शुक्रवार, 15 अगस्त 2008

मनोज तिवारी की 'मृदुलता'



भोले शंकर (6)गतांक से आगे..
गायकों के अभिनेता बनने की परंपरा भारतीय सिनेमा में बहुत पुरानी है। के एल सहगल हों या किशोर कुमार, सुरैया हों या मुकेश कोई कैमरे के सामने आने के आकर्षण से खुद को बचा नहीं पाया। नई पीढ़ी की बात करें तो सोनू निगम से लेकर पलाश सेन, लकी अली, वसुंधरा दास, हरभजन मान और यहां तक कि अब अदनान सामी भी हीरो बनने को तैयार हैं। इन सबने गायिकी में शोहरत के सोपान चढ़ने के बाद अदाकारी की तरफ छलांग लगाई। भोजपुरी गायक मनोज तिवारी का नाम भी इसी कड़ी में आता है। मनोज तिवारी ने जो भी कमाया है, अपनी मेहनत और अपनी काबिलियत के बूते कमाया है। गांव देहात के रीति रिवाज वो अब भी मानते हैं, बड़ों को पैलगी करना और सम्मान करना इस कलाकार की सबसे बड़ी खूबी है। भोजपुरी सिनेमा को दोबारा जीवन दान किसने दिया, इसे लेकर अक्सर बड़े बड़े दावे होते रहते हैं, लेकिन एक बात तो सबको माननी ही पड़ेगी, कि ससुरा बड़ा पइसावाला की कमाई ही वो दांव था जिसने तमाम निर्माताओं की तिजोरियां भोजपुरी सिनेमा के लिए खुलवा दीं। हिंदी सिनेमा के बड़े बड़े अभिनेताओं ने भी उन्हीं भोजपुरी फिल्मों में काम करने के लिए हामी भरी जिनमें से ज़्यादातर में मनोज तिवारी हीरो थे। ये फिल्में मनोज तिवारी को कैसे मिलीं? इस पर ना भी जाया जाए, तो कम से कम मनोज तिवारी के भोजपुरी सिनेमा के विकास में योगदान को नकारा नहीं जा सकता।

फिल्म भोले शंकर की मेकिंग की शुरुआत हमने इसके म्यूज़िक की बात से की थी। पूरी फिल्म में नौ गाने हैं, और ऐसा शायद पहली बार हुआ कि मनोज तिवारी की फिल्म में आधे से ज्यादा गानों में दूसरे कलाकारों को मौका मिला है। और पाठकों को ये जानकर आश्चर्य हो सकता है कि भोले शंकर के गानों को लेकर मनोज तिवारी से बस और बस एक बार ही सिटिंग हुई। वैसे तो गीतकार बिपिन बहार को भोजपुरी सिनेमा में मनोज तिवारी का हनुमान माना जाता है, लेकिन फिल्म भोले शंकर में बिपिन बहार भी खिसक कर डायरेक्टर के पाले में आ गए। फिल्म के एक एक गाने पर बिपिन बहार खूब कसे गए और कहते हैं कि तबला या ढोलक जितनी कसी होती है, आवाज़ भी उसकी उतनी ही दमदार निकलती है। मनोज तिवारी के सुपरहिट गाने 'एम ए में लेके एडमीशन कंपटीशन दे ता' को मैं फिल्म भोले शंकर में शामिल करने की योजना तब से बनाए था, जब इसकी कहानी बस फाइनल ही हुई थी। लेकिन, इस गाने की सिचुएशन और सीन का मूड देखकर मनोज तिवारी ने इसकी बजाय अपना एक और गाना मुझे सुझाया। मनोज तिवारी का मान मैंने रखा और बजाय अपनी पसंद का गाना रखने के मनोज तिवारी की पसंद का गाना ही फिल्म में रखा। हालांकि बाद में मुझे पता चला कि जिस गाने की सिफारिश मैंने अपनी फिल्म के लिए की थी, वो गाना मनोज तिवारी ने किसी और फिल्म के लिए दे दिया है, उस दिन मुझे बहुत आत्मिक कष्ट भी हुआ। मैंने ये बात अपने एक दो करीबी लोगों से साझा भी की। लेकिन, जब मनोज तिवारी का बताया गया दूसरा गाना बनकर तैयार हुआ, तो दिल को तसल्ली हुई। और वो इसलिए क्योंकि गाना यही बेहतर बन पड़ा है।
नौकरी के लिए भटकते युवाओं के इस पसंदीदा गाने - 'दौड़त धूपत चप्पल जूता फाट गइले भाईजी, नौकरिया नहीं मिलल मन उदास भइले भाईजी' - से जुड़ी हर बात दिलचस्प है। वैसे तो जब इस गाने को आप सुनेंगे तो लगेगा कि इसका म्यूज़िक वाकई शानदार है और गाना सुनकर ये भी लगेगा कि इसकी रिकॉर्डिंग लाइव यानी फुल आर्केस्ट्रा के साथ की गई है। लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी, कि जब मनोज तिवारी ने ये गाना रिकॉर्ड किया तब इसका म्यूज़िक तैयार ही नहीं हुआ था। संगीतकार धनंजय मिश्रा ने पूरा गाना क्लिक पर रिकॉर्ड किया और मनोज तिवारी की रिकॉर्डिंग हो जाने के बाद इसका संगीत तैयार किया। यही नहीं, इस गाने की शूटिंग का भी किस्सा बहुत दिलचस्प है। जिस दिन लखनऊ के इंटरनेशन सेंटर फॉर स्पेशल एजूकेशन में ये गाना शूट होना था, उस दिन किसी बात को लेकर मनोज तिवारी का मूड खराब हो गया। हमें रात में घुप्प अंधियारा होने के बाद हॉस्टल में इसकी शूटिंग करनी थी। ठंड उस दिन कड़ाके की पड़ रही थी और कॉन्टीन्यूटी के हिसाब से मनोज को केवल शर्ट पैंट पहन कर गाना रिकॉर्ड करना था। लाइटिंग हो गई, साथी कलाकार तैयार हो गए। मनोज तिवारी को बुलाया गया। मनोज आए और आते ही बोले इतनी ठंड में शूटिंग नहीं कर पाऊंगा। तुरंत उनके लिए थर्मल इनर वियर का इंतजाम कराया गया। ये इंस्टीट्यूट लखनऊ से बिल्कुल बाहर है और रात दस बजे इसका इंतजाम कैसे हुआ, ये बात बस हम लोग ही जानते हैं।

