बुधवार, 1 दिसंबर 2010

राम..


इसे कायदन मेरी पहली ग़ज़ल कह सकते हैं. रदीफ़, काफ़िया में न उलझलते हुए और बहर आदि की जानकारी न होते हुए भी बस क्रोंच पक्षी से मन के रुदन को शब्दों में पिरो डाला है। कहते हैं पहले भाषा आई, फिर उसे संस्कारित करने के लिए व्याकरण के नियम बने, लिहाजा 'जौ बालक कह तोतरि बाता' जैसी उदारता के साथ ही इसे पढ़ें और अपनी टिप्पणियों से ज़रूर अवगत कराएं। अवध के इलाके में जब तराजू उठाया जाता है तो पहला पलड़ा राम कह कर ही गिना जाता है, तो मेरी इन कोशिशों की शुरुआत भी राम से...।


पंशु

यूं न मौत को बदनाम करो ज़िंदगी के बाद,
अब आंखें किसी के इंतजार में जागती तो नहीं।

नश्तर ने यूं पाया उनके करतब से नया नाम,
गिरेबां में दोस्ती अब अपने ही झांकती तो नहीं।

सुलह थी सब्र की ज़ालिम से नीम रहने की,
रवानगी ये मेरे रगों की मानती तो नहीं।

पुराना कुर्ता है और चमक ये नील टीनोपाल की,
नज़र ये उनकी अब असलियत मेरी ढांकती तो नहीं।

रहा करे दिल में मेरे, मेरे बचपन का फितूर,
मेरे इंतजार में मां अब मेरी जागती तो नहीं।

चित्र सौजन्य - मुक्ता आर्ट्स की फिल्म "नौकाडूबी"

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

उसका तमाशा...!!

















गुमनाम न मर जाएं, चलो बदनाम ही सही
ये सोच के ही उसने तमाशा बनाया होगा..।

वो बनके तमाशा सुपुर्द ए खाक हो गए,
मय्यत* के सोगवारों* को मज़ा तो आया होगा..।

उसे गुमान अपने तंज*, अपने तेगे*, अपने नश्तर पर,
किसे पता वो कलमा पढ़ के जिबह* होने आया होगा..।

था उसका ज़ामिन* उसी ने चाक जिगर कर डाला,
किसी फरेब ने उसको भी भरमाया होगा..।

गली, कूंचों में मुझे हर तरफ मोहब्बत ही मिली,
नादान दिल ही मेरा उसको न समझ पाया होगा..।

कहा था मां ने कभी घर से दूर मत जाना,
है छांव सर पे घनी ना उसका सरमाया होगा..।

पं.शु. 

(फोटो कर्टसी- अनुषा जैन)

* मय्यत - शवयात्रा, सोगवार - शोक प्रकट करने वाले, तंज - व्यंग्य, तेगा- खंजर, जिबह - कत्ल, जामिन - जमानत देने वाला।

सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

दक्षिण के “भगवान” ने पोसा नक्सलवाद को?


देश में नेपाल की सीमा से लेकर आंध्र प्रदेश और उसके आगे केरल तक पसर चुके लाल गलियारे की पगडंडियों ने क्या कभी तेलुगूदेशम के संस्थापक और मशहूर अभिनेता एन टी रामाराव के सहारे विस्तार पाया था? बाहुबल के सहारे चलने वाली देश की क्षेत्रीय सियासत पर शूल, सरकार और सरकार राज जैसी फिल्में बना चुके निर्माता निर्देशक राम गोपाल वर्मा इस बार इसी सवाल को दर्शकों के सामने लेकर आने वाले हैं। गांधी जयंती के दिन गांधी की प्रतिमा के सामने सियासी हिंसा के खूनी खेल से शुरू होती इस फिल्म के कुछ अंश दो अक्टूबर को देखने का मौका मिला रामगोपाल वर्मा के साथ। मुंबई के एम्पायर स्टूडियो में रक्त चरित्र की फाइनल मिक्सिंग चल रही है और शनिवार की शाम इस फिल्म की दी रीलें देखने का मौका मिला।
करीब डेढ़ घंटे तक चली एक खास मुलाकात में रामगोपाल वर्मा ने कहा कि केंद्रीय को कभी भी क्षेत्रीय ताकतों का उदय रास नहीं आया। दो शक्तियों के इस टकराव में जो सत्ता में काबिज है वो वर्दीधारी बाहुबल का इस्तेमाल करता है और जो सत्ता के लिए संघर्ष कर रहा है उसकी कोशिश गैरकानूनी हो जाती है। नक्सलवाद की जड़ में भी यही समस्या है। रामगोपाल वर्मा ने अपनी नई फिल्म रक्त चरित्र में तेलुगूदेशम पार्टी के मशहूर नेता परिताला रवि की कहानी के जरिए सत्ता के इसी संघर्ष का सच परदे पर दिखाने की कोशिश की है। आंध्र प्रदेश के जंगलों में दबदबा कायम करने वाले खूंखार नक्सली परिताला रवि को अपनी पार्टी का वर्चस्व बढ़ाने के लिए एन टी रामाराव ने तेलुगूदेशम में शामिल कर लिया था। इसके बाद एक दशक तक हैदराबाद सियासी हिंसा के उफान के अलग अलग खूनी मंजर देखता रहा।
दक्षिण में पनपे नक्सलवाद के लिए रामाराव और चंद दूसरे नेताओं का संरक्षण मिलने की बात अब तक बस चर्चाओं में ही रही है, पहली बार किसी फिल्म में इस पर उंगली उठाई जा रही है। वर्मा मानते हैं कि इसका विरोध भी उन्हें झेलना पड़ सकता है क्योंकि रामराव को दक्षिण में भगवान की तरह पूजा जाता रहा है। रक्तचरित्र के जरिए शत्रुघ्न सिन्हा अरसे बाद किसी केंद्रीय किरदार के जरिए बड़े परदे पर वापसी कर रहे हैं। रामगोपाल वर्मा ये मानने में कतई संकोच नहीं करते कि शत्रुघ्न सिन्हा का चरित्र रामाराव से प्रेरित है। अमिताभ बच्चन को फिल्म सरकार और सरकार राज के अलावा रण में भी निर्देशित कर चुके वर्मा मानते हैं कि सत्तर के दशक से उभर हिंदी सिनेमा के इन दोनों सुपर सितारों का अपना अपना खास मैनरिज्म है। लेकिन, शत्रुघ्न सिन्हा को वह ज्यादा स्टाइलिश और ज्यादा रुआबदार मानते हैं।
एक साथ तीन भाषाओं तमिल, तेलुगू और हिंदी में बनी रामगोपाल वर्मा की फिल्म रक्त चरित्र की पहली कड़ी 22 अक्टूबर को रिलीज होगी और इसका दूसरा हिस्सा वह नवंबर के आखिरी हफ्ते में रिलीज करने की तैयारियां कर रहे हैं।

pankajshuklaa@gmail.com

रविवार, 18 जुलाई 2010

संडे स्पेशल : अनसुने, अनोखे आमिर खान



ये पूरा इंटरव्यू अगर पढ़ने में दिक्कत हो रही हो तो कृपया नीचे दिए लिंक को अपने ब्राउजर की खिड़की के पते वाली जगह पर कॉपी पेस्ट करें > http://www.naidunia.com/Details.aspx?id=164033&boxid=27282228

शनिवार, 15 मई 2010

महाराष्ट्र की सियाती शतरंज पर अब ‘ख़ाकी’ की बिसात

मुंबई। आईपीएल मैचों में मनोरंजन कर के मुद्दे पर महाराष्ट्र की सियासी शतरंज में अपनी गोटी पिटवा चुकी एनसीपी अब नई बिसात बिछा रही है। ये बिसात है अपने चहेते अफसर को मुंबई पुलिस कमिश्नर बनाने की और इस बिसात पर एनसीपी का खेल बिगाड़ने के लिए कांग्रेस खुलकर मैदान में उतर चुकी है। पुणे के पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह पुलिस विभाग में अगले महीने की शुरुआत में होने वाले फेरबदल में मुंबई पुलिस कमिश्नर बनने की रेस में सबसे आगे बताए जाते हैं। वहीं, गृह राज्य मंत्री और कांग्रेस विधायक रमेश बागवे ने पुणे पुलिस की कार्यशैली की सीआईडी जांच कराने की मांग करके अपने ही सीनियर यानी राज्य के गृह मंत्री आर आर पाटिल को धर्मसंकट में डाल दिया है।

कांग्रेस और एनसीपी के बीच महाराष्ट्र में चल रहे शह और मात के मुकाबले में इस बार ख़ाकी पर खेल होने जा रहा है। और, इसकी शुरुआत भीतरखाने हो भी हो चुकी है। इस खेल का पहला मोहरा चला जाएगा 31 मई को, जिस दिन महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक ए एन राय रिटायर होंगे। माना ये जा रहा है कि राय के उत्तराधिकारी के रूप में राज्य के दूसरे सबसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हसन ग़फूर की तैनाती होगी, जो इस वक्त एंटी करप्शन ब्यूरो के पुलिस महानिदेशक हैं। महाराष्ट्र में पुलिस महानिदेशक स्तर के तीन पद हैं, इनमें तीसरा पद है पुलिस महानिदेशक हाउसिंग का। गफूर के डीजीपी महाराष्ट्र बनने के बाद खाली हुए पद पर मुबंई के मौजूदा पुलिस कमिश्नर डी शिवनंदन की तैनाती हो सकती है, जिनके एडीजी से डीजी के लिए प्रमोशन में अब महीने भर से भी कम का वक्त बचा है।

ख़ाकी पर सियासत का असली खेल इसके साथ ही शुरू होता है। डी शिवनंदन का प्रमोशन होते ही अपनी पसंद का मुंबई पुलिस कमिश्नर लाने की कोशिशें कांग्रेस और एनसीपी दोनों में जारी हैं। मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने हालांकि अभी इस बारे में अपनी कोई राय नहीं बनाई है और वह मुख्य सचिव जे पी डांगे की अध्यक्षता में गठित पैनल की उस रिपोर्ट के इंतज़ार में हैं जिसमें महाराष्ट्र के नए डीजीपी के चयन के बारे में सिफारिशें की जाएंगी।

