार, 26 नवंबर 2011

मैं बच्चा बनके फिर से रोना चाहता हूं..


के अपनी बदगुमानियों से उकता गया हूं,
मैं बच्चा बनके फिर से रोना चाहता हूं।

न हमराह न हमराज़ इन गलियों में लेकिन,
मैं इस शहर में अपना एक कोना चाहता हूं।

सुकूं आराम की मोहलत के कैसी ये क़ज़ा* है,
मैं अपनी मां के आंचल सा बिछौना चाहता हूं।

के यूं ख्वाहिश जगी दाग़ औ कीचड़ के फाहों की,
मैं बच्चा बनके राह गलियारों में सोना चाहता हूं।

सिसकना सब्र से ईमां का अब होता नहीं रक़ीब*,
ना बन दस्त ए गिरह रफ़ीक*, मैं खोना चाहता हूं।

मुसल्लम ए ईमां हूं क़ाफिर की सज़ा पाई है,
अब बोसा* ए संग ए असवद* भी धोना चाहता हूं.. (पंशु.)



क़ज़ा- मौत। रक़ीब - दुश्मन। रफ़ीक - दोस्त।
बोसा - चुंबन। संग ए असवद - मक्का का पवित्र पत्थर।

रविवार, 13 नवंबर 2011

बदगुमानियों का बिग बॉस

पहले लोग कहते थे कि बद अच्छा बदनाम बुरा। अब जमाना बदल गया है। बद अच्छा हो न हो पर बदनाम जरूर अच्छा हो गया है। छोटे परदे पर बदगुमानियों का नया बाजार सज चुका है। लोग इस बाजार में अपनी दुकान सजाने के लिए खुद ही कीचड़ में कूदने को तैयार हैं। और, टीवी चैनल बाहें पसारे और तिजोरियां खोले ऐसे लोगों का स्वागत भी करने को बेताब हैं।


पंकज शुक्ल

दामन के दाग अच्छे बताने के दौर में हर किसी को अपनी कमीज दूसरे से सफेद बताने का जमाना अब चला गया। अब वक्त है विवादों से सुर्खियां बटोरने का। और, विवाद जब लगे कि करियर आगे बढ़ाने और लाइम लाइट में बने रहने का एक जरिया बन जाएं तो साथ मिलता है बिग बॉस का। पांच साल से लगातार चलते आ रहे छोटे परदे के सबसे बड़े विवादों को जन्म देने वाले रिएल्टी शो बिग बॉस में इस बार स्वामी अग्निवेश की एंट्री ने लोगों को चौंका दिया। कहां बिग बॉस की इस गंगा में बंटी चोर, सीमा परिहार, मोनिका बेदी, वीना मलिक और कमाल राशिद खान जैसे लोग अपने हाथ धोते रहे और कहां स्वामी अग्निवेश? लेकिन जैसा कि हालिया रिलीज फिल्म रॉक स्टार में जनार्दन जाखड़ का साथी खटाना उसे समझाता है कि एवरीथिंग इज इमेज, कुछ कुछ वैसे ही बिग बॉस भी लोगों की बिगड़ी इमेज सुधारने का शॉर्ट कट बन गया है। पहले लोग बिग बॉस का मेहमान बनने के लिए अपनी साख पर जानबूझकर बट्टा लगवाते हैं और फिर कभी रो कर कभी दूसरों को धो कर अपनी इसी इमेज को सुपर रिन की चमकार सरीखा चमकाने की कोशिश करते हैं।

पिछले साल बिग बॉस का चौथा सीजन शुरू होने की सरगर्मी शुरू होते ही बीते जमाने की एक मशहूर अदाकारा और म्यूजिक अलबमों की चर्चित कलाकार ने अपना पीआर देखने वाले को फोन किया। चाहत ये थी कि किसी तरह ये बंदा अपने संबंधों का इस्तेमाल करके उसका नाम किसी बड़े विवाद में घसीटने का इंतजाम कर दे। इस अदाकारा ने अपने हिस्से भी जितने जुगाड़ थे, सब लगाकार बिग बॉस बनाने वाले प्रोडक्शन हाउस पर खूब डोरे डाले। लेकिन, मामला जम न सका। आप भी अगर गौर करें तो पाएंगे कि पिछले पांच साल से हर बार जब भी बिग बॉस शुरू होने को होता है, कोई न कोई छुटभैया कलाकार अपने जीवन का कुछ ऐसा सत्य लोगों के सामने लाने को तड़पने लगता है जिसे सुनकर लोगों के पैरों के नीचे की जमीन खिसके न खिसके, सिर के ऊपर का आसमान जरूर एकाध इंच इधर का उधर हो जाए। इसी साल बिग बॉस शुरू होने से ऐन पहले एवरग्रीन अभिनेता और निर्देशक देव आनंद की खोज कही जाने वाली एक अदाकारा ने खुद के लेस्बियन होने का सरेआम ऐलान कर दिया। चाहत वही कि आग लगे न लगे लेकिन इतना धुंआ तो उठ ही जाए कि बिग बॉस बनाने वाले उसके करियर बचाने के इस आपातकालीन सिगनल को समझ जाएं।

आप भी अगर गौर करें तो पाएंगे कि पिछले पांच साल से हर बार जब भी बिग बॉस शुरू होने को होता है, कोई न कोई छुटभैया कलाकार अपने जीवन का कुछ ऐसा सत्य लोगों के सामने लाने को तड़पने लगता है जिसे सुनकर लोगों के पैरों के नीचे की जमीन खिसके न खिसके, सिर के ऊपर का आसमान जरूर एकाध इंच इधर का उधर हो जाए। इसी साल बिग बॉस शुरू होने से ऐन पहले एवरग्रीन अभिनेता और निर्देशक देव आनंद की खोज कही जाने वाली एक अदाकारा ने खुद के लेस्बियन होने का सरेआम ऐलान कर दिया।

वैसे बिग बॉस बनाने वाले इस मामले में इतने उदार रहे हैं कि पुरुषों और महिलाओं को एक नजरिए से देखते हैं। झगड़ा चाहे श्वेता तिवारी के घर में हो या मनोज तिवारी के। उनकी नजर सब पर समान रूप से पड़ती है। यही नहीं पहले सीजन से ही वो पुरुष और महिलाओं का ये भेद मिटाने वाले कुछ कलाकारों पर भी मेहरबान रहे हैं। बॉबी डार्लिंग, रोहित वर्मा, नवाजिश अली से लेकर लक्ष्मी तक ये सिलसिला बदस्तूर जारी है। मामला शेरलिन चोपड़ा, राहुल महाजन, कमाल राशिद खान, खली और राखी सावंत जैसे लोगों से जुड़ा हो तो बिग बॉस को अपनी थैलियां खाली करने में भी कोई एतराज नहीं होता। छोटे परदे पर बदनामी को बेचने का ये फॉर्मूला बिग बॉस ने ही ईजाद किया और इसके बदले खूब कमाई भी की। वैसे बिग बॉस की इस गणित के पीछे एक बड़ा मनोविज्ञान भी काम करता है। मशहूर मनोचिकित्सक पवन सोनार कहते हैं कि हर इंसान के भीतर अच्छे और बुरे की पहचान करने की काबिलियत तो होती है लेकिन कई बार किसी किसी को अपनी बदगुमानियों में भी मजा आने लगता है। नकारात्मक किरदारों की कहानियों को बढ़ा चढ़ाकर पेश करने की मीडिया की परंपराओं से ये लोग अपनी खुराक पाते हैं और सुर्खियों में बने रहने के लिए कुछ न कुछ उल्टा सीधा करते रहते हैं।

राखी सावंत को इस मामले में सबसे आगे की चीज माना जाता है। इतना आगे कि वह छोटे परदे पर अपना स्वयंवर फिर से करने को तैयार हैं। वैसे तो इस सीजन के लिए संबंधित चैनल द्वारा पाकिस्तानी अदाकारा वीना मलिक का नाम फाइनल करने की बात करीब करीब पक्की हो चुकी है, लेकिन राखी भी दौड़ में शामिल रहना चाहती हैं। राखी सावंत जैसों ने ही छोटे परदे को बदनामी का बाजार बनाया और अब तक इसके जरिए खूब कमाई करती रही हैं। इन रिएल्टी शोज की अपनी शोहरत शुरू के दिनों में ऐसी रही कि देश के हर न्यूज चैनल ने इन कार्यक्रमों की क्लिपिंग घंटों घंटों चलाकर टीआरपी बटोरी और सरकार को भी होश तब आया जब राखी सावंत की एक टिप्पणी से कथित रूप से दुखी होकर झांसी के एक व्यक्ति ने आत्महत्या तक कर ली। ऐसे शो बनाने वालों की सूचना और प्रसारण मंत्रालय में लंबी पहुंच बताई जाती है और दिल्ली तक ही नहीं कुछ लोगों की पहुंच तो पड़ोसी मुल्कों के उन लोगों तक बताई जाती है जो ऐसे कार्यक्रमों के जरिए अपने पैसों पर लगे दाम भी इस गंगा में धोना चाहते हैं। इस बारे में मुंबई पुलिस को जानकारियां भी मिली। बीते साल इसे लेकर जांच भी शुरू हुई पर नतीजा वही ढाक के तीन पात।

बिना किसी तार्किक विवेचन के छोटे परदे पर इन दिनों हर तरह के कार्यक्रम बन रहे हैं। खाली दिमाग में रचे जाने वाले इन घरों में जो आबादी बसती जा रही है, उसका एक निशाना और भी है और वह है लोगों के दिमाग से सही और गलत की पहचान मिटा देना। समाज में कभी तिरस्कृत माने जाने वालों लोगों को ये कार्यक्रम अपने लिए सहानुभूति जुटाने का एक मंच देते हैं और बदले में पाते हैं दूसरों की दुखती रग में मजा लेने वालों से मिलने वाली टीआरपी। टीआरपी का ये खेल भारत के लिए भले नया हो पर टेलीविजन पर बहुत पुराना हो चुका है। यहां सब कुछ पहले से तय होता है। कलाकारों के बीच होने वाली मारपीट और जजों के बीच होने वाला झगड़ा भी। कभी अनु मलिक का करियर बर्बाद कर देने की कसमें खाने वाली अलीशा चिनॉय अब उन्हीं की बराबर की कुर्सी पर बैठकर म्यूजिक रिएल्टी शो जज करती हैं और ऐसे ही एक म्यूजिक रिएल्टी शो की प्रतियोगी की जिंदगी बर्बाद कर देने वाला एक संगीतकार किसी दूसरे शो में युवाओं की प्रतिभा को तराशने का काम भी पा जाता है। कुल मिलाकर, मामला ये कि अगर आप में बदनाम होने की दम है तो टेलीविजन आपको हाथों हाथ अपना सकता है। जानबूझकर पैदा किए गए इन विवादों की परिणति कभी कभी राजा चौधरी जैसे लोगों में भी होती है, जिन्हें मुंबई शहर से ही तड़ीपार कर दिया जाता है।

रविवार, 23 अक्तूबर 2011

‘नायिकाओं में पहनावे की तमीज नहीं रही’ : हेमा मालिनी


पंकज शुक्ल

“मैं नारी हूं। मैं परंपराओं की जननी भी हूं तथा उनका निर्वाह करने वाली भी। संसार मुझ पर मोहित है तो इतिहास गर्वित है। मुझमें जीवित है वो सारी नारियां जो अपने आदर्श चरित्र यहां स्थापित कर के गई हैं। मैं अतीत भी हूं और वर्तमान भी और आने वाले कल का उत्तरदायित्व भी।“ ये पंक्तियां भले हेमा मालिनी के नए संगीत नाटक नारी की हों, पर हेमा मालिनी पर सौ फीसदी सटीक बैठती हैं। इन पंक्तियों को हेमा ने निजी जीवन में भी जीकर दिखाया है। हेमा मालिनी से एक खास मुलाकात।

नायक प्रधान हिंदी सिनेमा में नायिका का आम दर्शकों से जो एक अनदेखा रिश्ता हुआ करता था, वो अब ग्लैमर की चकाचौंध में कहीं खो सा गया है। इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
हिंदी सिनेमा में नायिका की जब तक गर्ल नेक्सट डोर वाली छवि रही लोगों को उसमें अपने सपनों के अक्स नजर आते रहे। इसकी वजह ये थी कि तब की नायिकाओं ने जमीन से जुड़े किरदारों को ज्यादा तवज्जो दी। शर्मिला टैगोर जैसी नायिकाओं ने इस परंपरा को मजबूत दी थी। मैंने भी उस दौर में ऐसे तमाम किरदार निभाए। हर किरदार फिल्म संन्यासी जैसा नहीं हो सकता न, तो रजिया सुल्तान और मीरा जैसे किरदार भी निभाने की हिम्मत होनी चाहिए। ड्रीम गर्ल होना अच्छा है पर ड्रीम गर्ल हर जगह नहीं हो सकती। उस दौर में जब मैंने लाल पत्थर में काम किया तो लोग कहते थे कि ऐसे किरदार लोगों को अच्छे नहीं लगेंगे। लेकिन, हकीकत ये है कि ऐसे किरदारों में खासी मेहनत करनी होती है। अब तो नायिकाएं पैंट शर्ट और जीन्स पहनती हैं। कम कपड़े पहनती हैं और कभी कभी तो वो भी नहीं होता। पहनावे से भी नायिका की अलग छवि बनती है, लेकिन अफसोस की बात है कि हिंदी सिनेमा की नायिका में पहनावे की तमीज खत्म होती जा रही है।

