शनिवार, 27 मार्च 2010

शनिवार, 20 मार्च 2010

किसने लिखा - "सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.." ?


जैसा कि अक्सर होता है कि इतिहास के अनछुए और अनदेखे पहलुओं को आज की रौशनी में देखने की कोशिशों पर सवाल उठ ही जाते हैं। आज़ादी के सिपहसालार हसरत मोहानी के बारे में जो दो कड़ियां मैंने पिछले दिनों लिखीं, उनका संपादित स्वरूप अख़बार "नई दुनिया" ने शनिवार के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया है। इस लेख को ज़ाहिर है देश के तमाम प्रदेशों में पढ़ा गया और इस पर एक प्रतिक्रिया जनाब शहरोज़ साहब की मुझे मिली हैं। शहरोज़ साहब लिखते हैं -

"लेकिन पढ़कर चकित हुआ कि एक टी वी का पत्रकार जिसे हसरत मोहानी से अतिरिक्त लगाव है और खुद को लेखक उनका अध्येता बता रहा है..लेकिन एक इतनी बड़ी चुक हो गयी.सरफरोशी की तमन्ना..जैसी ग़ज़ल का रचयिता आपने अतिरेक की हद में मौलाना हसरत मुहानी को बतला दिया. जबकि दर हकिअत इसे बिस्मिल अज़ीमाबादी ने लिखा था.अभी कुछ रोज़ पूर्व मैं ने अपने ब्लॉग रचना-संसारपर भी दर्ज किया था।"

अब पता नहीं शहरोज़ साहब को मेरे अतीत में टीवी पत्रकार भी होने के नाते मेरी मेहनत पर शक़ हुआ या मेरी नासमझी का यकीन। उन्होंने आज़ादी के मशहूर तराने "सरफरोशी की तमन्ना ..." का रचयिता हसरत मोहानी को बताए जाने को मेरा अतिरेक ही नहीं बल्कि अतिरेक ही हद मान लिया। ख़ैर, शहरोज़ भाई की भाषा पर मुझे दिक्कत नहीं क्योंकि जो कुछ उन्होंने पढ़ा वो उनकी अपनी खोजबीन पर सवाल लगाता था, सो उनका आपे से बाहर होना लाजिमी है। उनकी टिप्पणी मैंने अपने ब्लॉग पर बिना किसी संपादन के हू ब हू लगा दी है। साथ ही, उनके इस एतराज़ पर अपनी तरफ से जानकारी भी दे दी।

लेकिन, मुझे लगता रहा कि बात को और साफ होना चाहिए और दूसरे लोगों को भी इसमें अपनी अपनी राय देनी चाहिए। हिंदुस्तान बहुत बड़ा देश हैं और आज हम लोगों के पास इतिहास को जानने के अगर कोई तरीके हैं वो या तो अतीत में लिखी गई किताबें या फिर गिनती के जानकारों से बातचीत। हसरत मोहानी पर डॉक्यूमेंट्री बनाने से पहले मैंने और मेरे सहयोगियों ने कोई छह महीने इस बारे में रिसर्च की। इसके लिए हम हर उस जगह गए जहां से हसरत मोहानी का ज़रा सा ताल्लुक था, मसलन फतेहपुर ज़िले का हसवा, जहां हसरत मोहानी सिर्फ मैट्रिक पढ़ने गए थे। नेशनल आर्काइव की ख़ाक छानी गई, जामिया मिलिया यूनीवर्सिटी की लाइब्रेरी खंगाली गई। अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी के अलावा इस बाबत भारत सरकार की तरफ से छपी किताबें भी पढ़ी गईं।

इसी दौरान हम लोगों को एक किताब मिली, जिसे लिखा है उर्दू की मशहूर हस्ती जनाब मुज़फ्फर हनफी साहब ने, जिनके बारे में शहरोज़ साहब का कहना है -

"मुज़फ्फर हनफी साहब से भी चुक हुई.समकालीन सूचनाओं के आधार पर ही उन्होंने लिख मारा.बिना तहकीक़ किये. ढेरों विद्वानों ने ढेरों भूलें की हैं जिसका खमयाज़ा हम जैसे क़लम घिस्सुओं को भुगतना पड़ रहा है."