राय के रिटायर होने और शिवनंदन के प्रमोशन के बाद मुंबई पुलिस कमिश्नर बनने की दौड़ में वरिष्ठता के लिहाज से पांच आईपीएस अफसर हैं। इनमें एसआरपीएफ चीफ अजित परसनिस, स्पेशल ऑपरेशन चीफ संजीव दयाल, सीआईडी चीफ एस पी एस यादव, पुणे के पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह और एडीजी ट्रैफिक अरुप पटनायक शामिल हैं। इनमें से पुणे के पुलिस कमिश्नर को मुंबई का पुलिस कमिश्नर न बनने देने की कांग्रेस का एक धड़ा पूरी कोशिश कर रहा है। गृह राज्य मंत्री रमेश बागवे के पासपोर्ट प्रकरण ने इस मामले में आग में घी डालने का काम किया है। पुणे में पुलिस चौकियों को बंद किए जाने के मुद्दे पर आमने सामने रहे बागवे और सत्यपाल सिंह की अनबन के पीछे बागवे का पासपोर्ट ही है, जिसे पुणे पुलिस की रिपोर्ट के बाद पासपोर्ट दफ्तर ने रिन्यू नहीं किया।

अब सत्यपाल सिंह ने दो कदम पीछे जाते हुए पुणे की सभी बंद की गई पुलिस चौकियों को फिर से खोलने का आदेश जारी कर दिया है। सियासी जानकार इसे गृह राज्य मंत्री का अहम संतुष्ट करने की कार्यवाही बता रहे हैं, लेकिन बागवे किसी भी सूरत में पुणे पुलिस कमिश्नर को माफ करने के मूड में नहीं है। इधर पुणे पुलिस कमिश्नर बागवे की लंबे समय से चली आ रही पुलिस चौकियों को फिर से चालू करने की ज़िद पूरी कर रहे थे, उधर बागवे मीडिया के सामने पुणे पुलिस की कार्यप्रणाली की जांच सीआईडी से कराने की मांग कर रहे थे। बागवे इसके पहले भी अपने सीनियर यानी गृह मंत्री आर आर पाटिल को परेशानी में डाल चुके हैं, जब उन्होंने पिछले महीने पुणे पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह के तबादले का अपनी मर्जी से ऐलान करके पूरी सरकार को हैरानी में डाल दिया था।

पंकज शुक्ल। नई दुनिया, नई दिल्ली में 15 मई 2010 को प्रकाशित)


गुरुवार, 13 मई 2010

डेढ़ हज़ार किताबों का वजन बस 300 ग्राम !!!

मुंबई। अगर 70 के दशक में हिंदी सिनेमा के सबसे बहुचर्चित डॉयलॉग मेरे पास मां है की तर्ज पर कहें तो इन दिनों हिंदी सिनेमा के सितारे एक नई चीज़ पर इतरा रहे हैं। वो शान से कहते हैं – मेरे पास किंडल है। बॉक्स ऑफिस के बादशाह शाहरुख खान इसके बिना घर से बाहर नहीं निकलते और जब भी फुर्सत में होते हैं तो बस उनकी आंखें इसी पर टिकी रहती हैं। अगर शाहरुख खान के करीबियों की भाषा में कहें तो शाहरुख खान को किंडल से प्यार हो गया है। इन दिनों शाहरुख की पत्नी गौरी विदेश दौरे पर हैं और शाहरुख शूटिंग के बाद ज़्यादतर वक़्त या तो बच्चों के साथ बिताते हैं या फिर किंडल के साथ।

किंडल क्या है, इसे तफसील से समझने से पहले ये भी जान लीजिए कि शाहरुख खान आखिर बिना गौरी के कैसा महसूस कर रहे हैं। अपने चाहने वालों के साथ मंगलवार को ट्विटर पर करीब दस मिनट तक लगातार घुलते मिलते रहे शाहरुख ने कहा कि वो आज़ाद महसूस कर रहे हैं और वे सारी चीज़ें करने जा रहे हैं, जिस पर गौरी के चलते पाबंदी रहती है। उन्होंने इस दौरान ये राज़ भी खोला कि गौरी से उनकी मुलाकात उन स्कूल पार्टियों के दौरान हुई जिनमें लड़के और लड़कियां अलग अलग कोनों में बैठे रहते थे और फिर किसी लड़की से साथ में नाचने की फरमाइश करते थे। गौरी को उन्होंने अपनी मां की पसंद भी बताया। फुर्सत मिलते ही शाहरुख एक क़िताब भी पूरी करना चाहते हैं, जिसे वह काफी दिनों से लिख रहे हैं, लेकिन उन्हें अफसोस है कि अक्सर दूसरे कामों में व्यस्त हो जाने के कारण वह इसके लिए समय नहीं निकाल पाते। इस दौरान एक सवाल के जवाब में शाहरुख ने ये भी कहा कि सियासत उन्हें समझ नहीं आती।

अपने प्रशंसकों से बातचीत के दौरान शाहरुख ने इस बात पर भी अफसोस जताया कि पूरा देश ट्वेंटी 20 के खुमार में है और किसी ने इस बात की भी परवाह नहीं कि भारतीय हॉकी टीम अजलान शाह कप में कितना उम्दा खेल दिखा रही है। कभी धुंआधार सिगरेट पीने वाले शाहरुख ने अपने चाहने वालों के बीच इस बात से भी इनकार किया कि इसके चलते उन्हें अपने फेफड़ों का ऑपरेशन कराना पड़ा है।

क्या है किंडल?

और अब बात किंडल की। किंडल दरअसल 21वीं सदी के तकनीकी चमत्कारों में जुड़ी एक नई कड़ी है। किंडल एक तिहाई इंच से पतली एक मैगज़ीन की तरह है, जिसका वजन एक आम किताब से भी काफी कम होता है। आकार है 6 इंच से लेकर करीब 10 इंच तक और वजन महज तीन सौ ग्राम। तेज़ी से डिजिटल होती दुनिया में इसका इस्तेमाल आने वाले दिनों में हर वो शख्स करता नज़र आ सकता है जिसे किताबों से प्यार है। स्कूलों में ये बच्चों को भारी भरकम बस्तों से निजात दिला सकता है क्योंकि इसमें एक बार में आप डेढ़ हज़ार से लेकर साढ़े तीन हज़ार तक किताबें स्टोर कर सकते हैं।

सबसे बड़ी खूबी

किंडल की सबसे बड़ी खूबी है, इसका हमेशा ऑन लाइन रहना। इसके लिए आपको ना तो अलग से कोई इंटरनेट कनेक्शन लेने की ज़रूरत है और ना ही कोई मासिक या वार्षिक शुल्क देना है। आप दुनिया में कहीं भी जाएं, ये उपकरण 3 जी तकनीक से हमेशा अपने मदर सर्वर से जुड़ा रहता है। आप को जो भी किताब पढ़नी हो, बस उसे सेलेक्ट करना है और 60 सेकंड में ये किताब आपके किंडल पर डाउनलोड हो जाएगी। इसकी जो खूबी इसे लैप टॉप या पाम टॉप से भी बेहतर बनाती है वो है इसे किसी क़ागज़ की पत्रिका की तरह पढ़े जाने की खूबी। जी हां, इसमें किसी भी तरह की चमक नहीं होती है और तेज़ रोशनी में भी इसका आंखों पर कोई असर नहीं पड़ता। इसे एक बार चार्ज करने के बाद आप पूरे एक हफ्ते तक लगातार किताबें पढ़ सकते हैं और ज़रूरत होने पर अपने ज़रूरी डॉक्यूमेंट्स भी पीडीएफ फॉर्मेट में इसमें ले जा सकते हैं।

पढ़िए मनपसंद पुस्तकें

फिलहाल 5 लाख नई किताबों वाले इसके सर्वर पर रोज़ाना नई किताबें और पत्रिकाएं जुड़ रही हैं। वैसे अगर बिना कॉपी राइट वाली किताबों की बात की जाए तो 1923 से पहले प्रकाशित हुई करीब 18 लाख किताबें इस पर मुफ्त में पढ़ने के लिए मौजूद हैं। और, अगर आप अपनी आंखों को आराम देना चाहते हैं तो किंडल आपको आपकी मनपसंदीदा किताब पढ़कर भी सुना सकता है।

कितनी है कीमत?

और रही बात कीमत की तो ये आपके लेटेस्ट मोबाइल की कीमत के ही करीब है। किंडल का बेसिक मॉडल जहां करीब 13 हज़ार रुपये का है वहीं इसके डीलक्स मॉडल की कीमत है करीब 25 हज़ार रुपये। कीमत का ये फर्क इसकी स्टोरेज क्षमता और स्क्रीन के आकार को लेकर है।

शनिवार, 8 मई 2010

पटकथा लेखन में मुंबई की दीप मंजुरी विजेता

पत्रकार-फिल्म मेकर पंकज शुक्ल ने अपनी अगली शॉर्ट फिल्म के लिए पटकथा का चयन कर लिया है। इस प्रतियोगिता की विजेता रहीं- मुंबई की दीप मंजुरी दास। इन्हें पुरस्कार स्वरूप 11 हज़ार रुपये की राशि प्रदान की जाएगी।

दीप मंजुरी ने बैंगलोर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में बी.ए. करने के बाद कॉमिट्स बैंगलोर से ऑडियो विजुअल कम्यूनिकेशन में ए.एम की पढ़ाई की। फिल्म मेकिंग और पटकथा लेखन में दिलचस्पी रखने वाली दीप मंजुरी इन दिनों फिल्म निर्देशन में हाथ आजमा रही हैं। निर्देशकों रोहित जय सिंह वैद और प्रवीन कुमार की आने वाली फिल्मों में सहायक निर्देशक का काम कर रहीं दीप मंजुरी को दो साल पहले दुबई मीडिया सिटी में हुए आईबीडीए पुरस्कारों के तरह रेडियो फीचर श्रेणी में पुरस्कृत किया गया था।

इस वेबसाइट पर पटकथा प्रतियोगिता का ऐलान होने के बाद पचास से अधिक लोगों ने पटकथा लिखने में दिलचस्पी दिखाई और इसका कथा सार जानने के लिए मेल भेजे। इनमें से करीब 20 लोगों ने पटकथा लिखने की कोशिश भी की और अपनी प्रविष्टियां पंकज शुक्ल को भेजीं। शॉर्ट फिल्म की पटकथा लिखने के लिए मांगी गई प्रविष्टियों को लेकर पत्रकारों, लेखकों और ब्लॉगर्स ने ज़बर्दस्त उत्साह दिखाया।