यानी कि फिल्मी सितारों को लेकर जो पहले एक रहस्य का माहौल बना रहता था वो अब नहीं रहा?
इसके लिए कुछ टेलीविजन जिम्मेदार है, कुछ इंटरनेट और कुछ बदलता वक्त। अब तो हर सितारा टेलीविजन पर मौजूद रहता है। अभी हमारी फिल्म टेल मी ओ खुदा का म्यूजिक लॉन्च हुआ तो मैं खुद लोगों से पूछ रही थी कि उसकी रिपोर्ट टेलीविजन पर आई कि नहीं। पहले ये बंद मुट्ठी होती है, पर ये मुट्ठी अब खुल चुकी है और खुली मुट्ठी की अहमियत तो आप जानते ही हैं। अब हर चीज व्यावसायिक हो गई है। सितारों को फिल्म की लागत वसूल करने के लिए सब जगह जाना पड़ता है। पहले हम लोग छुप कर रहते थे। पहले सितारों के चाहने वाले उन्हें तलाशा करते थे, अब हम खुद अपने आप को हर जगह तलाशते रहते हैं। शाहरुख खान इन दिनों हर जगह भागे भागे नजर आते हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि आजकल सिनेमा बनाने में पैसा बहुत लगता है और इसकी वसूली में हम लोगों की जान निकल जाती है।

शाहरुख खान को आपने बड़े परदे पर पहला ब्रेक दिया था। तब के और आज के शाहरुख खान में आपको क्या तब्दीली नजर आती है?
शाहरुख खान एक बहुत ही प्यारा इंसान है। उसकी शख्सीयत में तब से लेकर अब तक जमीन-आसमान का अंतर आ गया है। कहां से उसने अपना करियर शुरू किया था और आज कहां पहुंच गया। ये हमेशा मेरे लिए गर्व की बात रहेगी कि मैंने इस कलाकार को अपनी फिल्म के लिए सबसे पहले चुना। मुझे इस बात की भी खुशी होती है कि जिस कलाकार को मैंने चुना, वो पूरी दुनिया को पसंद आया। लेकिन, निजी तौर पर शाहरुख बिल्कुल नहीं बदला है। वो अब भी पहले जैसा प्यारा इंसान है। टेल मी ओ खुदा के म्यूजिक रिलीज का न्यौता देने के बाद भी मुझे यकीन नहीं था कि वो अपने व्यस्त कार्यक्रमों से वक्त निकाल पाएगा। लेकिन, वो आया और इस मौके पर उसने जो बातें की, उसने मेरे दिल में शाहरुख के लिए इज्जत और बढ़ा दी है।
रही बात विजयाराजे सिंधिया पर घोषित हुई फिल्म की तो मुझे नहीं लगता कि अब वो पूरी हो पाएगी। इसे मृदुला सिन्हा बना रही हैं, जिन्होंने विजयाराजे सिंधिया के साथ काफी वक्त गुजारा। लेकिन वो लेखक हैं, सिनेमा के समीकरणों से वो अनजान हैं। फिल्म बनाने के लिए ढेर सारा पैसा चाहिए होता है। पर खुद सिंधिया परिवार ने कभी इस फिल्म के निर्माण में न तो कभी मदद की और ना ही कोई उत्साह दिखाया। यहां तक कि ग्वालियर में शूटिंग की इजाजत तक नहीं दी।

और, फिल्म टेल मी ओ खुदा का विचार कैसे आया?
मैंने एक अखबार में एक लड़की के बारे में पढ़ा था। भारत में जन्मी और ऑस्ट्रेलिया में पली बढ़ी ये लड़की जब बड़ी हुई तो उसे लगने लगा कि उसके आसपास के बच्चे उस जैसे नहीं हैं। तब उसे पता चला कि उसे गोद लिया गया था। किसी भी इंसान को अगर पता चले कि जिन लोगों के साथ उसने इतना लंबा वक्त गुजारा वो उसके असली माता पिता ही नहीं तो उस पर क्या गुजरती होगी? इसी विचार पर ये फिल्म बनी है। ऐसे कितने लोग होंगे भारत में और पूरी दुनिया में, जिन्हें लोग अनाथालयों से गोद ले जाते हैं। एपल के स्टीव जॉब्स को भी कितनी तड़प हुई होगी, जब उन्हें पता चला होगा कि वो एक गोद ली हुई संतान हैं। ऐसे ही एक शख्स के बारे में मैं जानती हूं जो जम्मू कश्मीर में फौज के बहुत बड़े अफसर हैं। वो अब भी अपने असली माता पिता की तलाश में लगे हुए हैं।

अनाथालय में जो बच्चे छोड़ दिए जाते हैं, उसकी वजह क्या आप सिर्फ गरीबी को मानती हैं या कुछ और?
मैंने खुद जितना ऐसे बच्चों के बारे में जाना है, उसके लिहाज से कह सकती हूं कि अनाथालय में बच्चों को सिर्फ मां छोड़ती है। पिता का इसमें शायद उतना हाथ नहीं रहता क्योंकि अनाथालयों में छोड़े जाने वाले ज्यादातर बच्चे बिन ब्याही मांओं की संतान होते हैं। कुछ गरीब घरों के बच्चे भी अनाथालय में छोड़ दिए जाते हैं, लेकिन मैंने देखा है कि कुछ बहुत अमीर माता पिता भी लगातार बेटियों के जन्म लेने पर अपनी बेटियों को अनाथालय छोड़ आते हैं। मैं वृंदावन गई थी तो वहां भी मुझे बताया गया कि वहां के आश्रमों में पलने वाली तमाम लड़कियों के माता पिता बहुत अमीर लोग हैं।

तो इसकी वजह क्या आप समाज में लड़कियों के जन्म को स्वीकार न कर पाने की प्रवृत्ति को भी मानती हैं?
मैंने हाल ही में तीस मिनट का जो संगीत नाटक बनाया है नारी। इसके पीछे मूल सोच यही है। इसमें मेरा किरदार कहता है, कन्या के जन्म के समाचार से मातम छा जाता है। इस वंश प्राप्ति पर जग बधाई देने से कतराता है। कन्या का आना जाना क्यूं दुर्भाग्य दिखाई देता है? जग में आने से पूर्व ही जग झट से उसे विदाई दे देता है। जिन्हें पुत्र कहते उनकी भी सृष्टि कहां से होगी? नारी न रही तो नूतन जग की सृष्टि कहां से होगी? जिसकी हत्या की वो क्या पता आगे चलकर क्या होती? इस नवयुग के निर्माण में उन कन्याओं का योगदान कितना होता। युग बदल रहा है अब अपनी चिंताधारा को भी बदलो। पुत्र रत्न है और कन्या विपदा इस भ्रम से तुम बाहर निकलो।
इसमें मेरी छोटी बेटी आहना रानी पद्मिनी बनकर आती है और एशा झांसी की रानी। ये दोनों कहती हैं, यदि देखना चाहते हो नारी की उड़ान को तो और ऊंचा कर दो आसमान को। दुर्भाग्य है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता को मानने वाले देश में कन्याओं को जन्म से पहले ही मार दिया जाता है।

अपने इन विचारों को आप छोटे परदे पर माटी की बन्नो जैसे धारावाहिकों के जरिए भी प्रकट करती रही हैं? आपको क्या लगता है कि टेलीविजन समाज के निर्माण में सार्थक भूमिका निभा पा रहा है?
टेलीविजन के लिए सारे मापदंड अब टीआरपी पर आकर खत्म हो जाते हैं। मैं टेलीविजन के पीछे नहीं भागती लेकिन फिर भी इसके लिए काम करते रहने की इच्छा मेरी रहती है। माटी की बन्नाो शायद गलत समय पर आया या कोई और वजह रही होगी। लेकिन, मैंने कोशिश बंद नहीं की है। एक और धारावाहिक पर भी काम चल रहा है। भारतीय नृत्य को लेकर भी छोटे परदे पर बहुत कुछ किया जा सकता है लेकिन हिंदी भाषी उत्तर भारत में नृत्य को बहुत नीची नजर से देखा जाता है हालांकि दक्षिण में इसे बहुत सम्मान हासिल है। मेरा मानना है कि नृत्य ईश्वर की आराध्ाना की उच्चतम उपासना पद्धति है। इसमें भक्त का पूरा शरीर भक्ति में तल्लीन हो जाता है। मैं ईश्वर का ध्ान्यवाद देती हूं कि उन्होंने मुझे अच्छी नृत्यांगना और लोकप्रिय अभिनेत्री दोनों बनाया। बतौर अभिनेत्री मिली लोकप्रियता का फायदा मेरी नृत्य साधना को मिला है, नहीं तो देश में ना जाने कितने लोग भरतनाट्यम करते हैं और मुझसे अच्छा भी करते हैं, लेकिन उनको लोग नहीं जानते।

और, इस लोकप्रियता का फायदा आपको राजनीति में भी मिला? इसी के चलते मध्य प्रदेश से भाजपा की बड़ी नेता रहीं विजयाराजे सिंधिया के किरदार में आपको लेकर एक फिल्म भी शुरू हुई थी?
अब देखिए ना (मुस्कुराते हुए), मैं भी कहां से कहां तक का सफर करती रहती हूं। मैं फिल्में बनाती हूं, नृत्य करती हूं और दूसरी तरफ ये सब। लेकिन, मुझे वहां भी सम्मान मिला। भाजपा में कुछ बहुत अच्छे लोग हैं, विद्वान लोग हैं। वहां तो मैं बस सुनती रहती हूं, बैठकों में चुपचाप ज्ञान की बातें सुनती रहती हूं। रही बात विजयाराजे सिंधिया पर घोषित हुई फिल्म की तो मुझे नहीं लगता कि अब वो पूरी हो पाएगी। इसे मृदुला सिन्हा बना रही हैं, जिन्होंने विजयाराजे सिंधिया के साथ काफी वक्त गुजारा। लेकिन वो लेखक हैं, सिनेमा के समीकरणों से वो अनजान हैं। फिल्म बनाने के लिए ढेर सारा पैसा चाहिए होता है। पर खुद सिंधिया परिवार ने कभी इस फिल्म के निर्माण में न तो कभी मदद की और ना ही कोई उत्साह दिखाया। यहां तक कि ग्वालियर में शूटिंग की इजाजत तक नहीं दी।

अच्छा, अमिताभ बच्चन जब भी आप से अपनी किसी फिल्म का हिस्सा बनने की बात कहते हैं, आप झट से मान लेती हैं, लेकिन आपकी अपनी फिल्म टेल मी ओ खुदा का वो हिस्सा नहीं बने, ऐसा क्यूं?
पहले इस फिल्म के जो निर्देशक थे मयूर पुरी वो अमिताभ बच्चन के पास इस फिल्म का प्रस्ताव लेकर गए थे। मयूर के दिमाग में अमर, अकबर, एंथनी का विचार घूमता रहता था। लेकिन, फिल्म के लिए जो भावनाएं जरूरी थीं वो फिल्म में मयूर नहीं ला पा रहे थे। इसके बाद जब फिल्म के निर्देशन की कमान मैंने संभाली तो कहानी में काफी कुछ फेरबदल हुए और मुझे लगा कि धर्म जी इस रोल के लिए ज्यादा उपयुक्त रहेंगे। ये फिल्म डा विंची कोड की शैली में बनी फिल्म है, जिसमें कैमरा फिल्म की नायिका के नजरिए से चलता रहता है और दर्शकों को लगेगा कि वो खुद इन सब जगहों पर जा रहा है। ये आजकल की कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जैसी फिल्म नहीं है। मुझे लगता है कि आज की पीढ़ी के निर्देशकों को सीनियर कलाकारों से कायदे से काम लेना नहीं आता। ये या तो कलाकारों को पूरी बात ढंग से समझा नहीं पाते, या फिर हमेशा अति आत्मविश्वास का शिकार रहते हैं।