पहली अप्रैल 1936 को पैदा हुए हनफी साहब की गिनती देश में उर्दू अदब के चंद मशहूर लोगों में होती है। और उनकी क़लम पर शक़ करने की कम से कम मुझमें तो हिम्मत नहीं है। उन्होंने किस्से लिखे, कहानियां लिखीं, शेरो-शायरी भी लिखी। इसके अलावा पुराने ज़माने के लोगों के बारे में उनकी रिसर्च भी काफी लोगों ने पढ़ी। उनकी रिसर्च की भारत सरकार भी कायल रही और तभी नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू ने उनके रिसर्च वर्क का अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं में अनुवाद भी कराया। हनफी साहब ने हसरत मोहानी पर भी एक किताब तमाम रिसर्च के बाद लिखी, जिसे नेशनल बुक ट्रस्ट ने देश की दूसरी भाषाओं में भी प्रकाशित किया है।

इसी किताब के पेज नंबर 27 पर छठे अध्याय में हनफी साहब एक और मशहूर हस्ती गोपी नाथ अमन के हवाले से लिखते हैं कि आज़ादी के मशहूर तराने "सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाजू ए क़ातिल में है" को अक्सर बिस्मिल से जोड़कर देखा जाता है, दरअसल ये बिस्मिल ने नहीं लिखा बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन को ये मोहानी का तोहफा था।

वैसे शहरोज़ साहब की काबिलियत पर भी शक़ की गुंजाइश कम है। कल को उनका रिसर्च वर्क भी इसी तरह शाया हो, ये मेरी दुआ है। क्योंकि विष्णुचंद्र शर्मा जी कहते हैं -

"मुझे लगता है ,शहरोज़ पर बात करने के लिए , सर्वप्रथम उसके समूचे रचनाकर्म पर काम करने की ज़रुरत है ,जैसा कभी भगवतीचरण वर्मा पर नीलाभ ने किया था।" (शहरोज़ जी के ब्लॉग पर उनके ही द्वारा शर्मा जी के हवाला देते हुए लिखा गया अपना परिचय)

शहरोज़ साहब अगर हनफी साहब की रिसर्च को झुठलाना चाहें तो इसके लिए वो आज़ाद हैं। वैसे वो इसके लिए खुदा बख्श लाइब्रेरी में बिस्मिल अज़ीमाबादी की हैडराइटिंग में रखे इस ग़ज़ल के पहले मतन का हवाला देते हैं। वो ये भी कहते हैं कि ये ग़ज़ल चूंकि कोर्स में शामिल है, लिहाजा इस पर विवाद की गुंजाइश नहीं है।

वैसे मुझे भी अपनी रिसर्च के दौरान नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया की ही एक और क़िताब "स्वतंत्रता आंदोलन के गीत" पढ़ने को मिली जिसमें इस तराने के साथ राम प्रसाद बिस्मिल का नाम लिखा है। लेकिन, मैं इस बारे में जिस निष्कर्ष पर पहुंचा वो मोहानी साहब के घर वालों से मुलाक़ात और दूसरे इतिहासकारों के नज़रिए से वाकिफ़ होने के बाद ही पहुंचा। फिर भी, मैं चाहूंगा कि इस बात पर और रिसर्च हो क्योंकि फिल्मकार या पत्रकार किसी भी विषय का संपूर्ण अध्येता कम ही होता है। वो तो संवादवाहक है, मॉस कम्यूनिकेशन का एक ज़रिया। शहरोज़ साहब का ये कहना कि मुझे मोहानी साहब से अतिरिक्त लगाव है, भी सिर माथे। मोहानी साहब ने जिस धरती पर जन्म लिया, उसी ज़िले की मेरी भी पैदाइश है। जैसे कि बिस्मिल अज़ीमाबादी और शहरोज़ साहब की पैदाइश एक ही जगह की है।

