शनिवार, 25 जुलाई 2009

सहकारिता को सियासत का श्राप- 1



आधुनिक अर्थशास्त्रियों को तो ख़ैर ये बात बहुत देर में समझ में आई, लेकिन भारतीय वेदों में सह अस्तित्व की बात शुरू से मान्य रही है। ओम् सह नानवतु, सह नौ भुनक्तु, सह वीर्यम करवावहै का ज़िक्र हो या फिर सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामयाः , सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत। हर बार मंशा यही रही कि ‘सब’ का कल्याण हो। समाज को आगे बढ़ाने की ये धारणा भारतीय मानस ने ऋषियों से लेकर आगे बढ़ाई। भारत का मानस गांवों में है और गांवों में रहने वालों के सामूहिक विकास के लिए ही सहकारिता की अवधारणा अपने यहां नई बात नहीं है। लेकिन, जिस सहकारिता के पाश ने महाराष्ट्र के किसानों के लिए श्राप का काम किया है, उसकी कथा ज़रा अनोखी है। ऐसा कैसे हो गया कि एक साथ, एक ही सहकारिता समिति के सदस्यों ने एक साथ काम शुरू किया, लेकिन उनमें से एक करोड़ों की संपत्ति का मालिक बन गया और देश में कानून बनाने वालों के बीच तक जा बैठा, जबकि उसके साथ के किसान अब उसी के रहमोकरम पर हैं। आर्थिक विकास के लिए विपणन प्रणाली के साथ साथ ही सहकारिता का भी जन्म हुआ। इसका विकास और स्वरूप पहले भारतीय संयुक्त परिवारों के चलाने और आगे बढ़ाने के ढंग को आदर्श मानकर किया गया। गावों के तालाब सहकारिता के सबक की पहली सीढ़ी हुआ करते थे, लेकिन जैसे जैसे आधुनिकता के आडंबर में सर्व की बजाय अहम् की स्थापना होती गई, व्यवस्थाएं व्यक्तिपूजक होने लगीं और सहयोग की जगह ले ली एक ऐसी गलाकाट प्रतिस्पर्धा ने, जिसमें दूसरे का अहित कर अपनी तिजोरी भरने की होड़ सी मच गई। महाराष्ट्र की सियासत में चमकने वाले 80 फीसदी से ज़्यादा नेताओं के आभा मंडल के पीछे वो चीनी मिलें हैं, जिन्हें शुरू तो सहकारिता के आधार पर किया गया, लेकिन समितियों के कानूनों की अनदेखी और ‘मुनाफा हमारा, घाटा सरकार का’ की नीति ने इनके सदस्य गन्ना किसानों को नेताओं का बंधुआ मतदाता बनाने से ज़्यादा कुछ नहीं किया।
आज़ादी से 46 साल पहले पड़े भीषण अकाल के वक्त देश के किसानों की माली हालत सुधारने की कोशिशें शुरू हुई थीं। तब बने अकाल आयोग ने सिफारिश की थी कि किसानों को सस्ती दरों पर कर्ज़ मुहैया कराया जाए। इस सुझाव पर सरकार ने एडवर्ड लॉ की अगुआई में बनी समिति की राय ली और इसी समिति ने पहली बार देश में ऐसी सहकारी समितियां गठित करने का सुझाव दिया, जिसके जरिए किसानों को सीधे सहायता दी जा सके। ये समितियां बहुउद्देश्यीय हों, इस बारे में रिजर्व बैंक के कृषि ऋण विभाग ने एक लंबी रपट बनाई, आज़ादी से दस साल पहले रिजर्व बैंक ने सहकारी आंदोलन के बारे में जो कुछ काम किया, वो लंबे अरसे तक कागज़ों में कैद रहा और यहां तक कि प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जब ग्रामीण ऋण सर्वेक्षण समिति बनाई तो इसकी रिपोर्ट में साफ तौर पर लिखा गया कि भारत में सहकारिता असफल रही है। लेकिन, तब सरकार ने ये भी माना था कि देश के किसानों के हालात सुधारने के लिए सहकारिता के अलावा दूसरा कोई रास्ता भी नज़र नहीं आता, लिहाजा सरकार को सहकारिता को सफल बनाना ही होगा। इसका असर भी हुआ और खाद, बीज व दूध जैसे मामलों में सहकारिता ने कामयाबी के नए अध्याय लिखे। लेकिन, गन्ने की खेती को बढ़ावा देने के लिए किए गए सहकारिता के प्रयोग पर कुछ खास लोगों ने कब्जा कर लिया।