अब बारी आई शूटिंग की। कैमरामैन राजूकेजी ने पहले शॉट के लिए क्रेन वगैरह लगाकर पूरी तैयारी कर ली थी। कोरियोग्राफर रिक्की भी बाकायदा अपने स्टेप्स वगैरह के साथ तैयार थे। तभी मेरे और मनोज के बीच एक आइडिया उपजा। मेरा मानना था कि ये गाना पूरी तरह फ्री स्टाइल होना चाहिए, बिल्कुल कैंपस की रॉ अपील के साथ। लेकिन इसके लिए स्टेडीकैम की ज़रूरत पड़ती और वो उस समय लखनऊ में मिलना मुमकिन नहीं था। एरी 3 जैसे वजनी कैमरे को कंधे पर रखकर शूटिंग करना आसान नहीं होता और शायद कोरियोग्राफर व कैमरामैन इसके लिए तैयार भी नहीं होते। लेकिन मेरी परेशानी को मनोज तिवारी ने एक पल में भांप लिया। भोजपुरी सिनेमा का ये शायद पहला गाना होगा, जिसकी कोरियोग्राफी मनोज तिवारी ने खुद की। मनोज तिवारी ने मुझसे मॉनीटर पर जाकर बैठने को कहा, और पूरे गाने की कमान अपने हाथ में ले ली। कोरियोग्राफर रिक्की समझ ही नहीं पाया कि ये क्या हो रहा है। मैंने कहा बस जो हो रहा है उसे शूट करते जाओ। यूनिट का हर सदस्य परेशान कि मनोज तिवारी को ये क्या हो गया। क्यों वो कोरियोग्राफर की बात नहीं सुन रहे। बस जो हो रहा था वो मैं जानता था और जानते थे मनोज तिवारी।

गाने की शूटिंग खत्म हुई। अगले दिन से मनोज तिवारी का लखनऊ में काम खत्म था। यूनिट के ज़्यादातर लोग इस बात को लेकर चर्चा करते रहे कि मनोज तिवारी ने जो किया वो ठीक नहीं किया। मैंने तब जाकर सबको बताया कि ये सब पूरी प्लानिंग के तहत हुआ। हम लोगों ने मुंबई आकर गाना एडिट किया और फिल्म की तकनीकी टीम ने जब इसका फाइनल वर्जन देखा तो हर कोई दंग रह गया। ऐसा कैंपस सॉन्ग अब तक भोजपुरी में तो क्या हिंदी सिनेमा में भी कम ही देखने को मिला है। आज बस इतना ही, कल बात मौली, पूनम यादव और उज्जयनी की।

कहा सुना माफ़,

पंकज शुक्ल
निर्देशक- भोले शंकर