मोहानी साहब तो ख़ैर एक शुरुआत है, मेरी डॉक्यूमेंट्री सीरीज़ - ताकि सनद रहे - में अभी ऐसे और तमाम नाम शामिल हैं। और, जब नई लीक खींचने की कोशिश होगी, तो संवाद और विवाद तो उठेंगे ही। वैसे, मराठी साहित्य भी "सरफरोशी की तमन्ना.." का रचयिता हसरत मोहानी को ही मानता है।

गुरुवार, 18 मार्च 2010

वो वजह पारसा उसकी..


(कौन हसरत मोहानी? - दूसरी कड़ी)

गुस्सा इस बात पर नहीं कि हसरत मोहानी जैसे शख्स को देश के इतिहासकारों और नेताओं ने भुला दिया, बल्कि अफसोस इस बात पर ज्यादा होता है कि कम्युनिस्ट पार्टी के देश में हुए पहले अधिवेशन का अध्यक्ष रहे इस शख्स पर पाकिस्तान ने डाक टिकट निकाला, लेकिन अपने ही देश में वो अब तक गुमनाम है। कांग्रेस में हसरत मोहानी की गांधी से नहीं निभी। मुस्लिम लीग में उनको जिन्ना की मज़हब के नाम पर मुल्क का बंटवारा करने की कोशिशें रास नहीं आईं। और कम्युनिस्ट पार्टी में उनको शायद गरीब बेसहारा लोगों के नाम पर की जा रही सियासत के खोखलेपन ने झकझोर दिया। तो क्या ऐसी ही हालत आज के सियासी माहौल की नहीं है? बड़ा हल्ला मचता है आजकल कि आज के युवा राजनीति में नहीं आ रहे। क्यों आएं वो राजनीति में? क्या हसरत मोहानी की तरह बस क़ागज़ के किसी पन्ने में बस एक नाम भर रह जाने के लिए। पच्चीस साल के भी नहीं हुए थे हसरत मोहानी जब वो पहली बार जेल गए। और इसी उम्र के लोगों को सियासत में अपना बगलगीर बनाने के लिए कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी पूरा देश मथ रहे हैं। लेकिन, क्या उन्हें ख्याल है उन लोगों को जिन्होंने अपनी पूरी जवानी कांग्रेस पार्टी के नाम कर दी और कभी भी पार्टी के चंद नेताओं की चरणवंदना से आगे कभी नहीं बढ़ पाए।

देश में लोकतंत्र कायम है। लेकिन राजनीतिक दलों में लोकतंत्र कब आएगा? क्या हसरत मोहानी के गुजर जाने के कोई 60 साल बाद भी कांग्रेस इस बात की गारंटी ले सकती है कि वहां किसी हसरत मोहानी को सिर्फ इस बात पर हाशिए पर नहीं डाल दिया जाएगा कि उसने पार्टी के सबसे बड़े नेता से अलग हटकर कुछ ऐसा सोचने की कोशिश की, जिसका पूरे समाज पर असर पड़ सकता है। महात्मा गांधी ने भले बरसों बाद अपनी जीवनी में हसरत मोहानी को पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाला पहला शख्स बताकर अपना दिल हल्का करने की कोशिश की हो, लेकिन कांग्रेस के आभामंडल की रोशनी में लिखे गए ज्यादातर इतिहास में न सिर्फ पूर्ण स्वराज्य बल्कि स्वदेशी आंदोलन को भी महात्मा गांधी से ही जोड़कर देखा जाता रहा है। बाल गंगाधर तिलक को हसरत मोहानी अपना उस्ताद मानते थे और इंक़लाब ज़िंदाबाद नारे को भी हसरत मोहानी से ही जोड़कर देखा जाता है। और इस बात के तो सबूत है कि – सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाजू ए क़ातिल में है – तराना हसरत मोहानी की क़लम से निकला, लेकिन राम प्रसाद बिस्मिल के नाम दर्ज़ हो चुके इस तराने को लिखने के लिए मोहानी को उनका असली हक़ दिलवाने की पहल कौन करेगा? इस्तेमाल तो मशहूर निर्देशक बी आर चोपड़ा ने उनकी ग़ज़ल भी अपनी फिल्म में बिना किसी इजाज़त के ही कर ली थी, और इसके लिए उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमे का सामना भी करना पड़ा। लेकिन, सरकार पर कौन मुकदमा करे, जिसने बस कानपुर की मेस्टन रोड का नाम हसरत मोहानी मार्ग करके अपनी जिम्मेदारी से निज़ात पा ली।