पंकज शुक्ल के मुताबिक इस शॉर्ट फिल्म की शूटिंग जल्द ही शुरू की जाएगी। फिल्म के निर्माता एनआरआई बिज़नेसमैन इरफान इज़हार हैं, जो छात्र नेता चंद्रशेखर प्रसाद के जीवन से जुड़ी घटनाओं पर बनने जा रही फिल्म चंदू के भी निर्माता हैं। फिल्म चंदू के क्रिएटिव कंसलटेंट मशहूर फिल्म मेकर महेश भट्ट हैं, और इस फिल्म में लीड रोल के लिए दिल्ली के ही उभरते कलाकार इमरान ज़ाहिद का चयन किया गया। उल्लेखनीय है कि इमरान ज़ाहिद को अभिनय का पहला मौका पंकज शुक्ल ने ही अपनी शॉर्ट फिल्म लक्ष्मी में दिया था। ये फिल्म इटली में सितंबर में होने जा रहे कॉस इंटरनेशन फिल्म फेस्टिवल में आमंत्रित की गई है।

शुक्रवार, 7 मई 2010

निकम की बहस से 30 से ज़्यादा बार टूटी जजों की कलम

 फांसी जल्द से जल्द दिए जाने के हिमायती हैं उज्जवल निकम
 संवेदनशील मामलों में शामिल होने के चलते ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा


मुंबई। पाकिस्तानी आतंकवादी अजलम कसाब को फांसी की सज़ा सुनाए जाने के साथ ही विशेष सरकारी वकील उज्जवल निकम की बहस के चलते फांसी के फंदे की तरफ बढ़ने वालों में एक और गुनहगार का इज़ाफ़ा हो गया। निकम देश के इकलौते ऐसे वक़ील हैं, जिनकी बहस के चलते अब तक 30 से ज़्यादा लोगों को फांसी की सज़ा सुनाई जा चुकी है और करीब सात सौ लोगों को उम्र कैद हुई।
जिन दूसरे चर्चित मुकदमों में निकम ने सरकारी के वक़ील के तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनमें 1993 के मुंबई बम धमाके, गुलशन कुमार मर्डर केस, प्रमोद महाजन हत्याकांड, 2003 के गेटवे ऑफ इंडिया पर हुए बम धमाके, खैरलांजी सामूहिक हत्याकांड, नदीम प्रत्यर्पण मामला और पुणे का बहुचर्चित राठी हत्याकांड शामिल हैं। ये अलग बात है कि निकम की बहस के चलते फांसी की सज़ा पाए ज़्यादातर दोषी अब भी जेल की सलाखों के पीछे हैं। फांसी की सज़ा पाए लोगों को सुप्रीम कोर्ट से पुष्टि के बाद जल्दी से जल्दी फंदे तक पहुंचाने के समर्थक रहे उज्जवल निकम कई मौकों पर क्षमा याचिकाओं के निपटारे में में लगने वाले समय पर अपनी राय ज़ाहिर करते रहे हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि देश में 2004 के बाद से किसी को फांसी नहीं दी गई है और 1988 के बाद से अब तक केवल दो लोग फांसी पर लटकाए गए हैं।
महाराष्ट्र के जलगांव में वकील देवराव निकम के घर 30 मार्च 1953 को जन्मे उज्जवल निकम ने शुरुआती पढ़ाई विज्ञान के छात्र के रूप में की, लेकिन बीएससी करने के बाद उनका रुझान वक़ालत की तरफ हो गया। जलगांव के ही एस एस मनियार कॉलेज से कानून की पढ़ाई करने के बाद वो वकील बने और सबसे पहले जलगांव में ही सरकारी वकील बने।
निकम को अपने करियर का पहला बड़ा मौका 1994 में मिला जब मुंबई बम धमाकों के लिए टाडा कानून के तहत एक विशेष कोर्ट की स्थापना की गई और 12 मार्च 1993 में हुए बम धमाकों में बहस के लिए उन्हें सरकारी वकील के तौर पर नियुक्त किया गया। इन बम धमाकों में 129 आरोपितों में से 100 दोषी पाए गए और उन्हें सज़ा सुनाई गई। गुलशन कुमार और प्रमोद महाजन हत्याकांड में दोषियों को सज़ा दिलवाने के अलावा निकम को खैरलांजी हत्याकांड में 6 लोगों को फांसी की सज़ा दिलवाने में भी कामयाबी मिली। 2006 के इस मामले में खैरलांजी के एक दलित परिवार को पीट पीट कर मार डाला गया था।
तमाम संवेदनशील मामलों में सरकारी वकील होने की वजह से उज्जवल निकम को ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई है और हाल तक मुकदमों की बहस के लिए वह जलगांव से ही मुंबई आते जाते रहे। बाद में मुख्यमंत्री कोटे से उन्हें मुंबई के वर्सोवा में म्हाडा का फ्लैट आवंटित किया गया। अपनी कार्यशैली के बूते आम लोगों के बीच नायक बनकर उभरे उज्जवल निकम को अब तक सरकारी-गैर सरकारी करीब 65 पुरस्कार मिल चुके हैं।
सरकारी वकील के तौर पर अपने करियर में उज्जवल निकम को शुरुआती दिनों में कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा। निकम तब अंग्रेजी ठीक से नहीं बोल पाते थे और इसके चलते लोग उनकी खिल्ली भी उड़ाया करते थे। निकम को वो दिन भी याद है जब मुंबई बम धमाकों की पहली सुनवाई के दिन देश विदेश के करीब सौ टीवी चैनलों के संवाददाताओं ने उनसे सवाल पूछे, उस दिन को निकम अपने जीवन का सबसे यादगार दिन मानते हैं।
वक़ालत के पेशे में कामयाबी की बेमिसाल ऊंचाइयां हासिल कर चुके उज्जवल निकम ने बीच में वक़ालत छोड़ने की भी इच्छा जताई थी, तब ये माना जा रहा था कि शायद निकम राजनीति में आएंगे। लेकिन, अभी तक उज्जवल निकम ने इस बारे में सार्वजनिक तौर से कुछ नहीं कहा है। दो बच्चों के पिता उज्जवल निकम लगातार सफर करते रहने की वजह से पेट की तमाम बीमारियों का शिकार हुए और अब वो जहां भी जाते हैं घर का पिसा आटा साथ लेकर जाते हैं। होटल में रुकने पर वो इसी आटे की चपातियां बनवाकर खाते हैं।
सुबह चार बजे उठने वाले उज्जवल निकम अब भी सुबह दो घंटे व्यायाम करते हैं और फिर दस बजे तक मुकदमों से संबंधित फाइलें पढ़ते हैं। निकम ने टेलीविजन देखने का अधिकतम समय दो घंटे तय कर रखा है और वो भी सम सामयिक घटनाओं से खुद को वाकिफ़ रखने के लिए। निकम सुबह अख़बार नहीं पढ़ते। अपनी व्यस्त दिनचर्या के चलते वो इसके लिए शाम को ही समय निकाल पाते हैं। लेट नाइट पार्टियों में जाने से उन्हें शुरू से ही परहेज़ रहा। मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर एम एन सिंह का वह आज भी एहसान मानते हैं, जिन्होंने उनकी काबिलियत परख कर उन्हें मुंबई बम धमाकों के मुकदमे में सरकार की तरफ से पैरवी करने के लिए जलगांव से मुंबई बुलाया।

गुरुवार, 6 मई 2010

‘नदिया के पार’ के निर्देशक गोविंद मूनिस नहीं रहे


मुंबई। फिल्म फेयर पुरस्कार विजेता और सुपर डुपर हिट फिल्म नदिया के पार के निर्देशक गोविंद मूनिस का कल शाम निधन हो गया। वह 81 वर्ष के थे और कुछ समय से गले के कैंसर से पीड़ित थे।
दो जनवरी 1929 को उत्तर प्रदेश के ज़िले उन्नाव के गांव पासाखेड़ा में पंडित श्रीराम द्विवेदी के घर जन्मे गोविंद मूनिस की पढ़ाई कानपुर में हुई और यहीं 1947 में दैनिक नवभारत में पहली कहानी छपने पर उन्हें किस्से कहानियां लिखने का चस्का लगा। इसके बाद उन्होंने तमाम अनुवाद किए, लेख, कहानियां लिखीं और फिर अप्रैल 1952 में कलकत्ता चले गए। शुरुआत में मशहूर निर्देशक ऋत्विक घटक का शागिर्द बनने के बाद उनके हुनर को निखारा निर्देशक सत्येन बोस ने। 1953 में बंबई आने के बाद मूनिस ने सत्येन बोस की तकरीबन सभी फिल्मों में उनका साथ दिया, कभी सहायक निर्देशक के तौर पर तो कभी पटकथा और संवाद लेखक के तौर पर। ज़रूरत पड़ने पर उन्होंने गीत भी लिखे। फिल्म “दोस्ती” के लिए गोविंद मूनिस को सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखक का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला था।
अपने करियर का सबसे बड़ा मौका मूनिस को दिया राजश्री प्रोडक्शन्स ने फिल्म “नदिया के पार” में। इसके पहले वह हालांकि “मितवा” निर्देशत कर चुके थे, लेकिन “नदिया के पार” ने उन्हें सिनेमा के इतिहास में वो मकाम दिलाया, जो कम निर्देशक ही हासिल कर पाए। इस फिल्म ने कई सिनेमाघरों में लगातार 100 हफ्ते चलकर कामयाबी के रिकॉर्ड बनाए। गोविंद मूनिस फिल्मों के अलावा टीवी और बालफिल्मों के लिए भी लगातार सक्रिय रहे। बांग्ला फिल्मों और बांग्ला संगीत के प्रचार प्रसार के लिए गोविंद मूनिस ने मुंबई में अलग अलग सस्थाएं बनाकर काफी काम किया।

सोमवार, 3 मई 2010

गुलज़ार ने गढ़ा नक्सलियों का नया नारा?


