बुधवार, 3 सितंबर 2008

नौटंकी और नटकौरा


भोले शंकर (13). गतांक से आगे..


फिल्म भोले शंकर की कहानी के कई एंगल हैं। ये एक विधवा मां के संघर्ष की भी कहानी है। भोले शंकर की मां दरअसल एक नाचने वाली है। जिससे एक ज़मींदार के बेटे को प्यार हो जाता है। और वो उसे अपनी पत्नी बनाकर अपने घर ले आता है। फिल्म में ये किस्सा फ्लैशबैक में आता है। और, अमूमन मां के रोल में दिखने वाली शबनम कपूर ने एक धमाकेदार नौटंकी गाने पर नाच भी दिखाया है। पहली बार जब मैंने शबनम कपूर को कहा कि फिल्म में आप पर दो गाने हैं। तो वो यही समझीं कि मां बेटे के रिश्तों पर कोई गाने होंगे। मैंने उन्हें बताया कि एक गाना फिल्म में तब होता है जब भोले और शंकर बड़े बड़े हो चुके हैं और मां उनके साथ छठ पूजा की तैयारी कर रही है। शबनम कपूर खुश हुईं कि उन्हें मिथुन और मनोज तिवारी दोनों के साथ इस गाने में मौका मिल रहा है। फिर मैंने बताया कि एक और गाना फिल्म में है और ये गाना तब होता है जब भोले और शंकर पैदा भी नहीं हुए हैं। ये सुनकर शबनम कपूर चौंकी।

लखनऊ पहुंचने के बाद एक तरफ विधवा मां के रोल के लिए शबनम कपूर की तैयारी चलती रही। और दूसरी तरफ मैं तैयारी करता रहा शबनम कपूर को एक युवती के तौर पर पेश करने की। वैसे तो कोई कलाकार अपनी उम्र नहीं बताता लेकिन किसी कलाकार को उसकी असल उम्र से ज़्यादा दिखाने में अमूमन दिक्कत नहीं आती। बस थोड़ा सा डार्क मेकअप, बालों में थोड़ी सफेदी और सादे कपड़े पहनाते ही कलाकार बुजुर्ग दिखने लगता है। लेकिन किसी कलाकार को उसकी असल उम्र से कम उम्र का दिखाना और वो भी जवानी के पूरे जोश के साथ, तो मामला थोड़ा सीरियस हो जाता है। फिल्म में शबनम कपूर पर एक नौटंकी गाना फिल्माया जाना है। ये वही गाना है जिसे रिकॉर्ड करने के लिए संगीतकार धनंजय मिश्रा ने खासतौर से बनारस के नगड़ची और नगाड़े बुलाए। वैसे तो वो कह रहे थे कि जो वाद्य यंत्र चलन में हैं, उन्हीं से वो नगाड़े की आवाज़ निकाल देंगे, लेकिन मुझे असल नगाड़े की आवाज़ चाहिए थी, चोप की चोट से कड़कती हुई। और नगड़िया की वो आवाज़ जो आग में सिकाई के बाद चोप पड़ने पर होती है। हम लोग जब मुंबई से लखनऊ के लिए निकले तो धनंजय का इस गाने पर काम ज़ारी था, वादा ये था कि ये गाना वो दो तारीख तक लखनऊ भिजवा देंगे, लेकिन ऐसा हो नहीं सका।

अब शाम को शूटिंग और हमारे हाथ में गाना नहीं। खास गावों में लगने वाला शामियाना लग चुका था। नौटंकी में इस्तेमाल होने वाले बाजे आ चुके थे। गांवों की नौटंकी में जो हारमोनियम बजती है उसमें हवा पैरों से दी जाती है और बजाने वाला दोनों हाथों से हारमोनियम बजाता है। ऐसी हारमोनियम ढुंढवाई गई, नौटंकी में शबनम कपूर के साथ नाचने वाले कलाकार भी खास नौटंकी वाले ही बुलाए गए। गाना दिन ढलने के बाद ही शूट होना था, लेकिन हेयर ड्रेसर मानसी और मेकमप मैन बाबू दोपहर 12 बजे से ही शबनम कपूर की उम्र घटाने में लग गए। उत्तर भारत में सर्दियों के दिनों में शाम के चार बजते ही रोशनी कम होने लगती है। थोड़ी ही देर में शूटिंग शुरू होनी थी लेकिन गाना हाथ में नहीं था। और इसमें भी तुर्रा ये कि हमारे कोरियोग्राफर रिक्की भी तब तक लखनऊ नहीं पहुंच पाए थे, मुंबई से चलने वाली उनकी फ्लाइट लेट हो चुकी थी। तुरंत धनंजय से कहकर रिक्की के पास गाने का स्पूल भिजवाया गया। तय हुआ कि रिक्की गाना लेकर जैसे ही सेट पर पहुंचेंगे, शूटिंग शुरू कर दी जाएगी। लेकिन, शूटिंग के वक्त गाने के बोल और बोल से पहले बाद में बजने वाले म्यूज़िक की बीट्स भी एक कागज़ पर नोट की जाती हैं। ताकि शूटिंग करते वक्त पता चलता रहे कि किस हिस्से के लिए सीन्स शूट हो चुके हैं और किसके लिए नहीं। कैमरे के मूवमेंट्स भी इस कागज़ पर हाथ के हाथ लिखे जाते हैं। थोड़ी देर में रिक्की का फोन आया कि उनकी फ्लाइट रनवे की तरफ बढ़ चुकी है और फोन बंद होने से तीन घंटे के भीतर वो सेट पर होंगे। एक टेंशन खत्म हुई। अब चुनौती ये थी कि रिक्की के आते ही गाने की शूटिंग शुरू हो जानी चाहिए।