और, धर्म जी को निर्देशित करने का एहसास?
उन्हें अब कोई क्या निर्देशित करेगा। वो खुद इतने अच्छे कलाकार हैं। खुद इतने अच्छे सीन्स लिखते हैं। वो बहुत काबिल इंसान हैं। लेकिन अब भी सीन देने के बाद भागकर मॉनीटर देखने आते हैं। कभी कभी खुद ही बोलते थे, हेमा, ये सीन अच्छा नहीं गया। फिर से करते हैं। मेरा काम तो सिर्फ किसी सीन को शॉट्स में बांटने तक रहता था, बाकी वो इतने अच्छे इंसान हैं कि अपना सारा काम खुद ही कर लेते थे। सनी देओल में मुझे ध्ार्म जी के सारे गुण नजर आते हैं। सनी देओल खुद अपनी तरफ से रुचि लेकर एशा देओल की इस फिल्म की मदद कर रहे हैं और मुझे क्या चाहिए? बस।

© पंकज शुक्ल। 2011।

रविवार, 9 अक्तूबर 2011

गीतों में लड़कियों को छेड़ने वाले शब्द ढूंढते हैं युवा: रनबीर कपूर

पंकज शुक्ल

परदादा धाकड़ अभिनेता, दादा अपने जमाने का सबसे बड़ा शो मैन, पिता हिंदी सिनेमा का सुपर स्टार और मां दमदार अदाकारा हो तो जाहिर है चौथी पीढ़ी पर दबाव आ ही जाता है। लेकिन करियर की पहली ही फिल्म फ्लॉप हो जाने के बावजूद रनबीर कपूर ने हिंदी सिनेमा में न सिर्फ अपनी अलग पहचान बनाई है बल्कि नई पीढ़ी के अभिनेताओं के बीच वो सबसे चमकते सितारे भी बन चुके हैं।

मुंबई में पला बढ़ा एक मेट्रो ब्वॉय फिल्म रॉक स्टार का जनार्दन जाखड़ कैसे बना?
जनार्दन जाखड़ जैसा किरदार वाकई मेरी जिंदगी के करीब कभी नहीं रहा। मैं तो वेक अप सिड जैसा सिड हूं। ये किरदार मेरा अब तक का सबसे मुश्किल किरदार रहा। ये दिल्ली के पीतमपुरा का एक जाट है जो हिंदू कॉलेज में पढ़ता है और जिसका सपना है रॉक स्टार बनना। इसे एक दिन कैंटीन वाला कहता है कि अगर जिंदगी में दुख दर्द आंसू नहीं सहा तो झंकार कहां से आएगी। जब तक तेरा दिल नहीं टूटता तब तक तू बड़ा कलाकार बन नहीं सकता। तो बस वो स्टीफेंस कॉलेज की जो सबसे हाईसोसाइटी वाली लड़की है, उसे पटाने की कोशिश करता है ताकि वो उसका दिल तोड़े। वहां से उनकी दोस्ती शुरू होती फिर उनकी आगे की 8-10 साल की स्टोरी है ये फिल्म।

रॉक स्टार में जो बैंड संस्कृति है, उसे आज के युवा कितना खुद को जोड़ पाएंगे?
आज के जो युवा हैं वो पश्चिम से ज्यादा प्रभावित रहते हैं, पर अपने यहां भी तो तमिल, तेलुगू और दूसरी भाषाओं में इतना सारा संगीत है जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है। आज के संगीतकार पश्चिम की धुनें और कंपोजीशन चुराकर संगीत बना रहे हैं, लेकिन मेरा मानना है कि अगर संगीत अपनी जड़ों से न जुड़ा हो तो कनेक्ट नहीं करेगा। रॉक स्टार के निर्देशक इम्तियाज की अली की भारतीय साहित्य के बारे में समझ बहुत है। उन्हें गालिब और रूमी जैसों का लिखा कंठस्थ है। इस फिल्म के गाने खटिया वाले गाने नहीं हैं। रिंग टोन वाले गाने नहीं है, उनका एक अलग स्तर है। जिन्हें गानों के बोलों और धुनों की कद्र होती है, रॉक स्टार के गाने उनके लिए हैं। हमने कोशिश की है, कुछ बेहतर देने की क्योंकि आज की पीढ़ी को बस डिस्को थेक वाले गाने चाहिए। उन्हें हर गाने में ऐसा कोई शब्द चाहिए होता है जिससे वो लड़कियों को छेड़ सकें। लेकिन हमने वैसा संगीत बनाने की कोशिश की जिसके लिए हिंदी सिनेमा को जाना जाता रहा है।

सांवरिया फ्लॉप हुई तो बुरा तो लगा लेकिन शायद ये सच्चाई से मेरा सामना भी था। फिल्म हिट होती तो मेरा दिमाग घूम सकता था। इस नाकामी ने मुझे बताया कि आप चाहे जितनी बड़ी फैमिली से हो लेकिन आपका काम ही आपको आगे बढ़ाएगा।


आपके अब तक के सारे किरदार एक दूसरे से काफी अलग रहे हैं, इसमें आपकी अभिनय की शिक्षा का कितना योगदान है?
मैं बचपन से अभिनेता बनना चाहता था। मैं किरदारों को लेकर बोर नहीं होना चाहता। मेरी कोई इमेज नहीं है। साथ ही मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि मुझे अब तक बहुत ही अच्छे निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिला। अदाकारी के बारे में जो जानता हूं, उसका श्रेय मैं संजय लीला भंसाली को देना चाहता हूं। मैं ऐसे निर्देशकों के साथ काम करना चाहता हूं जो फिल्म के जरिए कुछ कहना चाहते हैं। अगर निर्देशक को अपनी फिल्म को लेकर जुनून है तो आधा काम तो वहीं हो जाता है। रही बात अभिनय की शिक्षा की तो मैंने न्यूयॉर्क के ली स्ट्रासबर्ग थिएटर एंड फिल्म इंस्टीट्यूट से मैथड एकटिंग सीखी है पर मैं अदाकारी के इस तरीके को बिल्कुल नहीं मानता हूं। मेरा मानना है कि अदाकारी का हर अभिनेता का अपना अलग मेथड होता है।

किसी भी सितारे की कामयाबी में उसकी इमेज का बहुत बड़ा योगदान होता है और आपकी इमेज खराब करने के लिए तो मुंबइया गॉसिप मिल दिन रात काम करती दिखती है?
गॉसिप कॉलमों में क्या छपता है, मैं इस पर ज्यादा ध्यान नहीं देता। शुरू शुरू में इस सबको लेकर दिक्कत होती थी पर मेरा मानना है कि एक अभिनेता को अपने काम से मतलब रखना चाहिए। लगातार अच्छा काम करते जाने से कुछ दिनों बाद लोग भी इस तरह की बातें नहीं पूछते और आपके काम की तरफ ही ध्यान देने लगते हैं। मेरी अभी कोई इमेज नहीं है। और वो जमाना भी गया जब कलाकार एक इमेज लेकर चलते थे। एक जैसी ही फिल्में करते थे। इस बारे में मैं आमिर खान का अनुयायी हूं जिन्होंने हर फिल्म में नए लुक का चलन हिंदी सिनेमा में शुरू किया।

लेकिन, डेल्ही बेली में काम करने से आपने मना कर दिया था? और रीमेक के चलन के बारे में आपका क्या कहना है?
हां, डेल्ही बेली पहले मेरे पास ही आई थी। लेकिन तब मैं अपने करियर के साथ पंगा नहीं लेना चाहता था। मेरी एक जिम्मेदारी है अपने दर्शकों को लेकर। मैं ऐसी फिल्में करना चाहता हूं जिन्हें मैं अपने माता पिता के साथ देख सकूं। वैसे डेल्ही बेली एक कामयाब फिल्म है और इसकी स्क्रिप्ट भी अच्छी थी। रही बात रीमेक की तो मुझे नहीं लगता है कि ऐसा कहानियों की कमी की वजह से हो रहा है। हां, ये दिक्कत जरूर है कि अब फिल्में लिखने वाले खुद निर्देशक बन रहे हैं। मेरा मानना है कि फिल्में लिखने वाले अगर बड़े निर्देशकों के लिए फिल्में लिखें तो काफी अच्छा काम हो सकता है। हां, मैं रीमेक कभी नहीं करूंगा।

मैं अगले साल या उसके अगले साल अच्छी कहानी मिलने पर एक फिल्म निर्देशित करना चाहूंगा। मैं श्री 420 जैसी फिल्म बनाना चाहूंगा जिसका कोई संदेश भी हो।


आमिर, सलमान, शाहरुख की तिकड़ी के बाद लोग शाहिद, रनबीर और इमरान की तिकड़ी का नाम लेते हैं?
ये सही है कि शाहिद कपूर और इमरान खान अच्छा काम कर रहे हैं। मैं भी सही समय पर सही किरदार कर पा रहा हूं तो इसमें मेरे निर्देशकों का बड़ा योगदान रहा है। लेकिन, आमिर, सलमान या शाहरुख जैसी ऊंचाई पाने के लिए हम तीनों को बहुत मेहनत करनी होगी। हमें और चुनौती वाले किरदार करने होंगे तभी शायद हम वहां तक पहुंच सकें। इन लोगों के पीछे बहुत बड़ा काम और बहुत सारी मेहनत है। वहां पहुंचने के लिए बहुत कड़ी मेहनत और लगन की जरूरत होगी। मेरा पूरा ध्यान अब इसी तरफ है ताकि मैं इनसे भी आगे जाने की सोच सकूं।

आरके फिल्म्स के भविष्य को लेकर आपका क्या सपना है?
कपूर खानदान की विरासत एक बड़ी जिम्मेदारी है। मेरा सपना है कि मैं आरके फिल्म्स के लिए एक फिल्म बतौर निर्माता-निर्देशक बनाऊं। जिस तरह की फिल्में राज कपूर ने बनाई वैसी हम बना नहीं सकते क्योंकि वैसे किरदार अब नहीं होते तो हमें आगे बढ़ना है। लेकिन उससे पहले मुझे अपने अभिनय पर भी ध्यान देना है क्योंकि यहां कामयाबी कब आपके हाथ से फिसल जाए पता नहीं होता। मैंने अपने पिता को देखा है कि कैसे लीड हीरो से कैरेक्टर आर्टिस्ट बनने पर इंसान तनाव से गुजरता है। लेकिन, आप अच्छे एक्टर हो तो आपका करियर कभी खत्म नहीं होता। मैं अगले साल या उसके अगले साल अच्छी कहानी मिलने पर एक फिल्म निर्देशित करना चाहूंगा। मैं श्री 420 जैसी फिल्म बनाना चाहूंगा जिसका कोई संदेश भी हो। मौजूदा वक्त के हिसाब से पूछें तो मैं राजू हिरानी की फिल्मों जैसी फिल्म बनाना चाहूंगा।

अपनी पहली फिल्म सांवरिया के फ्लॉप होने के एहसास के बारे में बताइए?
मैंने संजय लीला भंसाली के साथ इससे पहले फिल्म ब्लैक में बतौर सहायक निर्दशक काम किया था। सांवरिया फ्लॉप हुई तो बुरा तो लगा लेकिन शायद ये सच्चाई से मेरा सामना भी था। फिल्म हिट होती तो मेरा दिमाग घूम सकता था। इस नाकामी ने मुझे बताया कि आप चाहे जितनी बड़ी फैमिली से हो लेकिन आपका काम ही आपको आगे बढ़ाएगा। अब साढ़े तीन साल में मुझे लगता है कि लोग मुझे मेरे काम से जानने लगे हैं। मेरे माता-पिता कहीं बाहर जाते हैं तो लोग उन्हें रनबीर कपूर के माता-पिता के नाम से बुलाते हैं, ये उन्हें भी बहुत अच्छा लगता है।

कपूर खानदान रिश्तों में बड़ा यकीन करता है, इन दिनों का पारिवारिक मिलन कैसा होता है?
हम अब भी हर रविवार को एक साथ लंच करते हैं। मेरी दादी चेंबूर में रहती हैं। हम लोग वहीं जाते हैं। घर में इतने सारे बड़े बड़े सितारे हैं कि हम लोग तो बस किनारे ही हो जाते हैं। खाने के सब शौकीन हैं और बात भी करते हैं तो लगता है झगड़ा कर रहे हैं। हमारे लिए तो ये टेनिस मैच जैसा होता है, आंखें यहां से वहां नाचती रहती हैं, एक चेहरे से दूसरे चेहरे पर।

रॉक स्टार के बाद आप बर्फी कर रहे हैं, उसके बाद?
बर्फी का नाम पहले साइलेंस था। इसमें मैं गूंगा बहरा बना हूं तो लोगों ने समझा कि ब्लैक की तरह की फिल्म होगी। पर ये बच्चों की फिल्म है। बहुत ही दिल को छू लेने वाली फिल्म है। इसमें रोमांस भी है और फिर एक मर्डरमिस्ट्री। फिल्म के निर्देशक अनुराग बासु के साथ काम करने में मजा आ रहा है। वो खुद भी बहुत बड़े बच्चे हैं। बच्चों पर आज जो टीवी का जो प्रभाव है, उससे उन्हें थिएटर जाने का मन नहीं करता लेकिन अगर आप अच्छी फिल्म बनाओ तो बच्चे आते हैं। अजब प्रेम की गजब कहानी देखने बहुत बच्चे आए। इसके बाद मैं एक फिल्म जनवरी में वेक अप सिड के निर्देशक अयान मुखर्जी के साथ शुरू कर रहा हूं, निर्माता करण जौहर की इस फिल्म में मेरे साथ दीपिका पादुकोण होंगी।