ना हसरत के गांव मोहान में उनकी कोई निशानी है। ना अलीगढ़ के रसलगंज में, जबकि अलीगढ़ में ही हसरत मोहानी ने अपने दम खम रिसाला निकालकर अंग्रेजों से मुचैटा संभाला था। वो खुद ही लिखते और खुद ही पुरानी सी मशीन पर अखबार छापते। उस ज़माने में डेढ़ सौ रुपये महीना इनायत को हसरत मोहानी ने ठोकर मार दी थी। कॉलेज से भी निकाले गए लेकिन लोगों के दिलो दिमाग में वो घर बसाए रहे। और तो और उत्तर प्रदेश की जिस राजधानी में लगे पुतले गरीबों को मज़ाक उड़ाते नज़र आते हैं, उस शहर में भी हसरत मोहानी की कब्र तलाशने में पूरा एक दिन निकल गया। पुराने लखनऊ के बाग ए अनवार में उनकी कब्र के पास ही एक मज़ार पर भूतों और जिन्नात को भगाने का सिलसिला पूरे साल चलता है। पूरे मुल्क से लोग यहां आते हैं, लेकिन इनमें से भी किसी को नहीं मालूम कि इसी अहाते में एक ऐसा शख्स सोया है, जिसने अपने लेखों से अंग्रेजों की नींद हराम कर दी थी।

और केवल हसरत ही नहीं उनकी पत्नी के साथ भी इतिहास ने काफी नाइंसाफी की। हसरत मोहानी की पत्नी निशात उन निशां आम घरों की पहली मुस्लिम औरत थीं, जिसने बुर्का पीछे छोड़कर आज़ादी की जंग में शिरकत की। जेल में हसरत की हिरासत के दौरान अपने शौहर के नक्शे कदम पर चलते हुए निशात बेगम ने उन्हें हौसला दिया और उनकी गैर मौजूदगी में स्वदेशी सेंटर भी संभाला। ताज्जुब की बात ये है कि इस बहादुर महिला को भी हसरत मोहानी की तरह इतिहासकारों ने भुला दिया। उनका इकलौता फोटो तक भारत के किसी संग्रहालय में नहीं दिखता और खुद हसरत मोहानी के घर वाले बेगम निशात उन निशां का फोटो लंदन की एक लाइब्रेरी से भारत लाए।

