रविवार, 31 अगस्त 2008

असल बनाम बनावटी


भोले शंकर (12). गतांक से आगे...

भोले शंकर की शूटिंग जैसे ही लखनऊ के करीब लुधमऊ गांव में शुरू हुई, पूरी जवार में हल्ला हो गया। शूटिंग देखने आने वालों की भीड़ जुटनी शुरू हो गई। मुंबई से पहुंची क्रू ने भी पहले दो दिन खूब सवाल किए कि आखिर इसी जगह शूटिंग क्यों? ये काम तो हम कहीं भी कर सकते थे। कहीं भी से उनका मतलब था उन जगहों से जहां इन दिनों ज़्यादातर फिल्मों की शूटिंग होती है। मुंबई के पास कहीं वसई का कोई तालाब, या विरार में हाईवे से थोड़ा हटकर कोई गांव, बहुत हुआ तो गुजरात का राजपीपला या उससे भी ज़्यादा हुआ उससे थोड़ा और आगे निकल गए।

मैंने भोले शंकर बनाने का फैसला लेने के बाद और फिल्म की शूटिंग शुरू करने से पहले लगातार बिला नागा कोई बीसेक भोजपुरी फिल्में देख डालीं। मैं फिल्म देखता था तो किरदारों पर कम और उनके आसपास के माहौल पर मेरा ध्यान ज़्यादा रहता था। मैं देखकर हैरान होता था कि आखिर भोजपुरी के नाम पर ये क्या हो रहा है। हीरो धोती पहने है तो उसे ये भी नहीं पता कि कांच कैसे बांधी जाती है। जनेऊ डाले हैं तो ये पता नहीं कि किस कंधे के ऊपर जनेऊ होता है और किसके नीचे, दीवार पर स्वास्तिक का चिन्ह बना है तो उल्टा, हीरोइन कीचड़ से होकर भागती है तो गांव में है, और गाना गाती है तो ऐसी जगह आ जाती है जहां पेड़ पौधे सब पहली नज़र में दिखावटी नज़र आते हैं। वही राजपीपला की हवेली, वही हवेली के आगे का अहाता, वही पार्क और वही झील वही पहाड़। कहीं किसी भी छोर से ना तो यूपी का रहन सहन और ना ही पटना- छपरा का रहन सहन। घास तक लंबी पत्तियों वाली नज़र आती है। ना ज़मीन पर दूब और ना ही गलियों में नीम निमकौरे। सिनेमा में वातावरण या कहें कि एंबिएंस...ही दर्शकों को बांधे रखता है। लेकिन, भोजपुरी में सब चलता है ना इन सारी फिल्मों का बेड़ा गर्क कर दिया। कहानी में दम ना हो, म्यूज़िक के नाम पर बस शोर शराबा हो तो भला कितना भी बड़ा हीरो क्यों ना हो, फिल्म चलती नहीं है।

खैर, मैं बात कर रहा था लुधमऊ गांव की, जहां कि हमने फिल्म भोले शंकर की शूटिंग शुरू की थी। फिल्म भोले (मनोज तिवारी) और शंकर (मिथुन चक्रवर्ती) के बचपन का रोल दो बाल कलाकारों शिवेंदु और उज्जवल ने किया है। दिसंबर की शुरूआत में कितनी कड़ाके की ठंड पड़ती है, ये तो यूपी बिहार का बच्चा बच्चा जानता है। दो दिसंबर को हम लोगों को वो सीन शूट करना था जिसमें सरपंच रात ढले इन बच्चों की मां पर बुरी नज़र डालता है। कड़ाके की ठंड में हो रही शूटिंग में दोनों बच्चे बस एक पैंट शर्ट पहने थे और नंगे पैर थे। हम सभी ने दो दो स्वेटर और जैकेट डाल रखे थे, लेकिन गरीबी के हालात दिखाने की गरज से दोनों बच्चों को मैं ऊनी कपड़े नहीं पहना सकता था। पास में ही अलाव का इंतज़ाम था और दोनों बच्चे शुरू में शॉट देकर सीधे आग के पास जा बैठते। लेकिन हर शॉट के बाद कैमरामैन को मॉनीटर के पास आकर कुछ देखना शिवेंदु को अपनी तरफ खींच गया। अगली बार शॉट ओके हुआ तो ये बच्चा आग के पास ना जाकर सीधे मॉनीटर के पास आया। बिना किसी से कुछ बोले सीन को फिर से देखता रहा। अगला सीन लगा। कैमरामैन राजू केजी ने फ्रेम संभाला। असिस्टेंट करन त्रिपाठी ने क्लैप बोर्ड हाथ में लिया। मैंने शबनम कपूर, नरेंद्र पजवानी और दोनों बच्चों को आखिरी बार फ्रेम में एंट्री और एक्जिट समझाई और आकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया। सारे कलाकारों को अपना काम पता था, लेकिन जैसा कि अमूमन फिल्मों की शूटिंग के दौरान होता है, कोई ना कोई चीफ असिस्टेंट डायरेक्टर या कैमरामैन कलाकारों को फिर से ज्ञान देने ही लगता है, ये दिखाने के लिए कि देखो डायरेक्टर ने जो समझाया वो तो ठीक, लेकिन जब तक हम नहीं बताएंगे तो काम नही होने वाला। लेकिन यहां पासा उलटा पड़ गया।

हुआ यूं कि हमेशा अपनी रौ में रहने वाले राजू केजी ने दोनों बच्चों को फ्रेम में जो एंट्री समझाई वो मेरी बताई एंट्री से उलटी थी। और यही शिवेंदु ने उन्हें पकड़ लिया, बोला अंकल पिछली बार मैं राइट टू कैमरा एक्जिट हुआ था इस बार एंट्री लेफ्ट टू कैमरा ही होगा ना कि राइट टू कैमरा। इस बारह साल के बच्चे ने जो बोला, उसे सुनते ही पूरे माहौल में सन्नाटा छा गया। इतनी तकनीकी भाषा तो अच्छे अच्छे कलाकार भी सालों के बाद बोलते हैं और वो भी शूटिंग का पूरा ग्राफ समझकर। इस बच्चे का अभी तीसरा ही दिन शूटिंग का और उसने राजू केजी जैसे कैमरामैन की चूक पकड़ ली। राजू भाई खुद हैरान थे कि यार ये लड़का कितना होशियार है। सीन खत्म होने के बाद सारे तकनीशियन्स ने शिवेंदु को अपने पास बुलाकर बातचीत शुरू की और बातों बातों में ही समझ लिया कि शिवेंदु को फिल्ममेकिंग सीखने का बड़ा शौक है। शिवेंदु अभी क्लास 6 में है, और एनीमेशन बनाने का शौकीन है। कंप्यूटर के कैमरे से शूट करके और कंप्यूटर पर ही खुद एडिट करके तीन मिनट की फिल्म वो अपने आप बना चुका है। कहते हैं कि पूत के पांव पालने में दिखाई देते हैं, ये लड़का भी आगे जाकर कमाल कर सकता है। शूटिंग के अगले दिन हुआ कौन सा कमाल, जानने के लिए पढ़ते रहिए कैसे बनी भोले शंकर..?

कहा सुना माफ़,

पंकज शुक्ल
निर्देशक- भोले शंकर