© पंकज शुक्ल। 2011।

रविवार, 2 अक्तूबर 2011

हौसले, हिम्मत और मोहब्बत की निशानी


किला जाधवगढ़

इतिहास सिर्फ वही नहीं जो हम किताबों में पढ़ते हैं। इतिहास वो भी है जिसकी जानकारी हमें दुर्गम इलाकों में मौजूद अतीत की निशानियों तक पहुंचकर मिलती है। बाजीराव मस्तानी की प्रेम गाथा भी महाराष्ट्र के एक ऐसे किले के करीब आज भी गुनगुनाई जाती है, जिसके बारे में तमाम घुमंतुओं को भी कम ही मालूम है।


जिन लोगों को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बने सिनेमा में खास रुचि रहती है, उनको भी और जिन्हें लोकप्रिय सितारों के साथ बनने वाली फिल्मों में दिलचस्पी रहती है, उनको भी याद होगा फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली का वो ऐलान, जो उन्होंने अपनी सुपर हिट फिल्म हम दिल दे चुके सनम के ठीक बाद किया था। संजय तब बाजीराव पेशवा और मस्तानी नाम की एक राजकुमारी की प्रेमकथा पर फिल्म बनाना चाहते थे, इसके लिए सलमान खान के साथ पहले ऐश्वर्या राय और फिर करीना कपूर को लेने की बात भी चली थी पर किन्हीं वजहों से ये फिल्म शुरू नहीं हो सकी। फिल्मों में मेरी रुचि तो शुरू से रही है, पर देशाटन के दौरान कम ज्ञात जगहों को लेकर भी मेरा विशेष आग्रह रहता है। लिहाजा इस बार मुंबई की चिल्लपों से दूर प्रकृति के वीराने में दिवे घाटी की गोद में इतिहास के एक अहम पन्नो की दास्तां खुद में समेटे जाधवगढ़ किले को घूमने का मौका मिला तो ना जाने कैसे बाजीराव-मस्तानी की प्रेम कहानी अपने आप याद आ गई। जी हां, पुणे से कोई 25 किमी दूरी पर स्थित जाध्ावगढ़ के किले के पास ही है वो मस्तानी झील, जहां मोहब्बत के कुछ हसीन लम्हे इन दोनों ने बिताए। जमाने के दस्तूरों को झकझोरा और पूरे किए अपने वो अरमान जिन पर उन दिनों तमाम तरह के पहरे रहा करते थे।
खुद महाराष्ट्र में बरसों से रहने वालों को भी जाध्ावगढ़ किले के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। मुंबई से सड़क रास्ते से पांच घंटे और पुणे से करीब 40 मिनट की दूरी पर है इतिहास की ये अनोखी विरासत। पिलाजी जाधवराव द्वारा 1710 में बनवाया गया ये किला महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि देश के उन किलों में सबसे आगे गिना जाता है, जिन्हें हेरिटेज होटल में तब्दील करने की महात्वाकांक्षी योजना पर काम चल रहा है। पुराने पुणे-सतारा मार्ग पर पुणे से 22 किमी आगे समुद्र तल से करीब ढाई हजार फिट की ऊंचाई पर छोटी छोटी पहाड़ियों के बीच कोई 25 एकड़ समतल जमीन पर बना है ये खूबसूरत किला। महाराष्ट्र की मशहूर मराठा वास्तुशिल्प के इस अद्बभुत नमूने में वो सब कुछ है जो आपका मन मोह लेता है। छत्रपति शाहू जी की सेना के मराठा जनरल पिलाजी जाधवराव के नाम पर ही इस इलाके का नाम पड़ा है जाध्ाववाड़ी। पहाड़ से निकाले गए पत्थरों को तराश कर बनाए गए इस किले की मजबूती और इसकी अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था यहां पहुंचकर की समझी जा सकती है।
इतिहास के झरोखे से
शाहजहां द्वारा बंदी बनाए गए छत्रपति शिवाजी के पोते शाहू जी 1707 में इक्कीस साल बाद जेल से रिहा हुए। मराठवाड़ा के लिए वो वक्त मुसीबतों का था। इलाके पर तब भी मुगलों का कब्जा था लेकिन औरगंजेब की मौत के साथ ही इनके पैर भी इस इलाके से उखड़ने लगे थे। मराठों के बीच शिवाजी के दूसरे बेटे राजाराम की विध्ावा रानी ताराबाई की सत्ताशीन होने को लेकर मतभेद लगातार कायम थे। शाहू जी ने सारे हालात को देख समझ कर एक समग्र योजना बनाई, जिसका अंतिम उद्देश्य था इस इलाके में मराठों की संप्रभुता फिर से कायम करना। आम इंसानों के बीच से हुनरमंदों को पहचानने की जबर्दस्त काबिलियत रखने वाले शाहू जी ने अपने विश्वासपात्र लोगों का एक खास जत्था तैयार किया। इन लोगों को शाहू जी ने पूरे इलाके में फैल जाने का निर्देश दिया और सबको अपने जैसे ही तमाम लोगों को अपने साथ जोड़कर एक ऐसी फौज तैयार के काम में जुट जाने को कहा, जो किसी भी हमले का मुकाबला करने में सक्षम हो। शाहू जी के इसी खास दस्ते में सबसे अहम शख्स थे पिलाजी जाध्ावराव। जाध्ाववाड़ी और सासवड इलाके के चुनिंदा जांबाजों को इकट्ठा कर पिलाजी ने लड़ाकू दस्ते तैयार किए। पिलाजी की तलवारबाजी के किस्से अब भी इलाके की लोककथाओं और लोक गीतों में सुने जा सकते हैं। पिलाजी और उनके जैसे कुछ अन्य जांबाजों की मदद से ही आखिरकार शाहू जी फिर से राजगद्दी पर बैठे और अपने वफादार पेशवाओं की मदद से इलाके पर राज किया।
जाधवगढ़ किले की खासियत
पिलाजी जाधवराव ने पेशवाओं की तीन पीढ़ियों और मराठों की लंबे समय तक सेवा करने के बाद 1784 में आखिरी सांस ली थी। जाध्ावगढ़ किला अब भी उनकी दूरदृष्टि और युद्धकौशल रणनीति की कहानियां सुनाता है। दूर दूर तक खुले मैदान के बीच बने इस किले के मुख्यद्वार तक पहुंचने का रास्ता घुमावदार है। किले के मुख्यद्वार तक पहुंचने के लिए बनी सीढ़ियां भी यू टर्न लेकर ऊपर तक पहुंचती है, मतलब कि दुश्मन की किसी भी टुकड़ी को किले के दरवाजे पर पहुंचने से पहले हर मोड़ पर मुकाबले के लिए तैयार मराठा सैनिकों से लोहा लेना होता था। ये किला दुश्मन के हमले से बचने के लिए तो बेजोड़ था ही, आरामतलबी के भी इसमें पूरे इंतजाम हैं। अनाज रखने के लिए बनी बड़ी सी बखारी और विपत्ति के समय बच निकलने के लिए गर्भतल में बनी लंबी सुरंग अब भी मौजूद है। किले की चौड़ी बाहरी दीवारों और परकोटे के बीच महिलाओं के रहने के लिए अलग से इंतजाम किया गया है।
इसी भीतरी इलाके में बरसात का पानी इकट्ठा करने के लिए एक बावड़ी भी बनी थी, जिसे अब स्वीमिंग पूल में तब्दील कर दिया गया है। 300 साल पहले बने किले में वाटर हार्वेस्टिंग की इतनी पुरानी व्यवस्था अचरज में डाल देती है। किले की भीतरी बनावट भी कम हैरान कर देने वाली नहीं है। राजपूताना महलों के विपरीत इस किले में कहीं भी किसी तरह की शौकीनमिजाजी के प्रमाण नहीं मिलते। ना दीवारों पर कहीं कोई नक्काशी, ना घुमावदार मेहराब और ना ही कहीं तड़क भड़क वाली चीजें। हां, मुख्य प्रवेश द्वार पर लगी नुकीले भाले और दरवाजे से भीतर घुसते ही दाहिनी तरफ हाथियों को भोजन खिलाने के लिए रखी शिला जरूर किले को अलग आभा प्रदान करती है। किला होटल में भले तब्दील हो गया हो, पर इसके मुख्य कर्ताधर्ता को अब भी कहा किलेदार ही जाता है। किले के परिसर में एक तीन सौ साल पुराना गणेश मंदिर भी है, जिसमें पूजा अर्जना का क्रम लगातार चलता रहता है। पिलाजी के वंशजों की शादियां आज भी इसी मंदिर में ही होती हैं।
बाजीराव-मस्तानी की अमर कहानी
जाधवगढ़ किले के पास ही है मशहूर दिवे घाट, जहां देश विदेश के उन सैलानियों का जमावड़ा लगता रहा है जिन्हें पर्वतारोहण में खास रुचि है। और इसी देवे घाट में स्थित है मस्तानी झील। घाटी की गहराइयों को नापती इस झील के बारे में कहा जाता है कि यही वो जगह है जहां बाजीराव पेशवा अपनी प्रेमिका मस्तानी से मिला करते थे। बाजीराव का पूरा नाम बाजीराव बालाजी भट्ट था। ब्राह्णण होने के बावजूद उन्होंने मराठा साम्राज्य के चौथे छत्रपति शाहू जी की सेनाओं का नेतृत्व किया। बाजीराव को उत्तर में मराठा साम्राज्य के विस्तार का श्रेय दिया जाता है। उनकी शादी काशी बाई से हुई। काशी बाई से उनके दो बेटे हुए जिनमें से एक नाना साहब को शाहू जी ने 1740 में अपना पेशवा नियुक्त किया। बाजीराव की दूसीर शादी मस्तानी से हुई और उनसे हुए बेटे कृष्णराव को उस समय के ब्राह्णण समुदाय ने अपनाने से अस्वीकार कर दिया। बाद में इसकी परवरिश शमशेर बहादुर के तौर पर हुई। 1761 की पानीपत की लड़ाई में शमशेर बहादुर 27 साल की उम्र में मराठों की तरफ से लड़ते हुए शहीद हो गया। मस्तानी दरअसल पन्नाा के महाराजा छत्रसाल की मुस्लिम पत्नी से हुई बेटी थी। बाजीराव और मस्तानी के पोते अली बहादुर ने बाद में अरसे तक बुंदेलखंड में बाजीराव की मिल्कियत की देखरेख की और उसी ने उत्तर प्रदेश की बांदा रियासत की नींव रखी।

© पंकज शुक्ल। 2011

सोमवार, 26 सितंबर 2011

तेरी लाडो मुन्नी मेरी...


दर ओ दीवार कभी बनते हैं घरों से सजते हैं,
रहा करे सुपुर्द ए खाक़ मेरी बसुली, कन्नी मेरी।

दरिया ए दौलत में उसे सूकूं के पानी की तलाश,
तर बतर करती बूंद ए ओस सी चवन्नी मेरी।

तू सही है गलत मैं भी नहीं ना कोई झगड़ा है,
वो आसमां उक़ूबत का ये घर की धन्नी मेरी।

मेरी गुलाटियों औ मसखरी को मजबूरी न समझ,
उछाल रुपये सा न मार ग़म की अठन्नी मेरी।

रगों में इसकी खून मेरा तो हो दूध तेरा भी,
सर ए दुनिया रहे चमके तेरी लाडो मुन्नी मेरी।

© पंकज शुक्ल। 2011।

रविवार, 25 सितंबर 2011

मुट्ठी में सिनेमा!