सादगी को सिरमौर बनाने वाले हसरत मोहानी हो सकता है कि आज के सियासी माहौल में भी फिट नहीं बैठते। क्योंकि वह पहले शख्स थे जो आज़ाद हिंदुस्तान में सांसदों को मिलने वाली खास सहूलियतों के खिलाफ़ सबसे पहले उठ खड़े हुए। तब तो खैर सांसदों को पचहत्तर रुपये ही भत्ता मिलता था। हमेशा रेलवे के तीसरे दर्जे में सफर करने वाले हसरत ने कभी सरकारी आवास तक का इस्तेमाल नहीं किया। अगर देश की नौजवान पीढ़ी को सियासत से जोड़ना है तो आज की सियासी पार्टियों को हसरत मोहानी जैसे लोगों को और करीब से जानने और समझने की ज़रूरत है। हसरत मोहानी जैसे नेताओं के बारे में नए सिरे से शोध की ज़रूरत है और तब शायद दूसरे नेताओं की बनिस्बत कम मशहूर आज़ादी के ऐसे अनोखे सिपाहियों के बारे में आज की पीढ़ी को भी कुछ जानने को मिलेगा और सियासत को मिलेंगे कुछ नए नायक। और तभी शायद पूरी हो सकेगी वो इबारत जो हसरत मोहानी ने बरसों पहले लिख दी थी - हज़ार खौफ़ हों पर ज़ुबां हो दिल की रफ़ीक़, यही रहा है अजल से कलंदरों का तरीक़।

फोटो परिचय: पुराने लखनऊ के बाग ए अनवार में मौलाना हसरत मोहानी की कब्र। पत्थर पर लिखे शेर का मजमून ये है -

जहान ए शौक में मातम बपा है मर्ग हसरत का।

वो वजह पारसा उसकी, वो इश्क़ पाक़बाज़ उसका।

मंगलवार, 16 मार्च 2010

कौन हसरत मोहानी?


कैसा लगेगा आपको अगर आप आज़ादी की लड़ाई में अपना सब कुछ स्वाहा कर देने वाले किसी गुमनाम से स्वतंत्रता सेनानी पर कोई फिल्म बनाने निकलें और उसके गांव पहुंच कर पहला सवाल ही आपका माथा खराब कर दे। जी हां, ये वाकया मेरे साथ अबकी हुआ उत्तर प्रदेश की राजधानी से कुछ ही दूर बसे गांव मोहान में। मैंने गांव की पुलिस चौकी के पास लगे मजमे में मौजूद लोगों से पूछा कि जनाब हसरत मोहानी का कोई पुश्तैनी मकान या फिर उनकी कोई यादगार यहां है क्या? जवाब में सवाल आया – कौन हसरत मोहानी? ये सवाल नहीं, इससे ज्यादा कुछ और है। जो नस्ल अपने ही पुरखों को भूल जाए और उनका नाम तक ना याद रख पाए, उसकी मौजूदा पुश्त से आगे क्या उम्मीद की जा सकती है। यही नहीं, मशहूर इतिहासकार एस पी सिंह से जब मैं इस मसले पर बात करने पहुंचा तो उन्होंने देश में इतिहास लेखन के मौजूदा हालात पर बड़ी नाउम्मीदी जताते हुए अफसोस किया कि उनके तीस साल के करियर में ये पहला मौका था जब कोई उनसे हसरत मोहानी पर बात करने आया। तो क्या भारत में इतिहास लेखन भी पूर्वाग्रहों और खास खेमों के इर्द गिर्द ही सिमटा रह गया? लगता तो यही है। जिस किसी भी शख्स ने आज़ादी की लड़ाई में कांग्रेस या कहें कि महात्मा गांधी की विचारधारा की मुख़ालिफ़त की, उसे ही दूध की मक्खी की तरह ना सिर्फ कांग्रेस से बल्कि इतिहास से भी बेदखल कर दिया गया। और, ऐसा आज भी हो रहा है।

