बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

कुमार के कौतुक

दिल्ली पुस्तक मेले से लौटते वक्त एकाएक नज़र गेट के करीब लगे एक बैनर पर अटक गई। फोटो तो अपने जाने पहचाने और करीबी डॉ. कुमार विश्वास की ही थी लेकिन किताब की डिज़ाइन पर जो नाम छपा था, वो समझ नहीं आया। काफी देर दिमाग की नसें जब आपस में गुत्थमगुत्था करके हार गईं तो ये सोच कर उसे समझाने का हौसला किया कि ज़रूर ये अपने अजूबे कवि की कोई नई राम कहानी होगी। लेकिन फिर भी मन नहीं माना। डर था कि कवि महोदय मेरी अज्ञानता पर हंस भी सकते हैं लेकिन तब भी...।

फोन की घंटी बजी, कवि कुमार की आवाज़ आते ही पूंछ बैठा कि भाई ये कौन सी नई किताब लिख मारी है, जिसका टाइटल ही एलियंस की सी भाषा में है। वो भी समझ नहीं पाए कि मेरे सवाल का मतलब क्या है, तभी दिमाग की घंटी बजी और तोड़ ये निकला कि जिस हिंदी फॉन्ट का इस्तेमाल डिज़ाइनर ने किया होगा, वो शायद छपाई के वक्त एलियंस की भाषा जैसी दिखने वाली लिपि में तब्दील हो गया। धन्य हो डायमंड पॉकेट बुक्स ! फिर कुमार की ही तो कविता है- कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है, मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है।

हिंदी के समकालीन और लोकप्रिय कवियों में डॉ. कुमार विश्वास का नाम अक्सर ही सुनाई देता है। कभी अब तक की किसी भी हिंदी कविता के सबसे ज़्यादा डाउनलोड (कोई दीवाना कहता है – उनकी नई किताब भी इसी नाम से आई है, जिसे डायमंड पॉकेट बुक्स वितरित कर रहा है) को लेकर तो कभी मंच पर उनकी रोमांटिक दादागिरी को लेकर। कुमार कौतुक से कविता निकालते हैं और ये उनका ही कमाल कि वो किसी को भी कहीं से कुरेद कर कविता बना देते हैं। कोई चार साल पहले कुमार ने ही सबसे पहले मीडिया खासतौर से टीवी मीडिया पर तलवार चलाई थी। हो सकता है रामू ने उनकी कविता सुनकर या उसके बारे में सुनकर ही रण की रणनीति बनाई हो। ज़ी न्यूज़ के दफ्तर में कोई तीन साल पहले आए रामू ने तब अपनी इस फिल्म के बारे में चर्चा की थी और टीवी के कारोबार को समझने के लिए एक दो बार बात भी की थी, तब शायद वो फिल्म का नाम ब्रेकिंग न्यूज़ रखना चाहते थे, लेकिन इस बीच इसी नाम से एक फिल्म बनकर रिलीज़ भी हो गई।

खैर लौटते हैं, कुमार के कौतूहल पर। इमरोज की कलमकारी से सजी इस किताब को एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद रुकने का मन नहीं होता। कुमार की इस किताब का अपन अलग कलेवर है और लफ्जों की नूराकुश्ती का अलग ही तेवर है। शिक्षण संस्थानों खासकर तकनीकी शिक्षण संस्थानों में सबसे ज़्यादा सुने जाने वाले इस युवा कवि की तारीफ़ (?) में उनके परम सखा अतुल कनक कुछ यूं लिखते हैं – आप बीती को गीत बीती बनाने का उनका कौशल पूरे हिंदी जगत में आधार पाता है। हिंदी कवि सम्मेलनों में हर प्रकार से (प्रशंसा से निंदा तक), अपनी पीढ़ी के नंबर वन कवि हैं। और निदा फ़ाज़ली की मानें तो गोपाल दास नीरज के बाद अगर कोई कवि मंच की कसौटी पर खरा लगता है तो वो नाम कुमार विश्वास के अलावा दूसरा नहीं हो सकता। खुद नीरज का मानना है कि कुमार को भविष्य बड़े गर्व और गौरव से गुनगुनाएगा। कुमार की किताब कोई दीवाना कहता है पुस्तक मेले में धड़ल्ले से बिक रही है। खुद कुमार छह और सात फरवरी को दोपहर एक बजे से चार बजे के बीच डायमंड पॉकेट बुक्स के पुस्तक मेले में लगे स्टाल पर अपने चाहने वालों के बीच होंगे। कुमार ने बंधी बंधाई लीक छोड़कर नई राह बनाई है, इस नज़रिए से सायर (शायर) भी हैं, साहित्य के सिंह भी और कलावादी मां के सपूत भी। और करो कौतुक, ज़माना इंतज़ार कर रहा है।