पंकज शुक्ल

सिनेमा हाल के दिनों तक करोड़ों का खेल माना जाता रहा है। खेल करोड़ों का अब भी है बस दाहिनी तरफ के जीरो अब एकाएक कम होने लगे हैं। अब पांच करोड़ रुपये का बजट नए सितारों को लेकर बनने वाली फिल्मों के लिए पर्याप्त माना जाने लगा है। और, हौसला रामगोपाल वर्मा और अनुराग कश्यप जैसा हो तो नॉट ए लव स्टोरी और दैट गर्ल इन येलो बूट्स जैसी फिल्में एक करोड़ के अरते परते भी बन सकती हैं।

सलमान खान की फिल्म बॉडीगार्ड की अब तक हो चुकी करीब 150 करोड़ रुपये की कमाई और उससे पहले अजय देवगन की फिल्म सिंघम द्वारा सिनेमा बाजार से बटोरे गए 100 करोड़ रुपये हिंदी सिनेमा के मंदी के दौर से पूरी तरह उबर आने के शुभ संकेत समझे जा रहे हैं। ये फिल्में बनी भी काफी बड़े खर्च के साथ हैं। लेकिन, हिंदी सिनेमा का एक और शगुन इस बीच हो चुका है और वो है फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों की फिल्मों के बजट घटाने के लिए फिल्ममेकिंग को लेकर बदलती सोच। अनुराग कश्यप की देश विदेश में सराही जा रही फिल्म दैट गर्ल इन येलो बूट्स, राम गोपाल वर्मा की चर्चित फिल्म नॉट ए लव स्टोरी और उससे पहले रिलीज हुई निर्देशक अमोल गुप्ते की फिल्म स्टैनली का डिब्बा तीनों की लागत निकालने में इसके निर्माता न सिर्फ कामयाब रहे बल्कि बिना किसी बड़े सितारे की मौजूदगी के भी इन फिल्मों ने मुनाफा भी कमा लिया है। हिंदी सिनेमा में कामयाबी का नया मंत्र है- कम लागत में फिल्म बनाओ, फिल्म के प्रचार प्रसार पर खूब लुटाओ और दर्शकों को सिनेमाघरों तक लाओ। जी हां, पूरे साल में सुपर डुपर हिट होने वाली गिनती की पांच छह फिल्मों से हिंदी सिनेमा अब आगे निकलने की तैयारी में है और ये बदलाव आया है सिनेमा बनाने की नई डिजिटल तकनीक से।
ये तकनीक क्या है? और कैसे इससे बचता है फिल्म निर्माण का खर्चा? इसकी जानकारी से पहले संक्षेप में जानना ये जरूरी है कि फिल्म की शूटिंग के बाद फिल्म के परदे तक पहुंचने के बीच में क्या क्या होता है? फिल्मों की शूटिंग परंपरागत तरीके में उन कैमरों से की जाती रही है, जिनमें रील डाली जाती है। आम तौर पर एक रील पर करीब चार मिनट की फिल्म शूट होती है और इस चार मिनट की रील की कीमत होती है 10 से 12 हजार रुपये के बीच। छोटे निर्देशकों की कोशिश होती है कि फिल्म की अंतिम लंबाई से औसतन चार गुणा से ज्यादा वो रीलें खर्च न करें, वहीं बड़े निर्देशक इनकी गिनती करने की परवाह नहीं करते और निर्माता बस फिल्म की शूटिंग के दौरान डिब्बे ही गिनता रह जाता है। शूटिंग होने के बाद ये रीलें फिल्म लैब भेजी जाती हैं। वहां इनको टेप पर ट्रांसफर किया जाता है जिसे कहते हैं टेली सिने। टेप पर आई फिल्मों को संपादन के बाद एक रफ कट तैयार होता है और इस रफ कट पर अंकित नंबरों के हिसाब से फिल्मों को डिजिटाइज किया जाता है। फिल्म का डिजिटल संस्करण तैयार होने के बाद इनका अंतिम संपादन होता है और उसके बाद स्पेशल इफेक्ट्स, डबिंग, बैकग्राउंड म्यूजिक डालकर इसे वो शक्ल देने की कोशिश की जाती है, जो हम सिनेमा के परदे पर देखते हैं।
डिजिटल सिनेमा ने फिल्म की शूटिंग से रील के डिब्बों को पूरी तरह हटा दिया है और बाजार में नए आए कैमरों ने फिल्म को डिजिटल फॉर्म में ही शूट करना शुरू कर दिया। स्टार की बजाय कहानियों पर ध्यान देने वाले निर्माता निर्देशकों की बांछें यहीं से खिलनी शुरू हुईं। शुरुआत हुई रेड कंपनी के बनाए डिजिटल कैमरे से। प्रतिदिन 10 से 12 हजार रुपये के किराए पर मिलने वाले इस कैमरे ने फिल्म निर्माण की लागत काफी हद तक घटाई, पर नए सिनेकार अब इसके आगे निकल गए हैं। और, ये मुमकिन हुआ है बाजार में आए उन कैमरों की मदद से जो बने तो स्टिल फोटोग्राफी के लिए थे, लेकिन जिनमें वीडियो शूट करने की भी सहूलियत है। कैमरों की बारीकी समझने के लिए हमें सिनेमैटोग्राफी के थोड़ा और विस्तार में जाना होगा।
दरअसल, किसी भी तस्वीर या फिल्म की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि वह रंगों के कितने बिंदुओं को जोड़कर बनी है। और इसके लिए एक शब्द इस्तेमाल होता है पिक्सेल। पारंपरिक तौर से इसे दो संख्याओं के जरिए व्यक्त किया जाता है जैसे कि अगर कहा जाए कि अमुक पिक्चर या फिल्म का रिजॉल्यूशन 640 गुणा 480 है तो इसका मतलब ये हुआ कि इस फिल्म या पिक्चर की 640 पिक्सेल कॉलम चौड़ाई में रंगों के 480 पिक्सेल कॉलम हैं। टेलीविजन पर दिखने वाली तस्वीरें आम तौर पर 720 गुणा 480 रिजॉल्यूशन की होती है और डीवीडी पर भी यही क्वालिटी होती है। कुछ चैनलों ने अब हाई डिफिनिशन (एचडी) प्रसारण शुरू किया है, जिनकी पिक्चर क्वालिटी 1280 गुणा 720 की होती है यानी कि टेलीविजन कितना ही बड़ा हो पिक्चर बिल्कुल साफ दिखेगी। दरअसल पर्दे के बड़े होते जाने की जरूरत के साथ ही किसी भी चीज को कैमरे पर उतारने के लिए इसकी गुणवत्ता का ध्यान रखना जरूरी हो जाता है। टीवी के लिए शूट किए गए किसी कार्यक्रम को अगर हम सिनेमा के बड़े परदे पर देखना चाहें तो उसमें हमें तस्वीरें फैली फैली सी दिखाई देंगी। इसीलिए, फिल्मों को इससे भी ज्यादा रिजॉल्यूशन यानी 2048 गुणा 1080 रिजॉल्यूशन पर शूट करना होता है। इससे बेहतर कोई भी क्वालिटी सिनेमा में अच्छी मानी जाती है, पर इससे कम नहीं। सिनेमा की शूटिंग के लिए इस्तेमाल होते रहे पारंपरिक कैमरों में लगने वाली 35 मिमी की रील इसी गुणवत्ता पर फिल्में शूट करती है।

पिक्चर क्वालिटी की बस इतनी सी समझ किसी भी फिल्म के बजट में आश्चर्यजनक तरीके से कटौती कर देती है। दैट गर्ल इन यैलो बूट्स को हिंदी सिनेमा में डिजिटल तकनीक से शूट हुई पहली फिल्म इस लिहाज से माना जाता है कि अनुराग कश्यप ने इसे बजाय किसी फिल्म कैमरे के स्टिल फोटोग्राफी के लिए बने कैमरे कैनॉन 5 डी पर शूट किया। कैनॉन ने अपने इस कैमरे में वीडियो मोड की शूटिंग के लिए जो तकनीकी विकास किए, वो किसी भी घटना को 1920 गुणा 1080 रिजॉल्यूशन में शूट करते हैं। सिनेमा की भाषा में इस टू के (2 के) गुणवत्ता कहते हैं। सिर्फ डेढ़ लाख की कीमत के इस कैमरे ने इन दिनों मायानगरी में हंगामा मचा रखा है। कोई भी निर्देशक बस अपने साथ एक सिनेमैटोग्राफर और सीन में काम करने वाले कलाकारों को लेकर फिल्म शूट करने निकल लेता है। फिल्म के सेट पर लगने वाले 100 से 150 लोगों की यूनिट का मेला भी अब ऐसी फिल्मों की लोकशन पर नहीं दिखता। अनुराग कश्यप कहते हैं फिल्म के कारोबार में बने रहने के लिए नए लोगों को सबसे पहले अपनी फिल्म के बजट को नियंत्रित करना होगा। फिल्म की शूटिंग को पिकनिक मानने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा और पूरा ध्यान अपनी कहानियों पर लगाना होगा। अंतर्राष्ट्रीय मॉडल नताशा सिक्का के साथ बियॉन्ड नाम की एक प्रयोगात्मक फिल्म बना रहे निर्देशक शिराज हैनरी कहते हैं कि अक्सर नए निर्देशकों की फिल्मों पर पैसा लगाने के लिए निर्माता तैयार नहीं होते, पर डिजिटल तकनीक ने ये संघर्ष भी कम कर दिया है। अब अगर आपके पास दमदार कहानी हो तो पचास लाख से लेकर एक करोड़ रुपये तक में भी अच्छी फिल्म बनाई जा सकती है। अगर ऐसी किसी फिल्म को एक दो अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाते हैं तो फिल्म को बेचने में भी फिर ज्यादा झंझट नहीं उठाना पड़ता।

रामगोपाल वर्मा की फिल्म नॉट ए लव स्टोरी की लोकेशन पर बामुश्किल डेढ़ दर्जन लोग इकट्ठा होते थे। वर्मा ने ये पूरी फिल्म एक करोड़ रुपये से भी कम बजट में बना डाली। फिल्म के प्रचार प्रसार पर एक करोड़ रुपये और खर्च किए और फिल्म की लागत व प्रचार प्रसार की कुल लागत से दो गुने से भी ज्यादा की कमाई पहले ही हफ्ते में कर डाली। हिंदी सिनेमा में कभी कथ्य के फिल्मांकन का नया दौर शुरू करने वाले रामगोपाल वर्मा ने फिल्म मेकिंग के इन नए प्रयोगों को आगे भी जारी रखने का संकल्प जताया है। वह भी मानते हैं कि हिंदी सिनेमा अब दो समानांतर धाराओं पर जल्दी ही चलता नजर आएगा जिसकी एक धारा में होंगे बड़े सितारे और बड़े बजट की फिल्में, जबकि दूसरी धारा होगी ऐसे सिनेकारों की, जो कहानियां सुनाएंगे और फिल्में बनाएंगे बहुत ही कम बजट में।
डिजिटल सिनेमा के इस नए अपारंपरिक रूप के कद्रदान मायानगरी में तेजी से बढ़ रहे हैं। निर्देशक अमोल गुप्ते की फिल्म स्टैनली का डिब्बा इन प्रयोगों से भी दो कदम आगे की फिल्म रही है। गुप्ते ने ये फिल्म स्कूली बच्चों के साथ बिना इन बच्चों की स्कूली पढ़ाई का एक दिन भी नुकसान कराए बनाई है। पूरे एक साल अमोल गुप्ते अपने कैनॉन 5 डी कैमरे के साथ हर शनिवार हाफ डे के बाद इन बच्चों के साथ काम करते रहे। अक्सर बच्चों को बताया जाता कि उन्हें एक नाटक की रिहर्सल करनी है और बिना किसी फिल्मी तामझाम के उनका कैमरा बिना इन बच्चों की जानकारी के शूटिंग करता रहता। इस फिल्म को जिन लोगों ने भी देखा है वो बच्चों के स्वाभाविक अभिनय की तारीफ किए बिना नहीं रहता। बस ये दर्शक नहीं जानते हैं, तो इतना कि ये फिल्म कैसे बनी है? डिजिटल सिनेमा के इस दौर को अपनाकर तमाम और सिनेकार भी सिनेमा की इस नई धारा का हिस्सा बन चुके हैं और जो नहीं बने हैं वो बनने की तैयारी कर रहे हैं।

ज़िक्र इक शाम का...


ज़िक्र इक शाम का यूं कर आया,
सरे राह ख्वाबों का सफर उग आया,
वो नहीं ना उनकी बेचैनी सा आलम है,
मेरी आंखों में ये आब है किसका साया।

वो गुमज़ुबां सी बोली, उसने आंखों से सुना,
थिरकते पांव की खुरचन को सिरहाने पे बुना,
खिंची थी मेड़ सी, अब मिलने का मातम है,
तेरी हंसी तेरी मुस्कान से क्यूं फिर शरमाया
मेरी आंखों में ये आब है किसका साया,
ज़िक्र इक शाम का यूं कर आया,
सरे राह ख्वाबों का सफर उग आया।

कभी थी ताप अब छांव रुई के फाहे सी,
कसम दी कोसों की अब दिल में चाहे सी
कहीं ना दूर गया वो, उसी का आदम है,
ख़री बात पे टिक के वो कब का भर पाया,
मेरी आंखों में ये आब है किसका साया,
ज़िक्र इक शाम का यूं कर आया,
सरे राह ख्वाबों का सफर उग आया।

© पंकज शुक्ल। 2011।

Pic Courtesy: Nokia । Vfx: Sound N Clips।

शनिवार, 24 सितंबर 2011

इरशाद कामिल : शैदाई तुझे कर गया ओए...