समाज के बने बनाए आदर्श पुरुषों की तरफ दूसरे नजरिए से देखने की कोशिश कम ही होती है। आमतौर पर समाज पहले से बने बनाए मापदंडों को मानकर ही आने वाले कल की तैयारी में जुट जाता है, लेकिन देखा जाए तो दुनिया के बदलते राजनीतिक हालात और ख़ासकर अपने देश भारत में बदलती सामाजिक आर्थिक हालत के मद्देनज़र कुछ बातों पर फिर से गौर करना ज़रूरी है। पहला तो ये कि क्यों आखिर मुसलमान शब्द सुनते ही लोगों के जेहन में आतंकवाद ही कौंध जाता है। क्या ये तुरंत हुआ है, या फिर समाज में विद्वेष के बीज बोने की ये बरसों से चल आ रही सोची समझी रणनीति की कामयाबी है। क्या इस देश को आज़ाद कराने में मुसलमानों ने कोई योगदान नहीं किया? क्या इतिहास में सिर्फ जिन्ना ही हुए हैं, हसरत मोहानी नहीं। बहुत कम लोग जानते हैं कि मशहूर ग़ज़ल – चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है – लिखने वाले हसरत मोहानी ही दरअसल देश में पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाले पहले सियासी नेता थे। तब तो मोहनदास करमचंद गांधी भी इसके पक्ष में नहीं थे। हसरत मोहानी ने ही पहले पहल स्वदेशी आंदोलन की नींव डाली और एक बार तो भयंकर जाड़े में भी अपने किसी रिश्तेदार के यहां पूरी रात ठिठुरते ठिठुरते इसलिए काट दी, कि उनको ओढ़ने के लिए रखे गए कंबल पर मेड इन इंग्लैंड लिखा था।

लाखों में एक होते हैं वो जो अपने वतन के लिए कुर्बान होने का जज़्बा रखते हैं, गिनती के थे वो जिन्होंने फ़ाकाकशी में भी अपने वतन की साख पर आंच नही आने दी। और बस हसरत ही हैं वो जो तिलक के शागिर्द बनकर बापू के लिए नज़ीर बन गए। मज़हब के नाम पर मुल्क के बंटवारे की आख़िरी दम तक मुख़ालिफ़त करने वाले हसरत मोहानी गरम दल के कांग्रेसी थे। मौलाना फज़लुर हसन हसरत यानी हसरत मोहानी की शख्सीयत की तरफ गौर करना आज के माहौल में इसलिए भी ज़रूरी है कि अब कुछ ऐसी मिसालें लोगों के सामने लाना ज़रूरी हैं, जो इस देश की गंगा जमुनी तहज़ीब में दिखती दरारों को पाटने में मदद कर सकें। हज करने के लिए हिंदुस्तान से मक्का तक पैदल जाने वाले हसरत मोहानी को कान्हा में भी दिलचस्पी थी। लोगों ने भले उन पर कुफ़्र का इल्जाम लगाया हो, लेकिन भगवान कृष्ण की तस्वीर कभी उनसे अलग नहीं हुई। इनकी किताब जिहाद ए हसरत एक बार फिर बाज़ार में है, कौम के लोगों को ये बताने के लिए कि जिहाद का मतलब क्या है? और कैसे जिहाद के ज़िरए दो कौमों को एक करने के लिए हसरत मोहानी ने अपना सब कुछ नीलाम हो जाने दिया।

लेकिन, क्या वजह है कि हसरत मोहानी की यादों के निशान अब उनके अपने गांव में भी ज्यादा नहीं बचे हैं। इसके लिए कौन गुनहगार है। पार्कों और पत्थर के हाथी लगवाने पर करोड़ों रुपये स्वाहा करने वाली सरकार क्या इस शख्स के नाम पर एक स्मारक या एक सरकारी पुस्तकालय तक नहीं बनवा सकती, जहां उनका लिखा साहित्य शोध करने वालों को एक जगह मुहैया हो सके। और सूबे की सरकार ही क्यों दिल्ली की सरकारों ने भी तो आज तक इस पिछड़े ज़िले के सबसे चमकदार नेता की याद बचाए रखने के लिए कुछ नहीं किया। पिछले चुनाव से ठीक पहले हसरत मोहानी के नाम पर मुसलमानों की खेमेबंदी करने की एक कोशिश ज़रूर इस ज़िले में हुई, लेकिन चुनाव के बाद ऐसा कुछ नहीं किया गया कि लोग इस कोशिश की ईमानदारी पर शक़ न करते।

(जारी..)

