शनिवार, 6 सितंबर 2008

कड़ाके की ठंड में रतजगा


भोले शंकर (15). गतांक से आगे...
अक्सर हम फिल्में देखने जाते हैं और तीन घंटे बाद हॉल से बाहर निकलकर अपना फैसला सुना देते हैं। पता नहीं कितने लोगों की मेहनत और कितने लोगों के अरमानों का फैसला इन तीन घंटों में हो जाता है। बड़े से बड़ा सुपरस्टार भी दर्शकों का ये फैसला नहीं बदल पाता। तमाम अभिनेता दर्शकों की नब्ज़ पकड़ने का दावा करते हैं। वो ये भी दावा करते हैं कि लगातार फिल्में करते रहने से उन्हें पता होता है कि क्या चलेगा और क्या नहीं चलेगा। अगर ऐसा होता तो फिर भला फिल्में फ्लॉप ही क्यों होती? क्यों भला कोई मेहनत करता, बस महानायक से हिट होने की रामबाण दवा लेता और बना लेता फटाफट से एक फिल्म। हिंदी फिल्मों की तरह ही भोजपुरी में भी स्टार सिस्टम का कीड़ा घुस चुका है। हर स्टार अपनी मर्जी से भोजपुरी सिनेमा को चलाना चाहता है। साथी कलाकारों को अपने से दोयम दर्जे का गिनना तो खैर कोई नई बात नहीं, प्रोड्यूसर और डायरेक्टर को भी वो अपनी उंगली पर नचाना चाहते हैं। शूटिंग के वक्त निर्देशक के कहे अनुसार काम ना करना और फिर बाद में सीन में दम ना होने का रोना ऐसे सुपरस्टार्स की आदत होती है।

इन मामलों में फिल्म के सहयोगी कलाकार ज़्यादा मेहनती साबित होते हैं। भोले शंकर की मेकिंग के दौरान ऐसा ही अनुभव हुआ मुझे निराली नामदेव के साथ गाने की शूटिंग के वक्त। निराली भोले शंकर की शूटिंग पर सीधे इलाहाबाद से पहुंची थी। मोनालिसा का तो अगले दिन रेस्ट रहा, लेकिन निराली लग गई सीधे शूटिंग पर। वैसे तो आज फिल्म भोले शंकर में मनोज तिवारी की एंट्री की बात होनी थी, लेकिन मुझे लगा कि पहले उस दिन का किस्सा ही पूरा कर लिया जाए। तो उस दिन मनोज तिवारी के वापस गांव से लौटने के सीन के बाद हम लोगों ने पारवती का रोल कर रही निराली के साथ मनोज तिवारी की मुलाकात का सीन शूट किया और फिर मनोज तिवारी का पैक अप हो गया। लेकिन बाकी पूरी यूनिट का काम अभी बाकी था। गांव में ये हमारा आखिरी दिन था और हमने तैयारी शुरू कर दी, पारवती के दिल का हाल बताने वाले गाने की शूटिंग की।

पारवती का घर जिस मकान को हमने बनाया था, उसके मालिक बहुत ही सहृदय इंसान थे। उनके घर के बाहर उस शाम ऐसी सजावट थी कि जैसे सचमुच उनके घर बारात आई हो। पूरे रास्ते को झालरों और लाइट्स से सजाया गया। शादी का गेट भी बनाया गया। बारात के आने के सीन शूट करने के बाद, हम आ गए मकान के अंदर। तब तक आठ बज चुके थे। हम लोगों ने तय किया कि आज की रात ही गाने की पूरी शूटिंग करके गांव से विदा ली जाए। अब समस्या ये थी कि दिसंबर की रात और कड़ाके की ठंड के बीच अगर हम लोग घर के अंदर शूटिंग करेंगे तो बेचारे घर के लोग कहां जाएंगे। अपने दिल की बात हमने घर के मालिक को बताई। वो दस मिनट का वक्त मांगकर घर के अंदर गए और हम बाहर उनके वापस आने का इंतज़ार करते रहे।

थोड़ी देर बाद वो वापस आए और उन्होंने कहा कि घर वाले मान गए हैं। अब सीन कुछ ऐसा था कि घर के सारे लोग एक छप्पर के नीचे बैठकर आग तापने लगे और हमने घर का सारा सामान चारपाई वैगरह समेट कर बाहर कर दी। लाइटमैन घर के अंदर लाइटस पहुंचाने लगे। कैमरामैन राजूकेजी मेरे बताए अनुसार लाइटिंग कराने लगे। और कोरियोग्राफर रिक्की ने संभाल लिया मोर्चा ट्रैक और ट्रॉली लगवाने का। थोड़ी ही देर में घर के हर कोने में हमारा सामान फैल चुका था। निराली पर ये गाना फिल्माया जाना था और गाने की ज़रूरत के लिहाज से उसे बस एक देसी सलवार सूट ही पहनना था। हड्डियां जमा देने वाली ठंड में बस एक सलवार सूट में शूटिंग के लिए कहना किसी अन्याय से कम तो नहीं, लेकिन फिल्म मेकिंग की यही मजबूरियां होती हैं। निराली ने भी एक बार उफ तक नहीं की। ऐसी ठंड में जब हाथ को रजाई से बाहर निकालना भी पहाड़ हटाने जैसा काम लगता हो, निराली ने बिना आस्तीन वाले कुर्ता पहन कर खुले आसमान के नीचे शूटिंग शुरू की।

कोरियोग्राफर रिक्की पूरे जोश में थे, और हर लाइन के बाद शॉट बदलते जा रहे थे। हम लोगों को थर्मल इनर वियर और जैकेट आदि के बाद भी कंपकंपी छूट रही थी और निराली बिना उफ किए शॉट पर शॉट दिए जा रही थी। गाने के बोल थे- तोरी मरज़ी है क्या बता दे बिधना रे.. काहे मोरा पिया ना मिला। फिल्म में ये मेरा सबसे पसंदीदा गाना है और मुझे उम्मीद है कि ये गाना आप लोगों को भी बहुत पसंद आएगा। पिछले दिन हमने कोई नौ बजे सुबह शूटिंग शुरू की थी और आधी रात होने को हो आई थी और शूटिंग जारी थी। इस गाने की शूटिंग सुबह चार बजे तक चली, यानी हमने लगातार कोई 19 घंटे शूटिंग करने का रिकॉर्ड बना डाला। लेकिन यूनिट के किसी भी मेंबर ने उफ तक नहीं की। मनोज तिवारी की फिल्म भोले शंकर में एंट्री की बात अब अगले अंक में होगी, पढ़ते रहिए कैसे बनी भोले शंकर?

पंकज शुक्ल
निर्देशक - भोले शंकर