बिरले ही होते हैं ऐसे जो मायानगरी में अपना नाम बनाने का ख्वाब लेकर आएं और किस्मत की दस्तक उनके दरवाजे पर उम्मीद से पहले सुनाई दे जाए। पंजाब के मलेरकोटला से मुंबई आए इरशाद कामिल का नाम भी ऐसे ही बिरलों में शामिल हैं। इन दिनों मेरे ब्रदर की दुल्हन और मौसम फिल्मों के लिए लिखे उनके गानों की हर तरफ धूम है, और गुरुवार को हुए जीमा अवार्ड्स में उन्हें पी लूं..गाने के लिए मिला सर्वश्रेष्ठ गीतकार का एक और पुरस्कार। इरशाद ने अपने करियर के कुछ राज खोले हैं पंकज शुक्ल के सामने।


पहली बगावत
पिताजी चूंकि मलेरकोटला में के सरकारी स्कूल में केमिस्ट्री पढ़ाते थे लिहाजा हमारे बारे में भी ये तय सा हो गया था कि या तो मुझे डॉक्टर बनना है या फिर इंजीनियर। लेकिन, हमने भी साइंस के साथ ऐसी ऐसी रुसवाइयां की कि उसे भी हमेशा याद रहेंगी। बाकायदा साइंस में फेल होकर दिखाया और घर वालों ने भी साइंस की सोहबत से हमें आजाद कर दिया। लिहाजा बीए में हिंदी और भूगोल ले ली। हिंदी थोड़ी आसान दिखती थी और चूंकि कुदरत से मोहब्बत शुरू से रही तो भूगोल के पहाड़, नदियां पसंद आने लगीं। 1990 में पंजाब यूनीवर्सिटी आ गया। वहां एमए किया, पीएचडी की। ट्रिब्यून और जनसत्ता जैसे अखबारों में नौकरी की और छोड़ भी दी। मुंबई आने की योजना पहले से थी पर मैं मुंबई उस तरह से नहीं आना चाहता था जैसे बाकी लोग आ जाते हैं। जान पहचान वाले एक दोस्त को मनाया। वो दिल्ली में था। उसने मुंबई साथ चलने का वादा किया तो मैं अप्रैल 2000 मैं अपनी बचत के पांच हजार रुपये लेकर दिल्ली आ गया। बस स्टैंड के सामने वहां टूरिस्ट कैंप है तिब्बती शरणार्थियों का। उस टाइम 200 रुपये का कमरा था। दोस्त बहाने मारते रहा और मेरे हजार रुपये चार पांच दिन में खर्च हो गए। आखिरकार, हिम्मत करके मैं एक दिन अकेले ही मुंबई के लिए निकल पड़ा।
पहला ब्रेक
पहली बार मुंबई आया तो दस-पंद्रह दिन घूम फिर कर मैं वापस चला गया। अगली बार फरवरी 2001 में यहां रुकने की तैयारी के साथ आया। पर इससे पहले मुझे चंडीगढ़ में ही एक सीरियल लिखने का काम मिल गया। ये बतौर लेखक मेरा पहला सीरियल था, कहां से कहां तक जी टीवी के लिए। फिर दो चार पांच सीरियल और लिखे। इसी दौरान फिल्म सोचा ना था के निर्देशक इम्तियाज अली से मुलाकात हो गई। संदेश शांडिल्य संगीत निर्देशक थे उस फिल्म में और तय ये हुआ कि गाने लिखने के लिए कोई नया लड़का चाहिए। वजह ये बताई गई कि यहां के जो नामी गीतकार हैं वो नए निर्देशक अपने अरदब में लेने की फिराक में रहते हैं। संदेश से मैं कुछ दिन पहले ही मिला था। इम्तियाज से दो मिनट में ही ट्यूनिंग हो गई। सोचा ना था कई सारे लोगों की पहली पिक्चर थी। अभय और आयशा की पहली फिल्म थी। उस दिन मैं मारे खुशी के रात सो भी नहीं पाया। ये बात 2002 की है, हालांकि सोचा न था तीन साल बाद रिलीज हुई और उसके पहले लोगों ने मेरे गाने चमेली में सुन लिए। इस लिहाज से मेरी रिलीज हुई पहली फिल्म चमेली रही।
पहला जश्न
चमेली पिक्चर में प्रोड्यूसर की मेहरबानी कहिए या मोहब्बत। कि मेरा नाम ओपनिंग क्रेडिट्स में नहीं है। एंड क्रेडिट्स में मेरा नाम है, सीडी और अलबम पर भी नाम है। लेकिन फिल्म की शुरुआत होते वक्त परदे पर नाम देखने की खुशी अलग ही होती है। तो वहां नाम नहीं देखकर बहुत ज्यादा मायूसी हुई। हालांकि अब मालूम हो चुका है कि यहां आपके हुनर से ना तो यहां निर्माताओं को मोहब्बत होती है और ना ही लगाव। क्रिएटिविटी उनके लिए माल है जिसे बाजार में बिकना होता है। खैर, मेरे नाम के साथ पहला होर्डिंग लगा फन रिपब्लिक में सोचा ना था फिल्म का। इम्तियाज उन दिनों पास में ही रहते थे, उन्होंने वहां फिल्म की होर्डिंग देखी तो रात 11.30 बजे मुझे फोन किया। मैं रात 12 बजे वहां होर्डिंग देखने गया। हम दोनों बड़े खुश हुए। पोस्टर पर नाम पहली बार लिखा देखा था। बस वहीं सेलीब्रेशन हो गई। हालात जैसे भी थे हौसले बहुत बड़े थे। हम दोनों ने तब एक एक सिगरेट पी कर जश्न मनाया।
पहला फिल्मफेयर
आपको ये जानकर शायद अचरज हो कि मुझे लव आजकल के गाने आज दिन चढ्या के लिए जब पहला फिल्मफेयर पुरस्कार मिला तो उससे पहले मेरा कभी नॉमीनेशन भी नहीं हुआ। जब वी मेट के लिए मेरा नॉमीनेशन नहीं हुआ। चमेली के लिए कोई नॉमीनेशन नहीं हुआ। लेकिन अब मुझे लगता है कि अवार्ड किसी एक खास गाने के लिए यहां नहीं दिया जाता। अवार्ड यहां शायद किसी कलाकार के हाल फिलहाल के पूरे काम को देखकर दिया जाता है। पहला अवार्ड जब मिला तब मैं आठवी कतार मंे बैठा था। गुलजार, प्रसून जोशी, जावेद अख्तर के साथ मेरा नॉमीनेशन हुआ तो मैं तो इतने से ही खुश था। मैं खुद को समझाकर गया था कि पुरस्कार नहीं मिलेगा बस अवार्ड फंक्शन देखकर लौट आना है। फिर स्टेज से नाम एनाउंस हुआ तो 15-20 सेकेंड के लिए मैं पूरी तरह से ब्लैंक हो गया। मुझे यकीन नहीं हुआ कि मुझे मिला है अवार्ड। थोड़ी देर बाद अपने आप में आया और अपनी कुर्सी से मंच तक जाने के लिए जो 25 कदम मैंने बढ़ाए उनमें अपनी बीती 10 साल की पूरी जिंदगी दोबारा देख ली। गुलजार साब के शब्दों में कहें तो जिस चीज की आपको तमन्नाा रही हो और वो मिल जाए तो जमीन तो पैरों के तले से खिसकती ही है, कई बार सिर से आसमान भी खिसक जाता है। लेकिन ये चाहत भी बस पहले पुरस्कारों तक ही रहती है। अब तक सब रीटेक जैसा मालूम होता है। मैं बस अच्छा काम करना चाहता हूं और चाहता हूं कि मेरे नाम के साथ जो उम्मीदें हिंदी सिनेमा के गीतों को पसंद करने वालों की बंध्ा गई हैं, उन पर खरा उतरता रहूं।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

सलाम ए सितमगर..










लो आ गया वो फिर से उसी शहर उन्हीं गलियों में,
नसीब उसका, रिवायत वही राह ए गुजर बनने की।

ना कर वादे, वादों पे नहीं अब और ऐतबार उसे,
मर चुकी ख्वाहिश भी हमराह ए सफर बनने की।

अपने शागिर्द की उस्तादी का भरम वो तोड़ चला,
हो के रुसवा बढ़ी चाहत यूं रूह ए इतर बनने की।

उसका एहतराम वो संगदिल भी थोड़ा सनकी भी,
हो के बेगैरत पड़ी आदत ज़िक्र ए फिक़र बनने की।

उसने परखा परखने में कोई अपना नहीं निकला,
मुए की आदत थी मुई लख़्त ए जिगर बनने की।

© पंकज शुक्ल। 2011।

picture used for reference only. no commercial use intended.

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

ये वक़्त ए इद्दत है..

सितमगर को मालूम, है खा़क़ ए मंज़िल मकां,
ये मेला कब्र का, यूं साज ओ सामां क्यूं है।

अज़ल का ख़ौफ़, है पैबस्त ए पेशानी शिक़न,
सफर ये सब्र का, यूं ज़ुल्म ओ दामां क्यूं है।



ज़फ़ा की जुस्तजू, शिद्दत से पुर ओ इमां से,
यही तरीक़ अजल से, यूं ग़म ए गिरेबां क्यूं है।

नहीं मैं दूर, ना तुझसे ना इस ज़माने से,
ये वक्त ए इद्दत है, यूं शाम ए परेशां क्यूं है।

ये तेरा दामन, रंगेगा और अभी छीटों से,
तू है शैदाई, यूं सहर ए तमाशा क्यूं है।



अज़ल-मौत। पैबस्त-समाया। पेशानी-माथा। अजल- क़यामत का पहला दिन। इद्दत- तलाक़ के बाद पुनर्विवाह से पहले की न्यूनतम मियाद। सहर- सुबह।


© पंकज शुक्ल। 2011।

चित्र सौजन्य- फिल्म 'प्यासा'

बुधवार, 14 सितंबर 2011

लिपि के बचने से बचेगी भाषा

अमिताभ बच्चन
हिंदी को लेकर छोटे शहरों में अब भी चेतना है। मेट्रो शहरों में भले अब हिंदी पर ज्यादा काम न हो रहा हो, पर शहरी कोलाहल से जो भी दूर है वह हिंदी से जुड़ा हुआ है। हिंदी को लेकर मेरी चिंता पूछी जाए तो वह इसकी लिपि को लेकर है। देवनागरी बहुत ही सरल और आत्मीय लिपि है, पर लोग इसे भूलते जा रहे हैं। इसे बाजार का दबाव कह कर भुला देना ठीक नहीं होगा क्योंकि किसी भी भाषा की पहचान उसकी लिपि से ही होती है। हिंदी को रोमन में लिखे जाने की प्रवृत्ति न सिर्फ गलत है बल्कि इसके विकास और प्रचार प्रसार में बाधक भी बनती जा रही है। इसके लिए जिम्मेदारी किसकी बनती है, इस पर बात करने की बजाय बहस इस बात पर हो सकती है कि इससे निजात कैसे पाई जाए।
"मैं बाबूजी की लिखी सारी रचनाओं को एक जगह एकत्र करने और उनसे जुड़ी स्मृतियों को उनके प्रशंसकों को समर्पित करने के लिए एक योजना पर काम कर रहा हूं। मेरी मनोकामना है कि मैं इलाहाबाद में बाबू जी के नाम पर एक स्मृति भवन बनवाऊं पर ये काम कब पूरा होगा मैं कह नहीं सकता।"

जाहिर है कि पहल उन लोगों को ही करनी चाहिए जिनके लिए हिंदी रोमन में लिखी जाती है। कंप्यूटर के आने के बाद हम लोग वैसे ही लिखना भूलते जा रहे हैं। अब तो हस्ताक्षर करते वक्त तक दिक्कत महसूस होती है। ऐसे में किसी भाषा की लिपि के संवर्धन में तकनीक का भी प्रयोग हो सकता है। मैं खुद भी अपने ब्लॉग या टि्वटर पर यदा कदा हिंदी को देवनागरी में ही लिखने की कोशिश करता हूं। मेरा मानना है कि अभ्यास करने से ये काम भी मुश्किल नहीं है।
भारत में पैदा हुए या भारत से संबंध रखने वाले विदेश में बसे लोगों में हिंदी को लेकर अब भी अकुलाहट देखी जाती है। वह हिंदी को अपने देश से जोड़े रखने का सेतु मानते हैं। अपने बाबूजी (डॉ. हरिवंश राय बच्चन) की कविताओं का पाठ करने जब मैं पिछले साल विदेश दौरे पर गया था, तो मेरे मन में यही आशंका थी कि हिंदी के प्रति लोगों का रुझान होगा भी कि नहीं। लेकिन श्रोताओं में भारतीयों के अलावा बड़ी संख्या वे विदेशी भी आए जिन्हें भारतीय परंपराओं और संस्कृति के बारे में जानने की ललक रहती है। हिंदी जोड़ने वाली भाषा है और इसको समृद्ध बनाने की जिम्मेदारी हम सबकी है। मैं अपनी तरफ से बस इतना प्रयास करता हूं कि हिंदी में जो कुछ मेरे सामने आए वो देवनागरी में ही लिखा हो। रोमन में लिखी गई हिंदी मुझे कतई पसंद नहीं है, जिस भाषा की जो लिपि है, उसे उसी में पढ़ना रुचिकर होता है। बाजार भी धीरे धीरे ही सही पर इसे समझ रहा है।
"पहल उन लोगों को ही करनी चाहिए जिनके लिए हिंदी रोमन में लिखी जाती है। कंप्यूटर के आने के बाद हम लोग वैसे ही लिखना भूलते जा रहे हैं। अब तो हस्ताक्षर करते वक्त तक दिक्कत महसूस होती है। ऐसे में किसी भाषा की लिपि के संवर्धन में तकनीक का भी प्रयोग हो सकता है। मैं खुद भी अपने ब्लॉग या टि्वटर पर यदा कदा हिंदी को देवनागरी में ही लिखने की कोशिश करता हूं।"

हिंदी के विकास इसमें लिखे गए साहित्य को सर्वसुलभ बनाने से ही होगा। मैं बाबूजी की लिखी सारी रचनाओं को एक जगह एकत्र करने और उनसे जुड़ी स्मृतियों को उनके प्रशंसकों को समर्पित करने के लिए एक योजना पर काम कर रहा हूं। मेरी मनोकामना है कि मैं इलाहाबाद में बाबू जी के नाम पर एक स्मृति भवन बनवाऊं पर ये काम कब पूरा होगा मैं कह नहीं सकता। इसके लिए हमें स्थानीय प्रशासन का सहयोग चाहिए होगा और इसके लिए प्रशासन में भी ऐसे प्रयासों के प्रति समर्पण की प्रथम आवश्यकता होती है।

प्रस्तुति-पंकज शुक्ल

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

दाग अच्छे हैं...