शनिवार, 6 मार्च 2010

ताकि सनद रहे...

संकट में इतिहास ही सच्चा गाइड है...

हम जो हैं, हम जिस तरह के हैं और हम क्यों हैं, यही इतिहास है...

क्या आप जानते हैं कि संसद भवन में बम फेंकने के बाद भगत सिंह पर चले मुकदमे में उनकी पैरवी करने वाला वकील कौन था? या फिर, क्या ये जानते हैं कि अमेरिका में आज़ाद भारत का पहला राजदूत कौन था? दोनों एक ही शख्स हैं? है ना चौंकाने वाली बात!

इतिहास के पन्नों से ही एक और पहेली। क्या आप जानते हैं कि वो कौन सा कांग्रेसी नेता है जिसने अमृतसर रेलवे स्टेशन पर अलग अलग घड़ों से हिंदुओं और मुसलमानों को पानी पिलाते देख अपना सफर वहीं रोक दिया और खुद खड़े होकर वे घड़े तुड़वाए? नहीं, ये महात्मा गांधी नहीं थे।

एक छोटा सा सवाल और। वो कौन सी शख्सीयत थी जिसने पहले पंडित मोती लाल नेहरू और फिर पंडित जवाहर लाल नेहरू के निजी सचिव के तौर पर काम किया?

आपका स्कोर क्या रहा? तीन में से दो या फिर तीन में से एक, या फिर.... J

अगर आप को इनमें से एक का भी जवाब पता है तो फिर आप बधाई के हक़दार हैं क्योंकि हिंदुस्तान की आज की नौजवान आबादी को तो इनमें से एक का भी जवाब ना तो पता है और ना ही किसी ने इन्हें ये बताने की कोशिश ही की। ये सब देश के महान स्वतंत्रता सेनानी थे और ये सब मुसलमान थे।

लेकिन...

लेकिन, क्या इनके बलिदानों और समर्पण को आधुनिक भारत में कोई पहचान मिली? क्या हमने ऐसा कुछ किया जो ना सिर्फ इनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि हो, बल्कि देश की गंगा जमुनी तहज़ीब की सही तस्वीर पेश कर सके।

ग्लोबल न्यूज़ नेटवर्क की प्रस्तुति ताकि सनद रहे..., इन्हीं सवालों का जवाब है।

ताकि सनद रहे, अलग अलग डॉक्यूमेंट्रीज़ की एक ऐसी सीरीज़ है जिसमें देश की आज़ादी में हिस्सा लेने वाली चंद मशहूर और कुछ अनजान सी रह गईं मुस्लिम शख्सीयतों को आज की पीढ़ी के सामने दिलचस्प और रोचक अंदाज़ में पेश किया जाएगा।

इनमें से किसी ने मशहूर ग़ज़ल चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है..लिखी तो कोई आगे चलकर बना युवक कांग्रेस का संस्थापक। ये वो लोग हैं जिन्होंने अपने पेशे और अपनी अच्छी खासी गृहस्थी को आग लगा दी सिर्फ इसलिए कि देश में आज़ादी का दीया जल सके। ये वो लोग हैं जिनसे हर हिंदुस्तानी और ख़ासकर अल्पसंख्यकों ने तिरंगे की आन बान और शान बढ़ाने की प्रेरणा ली और आज भी ले रहे हैं।

ताकि सनद रहे, एक उम्मीद है उन हज़ारों लाखों लोगों की, जिनको लगता है कि अल्पसंख्यक नेताओं की तरफ भारतीय मीडिया ने कभी ख़ास तवज्जो नहीं दी।

ताकि सनद रहे, ये बताने के लिए है कि जो इतिहास को भूल जाते हैं, भविष्य उनको भूल जाता है।

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