 ‘ठोंक दे किल्ली- चलेगा दिल्ली?’ बना माओवादियों का मार्चिंग सॉन्ग
 दण्डकारण्य के ट्रेनिंग कैंपों में खूब बज रहा है ‘रावण’ का ये गाना

मुंबई। चेन्नई के स्टूडियों में तैयार हुई और केरल के जंगलों में जीवंत हुई एक धुन छत्तीसगढ़ के निर्जन इलाकों में चल रहे नक्सलियों के ट्रेनिंग कैंप का मार्चिंग सॉन्ग बन गई है। मुंबई में रह रहे गीतकार गुलज़ार को शायद इस बात का अंदाज़ा भी नहीं होगा कि मणि रत्नम की जल्द आने वाली फिल्म रावण के लिए जब वो दिल्ली के ख़िलाफ़ कलम उठाएंगे तो वो नक्सलियों का नया नारा बन जाएगा। जी हां, नक्सलियों का नया नारा है –ठोंक दे किल्ली यानी नेल दैट।
वैसे तो मणिरत्नम की फिल्म रावण को शुरू से ही रामायण का रूपांतरण बताया जाता रहा है, लेकिन असल बात ये है कि ये दरअसल किसी तरह के राजनीतिक विवाद से बचने के लिए फिल्म बनाने वालों की तरफ से रचा गया एक छद्म आवरण है। बताया जा रहा है कि रावण दरअसल माओवाद को नक्सलियों के नज़रिए से दिखाने की कोशिश करती है। और, नक्सलियों के मिशन दिल्ली को उजागर करता है गुलज़ार का लिखा गाना – ठोंक दे किल्ली। इस गाने में देश की राजधानी दिल्ली का न सिर्फ जमकर खिल्ली उड़ाई गई है बल्कि इशारों इशारों में सोनिया गांधी पर भी निशाना साधा गया है। जी हां, वही गुलज़ार जो इससे पहले फिल्म इंदिरा गांधी पर फिल्म आंधी बनाकर सियासी निशाने पर आ चुके हैं।
ठोंक दे किल्ली में गुलज़ार ने नक्सलियों को एक दूसरे से दिल्ली चलने की बात पूछते दिखाया है और दिल्ली की गिल्ली उड़ा देने की बात भी कही है। यानी राजधानी को चारों तरफ से घेर कर उस पर कब्ज़ा करने की बात, जो माओवाद का मूल सिद्धांत है। इस गाने में दिल्ली को झूठी सच्ची और ऐसी मक्कार सहेली बताया गया है, जिसमें कूट कूट कर कपट भरा है। नक्सलियों को ये गाना इसलिए भी पसंद आ रहा है कि इसमें सीधे सीधे अपना हिस्सा हासिल करने की बात कही गई है। गाना जब ए आर रहमान के संगीत पर मचलता हुआ शबाब पर पहुंचता है तो सुखविंदर सिंह की आवाज़ में – सदियों से चलता आया है ऊंच नीच का लंबा किस्सा, अबकी बार हिसाब चुका दे छीन के ले ले अपना हिस्सा। - सुनकर रगों में दौड़ते खून की रफ्तार भले तेज़ हो जाती हो, लेकिन जानकार कहते हैं कि इस तरह के सियासी संदेश देने की कोशिशें हिंदी सिनेमा में कम ही हुई हैं।
रावण का ये गीत हिंदी और तमिल दोनों भाषाओं में तैयार किया गया है। हिंदी फिल्म में इसे अभिषेक बच्चन पर और तमिल में वहां के सुपर स्टार विक्रम पर फिल्माया गया है। दिलचस्प बात ये है कि विक्रम ही हिंदी संस्करण में राम का यानी एक पुलिस अफसर का रोल कर रहे हैं, जिसकी पत्नी रागिनी (ऐश्वर्य राय) को बीरा (अभिषेक बच्चन) उठा ले जाता है। बीरा रागिनी की हत्या करना चाहता है, लेकिन रागिनी बच जाती है। इसके बाद पूरी फिल्म में रागिनी के नज़रिए से बीरा की मानसिकता को परदे पर दिखाया गया है, यानी नक्सलवाद का ऐसा चेहरा जो माओवादियों का हत्यारा नहीं बल्कि मजबूरी में हथियार उठाने वाला बताता है।
देश में सक्रिय उग्रवादी संगठन अपने अभियान को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए फिल्म निर्देशकों से संपर्क करते रहते हैं। उल्फा ने भी बीच में मशहूर फिल्म निर्देशक जानू बरुआ से एक फिल्म बनाने की गुज़ारिश की थी। नक्सलवाद को माओवादी नज़रिए से परदे पर पेश करवाने के लिए भी बिहार और झारखंड के नक्सली नेता एक भोजपुरी फिल्म बनाने के लिए अरसे से प्रयासरत हैं। और इस बारे में वो मीडिया से जुड़े लोगों के संपर्क में भी हैं। अब रावण के गाने ठोंक दे किल्ली ने सीपीआई (माओवादी) का नारा बनकर घर घर तक माओवाद पहुंचाने का बीड़ा उठाया है।
इस गाने को वैसे तो फिल्माया अभिषेक पर गया है, लेकिन गुलज़ार जिन्हें अभिषेक प्यार से मामू कहते हैं, इस गाने में अमिताभ बच्चन की भावनाएं भरने की कोशिश भी करते दिखते हैं। दिल्ली की तरफ से उन पर होते रहे कथित हमलों का जवाब इस गीत में है। जहां एक तरफ ये गाना कहता है - किसमें दम है जो सूरज (अमिताभ का अर्थ भी सूरज ही होता है) बुझाए, वहीं दिल्ली को मुजरे का नज़राना मांगने वाला भी बताया गया है यानी हर मशहूर अभिनेता को सियासत अपनी तरह से इस्तेमाल करने की कोशिश करती रहती है।
गुलज़ार और मणिरत्नम दोनों को सम सामयिक सियासी मसलों पर फिल्म बनाने का शौक रहा है। मणि रत्नम ने अगर रोजा में इस्लामी आतंकवाद को सबसे पहले परदे पर उतारा तो बंबई में सांप्रदायिकता के ज्वार के बीच एक प्रेम कहानी भी उन्होंने गढ़ी। रावण उनकी नयी सियासी फिल्म है जिसमें वो ये बताने की कोशिश कर रहे हैं, रावण आज हम सबके भीतर है, और उसे पहचानने और मारने की बजाय उसे पहचानने और समझने की ज़रूरत है। हालांकि, इस बारे में सवाल करने पर फिल्म के निर्देशक मणि रत्नम न तो इसे मानते हैं और न ही नकारते हैं। वो कहते हैं कि ये उनका अपना विचार है और जिसे हम सही मानते हैं वो दूसरे के नज़रिए से गलत हो सकता है जबकि जिसे हम गलत मानते हैं, वो दूसरे के लिए सही हो सकता है। मैंने बस नज़रिए के इसी फर्क को परदे पर दिखाने की कोशिश की है।

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

लिखिए पटकथा, जीतिए नक़द इनाम

अगर आपको लगता है कि फिल्म मेकिंग में प्रवेश पाना आसान नहीं है और वहां सिर्फ सिफारिशी लोगों की ही पहुंच होती है, तो आप गलत है। पत्रकार से फिल्म मेकर बने पंकज शुक्ल ने नई प्रतिभाओं को आगे लाने के अपने अभियान के तहत इस बार नए लेखकों को तलाशने का बीड़ा उठाया है। पंकज अगले कुछ महीनों में अपनी नई शॉर्ट फिल्म की शूटिंग शुरू करने जा रहे हैं, 35 MM पर बनने जा रही इस फिल्म के लिए उन्हें ज़रूरत है एक संवेदनशील पटकथा लेखक की। इसके लिए सभी मीडिया कर्मियों से प्रविष्टियां आमंत्रित हैं, पेशेवर लेखक भी इस प्रतियोगिता में हिस्सा ले सकते हैं, सर्वश्रेष्ठ पटकथा लेखक को पुरस्कार स्वरूप 11 हज़ार रुपये की धनराशि दी जाएगी।

फिल्म की कहानी एक बच्चे पर केंद्रित है, इसलिए इस प्रतियोगिता में वे लोग बेहतर ढंग से शरीक हो सकते हैं जिन्हें बच्चों की मानसिकता की समझ है या जिन्हें बच्चों के दृष्टिकोण से कहानी या पटकथा लिखने का शौक रहा है। कहानी का प्लॉट इच्छुक लोगों को मेल के जरिए भेजा जाएगा और प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए पटकथा मेल के जरिए ही पंकज शुक्ल को भेजनी है। पंकज शुक्ल से संपर्क का ई पता है - pankajshuklaa@gmail.com

पत्रकार से फिल्म मेकर बने पंकज शुक्ल अब तक एक फीचर फिल्म, चार शॉर्ट फिल्म्स और तमाम डॉक्यूमेंट्रीज़ व टीवी सीरीज़ बना चुके हैं। इस समय पंकज ज़ूम चैनल के लिए एक रीएल्टी शो और ताकि सनद रहे नाम की एक डॉक्यूमेंट्री सीरीज़ पर काम कर रहे हैं। पटकथा भेजने की अंतिम तिथि 2 मई 2010 है।

शनिवार, 27 मार्च 2010

शनिवार, 20 मार्च 2010

किसने लिखा - "सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.." ?