कहते हैं कि महाराष्ट्र में वोट गन्ने की पोरों से निकलते हैं। वो गन्ना जिसे चलते ट्रैक्टर से खींचने के लिए आप भी कभी इसके पीछे दौड़े होंगे और जिसका रस पीने के लिए कभी गांव के बाहर बने कोल्हू पर बच्चों की भीड़ लगी रहती थी। कोल्हुओं का रस बस गांव में गुड़ बनाने के काम आता और ज्यादातर रस गन्ने की खोई के साथ ही बर्बाद हो जाता। गन्ने से ज्यादा से ज्यादा फायदा किसानों को मिल सके, इसके लिए महाराष्ट्र में सहकारिता के प्रयोग शुरु हुए। गन्ने के दाम इससे मिलने वाले गन्ने के रस के प्रतिशत यानी रिकवरी के हिसाब से तय होते हैं। 2009-2010 के चीनी सीजन के लिए केंद्र सरकार गन्ने की एमएसपी में 32 फीसदी की बढ़ोतरी करते हुए इसका दाम रुपये 107.76 करने का ऐलान कर चुकी है। ये दाम 9.5 फीसदी रिकवरी वाले गन्ने पर है, इसके बाद हर 0.1 फीसदी पर किसानों को रुपये 1.13 प्रति क्विंटल और मिलेंगे। महाराष्ट्र में चीनी मिलें सहकारी क्षेत्र में हैं और वहां गन्ने में रिकवरी भी अधिक होती है। लिहाजा, केंद्र के इस ऐलान से महाराष्ट्र के गन्ना किसानों में खुशी की लहर दौड़ जान चाहिए थी, लेकिन ऐसा दिखता नहीं है।
गन्ना खरीद के इस दांव पेंच को समझने के बाद ज़रूरी है ये समझना कि आखिर महाराष्ट्र में सहकारिता को आंदोलन मानने वाले बड़े नेताओं ने कैसे इसे अपने फायदे के लिए दुहा। ये तो सब जानते हैं कि महाराष्ट्र के गठन से लेकर अब तक अगर 1995 से 1999 तक का समय छोड़ दें तो मुंबई के मंत्रालय पर कांग्रेसियों का ही कब्ज़ा रहा है। कांग्रेस का मतलब यहां उन पार्टियों से भी है जो सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से छिटक कर अलग हुईं, लेकिन सत्ता की मलाई में शामिल रहने के लिए फिर से उसी की गोद में आ बैठीं। महाराष्ट्र के चीनी मिलों के पदाधिकारियों की सूचियों को भीतर तक छान चुके लोग बताते हैं कि इनमें से 90 फीसदी से ज़्यादा चीनी मिलों पर आज भी कांग्रेस या उसकी सहयोगी पार्टियों का कब्ज़ा है। और, इनमें से ज़्यादातर पदाधिकारी ना तो खुद किसानी करते हैं और ना ही किसानों को इन पदों पर काबिज़ होने देते हैं। महाराष्ट्र में सहकारिता कैसे किसानों के लिए श्राप बन चुकी है, इसकी बात चलने पर महाराष्ट्र के सीमांत और मझोले किसान संगमनेर फैक्ट्री के 13 साल पहले के चुनावों को हवाला देते हैं। बताते हैं कि उस वक्त फैक्ट्री के छोटी जोत वाले 14 हज़ार किसान सदस्यों में से एक एस तानपुरे ने गवर्निंग बॉडी के चुनावों में हिस्सा लेने की गुस्ताख़ी कर दी थी। बिना धन बल या बाहुबल के चुनाव जीतने का ख्वाब देखने वाला तानपुरे चुनाव तो हारा ही, बाद में खद्दरधारियों ने ना तो उसका गन्ना खरीदा और ना ही उसे कभी पनपने दिया। सहकारिता के मठाधीशों का विरोध करने वालों को महाराष्ट्र में खुलेआम धमकी मिलना तो अब आम बात है, और बगावत का झंडा बुलंद करने की कोशिश करने वालों का क्रेडिट रोक देना, उनके पानी, बिजली के कनेक्शन कटवा देना भी महाराष्ट्र के गन्ना किसानों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है।
(जारी...)