सिल्क स्मिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। सिनेमा ने उनको जीते जी कभी वो इज्जत नहीं बख्शी जो अब एकता कपूर जैसी निर्माता उन पर पूरी एक हिंदी फिल्म बनाकर उन्हें देने जा रही हैं। कौन थी सिल्क स्मिता? कैसे वो बनी सिल्क स्मिता? और क्या होता था सिल्क स्मिता होने का मतलब? आइए, करते हैं कोशिश सिल्क स्मिता के इस तिलिस्म को सुलझाने की।


पंकज शुक्ल
दाग अच्छे हैं। एक मशहूर उत्पाद के विज्ञापन की ये लाइन हिंदी सिनेमा के लिए इन दिनों बिल्कुल मुफीद साबित हो रही है। सिंघम और बॉडीगार्ड जैसी फिल्मों में भले आदर्श नायक की बड़े परदे पर वापसी ने आम सिनेमा दर्शकों की भीड़ सिनेमाघरों तक पहुंचा दी हो, लेकिन समाज की बंदिशों के परदों में छुपे और अब तक अतीत के पन्नों में कैद रहे किरदार भी अपनी कमजोरियों के साथ रुपहले परदे पर मौजूदगी दर्ज कराने को बेताब हो चले हैं। छोटे परदे पर परंपराओं और रिश्तों के ताने बाने बुनती रहीं निर्माता एकता कपूर बड़े परदे पर इस मौजूदा प्रयोगात्मक चलन की मशाल लेकर सबसे आगे हैं और इस बार उनकी टीम ने सिनेमा के कैनवास पर उकेरा है एक ऐसा किरदार, जिसे लेकर जितने मुंह उतनी बातें होती रही हैं।

अस्सी के दशक के दक्षिण भारतीय सिनेमा में मादकता के नए बिंबों के सहारे दुनिया भर में मशहूर हुई अदाकारा सिल्क स्मिता को जीते जी कभी वो इज्जत नसीब नहीं हुई जो हिंदी सिनेमा उन पर एक पूरी फीचर फिल्म बनाकर उसे देने जा रहा है। सिल्क स्मिता की शोहरत का ये आलम था कि हिंदी सिनेमा भी उसे उस वक्त अपनाने के मोह से खुद को बचा नहीं पाया। सिल्क स्मिता कौन थी? कहां से आई? और क्यों हिंदी सिनेमा के पांच बड़े प्रोडक्शन घरानों में शुमार बालाजी टेलीफिल्म्स को क्यों इस फिल्म को बनाने की सूझी? इस पर बात करने से ज्यादा ये जानना जरूरी है कि आंध्र प्रदेश में राजमुंदरी के एल्लुरू 2 दिसंबर 1960 को जन्मी विजयालक्ष्मी कैसे पहले स्मिता बनी और फिर सिल्क स्मिता। ये वो नाम है जिसने एक समय दक्षिण भारतीय सिनेमा को अपने यौवन के जादू से हिलाकर रख दिया था और उस दौर की कोई भी फिल्म वितरक तभी खरीदते थे जब उसमें कम से कम सिल्क स्मिता का एक गाना जरूर हो।

अपने दस साल के छोटे से करियर में करीब पांच सौ फिल्मों में काम करने वाली सिल्क स्मिता का परिवार इतना गरीब था कि घर वाले उसे सरकारी स्कूल में भेजने तक का खर्च उठाने में नाकाम रहे। चौथी क्लास में पढ़ाई छूटी और पहला काम उसे मिला फिल्मों में मेकअप असिस्टेंट का। वो शूटिंग के दौरान हीरोइन के चेहरे पर शॉट्स के बीच टचअप का काम किया करती। और, यहीं से उसकी आंखों में पलने शुरू हुए ग्लैमर के आसमान पर चांद की तरह चमकने के सपने। जिस हीरोइन का वो टचअप किया करती थी, उसी के खैरख्वाह फिल्मेकर से उसने दोस्ती की पींगें बढ़ाईं और 1979 में मलयालम फिल्म इनाये थेडी में पहली बार लोगों ने परदे पर देखी एक ऐसी लड़की जो गोरी नहीं थी, छरहरी नहीं थी, जिसकी अदाओं में शराफत नहीं थी और जिसकी आंखें आम लड़कियों की तरह शर्म से झुकती नहीं थी।

स्मिता को करियर का बड़ा ब्रेक मिला 1980 में रिलीज हुई फिल्म वांडी चक्रम में। उसमें उन्होंने अपने किरदार को खुद डिजाइन किया और मद्रासी चोली को फैशन स्टेटमेंट बना दिया। इस फिल्म तक उनका नाम सिर्फ स्मिता ही था, लेकिन फिल्म में अपने किरदार सिल्क को मिली शोहरत को उन्होंने अपने साथ जोड़ते हुए अपना नाम सिल्क स्मिता कर लिया। उन्होंने सिल्क, सिल्क, सिल्क नाम की एक फिल्म में लीड रोल भी किया। 1980 से 1983 का दौर सिल्क स्मिता के करियर वो दौर था जिसमें उन्होंने करीब 200 फिल्में की। एक दिन में तीन तीन शिफ्टों में काम किया और एक एक गाने की कीमत 50 हजार रुपये तक वसूली। यही वो दौर था जब पूरी फिल्म बना लेने के बाद भी निर्माता सिर्फ उनके एक गाने के लिए अपनी फिल्मों की रिलीज महीनों तक रोके रहते थे। सिल्क स्मिता की शोहरत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शिवाजी गणेशन से लेकर रजनीकांत, कमल हासन और चिरंजीवी तक की फिल्मों में उनका कम से कम एक गाना उस वक्त की जरूरत बन चुका था। मसाला फिल्मों के निर्देशकों पर चल चुके इस जादू ने लीक से हटकर फिल्में बनाने वाले निर्देशकों बालू महेंद्रा और भारती राजा को भी अपनी चपेट में लिया। बालू महेंद्रा ने सिल्क स्मिता को अपनी फिल्म मूरनम पिराई में खास रोल दिया और इसे जब उन्होंने हिंदी में सदमा के नाम से बनाया तो सिल्क स्मिता को उसमें भी रिपीट किया।

जितेंद्र-श्रीदेवी और जितेंद्र-जया प्रदा की हिंदी फिल्मों के इसी दौर में सिल्क स्मिता ने हिंदी सिनेमा में प्रवेश किया। सदमा रिलीज होने के ठीक महीने भर पहले वो जीत हमारी नाम की फिल्म के जरिए मायानगरी के निर्माताओं को अपने हुा का जलवा दिखा चुकी थीं। और इसके बाद तो ताकतवाला, पाताल भैरवी, तूफान रानी, कनवरलाल, इज्जत आबरू, द्रोही और विजय पथ तक सिल्क स्मिता हिंदी सिनेमा के दर्शकों को अपनी शोहरत की वजह का एहसास कराती रहीं। लेकिन, शोहरत के दौर में अपने निजी जीवन को संतुलित न रख पाने की कीमत उन्हें करियर के ढलान पर आते ही चुकानी पड़ी। सिल्क स्मिता के एक करीबी मित्र ने उन्ंहें फिल्म निर्माता बनने का लालच दिखाया और सिर्फ दो फिल्मों के निर्माण में ही उन्हें दो करोड़ रुपये का घाटा हो गया। तीसरी फिल्म शुरू तो हुई पर कभी पूरी नहीं हो सकी। बैंक में घटती रकम और एक स्टार की जीवनशैली कायम रखने के दबाव ने सिल्क स्मिता को मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर कर दिया और 23 सितंबर 1996 को उनकी लाश उनके ही घर में पंखे से झूलती पाई गई। पुलिस ने इसे आत्महत्या का मामला मानते हुए ये केस बंद कर दिया, हालांकि ऐसे भी लोगों की कमी नहीं है जो इसे हत्या का मामला मानते हैं और इसके पीछे एक बड़ी साजिश की आशंका जताते रहे हैं।

कहानी थोड़ा फिल्मी है
सिल्क स्मिता के निर्देशक मिलन लूथरिया की फिल्म डर्टी पिक्चर की पहली झलक सामने आने के साथ ही आई है ये खबर कि अब निर्देशक श्याम बेनेगल भी बिपाशा बसु को लेकर इसी से मिलती जुलती कहानी पर एक फिल्म बनाने जा रहे हैं। एक हीरोइन के शीर्ष पर पहुंचने और फिर वहां से लुढकने की कहानी ही निर्देशक मधुर भंडारकर की फिल्म हीरोइन की भी कहानी है। परवीन बाबी के अमिताभ बच्चन और कबीर बेदी से रिश्तों पर महेश भट्ट पहले ही निर्देशक मोहित सूरी के साथ वो लम्हे बना चुके हैं। परवीन बाबी से खुद अपने रिश्तों को लेकर उन्होंने फिर तेरी कहानी याद आई और अर्थ जैसी फिल्में बनाईं। इसी तरह गायक किशोर कुमार के व्यावसायिक और निजी जीवन को लेकर एक फिल्म की चर्चा अरसे से हिंदी फिल्म जगत में होती रही।
दूर से चमकीले दिखने वाले फिल्म जगत के ग्लैमर की कड़वी सच्चाइयों को सत्य घटनाओं पर आधारित इन फिल्मों के अलावा काल्पनिक कहानियों के जरिए भी परदे पर उतारा जा चुका है, जिनमें रामगोपाल वर्मा की रंगीला, मस्त और नाच जैसी फिल्में शामिल हैं। वर्मा की फिल्म मस्त खुद उनके श्रीदेवी को लेकर दीवानेपन की कहानी है। हाल के दिनों में निर्देशक तनुजा चंद्रा ने इसी तरह फिल्म स्टार बनाई। रोहित जुगराज ने सुपरस्टार, केन घोष ने चांस में डांस, राजकुमार संतोषी ने हल्ला बोल, जोया अख्तर ने लक बाइ चांस में ग्लैमर की दुनिया में परदे के पीछे के सच को सामने लाने की कोशिश की।