जैसा कि अक्सर होता है कि इतिहास के अनछुए और अनदेखे पहलुओं को आज की रौशनी में देखने की कोशिशों पर सवाल उठ ही जाते हैं। आज़ादी के सिपहसालार हसरत मोहानी के बारे में जो दो कड़ियां मैंने पिछले दिनों लिखीं, उनका संपादित स्वरूप अख़बार "नई दुनिया" ने शनिवार के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया है। इस लेख को ज़ाहिर है देश के तमाम प्रदेशों में पढ़ा गया और इस पर एक प्रतिक्रिया जनाब शहरोज़ साहब की मुझे मिली हैं। शहरोज़ साहब लिखते हैं -

"लेकिन पढ़कर चकित हुआ कि एक टी वी का पत्रकार जिसे हसरत मोहानी से अतिरिक्त लगाव है और खुद को लेखक उनका अध्येता बता रहा है..लेकिन एक इतनी बड़ी चुक हो गयी.सरफरोशी की तमन्ना..जैसी ग़ज़ल का रचयिता आपने अतिरेक की हद में मौलाना हसरत मुहानी को बतला दिया. जबकि दर हकिअत इसे बिस्मिल अज़ीमाबादी ने लिखा था.अभी कुछ रोज़ पूर्व मैं ने अपने ब्लॉग रचना-संसारपर भी दर्ज किया था।"

अब पता नहीं शहरोज़ साहब को मेरे अतीत में टीवी पत्रकार भी होने के नाते मेरी मेहनत पर शक़ हुआ या मेरी नासमझी का यकीन। उन्होंने आज़ादी के मशहूर तराने "सरफरोशी की तमन्ना ..." का रचयिता हसरत मोहानी को बताए जाने को मेरा अतिरेक ही नहीं बल्कि अतिरेक ही हद मान लिया। ख़ैर, शहरोज़ भाई की भाषा पर मुझे दिक्कत नहीं क्योंकि जो कुछ उन्होंने पढ़ा वो उनकी अपनी खोजबीन पर सवाल लगाता था, सो उनका आपे से बाहर होना लाजिमी है। उनकी टिप्पणी मैंने अपने ब्लॉग पर बिना किसी संपादन के हू ब हू लगा दी है। साथ ही, उनके इस एतराज़ पर अपनी तरफ से जानकारी भी दे दी।

लेकिन, मुझे लगता रहा कि बात को और साफ होना चाहिए और दूसरे लोगों को भी इसमें अपनी अपनी राय देनी चाहिए। हिंदुस्तान बहुत बड़ा देश हैं और आज हम लोगों के पास इतिहास को जानने के अगर कोई तरीके हैं वो या तो अतीत में लिखी गई किताबें या फिर गिनती के जानकारों से बातचीत। हसरत मोहानी पर डॉक्यूमेंट्री बनाने से पहले मैंने और मेरे सहयोगियों ने कोई छह महीने इस बारे में रिसर्च की। इसके लिए हम हर उस जगह गए जहां से हसरत मोहानी का ज़रा सा ताल्लुक था, मसलन फतेहपुर ज़िले का हसवा, जहां हसरत मोहानी सिर्फ मैट्रिक पढ़ने गए थे। नेशनल आर्काइव की ख़ाक छानी गई, जामिया मिलिया यूनीवर्सिटी की लाइब्रेरी खंगाली गई। अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी के अलावा इस बाबत भारत सरकार की तरफ से छपी किताबें भी पढ़ी गईं।

इसी दौरान हम लोगों को एक किताब मिली, जिसे लिखा है उर्दू की मशहूर हस्ती जनाब मुज़फ्फर हनफी साहब ने, जिनके बारे में शहरोज़ साहब का कहना है -

"मुज़फ्फर हनफी साहब से भी चुक हुई.समकालीन सूचनाओं के आधार पर ही उन्होंने लिख मारा.बिना तहकीक़ किये. ढेरों विद्वानों ने ढेरों भूलें की हैं जिसका खमयाज़ा हम जैसे क़लम घिस्सुओं को भुगतना पड़ रहा है."

पहली अप्रैल 1936 को पैदा हुए हनफी साहब की गिनती देश में उर्दू अदब के चंद मशहूर लोगों में होती है। और उनकी क़लम पर शक़ करने की कम से कम मुझमें तो हिम्मत नहीं है। उन्होंने किस्से लिखे, कहानियां लिखीं, शेरो-शायरी भी लिखी। इसके अलावा पुराने ज़माने के लोगों के बारे में उनकी रिसर्च भी काफी लोगों ने पढ़ी। उनकी रिसर्च की भारत सरकार भी कायल रही और तभी नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू ने उनके रिसर्च वर्क का अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं में अनुवाद भी कराया। हनफी साहब ने हसरत मोहानी पर भी एक किताब तमाम रिसर्च के बाद लिखी, जिसे नेशनल बुक ट्रस्ट ने देश की दूसरी भाषाओं में भी प्रकाशित किया है।

इसी किताब के पेज नंबर 27 पर छठे अध्याय में हनफी साहब एक और मशहूर हस्ती गोपी नाथ अमन के हवाले से लिखते हैं कि आज़ादी के मशहूर तराने "सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाजू ए क़ातिल में है" को अक्सर बिस्मिल से जोड़कर देखा जाता है, दरअसल ये बिस्मिल ने नहीं लिखा बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन को ये मोहानी का तोहफा था।

वैसे शहरोज़ साहब की काबिलियत पर भी शक़ की गुंजाइश कम है। कल को उनका रिसर्च वर्क भी इसी तरह शाया हो, ये मेरी दुआ है। क्योंकि विष्णुचंद्र शर्मा जी कहते हैं -

"मुझे लगता है ,शहरोज़ पर बात करने के लिए , सर्वप्रथम उसके समूचे रचनाकर्म पर काम करने की ज़रुरत है ,जैसा कभी भगवतीचरण वर्मा पर नीलाभ ने किया था।" (शहरोज़ जी के ब्लॉग पर उनके ही द्वारा शर्मा जी के हवाला देते हुए लिखा गया अपना परिचय)

शहरोज़ साहब अगर हनफी साहब की रिसर्च को झुठलाना चाहें तो इसके लिए वो आज़ाद हैं। वैसे वो इसके लिए खुदा बख्श लाइब्रेरी में बिस्मिल अज़ीमाबादी की हैडराइटिंग में रखे इस ग़ज़ल के पहले मतन का हवाला देते हैं। वो ये भी कहते हैं कि ये ग़ज़ल चूंकि कोर्स में शामिल है, लिहाजा इस पर विवाद की गुंजाइश नहीं है।

वैसे मुझे भी अपनी रिसर्च के दौरान नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया की ही एक और क़िताब "स्वतंत्रता आंदोलन के गीत" पढ़ने को मिली जिसमें इस तराने के साथ राम प्रसाद बिस्मिल का नाम लिखा है। लेकिन, मैं इस बारे में जिस निष्कर्ष पर पहुंचा वो मोहानी साहब के घर वालों से मुलाक़ात और दूसरे इतिहासकारों के नज़रिए से वाकिफ़ होने के बाद ही पहुंचा। फिर भी, मैं चाहूंगा कि इस बात पर और रिसर्च हो क्योंकि फिल्मकार या पत्रकार किसी भी विषय का संपूर्ण अध्येता कम ही होता है। वो तो संवादवाहक है, मॉस कम्यूनिकेशन का एक ज़रिया। शहरोज़ साहब का ये कहना कि मुझे मोहानी साहब से अतिरिक्त लगाव है, भी सिर माथे। मोहानी साहब ने जिस धरती पर जन्म लिया, उसी ज़िले की मेरी भी पैदाइश है। जैसे कि बिस्मिल अज़ीमाबादी और शहरोज़ साहब की पैदाइश एक ही जगह की है।

मोहानी साहब तो ख़ैर एक शुरुआत है, मेरी डॉक्यूमेंट्री सीरीज़ - ताकि सनद रहे - में अभी ऐसे और तमाम नाम शामिल हैं। और, जब नई लीक खींचने की कोशिश होगी, तो संवाद और विवाद तो उठेंगे ही। वैसे, मराठी साहित्य भी "सरफरोशी की तमन्ना.." का रचयिता हसरत मोहानी को ही मानता है।

गुरुवार, 18 मार्च 2010

वो वजह पारसा उसकी..


(कौन हसरत मोहानी? - दूसरी कड़ी)

गुस्सा इस बात पर नहीं कि हसरत मोहानी जैसे शख्स को देश के इतिहासकारों और नेताओं ने भुला दिया, बल्कि अफसोस इस बात पर ज्यादा होता है कि कम्युनिस्ट पार्टी के देश में हुए पहले अधिवेशन का अध्यक्ष रहे इस शख्स पर पाकिस्तान ने डाक टिकट निकाला, लेकिन अपने ही देश में वो अब तक गुमनाम है। कांग्रेस में हसरत मोहानी की गांधी से नहीं निभी। मुस्लिम लीग में उनको जिन्ना की मज़हब के नाम पर मुल्क का बंटवारा करने की कोशिशें रास नहीं आईं। और कम्युनिस्ट पार्टी में उनको शायद गरीब बेसहारा लोगों के नाम पर की जा रही सियासत के खोखलेपन ने झकझोर दिया। तो क्या ऐसी ही हालत आज के सियासी माहौल की नहीं है? बड़ा हल्ला मचता है आजकल कि आज के युवा राजनीति में नहीं आ रहे। क्यों आएं वो राजनीति में? क्या हसरत मोहानी की तरह बस क़ागज़ के किसी पन्ने में बस एक नाम भर रह जाने के लिए। पच्चीस साल के भी नहीं हुए थे हसरत मोहानी जब वो पहली बार जेल गए। और इसी उम्र के लोगों को सियासत में अपना बगलगीर बनाने के लिए कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी पूरा देश मथ रहे हैं। लेकिन, क्या उन्हें ख्याल है उन लोगों को जिन्होंने अपनी पूरी जवानी कांग्रेस पार्टी के नाम कर दी और कभी भी पार्टी के चंद नेताओं की चरणवंदना से आगे कभी नहीं बढ़ पाए।

देश में लोकतंत्र कायम है। लेकिन राजनीतिक दलों में लोकतंत्र कब आएगा? क्या हसरत मोहानी के गुजर जाने के कोई 60 साल बाद भी कांग्रेस इस बात की गारंटी ले सकती है कि वहां किसी हसरत मोहानी को सिर्फ इस बात पर हाशिए पर नहीं डाल दिया जाएगा कि उसने पार्टी के सबसे बड़े नेता से अलग हटकर कुछ ऐसा सोचने की कोशिश की, जिसका पूरे समाज पर असर पड़ सकता है। महात्मा गांधी ने भले बरसों बाद अपनी जीवनी में हसरत मोहानी को पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाला पहला शख्स बताकर अपना दिल हल्का करने की कोशिश की हो, लेकिन कांग्रेस के आभामंडल की रोशनी में लिखे गए ज्यादातर इतिहास में न सिर्फ पूर्ण स्वराज्य बल्कि स्वदेशी आंदोलन को भी महात्मा गांधी से ही जोड़कर देखा जाता रहा है। बाल गंगाधर तिलक को हसरत मोहानी अपना उस्ताद मानते थे और इंक़लाब ज़िंदाबाद नारे को भी हसरत मोहानी से ही जोड़कर देखा जाता है। और इस बात के तो सबूत है कि – सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाजू ए क़ातिल में है – तराना हसरत मोहानी की क़लम से निकला, लेकिन राम प्रसाद बिस्मिल के नाम दर्ज़ हो चुके इस तराने को लिखने के लिए मोहानी को उनका असली हक़ दिलवाने की पहल कौन करेगा? इस्तेमाल तो मशहूर निर्देशक बी आर चोपड़ा ने उनकी ग़ज़ल भी अपनी फिल्म में बिना किसी इजाज़त के ही कर ली थी, और इसके लिए उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमे का सामना भी करना पड़ा। लेकिन, सरकार पर कौन मुकदमा करे, जिसने बस कानपुर की मेस्टन रोड का नाम हसरत मोहानी मार्ग करके अपनी जिम्मेदारी से निज़ात पा ली।