लेकिन ऐसा तभी हो सकता था जब गाना कागज़ पर पहले से लिखा हो। अगर रिक्की के आने के बाद ये काम शुरू होता तो कम से कम दो घंटे बर्बाद होने का ख़तरा था। तो मैंने धनंजय मिश्रा को फोन लगाया और कहा कि वो गाना उधर से बजाएं और हम इधर से मोबाइल पर गाना रिकॉर्ड कर लेंगे। ताकि जब तक रिक्की पहुंचे गाना हम कागज़ पर लिखकर पूरी तैयारी कर लें। धनंजय ने अपने हनुमान राजभर को इस काम पर लगाया। मैंने मुंबई में बज रहे गाने को लखनऊ में अपने मोबाइल पर रिकॉर्ड किया। और सहायक निर्देशकों की टीम बैठ गई गाना लिखने। रिक्की के आने आने तक हम पूरा गाना बीट्स के साथ कागज़ पर उतार चुके थे। रिक्की की गाड़ी सेट पर पहुंचते ही शोर मच गया कि बुलाओ, शबनम कपूर को बुलाओ। शबनम कपूर मेकअप रूम से बाहर निकलीं तो पहली बार में उन्हें कोई पहचान ही नहीं पाया। वो बिल्कुल किसी शोख और क़ातिल नौटंकी वाली की तरह लग रही थीं। ग़ज़ब की ड्रेस और कमाल का मेकअप। बस उन्हें इस ड्रेस में ठंड कड़ाके की लग रही थी। रिक्की ने सेट पर पहुंचते ही बिना कुछ खाए पिए सीधे पहला शॉट लगाया और शुरू हो गई शूटिंग उस गाने की जिसके बोल हैं..." पिया मोरे गइले रामा पूरबी बनिजिया....।"

शबनम कपूर ने शायद कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उन्हें फिल्मों में कोई सोलो गाना भी देगा। लेकिन कोई फिल्म कामयाब तभी होती है, जब उसका हर किरदार अपने आप में पूरा हो। और शबनम कपूर के किरदार के लिए ये गाना ज़रूरी था। आमतौर पर क्या हिंदी और क्या भोजपुरी, गाने हीरो और हीरोइन को ही सोचकर लिखे जाते हैं। वो ज़माना और था जब कभी प्राण परदे पर "कसमे वादे प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या" गाते दिखते थे तो कभी बलराज साहनी दिखते थे गाते - "ए मेरी ज़ोहरा जबीं, तुझे मालूम नहीं"। सिनेमा से चरित्र कलाकारों का सफाया बॉलीवुड ने ना जाने क्या सोचकर शुरू किया, और इसका वायरस अब दूसरी भाषाओं की फिल्मों तक पहुंचने लगा है। लेकिन, किसी भी कहानी में अगर हर उम्र के किरदार ना हों तो फिर हर उम्र के दर्शक मिलने की चाहत निर्माताओं को नहीं करनी चाहिए। शबनम कपूर ने उस रात चार डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान में वो गाना पूरा किया। बेचारी शॉट लगने तक आग के पास शॉल ओढ़कर बैठी रहतीं और जैसे ही शॉट लगता वो पहुंच जातीं पूरे जोश के साथ अपनी कमर थिरकाने। बाकी अगले अंक में...

कहा सुना माफ़,

पंकज शुक्ल
निर्देशक- भोले शंकर