देसी सौंदर्य की प्रतिमूर्ति थी सिल्क स्मिता
अनामिका

सिल्क स्मिता ने बीस साल पहले जो किया, उसे समझने के लिए हमें आज के दौर में नहीं बल्कि बीस साल पीछे जाना होगा। ये वो दौर था जब परदे पर श्रीदेवी का जादू चला करता था। लेकिन हर भारतीय स्त्री तो श्रीदेवी जैसी सुंदर नहीं हो सकती। सिल्क स्मिता ने चाहे बिकनी पहनी, साड़ी पहनी हो, या फिर हॉट पैंट्स और बुनाई वाले ब्लाउज पहने हो, उनके हर पहनावे में आम भारतीय नारी को अपनी कल्पनाएं नजर आईं। शायद कम ही लोग जानते होंगे लेकिन सिल्क स्मिता के दीवाने जितने पुरुष थे, उससे कहीं ज्यादा बड़ा प्रशंसक वर्ग उस दौर में उनका महिलाओं में था। और, ऐसा इसलिए क्योंकि सिल्क स्मिता ने उस दौर में समाज की वर्जनाएं तोड़ भारतीय महिलाओं की बरसों से दबी कुचली दैहिक संतुष्टि की इच्छाओं को प्रकट करने का रूपक दिया था। सिल्क ने उन भावनाओं को परदे पर जिया जिनकी झलक हमें खजुराहो के मूर्ति शिल्प में ही मिलती रही।
ऐसा नहीं है कि इन इच्छाओं को किसी और नायिका या खलनायिका ने हिंदी सिनेमा में उनसे पहले करने की कोशिश ही नहीं की, लेकिन सिल्क स्मिता का आम नायिका से विपरीत आम महिला के ज्यादा करीब होना उनके हक़ में गया। भारतीय फैशन की जहां तक बात की जाए तो सिल्क स्मिता ने ही दक्षिण भारतीय नायिकाओं को लो वेस्ट साड़ी पहनने की प्रेरणा दी। रही बात आज के दौर की तो मौजूदा दौर में सिल्क स्मिता का देशी यौवन परदे पर प्रदर्शित करने के लिए एक हीरोइन को पहले तो प्लास्टिक सर्जन की जरूरत होगी क्योंकि जीरो फीगर के इस दौर में उनके जैसी मादकता दिखाने वाली कोई हीरोइन नहीं है। इस किरदार के सबसे करीब मेरी नजर से विद्या बालन ही हैं। हालांकि वो निजी जीवन में थोड़ा संकोची और शर्मीली हैं, लेकिन सिल्क स्मिता को समझने के लिए उनके बदन को देखने से ज्यादा उनकी मनोदशा को पढ़ना जरूरी है।

(अनामिका छावल मशहूर फैशन ब्रांड क्रॉसओवर बॉलीवुड की प्रबंध निदेशक हैं)


औरत होने का सबसे करीबी एहसास मिला- विद्या बालन
सिल्क स्मिता के किरदार पर परदे को उतारने के लिए हिंदी सिनेमा की मौजूदा दौर की नायिकाओं में से एकता कपूर ने विद्या बालन को चुना। सिनेमा और फैशन के जानकार भी मानते हैं कि इस किरदार के लिए विद्या बालन से बेहतर पसंद दूसरी नहीं हो सकती थी। पेश है विद्या से बातचीत के कुछ अंश
फिल्म डर्टी पिक्चर में काम करने का अनुभव कैसा रहा?
मेरे हिसाब से मुझे एक औरत होने के इतनी करीबी एहसास को महसूस करने का मौका पहले कभी नहीं मिला, जितना कि इस फिल्म की शूटिंग के दौरान हुआ। ये फिल्म औरत के इंद्रध्ानुषी रंगों को जीने का जश्न है। इसमें जीवन के तमाम रंग हैं, लेकिन एक ाी के जीवन में जितने विविध्ा रंग होते हैं, उनको पेश करने का ये सबसे करीबी मौका रहा।

लेकिन, एक साथ तीन तीन नायक?
ये तो सोने पर सुहागा जैसा रहा। वो कहते हैं ना कि एक से मेरा क्या होगा? लेकिन मजाक ना भी करूं तो भी ये बहुत ही रोचक और दिलचस्प रहा। नसीर साब के साथ तो मैं पहले ही काम कर चुकी हूं तो वो हर पल मेरा हौसला बढ़ाते रहे। इमरान के साथ काम करने को लेकर मैं थोड़ा संकोच में थी, पर उनके साथ भी मजा आया। और तुषार के साथ तो हैदराबाद में शूटिंग करते वक्त मैंने बहुत अच्छा वक्त गुजारा। सबसे बड़ी बात ये थी कि मैं एक ऐसे निर्देशक के इशारों पर काम कर रही थी जिसे ऐसे विषयों को संभालने में महारत हासिल है।

तो फिल्म के बाद आप भी सिल्क कहलाने के लिए तैयार हैं?
मैंने इस फिल्म में एक किरदार किया है। इस दौरान मैंने इस किरदार को न सिर्फ पूरी ईमानदारी से जीने की कोशिश की बल्कि ये भी ख्याल रखा कि इस खास किरदार के प्रशंसकों को मैं उतनी ही संतुष्टि दे पाऊं जितनी कि उन्हें इस कलाकार को देखते वक्त होती थी। मेरा काम यहीं खत्म हो जाता है और मुझे नहीं लगता कि फिल्म रिलीज होने के बाद मुझे लोग सिल्क के नाम से पुकारना चाहेंगे।

सोमवार, 12 सितंबर 2011

चटख़ चोला, फीक़े रंग..



मौसम के रंग देखकर रंगीं वो यूं हुए,
रंगों ने रातें ओढ़ लीं मौसम बदल दिए।

बदली घिरी बूंदों तले मेघों को हुआ रश्क़,
षडयंत्र सावनों के देख बादल बदल दिए।

भादों के भाव भोर तक गिनता रहा रफ़ीक,
घिरती घटा के छांव यूं घनघोर हो गए।

किलकी किरन बादलों के काले कोह चीर के,
छपकी छपक छलांगकर उस छोर हो गए।

रंगरेज़ बेईमान है, चोला है मुख़्तसर,
नीयत पे दाग़ इस कदर चेहरे बदल दिए

© पंकज शुक्ल। सितंबर 2011।


(image used here is only for referential purpose)

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

अन्ना...


26.08.2011

वो बूढ़ा है, सिसकता देश की ख़ातिर।
जवां युवराज को अपना घर बचाना है।

कहां है दाग़ ढूंढो फिर इक नेक बंदे में,
बने दाग़ी तो अच्छा इसका मर ही जाना है।

ये घेरा तल्ख़ का, शक़ का और शुबहों का,
उन्हें दरबार राजा का कंधों पर सजाना है।

वो राजा हैं वादे करके भूल जाते हैं,
ख़तो क़िताबत का बस करते बहाना हैं।

लिपटकर रोएं गंगा में वजू के सिसकते हाथ,
इन्हीं हाथों से कल बूढ़े की अर्थी उठाना है।

(पं.शु.)

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

रिन साबुन की बट्टी है अनुराग की उड़ान

अगर आपकी क़लम का ताल्लुक हिंदी सिनेमा से है और आप दुनिया के सामने दिखने वाले सच के गिरेबां में झांकने की हिम्मत रखते हैं, तो अनुराग कश्यप से आपकी मुठभेड़ गाहे बेगाहे होती रहना तय है। कभी रू ब रू और कभी बाकैमरे। लेकिन, अनुराग के काम की तारीफ करना हिंदी सिनेमा के किसी भी क़लमनवीस के लिए ख़तरे की घंटी भी हो सकती है। कभी भी कोई हिंदी सिनेमा का “भगवान” आपकी लेखनी की स्याही निचोड़ सकता है, क्योंकि अनुराग के बारे में लिखना हिंदी सिनेमा में चल रही एक ऐसी लड़ाई के एक पाले में खड़े होने जैसा है, जिसमें बाहर से आए किसी आम आदमी के लिए जगह मिल पाना नामुमकिन भले ना हो पर मुश्किल ज़रूर है। और, आम आदमी के बारे में बात करना अब बस फैशन रह गया है, जज़्बा नहीं। मेरे ज़िले के मरहूम शायर हसरत मोहानी का एक शैर ऐसे मौके-बेमौके मुझे याद आ ही जाता है और उसे मैं कितनी बार भी इस्तेमाल करूं, बेशर्म की चमक कम नहीं होती – हज़ार ख़ौफ़ हों पर ज़ुबां हो दिल की रफ़ीक़, यही रहा है अजल से कलंदरों का तरीक़।
अपन बात कर रहे थे अनुराग कश्यप की। बीते साल उन्होंने एक ऐसी कहानी को हाथ लगाया जिसे करीब करीब हर प्रोड्यूसर कूड़े में फेंक चुका था। संजय लीला भंसाली के असिस्सटेंट रहे विक्रमादित्य मोटवाने की ये कहानी अनुराग ने पढ़ी तो बहुत पहले थी लेकिन संजय सिंह के साथ मिलकर इसे बनाने का मुहूर्त तभी निकला। उड़ान बनी। चली नहीं चली, इसके आंकड़ों में ना भी जाएं तो सराही बहुत गई। असली हुनरमंद भी कभी पैसे के पीछे नहीं भागता, उसके लिए हौसला बढ़ाने के लिए बजी दो तालियां दोनों जहां की मन्नतें कुबूल होने जैसा होता है। विक्रमादित्य की इस फिल्म ने तमाम देसी विदेशी फिल्म फेस्टिवल्स में तारीफ पाई और मराठों के मैदान में आते आते एक ऐसी गंगा बन गई, जिसमें करोड़ों फूंक कर अपनी मर्जी का तमाशा करने वाले फिल्म अवार्ड्स अपने पाप धोने के लिए बार बार डुबकी लगा रहे हैं। उड़ान इन लोगों के लिए रिन साबुन की ऐसी बट्टी बन गई है जिससे दरअसल इन अवार्ड्स वालों को अपने दामन पर लगे दाग धोने की सहूलियत हो गई है।
अनुराग को उसूलों से समझौता करना न विरासत में मिला और उन्होंने अपने हौसले को समझौतो के आगे घुटने भी नहीं टेकने दिए। उनकी लड़ाई एक ऐसी व्यवस्था से रही है, जहां सितारों को भगवान माना जाता है। शोहरत की बुलंदियां छूने के बाद भी उनका ये जुझारूपन कायम है, अनथक और अविराम। उनके दफ्तर मेरा जाना अब तक दो ही बार हुआ है। मुंबई के उपनगर अंधेरी में आरामनगर का ये इलाका अपने नाम के लिहाज से बिल्कुल उलट है। यहां हर वक्त जिंदगी बेतरतीब सी बिखरी दिखती है। फिल्म निर्माताओं के दफ्तरों के सामने काम पाने की चाहत रखने वाले युवाओं की बेतरतीब कतारें, रास्ते में बेतरतीब से खड़े पेड़ या फिर फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप के दफ्तर तक पहुंचने का बेतरतीब रास्ता। दफ्तर के रिसेप्शन पर एक फ्रेम में लगा फिल्म नो स्मोकिंग का पोस्टर भी इसी का एक्सटेंशन मालूम होता है। पोस्टर पर छपा है - इन सिनेमाज 26 अक्टूबर 2007। इसके नीचे अलग से टाइप करके चिपकाया गया है - आउट ऑफ सिनेमाज 30 अक्टूबर 2010। अपने हर लफ्ज पर दाद की चाह रखने वालों के शहर में अपनी ही फिल्म के पोस्टर पर अपने ही हाथों चिपकाई गई ये चिप्पी अनुराग कश्यप की शख्सीयत का सबसे छोटा लेकिन सबसे सटीक परिचय है।
उड़ान के किरदारों की मनोदशा की चुगली अनुराग के दफ्तर की दीवारें करती हैं। फिल्म रिलीज से पहले हुई बातचीत में अनुराग ने कहा था, अपने यहां टीन एजर्स को लेकर हल्ला तो बहुत है, लेकिन सच पूछें तो उनको जानने की कोशिश हम ईमानदारी से कर नहीं रहे। पहले जो संवाद दो पीढ़ियों के बीच कभी कभार ही होता था, वह अब खूब होता है लेकिन फिर भी कहीं न कहीं कुछ न कुछ दूरी जरूर है। हम टीनएजर्स के लिए फिल्में भी इसीलिए ईमानदारी से नहीं बना पाते। इस आयुवर्ग में सिर्फ कैंडीफ्लॉस रोमांस ही नहीं होता। ये पीढ़ी कांतिशाह के अंगूर भले देखती हो लेकिन वह हम सबसे बहुत आगे है। उसे अपने कल की हमसे ज्यादा चिंता है। जिस उम्र में हम लोग अश्लील साहित्य की तरफ आकर्षित होते थे, उस उम्र तक आते आते तो ये पीढ़ी सब कुछ देख भी चुकी होती है और उससे उकता भी चुकी होती है। आज 40 की उम्र के लोग भले अकेले में इंटरनेट पाने पर पॉर्न साइट्स पर जाना न चूकते हों, लेकिन आज के टीनएजर्स अकेले होते हैं तो भी अमूमन ऐसा नहीं करते। अनुराग की यही पारखी नज़र उन्हें बाकी के निर्देशकों से अलग करती है।
अनुराग की तारीफ में लिखना हिंदी सिनेमा में अपने दुश्मन बढ़ाने जैसा ही है। इसके खामियाजे से मैं दो चार हो भी चुका हूं। लेकिन, फिल्म शूल के वक्त दिल्ली के फिल्म्स डिवीजन ऑडीटोरियम के बाहर फुटपाथ किनारे मिले अनुराग और आज के अनुराग में फर्क ना दिखना ही इसकी भरपाई कर देता है। अपन बेझिझक उनके पाले में खड़े हो सकते हैं, क्योंकि जो तटस्थ हैं, वक्त उनका भी इतिहास किस तरह लिखेगा, फिलहाल तो मालूम नहीं।
-पंकज शुक्ल