ना हसरत के गांव मोहान में उनकी कोई निशानी है। ना अलीगढ़ के रसलगंज में, जबकि अलीगढ़ में ही हसरत मोहानी ने अपने दम खम रिसाला निकालकर अंग्रेजों से मुचैटा संभाला था। वो खुद ही लिखते और खुद ही पुरानी सी मशीन पर अखबार छापते। उस ज़माने में डेढ़ सौ रुपये महीना इनायत को हसरत मोहानी ने ठोकर मार दी थी। कॉलेज से भी निकाले गए लेकिन लोगों के दिलो दिमाग में वो घर बसाए रहे। और तो और उत्तर प्रदेश की जिस राजधानी में लगे पुतले गरीबों को मज़ाक उड़ाते नज़र आते हैं, उस शहर में भी हसरत मोहानी की कब्र तलाशने में पूरा एक दिन निकल गया। पुराने लखनऊ के बाग ए अनवार में उनकी कब्र के पास ही एक मज़ार पर भूतों और जिन्नात को भगाने का सिलसिला पूरे साल चलता है। पूरे मुल्क से लोग यहां आते हैं, लेकिन इनमें से भी किसी को नहीं मालूम कि इसी अहाते में एक ऐसा शख्स सोया है, जिसने अपने लेखों से अंग्रेजों की नींद हराम कर दी थी।

और केवल हसरत ही नहीं उनकी पत्नी के साथ भी इतिहास ने काफी नाइंसाफी की। हसरत मोहानी की पत्नी निशात उन निशां आम घरों की पहली मुस्लिम औरत थीं, जिसने बुर्का पीछे छोड़कर आज़ादी की जंग में शिरकत की। जेल में हसरत की हिरासत के दौरान अपने शौहर के नक्शे कदम पर चलते हुए निशात बेगम ने उन्हें हौसला दिया और उनकी गैर मौजूदगी में स्वदेशी सेंटर भी संभाला। ताज्जुब की बात ये है कि इस बहादुर महिला को भी हसरत मोहानी की तरह इतिहासकारों ने भुला दिया। उनका इकलौता फोटो तक भारत के किसी संग्रहालय में नहीं दिखता और खुद हसरत मोहानी के घर वाले बेगम निशात उन निशां का फोटो लंदन की एक लाइब्रेरी से भारत लाए।

सादगी को सिरमौर बनाने वाले हसरत मोहानी हो सकता है कि आज के सियासी माहौल में भी फिट नहीं बैठते। क्योंकि वह पहले शख्स थे जो आज़ाद हिंदुस्तान में सांसदों को मिलने वाली खास सहूलियतों के खिलाफ़ सबसे पहले उठ खड़े हुए। तब तो खैर सांसदों को पचहत्तर रुपये ही भत्ता मिलता था। हमेशा रेलवे के तीसरे दर्जे में सफर करने वाले हसरत ने कभी सरकारी आवास तक का इस्तेमाल नहीं किया। अगर देश की नौजवान पीढ़ी को सियासत से जोड़ना है तो आज की सियासी पार्टियों को हसरत मोहानी जैसे लोगों को और करीब से जानने और समझने की ज़रूरत है। हसरत मोहानी जैसे नेताओं के बारे में नए सिरे से शोध की ज़रूरत है और तब शायद दूसरे नेताओं की बनिस्बत कम मशहूर आज़ादी के ऐसे अनोखे सिपाहियों के बारे में आज की पीढ़ी को भी कुछ जानने को मिलेगा और सियासत को मिलेंगे कुछ नए नायक। और तभी शायद पूरी हो सकेगी वो इबारत जो हसरत मोहानी ने बरसों पहले लिख दी थी - हज़ार खौफ़ हों पर ज़ुबां हो दिल की रफ़ीक़, यही रहा है अजल से कलंदरों का तरीक़।

फोटो परिचय: पुराने लखनऊ के बाग ए अनवार में मौलाना हसरत मोहानी की कब्र। पत्थर पर लिखे शेर का मजमून ये है -

जहान ए शौक में मातम बपा है मर्ग हसरत का।

वो वजह पारसा उसकी, वो इश्क़ पाक़बाज़ उसका।

मंगलवार, 16 मार्च 2010

कौन हसरत मोहानी?


कैसा लगेगा आपको अगर आप आज़ादी की लड़ाई में अपना सब कुछ स्वाहा कर देने वाले किसी गुमनाम से स्वतंत्रता सेनानी पर कोई फिल्म बनाने निकलें और उसके गांव पहुंच कर पहला सवाल ही आपका माथा खराब कर दे। जी हां, ये वाकया मेरे साथ अबकी हुआ उत्तर प्रदेश की राजधानी से कुछ ही दूर बसे गांव मोहान में। मैंने गांव की पुलिस चौकी के पास लगे मजमे में मौजूद लोगों से पूछा कि जनाब हसरत मोहानी का कोई पुश्तैनी मकान या फिर उनकी कोई यादगार यहां है क्या? जवाब में सवाल आया – कौन हसरत मोहानी? ये सवाल नहीं, इससे ज्यादा कुछ और है। जो नस्ल अपने ही पुरखों को भूल जाए और उनका नाम तक ना याद रख पाए, उसकी मौजूदा पुश्त से आगे क्या उम्मीद की जा सकती है। यही नहीं, मशहूर इतिहासकार एस पी सिंह से जब मैं इस मसले पर बात करने पहुंचा तो उन्होंने देश में इतिहास लेखन के मौजूदा हालात पर बड़ी नाउम्मीदी जताते हुए अफसोस किया कि उनके तीस साल के करियर में ये पहला मौका था जब कोई उनसे हसरत मोहानी पर बात करने आया। तो क्या भारत में इतिहास लेखन भी पूर्वाग्रहों और खास खेमों के इर्द गिर्द ही सिमटा रह गया? लगता तो यही है। जिस किसी भी शख्स ने आज़ादी की लड़ाई में कांग्रेस या कहें कि महात्मा गांधी की विचारधारा की मुख़ालिफ़त की, उसे ही दूध की मक्खी की तरह ना सिर्फ कांग्रेस से बल्कि इतिहास से भी बेदखल कर दिया गया। और, ऐसा आज भी हो रहा है।

समाज के बने बनाए आदर्श पुरुषों की तरफ दूसरे नजरिए से देखने की कोशिश कम ही होती है। आमतौर पर समाज पहले से बने बनाए मापदंडों को मानकर ही आने वाले कल की तैयारी में जुट जाता है, लेकिन देखा जाए तो दुनिया के बदलते राजनीतिक हालात और ख़ासकर अपने देश भारत में बदलती सामाजिक आर्थिक हालत के मद्देनज़र कुछ बातों पर फिर से गौर करना ज़रूरी है। पहला तो ये कि क्यों आखिर मुसलमान शब्द सुनते ही लोगों के जेहन में आतंकवाद ही कौंध जाता है। क्या ये तुरंत हुआ है, या फिर समाज में विद्वेष के बीज बोने की ये बरसों से चल आ रही सोची समझी रणनीति की कामयाबी है। क्या इस देश को आज़ाद कराने में मुसलमानों ने कोई योगदान नहीं किया? क्या इतिहास में सिर्फ जिन्ना ही हुए हैं, हसरत मोहानी नहीं। बहुत कम लोग जानते हैं कि मशहूर ग़ज़ल – चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है – लिखने वाले हसरत मोहानी ही दरअसल देश में पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाले पहले सियासी नेता थे। तब तो मोहनदास करमचंद गांधी भी इसके पक्ष में नहीं थे। हसरत मोहानी ने ही पहले पहल स्वदेशी आंदोलन की नींव डाली और एक बार तो भयंकर जाड़े में भी अपने किसी रिश्तेदार के यहां पूरी रात ठिठुरते ठिठुरते इसलिए काट दी, कि उनको ओढ़ने के लिए रखे गए कंबल पर मेड इन इंग्लैंड लिखा था।

लाखों में एक होते हैं वो जो अपने वतन के लिए कुर्बान होने का जज़्बा रखते हैं, गिनती के थे वो जिन्होंने फ़ाकाकशी में भी अपने वतन की साख पर आंच नही आने दी। और बस हसरत ही हैं वो जो तिलक के शागिर्द बनकर बापू के लिए नज़ीर बन गए। मज़हब के नाम पर मुल्क के बंटवारे की आख़िरी दम तक मुख़ालिफ़त करने वाले हसरत मोहानी गरम दल के कांग्रेसी थे। मौलाना फज़लुर हसन हसरत यानी हसरत मोहानी की शख्सीयत की तरफ गौर करना आज के माहौल में इसलिए भी ज़रूरी है कि अब कुछ ऐसी मिसालें लोगों के सामने लाना ज़रूरी हैं, जो इस देश की गंगा जमुनी तहज़ीब में दिखती दरारों को पाटने में मदद कर सकें। हज करने के लिए हिंदुस्तान से मक्का तक पैदल जाने वाले हसरत मोहानी को कान्हा में भी दिलचस्पी थी। लोगों ने भले उन पर कुफ़्र का इल्जाम लगाया हो, लेकिन भगवान कृष्ण की तस्वीर कभी उनसे अलग नहीं हुई। इनकी किताब जिहाद ए हसरत एक बार फिर बाज़ार में है, कौम के लोगों को ये बताने के लिए कि जिहाद का मतलब क्या है? और कैसे जिहाद के ज़िरए दो कौमों को एक करने के लिए हसरत मोहानी ने अपना सब कुछ नीलाम हो जाने दिया।

लेकिन, क्या वजह है कि हसरत मोहानी की यादों के निशान अब उनके अपने गांव में भी ज्यादा नहीं बचे हैं। इसके लिए कौन गुनहगार है। पार्कों और पत्थर के हाथी लगवाने पर करोड़ों रुपये स्वाहा करने वाली सरकार क्या इस शख्स के नाम पर एक स्मारक या एक सरकारी पुस्तकालय तक नहीं बनवा सकती, जहां उनका लिखा साहित्य शोध करने वालों को एक जगह मुहैया हो सके। और सूबे की सरकार ही क्यों दिल्ली की सरकारों ने भी तो आज तक इस पिछड़े ज़िले के सबसे चमकदार नेता की याद बचाए रखने के लिए कुछ नहीं किया। पिछले चुनाव से ठीक पहले हसरत मोहानी के नाम पर मुसलमानों की खेमेबंदी करने की एक कोशिश ज़रूर इस ज़िले में हुई, लेकिन चुनाव के बाद ऐसा कुछ नहीं किया गया कि लोग इस कोशिश की ईमानदारी पर शक़ न करते।

(जारी..)

