सोमवार, 1 अक्तूबर 2007

माफ़ीनामा !!!

ला हो, गूगल वालों का जिन्होंने अपने ही ब्लॉग पर वापस पहुंचने का नया रास्ता बना दिया, वरना हम तो वापस इस ब्लॉग पर आने की उम्मीद ही छोड़ बैठे थे। कहां तो हम कम से कम हर हफ्ते कुछ ना कुछ लिखने का इरादा ठाने बैठे थे और कहां पूरा महीना हो गया, यहां कुछ भी ना लिख पाए।

ख़ैर अब पासवर्ड भूलने की गलती ना होने पाए, इसके लिए इंतजाम कर लिया है, उम्मीद करता हूं कि ये इंतजाम पुख़्ता रहेगा। तो भइया शुरुआत करते हैं ज़िंदगी की नई भूल भुलैया से, जिसका नाम है सिनेमा। वैसे नई तो नहीं कहेंगे क्योंकि जोधपुर में दूसरी क्लास में गुलज़ार साहब की 'परिचय' ना दिखाए जाने पर घर में किया गया बाल हठ हमें अब भी याद है। फिर राज कपूर की 'बॉबी' , देवर फिल्म्स की 'हाथी मेरे साथी' और कुछ और फिल्में उस दौरान देखीं, जब शायद ठीक से निकर का नाड़ा बांधना भी नहीं सीख पाए थे।

फिर शहर से हम गांव आ गए और कोई चार साल के इंटरवल के बाद देखने को मिली 'शोले'। रिपीट रन में भी हाउस फुल। घटी दरों पर फिल्में दिखाने का चलन अब बड़े शहरों में नहीं रहा वरना इससे बढ़िया बिज़नेस फंडा दूसरा कोई नहीं। वापस शहर आए तो इतनी फिल्में देखीं कि आगे-पीछे सबका हिसाब बराबर हो गया। ग्रेजुएशन में तो बस हर दिन का यही एजेंडा रहा कि अखबार के कॉलम में छपने वाली फिल्मों के नामों में से कोई अनदेखी नहीं होनी चाहिए। यानि कि किताबी पढ़ाई कम और सिनेमा की कढ़ाई ज़्यादा होती रही। माफी घर वालों से भी मांगने का दिल करता है कि उनकी मेहनत की कमाई हमने पढ़ाई में कम और सिनेमा देखने में ज़्यादा खर्च की।

अब इसकी पाई पाई चुकाने का वक़्त आ चुका है। फीचर फिल्म बनाने का जो कीड़ा हम सालों से दबाए बैठे थे, उसने कूकून से बाहर आने का रास्ता पा लिया है। हौसला मिला तो दादा मिथुन चक्रवर्ती की हां, जो बस एक बार मनुहार करने पर रिश्तों को निभाने की ख़ातिर अपने करियर की पहली भोजपुरी फिल्म में काम करने के लिए हां कहे बिना नहीं रह सके। दादा लाजवाब हैं। घर पर बुलाते हैं तो बिल्कुल अपनों की तरह मिलते हैं। ना किसी सुपर स्टार सा गुरूर और ना ही किसी फिल्मी सितारे जैसा नख़रा। भगवान उनको और उनके घरवालों को बरकत बख्शे।

भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार मनोज तिवारी ने भी अपनापन दिखाया और वोट फॉर खदेरन (मनोज तिवारी का किसी नेशनल न्यूज़ चैनल पर पहला शो बिहार चुनाव के दौरान हमारे ही खुराफ़ाती दिमाग की उपज रही) को याद करते हुए फिल्म के लिए हां कर दी। लेकिन सबसे मुश्किल काम अब तक का रहा फिल्म के लिए एक अदद हीरोइन तलाश करना। कितनी हसीनाओं ने अपने जलवे दिखाए, कुछ ने तो और भी ना जाने क्या क्या दिखाने का इशारा भी किया। लेकिन हमें चाहिए थी एक ऐसी लड़की, जो हुस्न की नुमाइश की बजाय अदाकारी का दम भरती हो। मुंबई जैसे शहर में हीरोइन्स की कोई कमी नहीं हैं, लेकिन ये मूक सिनेमा काल में होतीं तो शायद बेहतर होता। अदाकारी से किसी को कोई लेना देना नहीं। सब आएंगी, अपनी चंद बिंदास सी तस्वीरें लेकर। और भोजपुरी तो दूर हिंदी में भी एक संवाद बोलना हो तो पहले दो गिलास पानी पिएंगी।

ख़ैर, नाशिक जैसे छोटे शहर की एक लड़की ने हमारे हौसले पर पानी फिरने से बचाया। सुभाष घई जैसे पारखी की फिल्म किसना में एक छोटा रोल कर चुकी वृषाली भांबेरे सिनेमा के आसमान पर पहली कुंलाचे भर रही है। वृषाली की पहली भोजपुरी फिल्म श्रीमान ड्राइवर बाबू रिलीज़ के लिए तैयार है। मनोज तिवारी (अपनी फिल्म के भोले) की गौरी वो ही बनने जा रही है। वृषाली मुंबइया नस्ल की नहीं है। वो अपने हुनर के बूते कुछ करना चाहती है। पिता मराठी के लेखक रहे हैं।

शुरुआती टीम बन चुकी है। यशराज फिल्म्स के दो और महारथी सिनेमैटोग्राफर राजू केजी और एसोसिएट डायरेक्टर मनोज सती भी कंधे से कंधा मिलाने को तैयार हैं। के सी बोकाडिया के गुरबत के दिनों के साथी रहे मुकेश शर्मा भी साथ हैं। गुणी संगीतकार धनंजय मिश्रा ने अपना बाजा कस लिया है, पसीना पसीना हैं वो कि हमारे जैसा कोई पागल भोजपुरी में भी संगीत को लेकर इतनी मेहनत उनसे करा सकता है, लेकिन फिल्म के गीतों का जो शुरुआती ख़ाका बना है, वो मन के तार हिला देने वाला है। बाकी सब भोले शंकर के हाथों में हैं...।

जारी...