शनिवार, 6 मार्च 2010

ताकि सनद रहे...

संकट में इतिहास ही सच्चा गाइड है...

हम जो हैं, हम जिस तरह के हैं और हम क्यों हैं, यही इतिहास है...

क्या आप जानते हैं कि संसद भवन में बम फेंकने के बाद भगत सिंह पर चले मुकदमे में उनकी पैरवी करने वाला वकील कौन था? या फिर, क्या ये जानते हैं कि अमेरिका में आज़ाद भारत का पहला राजदूत कौन था? दोनों एक ही शख्स हैं? है ना चौंकाने वाली बात!

इतिहास के पन्नों से ही एक और पहेली। क्या आप जानते हैं कि वो कौन सा कांग्रेसी नेता है जिसने अमृतसर रेलवे स्टेशन पर अलग अलग घड़ों से हिंदुओं और मुसलमानों को पानी पिलाते देख अपना सफर वहीं रोक दिया और खुद खड़े होकर वे घड़े तुड़वाए? नहीं, ये महात्मा गांधी नहीं थे।

एक छोटा सा सवाल और। वो कौन सी शख्सीयत थी जिसने पहले पंडित मोती लाल नेहरू और फिर पंडित जवाहर लाल नेहरू के निजी सचिव के तौर पर काम किया?

आपका स्कोर क्या रहा? तीन में से दो या फिर तीन में से एक, या फिर.... J

अगर आप को इनमें से एक का भी जवाब पता है तो फिर आप बधाई के हक़दार हैं क्योंकि हिंदुस्तान की आज की नौजवान आबादी को तो इनमें से एक का भी जवाब ना तो पता है और ना ही किसी ने इन्हें ये बताने की कोशिश ही की। ये सब देश के महान स्वतंत्रता सेनानी थे और ये सब मुसलमान थे।

लेकिन...

लेकिन, क्या इनके बलिदानों और समर्पण को आधुनिक भारत में कोई पहचान मिली? क्या हमने ऐसा कुछ किया जो ना सिर्फ इनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि हो, बल्कि देश की गंगा जमुनी तहज़ीब की सही तस्वीर पेश कर सके।

ग्लोबल न्यूज़ नेटवर्क की प्रस्तुति ताकि सनद रहे..., इन्हीं सवालों का जवाब है।

ताकि सनद रहे, अलग अलग डॉक्यूमेंट्रीज़ की एक ऐसी सीरीज़ है जिसमें देश की आज़ादी में हिस्सा लेने वाली चंद मशहूर और कुछ अनजान सी रह गईं मुस्लिम शख्सीयतों को आज की पीढ़ी के सामने दिलचस्प और रोचक अंदाज़ में पेश किया जाएगा।

इनमें से किसी ने मशहूर ग़ज़ल चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है..लिखी तो कोई आगे चलकर बना युवक कांग्रेस का संस्थापक। ये वो लोग हैं जिन्होंने अपने पेशे और अपनी अच्छी खासी गृहस्थी को आग लगा दी सिर्फ इसलिए कि देश में आज़ादी का दीया जल सके। ये वो लोग हैं जिनसे हर हिंदुस्तानी और ख़ासकर अल्पसंख्यकों ने तिरंगे की आन बान और शान बढ़ाने की प्रेरणा ली और आज भी ले रहे हैं।

ताकि सनद रहे, एक उम्मीद है उन हज़ारों लाखों लोगों की, जिनको लगता है कि अल्पसंख्यक नेताओं की तरफ भारतीय मीडिया ने कभी ख़ास तवज्जो नहीं दी।

ताकि सनद रहे, ये बताने के लिए है कि जो इतिहास को भूल जाते हैं, भविष्य उनको भूल जाता है।

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रविवार, 7 फ़रवरी 2010

इस्लाम का प्रोग्रेसिव चेहरा


राजधानी दिल्ली में चल रहे पुस्तक मेले में जाने वालों को इस बार एक खास बात नज़र आई और वो है यहां बंट रहे हरे सफेद पर्चे। आमतौर पर पुस्तक मेले में अलग अलग प्रकाशकों के कारिंदे नुक्कड़ों और प्रवेश द्वारों पर पुस्तक सूचियां या फिर अपने स्टाल का पता बताने वाली सामग्री बांटते नज़र आते हैं, लेकिन इन हरे सफेद पर्चों की तरफ ध्यान इनके मजमून को लेकर जाता है। आम तौर पर मेलों में आने वाले पाठक या तो इन पर्चों को लेते ही नहीं है या फिर लेने के बाद अगले कदम पर पड़ने वाली डस्ट बिन के हवाले इन्हें कर देते हैं। लेकिन, इन पर्चों को ध्यान से पढ़ने की ज़रूरत है, कम से कम उन लोगों को जिनके निशाने पर इस्लाम है या फिर जो इस्लाम के नाम पर दूसरों को निशाने पर रखते हैं। मेले में सबसे ज़्यादा पर्चे बांटे जा रहे हैं वर्क यानी वर्ल्ड ऑर्गनाइजेशन ऑफ रिलीजन्स एण्ड नॉलिज चैरिटेबल ट्रस्ट नाम की संस्था की तरफ से। एक हरे पर्चे की आखिरी लाइन है, हिंदू शब्द के मूल से चलने पर हम देखते हैं कि यह स्थान वाचक शब्द है और यदि संविधान में संशोधन कर प्रत्येक भारत निवासी को हिंदू कहा जाए तो कोई विरोधाभास नहीं होगा और भारतीय मुसलमान भी सनातन धर्मियों की आवाज़ में आवाज़ मिलाकर कह सकेंगे, गर्व से कहो हम हिंदू हैं।

यह पर्चा मेले में हिंदू कौन है?” शीर्षक के साथ बांटा जा रहा है। पर्चे में पहले तो हिंदू शब्द की उत्पत्ति और इसके एक धर्म होने के आधार पर सवाल उठाए गए हैं, लेकिन फिर बात पहुंच जाती है वहां, जहां से वंदे मारतम् का विरोध करने वालों के दावों की हवा निकलती दिखाई देती है। इसके मुताबिक इस्लाम के पहले ईशदूत का भारतीय होना इस्लाम का भारतीय मूल का धर्म सिद्ध करता है। इसके अलावा अंतिम ईशदूत हज़रत मुहम्मद को भारत की ओर से जन्नत की सुगंध आना, निश्चित रूप से भारत को विश्व के सभी मुसमलमानों की पुण्य भूमि करार देता है। हिंदुस्तान की तारीफ में आगे लिखा गया है कि हजरत मुहम्मद के जन्म के पूर्व से ही अरब निवासी हमारी सुंदर भूमि को हिंद कहते थे। अरब देशों में सुंदर स्त्रियों का नाम हिंदा रखा जाता था। बहुत हदीसों में हिंद शब्द भारत के लिए प्रयुक्त हुआ है। यह भी कहा गया है कि हिंद नाम अरबी मूल का है।

ऐसा ही एक और हरा पर्चा मेले में मानवता का दूत शीर्षक के साथ बांटा जा रहा है। लेकिन उसकी चर्चा से पहले मेले में बिक रही एक किताब फ्रीडम ऑफ रिलीज़न एंड टॉलरेंस इन इस्लाम का ज़िक्र ज़रूरी हो जाता है। ये किताब इस्लामिक आतंकवाद की जड़ पर चोट करती है। कुरान शरीफ की आयतों का ज़िक्र करते हुए ये किताब उन लोगों को संदेश देने की कोशिश करती है जो आतंक की राह पर चल चुके हैं। अमेरिका पर अपहृत विमानों के ज़रिए किए गए 9/11 के हमले की मुख़ालिफत करते हुए ये किताब कुरान शरीफ का हवाला देते हुए कहती है कि एक मुसलमान को अच्छा हमसफर और उतना ही अच्छा हमराही होना चाहिए। किसी भी मुसलमान को अपने सहयात्री को नुकसान पहुंचाना ग़लत है, बारूद से विमान को उड़ाना या फिर हवाई जहाज को ले जाकर टकरा देने जैसी बात तो किसी मुसलमान को सोचनी भी नहीं चाहिए। किताब के एक सफे पर यह भी लिखा है कि इस्लाम एक मुसलमान को गैर मुसलमानों के साथ भी शांति, सद्भाव और मित्रवत रहने की सीख देता है। इसमें अनजान पड़ोसी के साथ भी अच्छे व्यहार की बात कहते हुए इस अनजान पड़ोसी के साथ किसी भी तरह से यानी जाति, धर्म या देश के आधार पर भेदभाव को गलत ठहराया गया है।

बात यहीं तक रुकती नहीं है, ये किताब कुरान की उन आयतों का चुन चुन कर ज़िक्र करती है, जिन्हें आज के वक्त में इस्लाम को मानने वाले हर शख्स को पढ़ना और इन पर अलम करना ये किताब ज़रूरी मानती है। जिहाद पर इस किताब में खास तौर से अलग से चर्चा की गई है। कुरान शरीफ की आयतों का हवाला देते हुए इसमें कहा गया है कि जिहाद का पहला मतलब जंग नहीं है। फिर हदीस का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि जिहाद का बेहतरीन उदाहरण है कायदे से किया गया हज़ और जिहाद का मतब है अपने आप से जंग खुद को एक नैतिक और आध्यात्मिक तौर पर एक बेहतर इंसान बनाने के लिए। यही नहीं मुसलमान के मायने को साफ करते हुए ये किताब कहती है –कि मुसलमान वो है जो गुस्से पर काबू करे और लोगों को माफ करे।

पिछले कई दिनों से इस किताब के खास हिस्सों को अलग से पन्नों पर छाप कर भी मेले में बांटा जा रहा है और दिलचस्प बात ये भी है कि इस बार मेले में इस्लामिक साहित्य के छोटे ही सही पर जगह जगह लगे स्टालों पर दूसरे धर्मों के लोगों की खासी भीड़ भी दिख रही है। कुरान शरीफ़ के देवनागरी में तर्जुमे और अंग्रेजी अनुवाद की अच्छी खासी बिक्री हो रही है। मायने साफ है कि लोग इस्लाम को नज़दीक से जानने की उत्सुकता लिए आते हैं और इसी बहाने कुछ लोग ही सही पर इस्लाम के दामन पर चंद फिरकापरस्तों की तरफ से लगाए जा रहे दाग को धोने की कोशिश कर रहे हैं। ये सफेद हरे पर्चे बताते हैं कि इस्लाम पर बार बार उठती उंगली से एक तबका खासा परेशान है, और ये तबका चाहता है कि आतंक के हर हमले के बाद उंगली आतंकवादियों पर ही उठे, इस्लाम पर नहीं।

इस्लाम की शुरुआती वक्त की तारीफ करते हुए एक दूसरा हरा पर्चा भी मेले में मिला। मक्का शहर में जन्मे एक अनाथ बच्चे की कहानी कहता हुआ ये पर्चा धीरे धीरे हजरत मुहम्मद की शोहरत तक आता है। पर्चा कहता है कि इस्लाम को मानने वालों की तादाद ज्यों ज्यों बढ़ती गई, जुल्म व सितम का खात्मा हो गया। आतंकवाद का नाम व निशान न रहा। लोग दुख व दर्द में एक दूसरे के काम आने लगे। अनाथों और बेवाओं का संरक्षण करना लोग अपना कर्तव्य समझने लगे। गरीबों के लिए अमीरों की आमदनी में से ढाई फीसदी का अनिवार्य दान निर्धारित हुए। ईश्वर के बाद सबसे ज्यादा मान सम्मान की हक़दार मां को बनाया गया। शराब और जुए की लानत जड़ से समाप्त हो गई। लड़की के जन्म को शुभ माना जाने लगा। स्त्रियों के लिए विरासत में हिस्सा नियुक्त हुआ। इंसानों ही नहीं पशुओं के भी अधिकार मुकर्रर हुए, बदला लेने के बजाए माफी की शिक्षा दी गई। इन लाइनों को ध्यान से पढ़ें तो ये सारी बातें वहीं हैं जो एक विकसित समाज के लिए ज़रूरी होती हैं और जिनके लिए भारत समेत कई दूसरे देशों में बाद की सरकारों ने कानून तक बनाए। मतलब ये कि इस्लाम को दकियानूसी और रूढ़वादी मानने वालों तक ये बात पहुंचाने की कोशिश की जा रही है कि इस्लाम भी उतना ही प्रोग्रेसिव है जितना कि दुनिया के दूसरे धर्म। इस्लाम को इस पर्चे में इतिहास का सबसे अद्भुत और शांतिपूर्ण इंकलाब भी बताया गया है। ध्यान देने की बात ये भी है कि ये सारे पर्चे या तो हिंदी या फिर अंग्रेजी में हैं। उर्दू लिपि में कहीं कोई पर्चा बंटना नज़र नहीं आता यानी कि ये बात भी करीब करीब साफ़ है कि ये पर्चे बांटे किनके लिए जा रहे हैं।

इस्लाम को लेकर दूसरे धर्मों के लोगों के बीच हमेशा से भ्रांतियां रही हैं। अंग्रेजी में एक नए शब्द इस्लामोफोबिया का चलन भी शुरु हुआ और गैर मुस्लिम पढ़े लिखे लोगों के बीच इस शब्द का इस्तेमाल आजकल धड़ल्ले से होता है। न्यूयॉर्क और लंदन से निकला ये शब्द हाल ही में हुए प्रवासी भारतीय दिवस में भी खूब सुनाई दिया। मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में तो निर्देशक और लेखक सीना ठोंक कर कहते हैं कि उनकी फिल्म इस्लामोफोबिया पर बनी है। लेकिन, सोचने वाली बात ये है कि लोग इस्लाम से डरते हैं या फिर पाकिस्तान और अफगानिस्तान में छुपे बैठे उन दहशतगर्दों से जो अपने नापाक इरादों को जायज़ ठहराने के लिए इस्लाम का सहारा लेने लगते हैं। ये पर्चे अगर कुछ इशारा करते हैं तो यही कि अब इस्लाम को मानने वालों ने ही अपने बीच के इन चंद फिरकापरस्तों को अलग थलग करने की छोटी सी ही सही पर स्वागत योग्य पहल की है। कुरान शरीफ की आयतों के ज़रिए अगर इस्लाम के असली मकसद को सबके सामने लाया जाता है तो इसका खुले दिल से ख़ैरमकदम किया जा चाहिए। जैसा कि कुरान शरीफ़ भी कहती है – धर्म में ज़बर्दस्ती के लिए कोई जगह नहीं है। आमीन।

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बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

कुमार के कौतुक

दिल्ली पुस्तक मेले से लौटते वक्त एकाएक नज़र गेट के करीब लगे एक बैनर पर अटक गई। फोटो तो अपने जाने पहचाने और करीबी डॉ. कुमार विश्वास की ही थी लेकिन किताब की डिज़ाइन पर जो नाम छपा था, वो समझ नहीं आया। काफी देर दिमाग की नसें जब आपस में गुत्थमगुत्था करके हार गईं तो ये सोच कर उसे समझाने का हौसला किया कि ज़रूर ये अपने अजूबे कवि की कोई नई राम कहानी होगी। लेकिन फिर भी मन नहीं माना। डर था कि कवि महोदय मेरी अज्ञानता पर हंस भी सकते हैं लेकिन तब भी...।

फोन की घंटी बजी, कवि कुमार की आवाज़ आते ही पूंछ बैठा कि भाई ये कौन सी नई किताब लिख मारी है, जिसका टाइटल ही एलियंस की सी भाषा में है। वो भी समझ नहीं पाए कि मेरे सवाल का मतलब क्या है, तभी दिमाग की घंटी बजी और तोड़ ये निकला कि जिस हिंदी फॉन्ट का इस्तेमाल डिज़ाइनर ने किया होगा, वो शायद छपाई के वक्त एलियंस की भाषा जैसी दिखने वाली लिपि में तब्दील हो गया। धन्य हो डायमंड पॉकेट बुक्स ! फिर कुमार की ही तो कविता है- कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है, मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है।

हिंदी के समकालीन और लोकप्रिय कवियों में डॉ. कुमार विश्वास का नाम अक्सर ही सुनाई देता है। कभी अब तक की किसी भी हिंदी कविता के सबसे ज़्यादा डाउनलोड (कोई दीवाना कहता है – उनकी नई किताब भी इसी नाम से आई है, जिसे डायमंड पॉकेट बुक्स वितरित कर रहा है) को लेकर तो कभी मंच पर उनकी रोमांटिक दादागिरी को लेकर। कुमार कौतुक से कविता निकालते हैं और ये उनका ही कमाल कि वो किसी को भी कहीं से कुरेद कर कविता बना देते हैं। कोई चार साल पहले कुमार ने ही सबसे पहले मीडिया खासतौर से टीवी मीडिया पर तलवार चलाई थी। हो सकता है रामू ने उनकी कविता सुनकर या उसके बारे में सुनकर ही रण की रणनीति बनाई हो। ज़ी न्यूज़ के दफ्तर में कोई तीन साल पहले आए रामू ने तब अपनी इस फिल्म के बारे में चर्चा की थी और टीवी के कारोबार को समझने के लिए एक दो बार बात भी की थी, तब शायद वो फिल्म का नाम ब्रेकिंग न्यूज़ रखना चाहते थे, लेकिन इस बीच इसी नाम से एक फिल्म बनकर रिलीज़ भी हो गई।

खैर लौटते हैं, कुमार के कौतूहल पर। इमरोज की कलमकारी से सजी इस किताब को एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद रुकने का मन नहीं होता। कुमार की इस किताब का अपन अलग कलेवर है और लफ्जों की नूराकुश्ती का अलग ही तेवर है। शिक्षण संस्थानों खासकर तकनीकी शिक्षण संस्थानों में सबसे ज़्यादा सुने जाने वाले इस युवा कवि की तारीफ़ (?) में उनके परम सखा अतुल कनक कुछ यूं लिखते हैं – आप बीती को गीत बीती बनाने का उनका कौशल पूरे हिंदी जगत में आधार पाता है। हिंदी कवि सम्मेलनों में हर प्रकार से (प्रशंसा से निंदा तक), अपनी पीढ़ी के नंबर वन कवि हैं। और निदा फ़ाज़ली की मानें तो गोपाल दास नीरज के बाद अगर कोई कवि मंच की कसौटी पर खरा लगता है तो वो नाम कुमार विश्वास के अलावा दूसरा नहीं हो सकता। खुद नीरज का मानना है कि कुमार को भविष्य बड़े गर्व और गौरव से गुनगुनाएगा। कुमार की किताब कोई दीवाना कहता है पुस्तक मेले में धड़ल्ले से बिक रही है। खुद कुमार छह और सात फरवरी को दोपहर एक बजे से चार बजे के बीच डायमंड पॉकेट बुक्स के पुस्तक मेले में लगे स्टाल पर अपने चाहने वालों के बीच होंगे। कुमार ने बंधी बंधाई लीक छोड़कर नई राह बनाई है, इस नज़रिए से सायर (शायर) भी हैं, साहित्य के सिंह भी और कलावादी मां के सपूत भी। और करो कौतुक, ज़माना इंतज़ार कर रहा है।